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श्रद्धा है बुद्धि के आगे की बेवकूफ़ी || आचार्य प्रशान्त (2014)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: श्रद्धा क्या है? कभी-कभी आप लोग बोलते हो ना, और जब बोलते हो तो थोड़ी थकान हो जाती है, तो अचानक से मन कहता है, “चुप हो जाओ, इतनी बातें तो हैं ही उन्हीं को सुन लेंगे तो उत्तर मिल जाएगा।” अभी थोड़ी देर के लिये चुप हुआ और मन ने कहा कि ये जो बह रहा है और जिसकी आवाज़ लगातार आ ही रही है, इसी को आप ध्यान से सुन लें तो क्या पता नहीं लग जाएगा श्रद्धा क्या है?

ऐसा होगा नहीं (सभी हँसते हैं) पर थकान के कारण मन ने ये बात कही। श्रद्धा क्या है? साफ़ साफ़ न जानना फिर भी मन का न परेशान होना न डिगना, ये श्रद्धा है। ऐसे समझिये, आप किसी के विषय में सारी जानकारी इकठ्ठा कर लो, और फिर आपको यकीन आये कि ठीक है सब कुछ। आप किसी के बारे में सारी जानकारी इकठ्ठा कर लो – माँ बाप, काम धंधा, धर्म, जात, गोत्र, भाई-बहन-खानदान, रुपया-पैसा, आर्थिक स्थिति, पूरा इतिहास, और फिर आपको यकीन आये कि ठीक है सब कुछ, इसका नाम होता है विश्वास।

और आप किसी से मिलो, उसकी आँखों में देखो, और आपको उसका नाम भी नहीं पता है, और अचानक एक अकारण विश्वास आ जाए कि ठीक है सब कुछ, इसका नाम है श्रद्धा। “कुछ हम जानते नहीं तुम्हारे बारे में, पर फिर भी बड़ा यकीन है तुम पर। हम तुम्हारा नाम भी नहीं जानते, कोई कारण नहीं है तुम पर यकीन करने का, पर फिर भी दिल यकीन किये जाता है,” ये श्रद्धा है।

जब कारण हो यकीन करने का, तो विश्वास है, जब अकारण मन खिंचा चला जाए तो श्रद्धा है।

“तुम्हें जानते नहीं, तुम्हें देखा नहीं, पर फिर भी, बिलकुल पता है कि तुम हो,” ये श्रद्धा है।” कोई प्रमाण नहीं तुम्हारे होने का, लेकिन फिर भी जानते हैं, अच्छे से जानते हैं कि तुम हो,” ये श्रद्धा है। और दुनिया लाख कहेगी, दुनिया सौ प्रमाण भी लाकर के दे देगी, तब भी हमें पता रहेगा कि तुम हो। वो प्रमाण गलत नहीं होंगे, “दुनिया ने प्रमाण ला कर के दिया कि तुमने चोरियाँ की, दुनिया ने प्रमाण ला कर के दिया कि तुमने अपना नाम भी हमें गलत बताया, पर फिर भी मन कह रहा है सब ठीक है,” ये श्रद्धा है।

श्रद्धा को जो जानेगा, जो श्रद्धा में उतरेगा, वो स्वयं ही समझ जाएगा कि प्रमाण कितनी छोटी चीज़ होती है, और क्यों पतंजलि कह रहे हैं कि प्रमाण वृत्ति मात्र है। क्योंकि श्रद्धा तो कभी प्रमाण मांगती ही नहीं। न प्रमाण मांगती है, न प्रमाण के सामने झुकती है, वो कदर ही नहीं करती प्रमाण की। वो तो बस एक अकारण का बहा जाना है, तभी इस झरने की याद आई। अब कोई बड़ा तर्कशास्त्री हो तो कहेगा, देखिये साहब गुरुत्वाकर्षण का बल है, वो इसे नीचे खींच रहा है, ऊपर से नीचे को ही तो जा रहा है ना?

मुझे नहीं मालूम। आप झरने से पूछें तो वो ये नहीं कहेगा कि गुरुत्वाकर्षण के कारण जा रहा हूँ, और अगर आप ठीक-ठीक समझना चाहते हैं, तो अभी जब जाइएगा तो उसे ध्यान से देखिएगा ज़रा, उसकी मौज को देखिएगा, उसके बहाव को देखिएगा, भौतिकी कभी बता नहीं पाएगी आपको कि वो क्यों बह रहा है ऐसे? कभी नहीं बता पाएगी। वो तो श्रद्धालु मन ही समझ सकता है कि वो क्यों ऐसा बह रहा है?

भौतिकी उसकी पूरी व्याख्या कर देगी, आपको समीकरण लिख कर के दे देगी, कि तरल पदार्थों की गति जब होती है तो इन इन नियमों से संचालित होती है। और विक्षोम के ये नियम हैं, और चिपचिपापन उसको ऐसे प्रभावित करती है, ये सब बता देगी, और आपको लगेगा जान गये। कुछ नहीं जाने। सिर्फ झरना जानता है कि वो क्यों ऐसे बह रहा है। ये श्रद्धा है। तार्किक मन को श्रद्धा बेवकूफी जैसी लगेगी, लगनी चाहिए भी। बेवकूफी ही है, पर बड़ी प्यारी बेवकूफी है। जो प्यार को बेवकूफी से ज्यादा तवज्जो देते हों, उन्हीं के लिए खुले हैं श्रद्धा के दरवाज़े। और जिन्हें बेवकूफ होना गवारा नहीं है, वो कभी श्रद्धा को नहीं पाएँगे। क्योंकि श्रद्धा बेवकूफी ही है, मुझे कोई शक नहीं है, कोई आपत्ति नहीं है ये स्वीकार कर लेने में। श्रद्धा बेवकूफी तो है ही, बड़ी मीठी बेवकूफी है, कर के देखिये।

श्रोता १: हम आ रहे थे तो सड़क थी और सामने से ताज रौशनी पर बहुत सारी बसें आ रही थी, शुभांकर बैठा था, मैं, कुनाल, हम सब बैठे थे, तो कुनाल ने कहा कि ये गाड़ी चल कैसे रही है? मतलब सामने से रौशनी और ये सब, शुभांकर कहता, “श्रद्धा से।”

आचार्य जी: देखो,

श्रद्धा वो बेवकूफी है जो बुद्धि का अतिक्रमण कर के आती है। दो प्रकार कि बेवकूफियाँ होती हैं। एक बेवकूफी वो है जो बुद्धि से नीचे की होती है, निर्बुद्धि है, तमसा में पड़ा हुआ है। खोपड़ी चलती नहीं इसकी। श्रद्धा वो नहीं है। श्रद्धा तब है जब तुम जानते-बूझते बेवकूफी करो। श्रद्धा तब है जब बुद्धि से आगे निकल जाओ। पता है, अच्छे से पता है, अच्छे से पता है जो कर रहे हैं उसका क्या परिणाम है, लेकिन फिर भी करना है, बड़ा मज़ा आता है। श्रद्धा ये नहीं है कि पता नहीं था तो फिसल गए। श्रद्धा ये है कि पता था फिसलेंगे, और जानते बूझते फिसले। जानते बूझते फिसलने का नाम है श्रद्धा। बुद्धि से आगे जाने का नाम है श्रद्धा।

श्रद्धा वो वाली बेवकूफी नहीं है कि बुद्धि चलती ही नहीं, श्रद्धालु की बुद्धि खूब चलती है। उसकी बुद्धि में कोई खोंट नहीं है, वो सब समझता है, वो समझते हुए भी बेवकूफी करता है। क्या है बेवकूफी? बेवकूफी की परिभाषा क्या है? बुद्धि पर न चलना बेवकूफी है। ठीक है ना? श्रद्धा कभी बुद्धि पर नहीं चलती, इसीलिए बार-बार कह रहा हूँ कि श्रद्धा बेवकूफी है क्योंकि बुद्धि पर नहीं चलती वो। पर बुद्धि पर न चलने का मतलब है कि वो बुद्धि से ऊपर चलती है। बुद्धि पर न चलने का मतलब ये नहीं है कि वो बुद्धि से नीचे चलती है। पारा इंटेलिजेंस, सब इंटेलिजेंस नहीं।

श्रोता: आचार्य जी, जैसे बुद्धि होती है, तो आप कुछ कर रहे हो, अचानक से मन में आ जाए कि कारण कहाँ है? आपके पास कोई कारण नहीं होता इसके लिये। श्रद्धा भी ऐसे तो नहीं है कि आपने कहा ना कि पता होते हुए भी हम वो काम कर लेते हैं।

आचार्य जी: बिलकुल।(समर्थन में सर हिलाते हुए)

देखो, दो तरह के जागने होते हैं। एक तो जागना ये होता है कि आँखें बंद थी, सोये पड़े थे, जग गये, वो जागना भी महत्वपूर्ण है। है ना? उस जागने में क्या हुआ? उस जागने में मन अपनी एक हालत से दूसरी हालत में चला गया। सो रहा था, जाग्रति में आ गया, उसकी कीमत है, बिलकुल है। एक दूसरा जागना भी होता है, जिसमें वो सब कुछ जो तुम साधारण जागने में करते हो, तुम उसे करना छोड़ ही देते हो। ऐसा नहीं कि वो कर पाने कि तुममें काबीलियत नहीं रही।

सोता हुआ आदमी, उदाहरण के लिए ज्ञान नहीं पा सकता, सोता हुआ आदमी उदाहरण के लिए तर्क नहीं कर सकता। तुम्हें नींद से उठना पड़ेगा तभी तुमसे कोई तर्क किया जा सकता है, तभी तुम्हें कोई ज्ञान दिया जा सकता है। तो नींद से उठना ज़रूरी है ताकि तुम्हें ज्ञान मिले, ताकि तुम्हें तर्क मिले, अपने होने का एहसास मिले, नींद में अपने होने एहसास बड़ा क्षीण पड़ जाता है। तो ज्ञान, तर्क, अस्मिता, इनके लिए नींद से उठाना ज़रूरी है। और फिर होता है एक ज़बरदस्त रूप से उठ बैठना, जिसमे ज्ञान, तर्क, अस्मिता, रहते हुए भी तुम उनका उपयोग नहीं करना चाहते। वो दूसरी जाग्रति है, वो परम जाग्रति है, उस परम जाग्रति का नाम है श्रद्धा।

एक आदमी बिस्तर पर सोया पड़ा है। उसमें तो कुछ है ही नहीं, वो मन की ऐसा अवस्था में है जहाँ पर मन अपने ही दायरों में चक्कर काट रहा है। सोते हुए आदमी के लिए बस भूत होता है, वर्तमान जैसा कुछ होता नहीं। मन का एक दायरा है, मन उसी में चक्कर काट रहा है। फिर हुई जाग्रति, जाग्रति में तुम्हें साधन उपलब्ध होते हैं, इन साधनों का नाम है विचार, वितर्क, ज्ञान, इन साधनों का उपयोग करना है परम जाग्रति के लिए, असली जाग्रति के लिए। और असली जाग्रति जब होती है तब ये साधन छोड़ दिए जाते हैं।

ज्ञान की अपने आप में कोई कीमत नहीं है, ज्ञान सिर्फ तुम्हें जाग्रति से परम जाग्रति में ले जाने का साधन है। ज्ञान इसीलिए है ताकि ज्ञान का उपयोग करके ज्ञान को छोड़ सको। अस्मिता इसीलिए है ताकि मैं, मैं को पहचाने और मैं की व्यर्थता को जान कर के मैं का त्याग कर दे। साधारण जाग्रति से ज्यादा बड़ी जाग्रति है श्रद्धा। श्रद्धा अँधा होने का नाम नहीं है, कि कोई कहे अन्धविश्वास है श्रद्धा। श्रद्धा में तो तुम्हारी आँखें पूरी तरह खुल जाती हैं। शरीर की आँखें जब खुलें तब साधारण जाग्रति, और मन कि आँखें जब खुल जाएँ तो परमजाग्रती, उसका नाम है श्रद्धा।

समझ रहे हो?

श्रोता: आचार्य जी, आप कह रहे हैं कि परम जाग्रति में श्रद्धा आती है…

आचार्य जी: परम जाग्रति में श्रद्धा आती नहीं है। श्रद्धा में उठते हो तुम परम जाग्रति की तरफ। साधारण जाग्रति का तो प्रमाण है, परम जाग्रति की तरफ तुम जाओगे ही क्यों अगर श्रद्धा नहीं है? मैं तुम्हें विश्वास दिला सकता हूँ, शरीर की आँखें खोलने के लिए, पर मन की आँख जैसी तो कोई चीज़ होती नहीं, न दिखाई पड़ती है न किसी एक्स-रे में आती है। तो मैं तुमसे कह रहा हूँ मन की आँखें खोलो, तुम मेरी बात पर क्यों यकीन करो। इस यकीन का नाम श्रद्धा होगा। किसी ने देखी है आजतक मन कि आँखें? अब मैं तुम्हारे सामने बैठे-बैठे ये वाहियात बातें कर रहा हूँ, मन की आँखें, तुम बोल क्यों नहीं रहे हो, “मन में आँखें नहीं होती”। बोल क्यों नहीं रहे हो? तुम फिर भी मुझे सुने जा रहे हो जबकि मैं बिलकुल बेवकूफी की बात कर रहा हूँ, मन की आँखें, इसका नाम श्रद्धा है।

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