प्रश्नकर्ता: उर्वशी ने अर्जुन को श्राप दिया था कि तुम नपुंसक हो जाओगे।
श्राप क्या है? श्राप किस-किसको लग सकता है, और क्या श्राप से कुछ भी बिगड़ता नहीं है?
आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं बिगड़ता। कोई दूसरा श्राप नहीं देता तुम्हें, किसी दूसरे को कोई ज़रूरत ही नहीं है तुम्हारा नुकसान करने की। हम हैं तो तैयार, अपना नुकसान ख़ुद करने के लिए। कोई दूसरा क्यों श्राप दे हमें?
तो इस चक्कर में मत रहना कि बुरा करोगे तो किसी दूसरे का श्राप लग जाएगा, कोई दूसरा आकर तुम्हारा अहित कर जाएगा। जो ग़लत जी रहा है, वो अपना अहित कर चुका। अब उसे किसी दूसरे-तीसरे की ज़रूरत ही नहीं है फल भुगतने के लिए; वो फल वो भुगत चुका।
अर्जुन कुछ ग़लत कर नहीं रहा था, तो कथा भी बताती है कि उसे कोई फल इत्यादि लगा भी नहीं। अपितु कथा तो ये कहती है कि वो श्राप उसके काम ही आ गया। अर्जुन का पौरुष कुछ दिनों के लिए क्षीण हो गया तो बृहन्नला बन गया और बृहन्नला बन करके, नर्तक बन करके उसको एक साल अज्ञातवास बिताने में, छिपने में मदद मिली। तो श्राप उपयोगी सिद्ध हुआ, कुछ नहीं बिगड़ गया, क्योंकि बाहर वाला कोई कुछ तुम्हारा बिगाड़ ही नहीं सकता, अच्छे से समझ लो।
और मैं ये नहीं कह रहा कि बाहर वाला कोई तुम्हारा कुछ बना सकता है। न बिगाड़ सकता है, न बना सकता है, तुम ही काफ़ी हो। अरे भाई, जब तुम्हीं मात्र हो, तो तुम्हीं काफ़ी भी होओगे। दूसरा क्या बनाएगा, क्या बिगाड़ेगा जब दूसरा वास्तव में है ही नहीं?




