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शांत मन को कैसे प्राप्त हों? || (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः। छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।।

जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब संशय ज्ञान के द्वारा निवृत्त हो गए हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत मन को प्राप्त होते हैं। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ५, श्लोक २५

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। श्लोक कहता है, "जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब संशय ज्ञान द्वारा निवृत्त हो गए हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन परमात्मा में स्थिर है, वे ब्रह्मविद पुरुष शांत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।"

‘सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाना और सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत रहना’, इसके बारे में थोड़ा बताएँ।

आचार्य प्रशांत: पाप क्या है? जो नहीं करना चाहिए। अभी कर्मयोग की बात करी। बताओ फ़िर पाप क्या है? जो योग न दिलाए सो पाप।

पाप यही नहीं है कि किसी दूसरे का नुकसान कर दिया, चोरी कर दी इत्यादि-इत्यादि। खूब मेहनत कर रहे हो किसी ऐसी चीज़ में जो न योग दिलाएगी, न मुक्ति, न पूर्णता, वही पाप है, महापाप।

पुण्य भी समझ लो फ़िर क्या है – ज़रा सा कुछ करा नहीं ऐसा जो छोटी कामनाओं की पूर्ति करेगा, वही पाप। छोटी कामना की पूर्ति की ओर तुमने ज़रा-सा भी समय लगा दिया तो वही पाप है।

इतने निराश क्यों हो रहे हो? कोई दिक़्क़त नहीं है, ज्ञानी बन जाओ और कह दो कि ‘मैं आत्मा हूँ’। फ़िर मज़े में जो करना है, करो। लोग तरीके निकाल ही लेते हैं। रसगुल्ला खाओ और बोलो, “न मैं कर्ता हूँ, न भोक्ता हूँ। यह तो शरीर ने खाया; मैं तो आत्मा हूँ।”

प्र२: प्रणाम, आचार्य जी। आपने कहा कि काम वो करो जो मुक्ति की ओर ले जाता है। तो यह पता कैसे चलेगा? इसका कोई मापदंड है क्या?

आचार्य: जहाँ दर्द हो रहा हो, वहीं मापदंड है। मुक्ति आत्मा को तो चाहिए नहीं। मुक्ति किसको चाहिए?

श्रोतागण: अहम् को।

आचार्य: अहम् को मुक्ति क्यों चाहिए?

श्रोतागण: परेशान है ख़ुद से।

आचार्य: जहाँ परेशानी है, वहीं मापदंड है। मुक्ति बंधनों के ही तो विरुद्ध चाहिए न? तो जो काम कर रहे हो, देख लो कि वह तुम्हारा कोई बंधन काट रहा है कि नहीं काट रहा। काट रहा है तो मुक्ति की दिशा में है, नहीं काट रहा है तो व्यर्थ है।

अधिकांशतः हमारे काम बंधन काटते नहीं हैं, चार बंधन और चढ़ाते हैं हमारे ऊपर। बंधन जब आते हैं तुम्हारे पास तो बोल कर थोड़े ही आते हैं कि ‘हम बंधन हैं’। तब तो वो गठबंधन बन कर आते हैं, बंदनवार बनकर आते हैं।

नए बंधन पकड़ो मत और पुरानों के प्रति सदा एक अरुचि रहे, एक ग्लानि रहे, एक बेचैनी रहे। कभी समझौता मत कर लेना। बंधनों के प्रति ग्लानि रहेगी तो ही तुम्हारा कर्म मुक्ति की ओर उद्यत होगा। बंधनों के साथ क़रार कर लिया अगर, तो जो भी कर्म करोगे, वह और बंधन पकड़ने के लिए करोगे। जब पुराने बंधन बुरे लग ही नहीं रहे, उनके साथ ज़िन्दगी ने एक सुव्यवस्था कर ली है, तो नए बंधनों से भी फ़िर क्या ऐतराज़?

पुरानों के प्रति हमेशा एक कचोट रहे। दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँककर पिए। पुरानी ग़लतियाँ भूल नहीं जानी हैं, पुरानी ग़लतियाँ जो भूल गया, वो उन्हीं ग़लतियों को दोहराएगा, और बड़े परिमाण में दोहराएगा।

दंडित हो, सदा यह याद रखना कि दंड भोग रहे हो। जिसको यह याद रहेगा कि वह दंड भोग रहा है, जिसमें अपनी दंडित अवस्था के प्रति लज्जा रहेगी, ग्लानि रहेगी, वही अपने लिए नए दंड का निर्माण नहीं करेगा। पहली बात, वह नए दंड का निर्माण नहीं करेगा और दूसरी बात, वह जो उसने पुराने बंधन पकड़ रखे हैं, उनसे मुक्ति के लिए सदा सचेत रहेगा, कुछ कर्म करेगा। यही कर्मयोग है।

कर्मयोगी का पुरस्कार यह होता है कि वह आगे भोगने के लिए नया कर्मफल तैयार नहीं करता। पुराना कर्मफल काटता चलता है और आगे के लिए कोई नया कर्म तैयार नहीं करता। वह कुछ ऐसा नहीं करता जो आगे अब उसको और बंधन देगा, और बेड़ियाँ और परेशानियाँ देगा। वह कहता है कि “पहले जो कर लिया, वही बहुत है, उसी को भोगे जा रहे हैं, उसी का दंड खत्म नहीं हो रहा। अब ज़रा भी और ग़लती नहीं करेंगे। ग़लत रास्ते पर बहुत दूर चले आए हैं, अब इसी रास्ते पर और आगे थोड़े ही बढ़ते जाएँगे।“ वह तत्काल मुड़ जाता है।

कृपया सावधान रहें, कर्मयोग का यह अर्थ बिलकुल भी नहीं होता है कि जो कुछ भी कर रहे हो, उसे कृष्ण को अर्पित कर दो। यह हमने बड़ा अन्याय कर दिया है भगवत-वचन के साथ भी। हम किसी को नहीं छोड़ते, हम किसी को नहीं बख़्शते, चाहे वो कृष्ण ही क्यों न हों!

कर्मयोग का साधारण प्रचलित अर्थ यही चल रहा है – जो भी कर रहे हो, कृष्ण को समर्पित कर दो। अरे, जो भी नहीं कर रहे हो, कर्मयोग सबसे पहले कहता है कि फालतू काम करना ही नहीं है। 'जो भी कर रहे हो’, उससे क्या मतलब है? जो भी कर रहे हो उसको रोको। सिर्फ वही करना है जो तुम्हें पूर्णता देगा, योग देगा, मुक्ति देगा।

यह थोड़े ही है कि छप्पन भोग खाने बैठे हो तो उससे पहले थोड़ा होम दे दिया कृष्ण को और कहा कि “देखो, यह सब कृष्ण को अर्पित है” और फ़िर सब कुछ ख़ुद खा गए। कहते हैं, “कर्मयोग यही है, भाई। जो भी करते हैं, कृष्ण को अर्पित करके करते हैं।”

एक-से-एक धुरंधर होते हैं। एक सज्जन थे, वे सरकारी नौकरी करते थे, तो उनको घूस में खूब गड्डियाँ मिलती थीं। तो वे उसको ला करके पहले कृष्ण की मूर्ति के आगे रख दें, कहें, “यह आपका हो गया।” फ़िर कहें, “अब मैं इसको प्रसाद मानकर ग्रहण करूँगा।” वे कहें कि यही तो कर्मयोग है। घूस आसानी से थोड़े ही मिलती है, बड़ा पौरुष चाहिए। “कर्मयोगी हैं हम, हमेशा करते रहेंगे, करना कभी नहीं छोड़ेंगे!” क्या करना? “घूस खाना!”

योग का मतलब ही है कि करे जाओ, करे जाओ। जितना अनाचार-दुराचार है, सब करे जाओ। कर्मयोग है यह। और वह सब ला करके कृष्ण की प्रतिमा पर चढ़ा दो, और अब बोलो, “प्रसाद खाओ, बच्चों। लड्डू, यह गड्डी तेरी है, लल्ली की माँ, यह सबकुछ तेरा है।” यह नहीं है कर्मयोग।

कहीं भी यह पढ़ना कि ‘जो कुछ भी कर रहे हो, कृष्णभाव से करो या कृष्ण को अर्पित करके करो’, वहीं बिलकुल सावधान हो जाइए, बुद्धू बनाया जा रहा है।

स्वयं कृष्ण अर्जुन से ये कह रहे हैं क्या कि, ‘अर्जुन जो कुछ भी करना है, कर’? ऐसा कह रहे हैं क्या? यह छूट दी है क्या कि ‘अर्जुन, जो करना है कर’? कह रहे हैं कि, “एक ही काम कर, कुछ और नहीं करना है। तू युद्ध कर, उसके अलावा कोई काम करने योग्य ही नहीं है।“ यही कर्मयोग है। बाकी सारे काम बंद करो, व्यर्थ के धंधे बंद करो। एक ही काम है करने लायक, उसके अलावा कुछ नहीं है करने योग्य। वह करने में प्राण भी जाएँ तो अच्छी बात है। यह कर्मयोग है।

कर्मयोग कहता है, “नियतं कर्मम कुरु।" नियत कर्म करना है, सब कर्म नहीं करने। नियत कर्म को लेकर भी आम जनमानस के साथ बड़ा खिलवाड़ किया है। नियत कर्म तुमको यह बता दिया गया है कि जो भी तुम्हारी सामाजिक ज़िम्मेदारी वगैरह है, वही तुम्हारा नियत कर्म है। तो कर्मयोग का मतलब यह बताया गया है कि अपनी ज़िम्मेदारियों का पालन करना ही कर्मयोग है।

उसका समाधान भी श्रीकृष्ण ने ही कर दिया है साफ़-साफ़। उन्होंने बता दिया कि नियत कर्म क्या है। “सारे धर्मों का परित्याग करके सिर्फ मेरी शरण में आओ, अर्जुन। यह तुम्हारा एकमात्र धर्म है। सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।”

नियत कर्म का मतलब यह नहीं होता कि जब जातिवाद बहुत चलता था तो बताया जाता था कि “नियत कर्म का मतलब है कि अगर ब्राह्मण पैदा हुए हो तो यज्ञ इत्यादि कराओ, शिक्षण इत्यादि करो, यह तुम्हारा नियत कर्म है। लोहार पैदा हुए हो तो लोहा ठोको, सुनार पैदा हुए हो तो सोने का व्यापार करो, चांडाल पैदा हुए हो तो जाओ श्मशान बैठो, यही नियत कर्म है तुम्हारा।“ पहले यह सब खूब चलता था। यह बड़ी मूर्खतापूर्ण और शोषणपूर्ण अवधारणाएँ हैं, दुष्प्रचार है।

अब आज-कल नियतकर्म का यह अर्थ चलता है कि जो भी तुम्हारे पारिवारिक-सामाजिक कर्तव्य हैं, उनका पालन करो, यही नियत कर्म है। यही तो तुम्हारी नियति है, यही तो तुम्हारा नियत कर्म है। नहीं, नियति तुम्हारी कृष्ण मात्र हैं। तो नियत कर्म क्या है फ़िर? जो कृष्ण की ओर ले जाए। और कोई कर्म करने की ज़रूरत नहीं है, भाई। और कोई तुम्हारा नियत कर्म है ही नहीं।

कोई बताए कि, “देखो, तुम यह हो, तुम वह हो, यही तुम्हारा नियत कर्म है, यही तुम्हारा कर्तव्य है, यही तुम्हारी ज़िम्मेदारी है।“ तो वह तुम्हें बरगला रहा है, वह अपने स्वार्थ के लिए तुम्हारा शोषण कर रहा है। नियत कर्म सिर्फ़ एक है: ‘मामेकं शरणं व्रज’। कुछ भी नहीं करना है, सिर्फ़ एक काम करना है। और बहुत कुछ कर रहे हो तो वो कर्म बंद करो तत्काल।

कर्मयोग का बिलकुल यह आशय है कि जो करेंगे ज़ोर लगाकर करेंगे, पूरी ऊर्जा से करेंगे, दिल-ओ-जान लगाकर करेंगे, लेकिन नियत कर्म करेंगे। नियत कर्म के अलावा कोई नहीं करेंगे।

नियत कर्म यह नहीं है कि तुम गृहिणी हो तो नाश्ता बनाओ, खाना बनाओ, रात्रि-भोज बनाओ। यही बताया जाता है कि, “यही तो मेरा नियत कर्म है, आचार्य जी। मैं बड़ी कर्मयोगिनी हूँ।“ अच्छा, क्या करती हैं? “नाश्ता बनाती हूँ।” यह तो गज़ब कर्मयोग है! नाश्ता बनाते हैं, कर्मयोग है। नाश्ता बना-बनाकर वैतरणी पार कर जाएँगी? हाँ?

“भाईसाहब, हम तो ठेकेदार हैं और जी-जान से काम करते हैं सोलह घण्टे। देखिए, हम और तो पूजा उपासना जानते नहीं, हम तो कर्मयोगी हैं।” अद्भुत! दिन के सोलह घण्टे ठेकदारी करते हैं, यह कर्मयोग हो गया?

और जिन लोगों का अध्यात्म से कोई लेना-देना नहीं, जो अपनी टुच्ची आकाँक्षाओं के लिए दिन-रात दुनियादारी में लगे रहते हैं, उनको बड़ी सुविधा होती है घोषित करने में कि वे कर्मयोगी हैं। न उन्हें स्वाध्याय करना, न सत्संग करना, न ध्यान करना, न ज्ञान करना। उनको क्या करना है? बस अपनी आकाँक्षाओं के लिए दिन-रात लगा करके मेहनत करनी है। जूझे हुए हैं कि अगली कोठी अपनी कब खड़ी करेंगे। और उनसे पूछो, “यह तुम क्या कर रहे हो, ज़िन्दगी किस चीज़ में बिता रहे हो?” तो कहेंगे, “हम तो कर्मयोगी हैं। देखिए, हम भजन-कीर्तन वगैरह वाले नहीं हैं, हम तो कर्मयोगी हैं।” ये अवधारणाएँ मूर्खतापूर्ण तो हैं ही, अतिघातक हैं, इनसे बचिएगा।

युद्ध अर्जुन भी कर रहा है और युद्ध उधर से दुर्योधन भी कर रहा है, दोनों क्या कर रहे हैं? युद्ध कर रहे हैं। एक ही मैदान पर खड़े भी हैं, एक ही तरह के शस्त्रों का संचालन भी कर रहे हैं। दूर से देखेंगे तो लगेगा कि दोनों एक ही काम कर रहे हैं, लेकिन फ़िर भी दोनों नहीं हुए कर्मयोगी। कर्मयोग एक बहुत विशेष तरह का कर्म है। हर कर्म कर्मयोग की परिभाषा में नहीं आता।

यह तो छोड़ दो कि अर्जुन और दुर्योधन की तुलना, अर्जुन और भीम तो एक पक्ष से लड़ रहे हैं न? पर दोनों कर्मयोगी नहीं हुए। क्यों? अंतर समझना। अर्जुन लड़ना नहीं चाहते थे। अर्जुन लड़े हैं कृष्ण की ख़ातिर, नहीं तो अर्जुन ने तो पलायन कर दिया था, ठीक? अर्जुन किसके लिए लड़ रहे हैं?

श्रोतागण: कृष्ण के लिए।

आचार्य: और भीम किसके लिए लड़ रहा है?

श्रोतागण: स्वार्थ के लिए।

आचार्य: भीम लड़ रहा है कि चोट है, द्वेष है; राज्य पाना है, दुर्योधन को मिटाना है, द्रौपदी का सम्मान जीतना है। दोनों एक ही पक्ष पर खड़े हैं पर दोनों कर्मयोगी नहीं हुए। जो कृष्ण के लिए युद्ध कर रहा है, वह कर्मयोगी है। जो किसी और के लिए कर रहा है—वह अपनी बीवी के लिए कर रहा हो, अपने राज्य के लिए कर रहा हो—वह कर्मयोगी नहीं हो गया।

अंतर सूक्ष्म है, इसको समझकर रखिएगा। आप अपनी पत्नी के लिए निकले हैं युद्ध करने तो आप कर्मयोगी नहीं हो गए। आप राज्य के लिए निकले हैं कमाने तो आप कर्मयोगी नहीं हो गए। हाँ, आप कृष्ण के लिए कुछ कर रहे हैं तो आप कर्मयोगी हुए, अन्यथा बिलकुल भी नहीं।

यही मत देखो क्या कर रहे हो, यह देखो किसके लिए कर रहे हो।

यह बात कुछ दिन पहले मैंने बहुत ज़ोर दे करके बोली थी, ‘ग़ौर से देखो, जो भी कर रहे हो, किसके लिए कर रहे हो।’ हाँ, पुणे विश्रांति शिविर में बोली थी। सारा मामला वहीं पर साफ़ हो जाता है, उघड़ जाता है जब पूछते हो कि, “जो कर रहा हूँ, वह किसके लिए कर रहा हूँ?” और जिसके लिए कर रहे हो, अगर उसका नाम कृष्ण नहीं है, तो छोड़ो कर्मयोग वगैरह।

और कृष्ण माने क्या? कृष्ण माने कोई प्रतिमा नहीं, महाभारत की कथा का, भागवत पुराण का कोई पात्र नहीं। कृष्ण माने निराकार ब्रह्म, कृष्ण माने स्वयं मुक्ति। कृष्ण का सम्बन्ध किसी पंथ, प्रथा या धर्म से नहीं है। पृथ्वी पर जो ऊँची-से-ऊँची बातें कही गई हैं, चाहे जिस देश में कही गई हों, जिस काल में कही गई हों, जिस जगह पर कही गई हों, जिसके मुख से कही गई हों, सब बातें कही मुक्ति के लिए ही गई हैं। तो कृष्ण का अर्थ है वह जो मन की, अहम् की उत्कृष्टतम कामना है, उसका नाम कृष्ण है।

कृष्ण, फ़िर समझा रहा हूँ, दसवीं शताब्दी ईसा-पूर्व की किसी कहानी के कोई पात्र नहीं हैं। हम सब अहम् हैं, और अहम् जिसके लिए व्याकुल है, उसका नाम कृष्ण है। जिन्होंने कृष्ण का कभी नाम भी नहीं सुना, वो भी व्याकुल कृष्ण के ही लिए हैं।

कोई हो सकता है अफ्रीका के किसी कबीले का सदस्य, या कोई ईसाई हो सकता है या कोई मुस्लिम हो सकता है, व्याकुल तो सभी हैं न? हम सब क्या हैं, छटपटाती चेतना हैं न एक बिलकुल? यह जो छटपटाहट है, उसका जो लक्ष्य है, उसका नाम कृष्ण है। उसको आप कुछ और नाम भी दे सकते हैं। नाम में बहुत कुछ नहीं है।

कर्मयोग कहता है कि, “जब तुम व्याकुल हो ही, छटपटा रहे ही हो, तो ईमानदारी का खेल खेलो न। प्यासे हो अगर तो पानी पियो न, ये रेत क्या चबा रहे हो?” यह कर्मयोग है। प्यासे को पानी चाहिए, रेत नहीं। हम ऐसे विचित्र प्यासे हैं जो प्यासे होते हुए भी क्या चबाते हैं? रेत। और पूरी कोशिश कर-करके हम रेत अर्जित करते हैं चबाने के लिए।

हमको पता ही नहीं है कि वास्तव में हमको चाहिए क्या। तो पूरे जीवन हम करते बहुत हैं, करते खूब हैं, और जो करते हैं, उसका फल भी पाते हैं। जब फल आ जाता है तब पता चलता है यह तो कोई विषफल है, कोई ऐसी चीज़ है जो चाहिए ही नहीं थी।

दो तरीके से मारे जाते हैं: पहली बात, जो मेहनत की, वो बर्बाद गई; दूसरी बात, यह जो फल आया है, इसको ढोना भी तो पड़ेगा। आप फ़ेंक थोड़े ही सकते हो जो फल आया, उसका भोक्ता भी बनाना पड़ेगा। अरे, बाप रे! दोहरी मार पड़ी कि नहीं पड़ी? दस, बीस, चालीस साल बड़ी मेहनत करके कुछ अर्जित किया और जो अर्जित किया, वह क्या निकला? दो टन का पत्थर। और अब यह सुविधा नहीं है कि उसको यूँ ही फ़ेंक दो। “अरे! ग़लत चीज़ आ गई, कूरियर लौटा देंगे।” यह सुविधा है ही नहीं। जो कमाया है, वो खाना पड़ेगा।

तो बीस-तीस साल मेहनत करके क्या कमाया? दो टन का पत्थर। अब वह आ गया है, अब उसको खाओ। दोहरी चोट पड़ी न? ऐसे ही चल रही है न ज़िन्दगी? फल चाहिए, फल चाहिए, और जब फल हाथ में आ गया तो आँखें फटी-की-फटी रह जाती हैं, “यह क्या?” उसको फेंकने की कोशिश कर रहे हैं और हाथ से चिपक गया। वह कह रहा है कि, “मुझे खाओ, मुझे भोगो।“ जो कर्ता है, उसे भोक्ता होना पड़ेगा। किया है तो भोगो। अब वह विषफल चिपका हुआ है, अब उसे तुम्हें भोगना है। भोगो।

रेस्त्रां में कुछ ग़लत ऑर्डर कर देते हो तो इतना ही होता है न कि जब वह सर्व कर गया, तो कहते हो, “यार, पैसा ख़राब गया और यह जो बीस मिनट इंतज़ार किया भोजन के लगने का, वो बीस मिनट ख़राब गए।”

अब एक दूसरा दृश्य देखो। कुछ ऐसा ऑर्डर कर दिया है जो करना ही नहीं चाहिए था। वह ऐसा है कि उसको देखते ही तुम्हें उलटी आती है। पर नाम आकर्षक था और महँगा रेस्त्रां। वह व्यंजन ही डेढ़-हज़ार रूपये का था। तुमने सोचा कि, “बढ़िया ही होगा इतना महँगा है तो। और यह मीनू कितना चमक रहा है। और जो वेट्रेस है, आहाहा! इसको बोल कैसे दें कि रोटी दाल ले आना! सोचेगी क्या हमारे बारे में! तो वहाँ पर जो सबसे ज़्यादा न समझ में आने वाली चीज़ लिखी हुई थी, वह उसको बोले। इम्प्रेस कर दिया, देखो।“

तो वह बोल रही है, “ दिस विल टेक अराउंड ट्वेंटी मिनट्स * ” (इसे बनने में बीस मिनट लगेंगे)। “हाँ, बिलकुल, बिलकुल। यह तो हमारी * स्टेपल डाइट है, हमारा पसंदीदा व्यंजन है यह, रोज़ खाते हैं। लेकर आइए।” वह लेकर आई और सामने रखा। अब समझ में ही नहीं आ रहा है भागें, कि छुपें, कि कूद जाएँ, क्या करें। तो उसको कुछ देर तक देखते रहे। “वह आज थोड़ा सा पेट में अचानक दर्द हो गया है। आइल पे फॉर इट (मैं इसका भुगतान कर दूँगा), लेकिन आप इसको ले जाइए।”

तो तभी क्लिक की आवाज़ आती है और उसने यहाँ कनपट्टी पर रख दी है, बोल रही है, “अब खाओ।” और तुम घूम करके देखते हो तो उसकी शक्ल बदल चुकी है। वह वैसी है ही नहीं जैसी दिखी थी और कनपट्टी पर रखकर बोल रही है, “अब खाओ।” यह आम आदमी की पूरी ज़िन्दगी का वृतांत है। क्यों, साहब? अरे! खाइए, इतने शौक़ से मँगाया है।

पुणे में किसी ने मुझसे पूछा, बोले कि, “माया के पीछे मन बहुत भागता है। यहाँ तक कि अगर बस में भी सफर कर रहा होता हूँ और कोई आकर्षक स्त्री दिख जाती है तो मन करता है बिलकुल पकड़ लूँ कूदकर।“ मैंने कहा कि तुमने पकड़ लिया, यह तो ठीक है, और फ़िर उसने तुम्हें पकड़ लिया तब क्या करोगे? कर्ता बनने का ख़याल तो तुमको आ रहा है, फ़िर भोगना भी पड़ेगा। वह कहेगी, “अब भोग, पकड़ा क्यों? पकड़ा है तो भोगो, छोडूँगी नहीं।” कुछ पता नहीं कि कौन फ़िर किसको भोगेगा।

भर्तृहरि ऋषि हुए हैं। उनको बेचारे को ज़िन्दगी से बड़े थपेड़े पड़े। बड़े रसिक थे, बड़े भोगी। उन्होंने लिखा श्रृंगार शतकम, उसमें उन्होंने पूरा विविध, बिलकुल समझिए सचित्र वर्णन किया कि स्त्रियों की देह ऐसी होती है और भोगने में यह रस है और वह रस है।

और फ़िर ज़िन्दगी ने दिए करारे झटके। मन बिलकुल उचाट हो गया। ऐसी ठोकर लगी कि चूर-चूर हो गए। महल छोड़ दिया, राज्य छोड़ दिया, रानियाँ छोड़ दीं। गंगा किनारे चले गए हिमालय। फ़िर वहाँ लिखा वैराग्य शतकम, तो उन्होंने कहा है, “तुम भोग को नहीं भोगते, भोग तुम्हें भोगता है, बस तुम्हें पता नहीं चल रहा। तुम जिसको भोग रहे हो वास्तव में, वह तुम्हें भोग रहा है, पर तुम्हें यह बात पता नहीं चलती। पता तुम्हें तभी चलती जब मेरे जितनी ठोकर खा लो।”

लोग सोचते हैं कि यह बड़ी ख़ुशी की और बड़े न्याय की बात है कि जो कर्ता है, वह भोगता है। उनको लगता है कि यह तो न्याय का, इन्साफ का सन्देश हुआ न कि जो करेगा, वह पाएगा। उन्हें समझ में नहीं आता कि यह बात चेतावनी है। यह खुशखबरी नहीं है, यह तुम्हें सावधान किया जा रहा है कि यह जो कर रहे हो न, अभी तुम कर रहे हो, फ़िर तुम्हें किया जाएगा। अभी तो तुम्हें लग रहा है तुम कर्ता हो, थोड़ी देर में पता चलेगा तुम कर्ता नहीं हो, तुम भोग हो। भोग तुम्हें भोगेगा।

कृष्णमूर्ति बोल गए थे, "*द ऑब्ज़र्वर इज़ द ऑब्ज़र्व्ड*।” अब अपने तल की बात सुनिए, “ द कंस्यूमर इज़ द कंस्यूमड * ” (भोक्ता ही भोग है)। * (एक श्रोता से) तुम तो चालीस देशों का व्यंजन भोगते हो, तुम तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भोगे जाओगे। (सभी हँसते हैं) फ़क़्र की बात है, “हमारा इंटरनेशनल कंसम्पशन होता है।”

जो पढ़ो, उसको बिलकुल जीवन के धरातल पर लेकर आओ। इसलिए मैं कह रहा हूँ कि तुम्हारे लिए ज़्यादा उपयोग की बात ‘कंस्यूमर इज़ द कंस्यूमड’ है। ' ऑब्ज़र्वर इज़ द ऑब्ज़र्व्ड’ , यह तो बड़ी ऊँची बात हो जाती है, लगता है वाह, वाह! उस बात में कुछ ख़तरा पता ही नहीं चलता अपने लिए, बल्कि वह बात ज्ञानवर्धक हो जाती है।

कल यही समझा रहा था। ज्ञान ज़िन्दगी बना क्या? इसलिए नहीं बना क्योंकि उसको तुमने बहुत दूर का रखा। मल्लयुद्ध हुआ नहीं, तो दोनों बचे रह गए; तुम भी और गीता भी।

समर्पण नहीं कर सकते तो संग्राम ही कर लिया करो। हम ऐसे हैं जो न समर्पण करते हैं, न संग्राम करते हैं। संग्राम कर लो समर्पण करना पड़ जाएगा। शास्त्रों के आगे, ऋषियों के आगे अगर समर्पण नहीं कर सकते तो उनसे संग्राम कर लो। हम न समर्पण करते हैं, न संग्राम करते हैं; हम वहाँ दूर छुपकर बैठ जाते हैं खम्भे के पीछे। समर्पण करने जितनी हममें श्रद्धा नहीं और संग्राम करने जितना हममें पौरुष नहीं, मर्दानगी नहीं, ईमानदारी नहीं।

परिणाम दोनों का एक ही होता है, समर्पण का और संग्राम का, दोनों का परिणाम एक ही होता है – झुकना पड़ेगा, मिटना पड़ेगा। हम दोनों में से कुछ भी नहीं करेंगे। हम छुपे रहेंगे, हम चुप्पा खेल खेलेंगे। “मैं सामने पडूँगा ही नहीं, मैं उलझूँगा ही नहीं। जब मैं उलझूँगा ही नहीं तो तुम मुझे बदल कैसे दोगे?”

उलझा करो, उलझ जाया करो। और उलझने को क्यों कह रहा हूँ? क्योंकि सहज, सरल, भोला, स्वस्थ समर्पण हमारे बूते का नहीं है। वह बड़े सीधे, सरल लोगों की बात होती है जिनके चित्त में खोट न हो। वे चुपचाप सीधी चाल चलते हैं, समर्पित हो जाते हैं। उसके लिए बड़ी मासूमियत चाहिए। वह आमतौर पर होती नहीं हमारे पास।

तो मैं कहता हूँ कि संग्राम करो, भिड़ जाया करो। बोला करो कृष्ण से, “आप जितनी बातें बोल रहे हैं, मेरा जीवन उनमें से एक भी बात का पालन नहीं करता। मेरी फिलॉसोफी , मेरा दर्शन बिलकुल दूसरा है। और मेरी नज़रों में तो मेरा ही दर्शन श्रेष्ठ है क्योंकि मैं उसी पर चल रहा हूँ। तो आइए ज़रा द्वंद करते हैं, शास्त्रार्थ करते हैं। देखते हैं कौन जीतता है।” करो न, संग्राम करो।

ईमानदारी की बात यह है कि हम यहाँ बैठ करके चर्चा भले ही श्रीकृष्ण की कर रहे हों, लेकिन मानते तो हम अपने-आपको ही सूरमा हैं न? अगर हम श्रीकृष्ण को सही मानते तो वैसे जीते जैसे कृष्ण जिए और कृष्ण ने सुझाया।

आपके पास दो विकल्प हैं – या तो अपने दर्शन पर चल लें, या कृष्ण के दर्शन पर चल लें। आप किसके दर्शन पर चल रहे हैं? अपने दर्शन पर। माने आप श्रेष्ठ किसको मानते हैं अपने लिए? अपने ही दर्शन को। तो फ़िर डर क्या है, भिड़ जाइए न कृष्ण से। “तेरा दर्शन ही ग़लत है। ये क्या कर्मयोग, क्या ज्ञानयोग? हम बताते हैं, गर्म योग, हॉट योगा * । हम * हॉट के दीवाने हैं। सब कुछ है हमारे पास, गर्म योग भी है, नर्म योग भी है।” हरा दीजिए न कृष्ण को।

आज के युग का योग है चर्म योग, खाल योगा। बढ़िया मालिश करो, चमका दो। और जो चीज़ जितनी चमकदार हो, उसको उतने समर्पित हो जाओ।

प्र३: प्रणाम, आचार्य जी। अर्जुन को तो साफ़ और स्पष्ट निर्देश कृष्ण से मिल रहे थे। अर्जुन के लिए काम आसान था।

आचार्य: उतने ही स्पष्ट निर्देश गीता में लिखे हैं, आपके लिए क्यों नहीं आसान है? यह तो बड़ा बढ़िया बता दिया कि अर्जुन को साफ़ बात पता चल रही थी, और आपको जो बातें गीता में कही गई हैं, वो कठिन बनाकर कही गई हैं? यही शब्द थे न जो अर्जुन के पास भी जा रहे थे? उसके लिए साफ़ थे, आपके लिए धुंधले हैं?

यहाँ जितनी बातें लिखी हैं, उनमें कहाँ पर आ रहा है दुर्योधन का नाम या युद्ध का नाम? बातें तो सब समझाने की हैं। यह पूरा आपके सामने पाँचवा अध्याय है, इसमें बताइएगा कि ‘युद्ध’ शब्द कितनी बार आया है। जो बात आई है, वह अर्जुन के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी आपके लिए। अर्जुन को कैसे समझ में आ गई, आपको क्यों नहीं आ रही?

भाई, जो तात्कालिक परिस्थिति थी, कृष्ण उसका हवाला तो कहीं दे ही नहीं रहे हैं न। उसकी बात कर रहे हैं क्या? द्रोण का नाम ले रहे हैं, कर्ण का नाम ले रहे हैं, भीष्म का ले रहे हैं, दुर्योधन का ले रहे हैं? कोई पुरानी बात उठा रहे हैं पूरे अध्याय में? युद्ध शब्द भी अगर एकाध बार बोला हो तो बोला हो, नहीं तो वो भी नहीं बोल रहे हैं। सीधी स्पष्ट ज्ञान की बात कर रहे हैं अर्जुन से। वो बात अर्जुन को क्यों समझ में आ गई और आपको क्यों नहीं समझ में आ रही?

नीयत की बात है न। बल्कि उलटा है, अर्जुन से जो बात बोल दी, वह बोल दी, दोहराई नहीं। आपके सामने तो सौ बार दोहराई जा रही है, व्याख्या भी दी जा रही है और समझाया भी जा रहा है। अर्जुन को कौन उपलब्ध था, कि कृष्ण बोल गए फ़िर पीछे से आचार्य आकर समझा रहे हैं? अर्जुन को यह सुविधा थी क्या कि कृष्ण ने बोल दिया, अब पीछे से कोई आकर समझा भी रहा है? जैसे बच्चों का होता है, क्लासरूम में पढ़ा और शाम को ट्यूटर भी आ रहा है।

उनको तो एक बार बताया गया और उनको बात समझ में आ गई। आपके सामने पुस्तक है जो आपने पाँच-सौ बार पढ़ ली और उस पर आपने सौ तरह की व्याख्याएँ और टीकाएँ भी पढ़ लीं, तब भी आप कहें कि बात नहीं समझ आ रही तो यह नीयत का फरेब है। अर्जुन के पास तो रिकॉर्डर भी नहीं कि वह कहे कि चलो अभी सुन लेते हैं, फ़िर बाद में जाकर दोबारा सुन लेंगे कि क्या बोला। एक बार माने एक बार।

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