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सत्य - ना तुम, ना तुम्हारा संसार || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: फिर कहते हैं, “ज्ञानी-अज्ञानी, समर्थ-असमर्थ, ये दोनों (ईश और जीव) अजन्मा ही हैं। भोक्ता (जीव) के लिए एक भोग्या (प्रकृति) भी अजन्मा है। विश्वरूपों में संव्याप्त अनंत आत्मा अकर्ता (कर्तापन के भाव से मुक्त) है। इन तीनों - ईश्वर, जीव, और प्रकृति को जब ब्रह्मयुक्त अनुभव करें, वही यथार्थ ज्ञान है।“

एक-एक करके समझेंगे।

ज्ञानी-अज्ञानी, समर्थ-असमर्थ, ये दोनों — दोनों से आशय है ईश और जीव — अजन्मा ही हैं। अजन्मा से अर्थ है वो जो हो ही ना, अस्तित्वमान ना हो। ब्रह्म यदि एकमात्र और कारणभूत सत्य है तो वो सब-कुछ जो प्रकट और प्रतीत होता है, वास्तव में मिथ्या ही है; जीव भी मिथ्या, प्रकृति भी मिथ्या और जीव जिसको अपना ईश कहता है वो भी मिथ्या।

“भोक्ता के लिए जो भोग्या है वह भी अजन्मा है”, तुम जब हो नहीं, तो वो प्रकृति जिसका तुम भोग करते हो वो भी कहाँ है? सत्य ना तुममें है, ना तुम्हारी प्रकृति में है। ना तुम वास्तव में हो, ना तुम्हारा संसार वास्तव में है — होने से अर्थ है कारणभूत है — ना तुम कारणभूत हो, ना तुम्हारा संसार कारणभूत है।

इन दोनों को एक-साथ नकारना ज़रूरी है, नहीं तो भीतर से लालसा ये हो जाती है कि कह दें कि, “संसार तो मिथ्या है, लेकिन हममें कुछ-न-कुछ होगा ज़रूर जो सत्य है, वास्तविक है।“ ना! ना संसार में वास्तविकता है, ना तुममें — यहाँ पर जो 'वास्तविक' शब्द है उसका संबंध वस्तु से है — ब्रह्म मात्र को वस्तु माना गया है, ब्रह्म मात्र में वस्तुता मानी गई है, इस अर्थ में कि वो वास्तविक है। इसीलिए ब्रह्म को सद्वस्तु भी बोलते हैं। और इसीलिए जीव को और जीव के परितः जो प्रकृति है उसको अवास्तविक माना, क्योंकि वो अपने-आपको ब्रह्म से पृथक देखते हैं, दोनों ही, और उनमें जो उपाधियाँ हैं वो ब्रह्म की नहीं हो सकतीं।

“विश्वरूपों में संव्याप्त अनंत आत्मा अकर्ता है”; जीव में लगातार कर्ता होने का भाव है। आत्मा अकर्ता है क्योंकि आत्मा असीमित है; जो असीमित है उसके पास कर्म करने के लिए ना स्थान हो सकता है, ना प्रेरणा। कर्म हमेशा द्वैत के क्षेत्र में होते हैं। अनंत, असीमित आत्मा इसीलिए अकर्ता है; अनंत तो है, परंतु कर्म से सर्वथा मुक्त है, ना वो कुछ करती है, ना ही किसी भी कर्म के परिणाम का भोक्ता बनती है।

जहाँ कहीं भी करने का और पाने का खेल हो, वहाँ समझ लेना कि यह काम आत्मा का तो नहीं है, यह काम है तो मन का, अहं का ही। हाँ, यह ज़रूर हो सकता है कि मन के कर्म दो तरह के हों - एक वो जो मन को आत्मा की तरफ़ ले जाते हों, दूसरे वो जो मन को आत्मा के विरुद्ध ले जाते हों। ऐसी दशा में जो कर्म अहं को आत्मा की तरफ़ ले जाते हैं उनको सत्कर्म कहते हैं या सम्यक् कर्म कहते हैं, और जो कर्म आपको आत्मा से और दूर ले जाते हैं वो निषिद्ध कर्म या कुकर्म कहलाते हैं।

“जब सब-कुछ ब्रह्मयुक्त अनुभूत हो, तब यथार्थ ज्ञान है”, जब ब्रह्म के अतिरिक्त और कोई अनुभूति हो ही ना। सब-कुछ ब्रह्मयुक्त अनुभूत हो माने सिर्फ़ ब्रह्म ही अनुभूत हो; माने जो आपकी साधारण प्रेरणा होती है अनुभव के पीछे, वह प्रेरणा ही विनष्ट हो जाए।

साधारणतया हम अनुभव करते क्यों हैं? हम अनुभव करते हैं अपनी अपूर्णता की भावना के चलते, हम कहते हैं कि, "अनुभव करेंगे तो उस अनुभव से हमें कुछ प्राप्त हो जाएगा", और नए अनुभव को पाने के लिए हम नई अनुभूत या भोग्य वस्तु की तरफ़ बढ़ते हैं। तुम्हें कोई अनुभव करना है तो उस अनुभव के लिए तुम्हें कोई विषय भी तो चाहिए न, जिसका तुम अनुभव करोगे? तो अनुभव पाने के लिए हम बढ़ते हैं वस्तु की ओर। जब किसी वस्तु की ओर बढ़ते हैं तो वो वस्तु फिर हमें दिखाई देगी, हमारे दिमाग पर छा जाएगी।

श्रृंखला समझो - पहली बात, हम भीतर से अनुभव करते हैं अपने-आपको अपूर्ण, जब अपूर्ण अनुभव करेंगे तो हम कहेंगे कि हमें पूर्ण होना है, और पूर्ण किसके माध्यम से होना है? जो इधर-उधर चारों तरफ़ दिख रहा है उसी के माध्यम से। तो फिर जिसके माध्यम से पूर्ण होना है उसकी तरफ़ बढ़ेंगे, जब उसकी तरफ़ बढ़ेंगे तो उसका दृश्य हमारे मानस-पटल पर छा जाता है, और फिर हम कहते हैं कि, "इस वक़्त तो मुझे वो वस्तु ही दिख रही है।" वो वस्तु उस वक़्त हमारे लिए बड़े काम की है क्योंकि हमें ये उम्मीद लग गई है कि इस वस्तु से हमारी अपूर्णता मिटेगी।

फिर, एक दूसरा होता है चित्त, जिसके भीतर से वो अपूर्णता ही मिट गई, जिसने उस अपूर्णता में अपना जो विश्वास बैठा रखा था उस विश्वास को उसने हटा लिया, वो कह रहा है, “नहीं, अब मैं उतना निश्चयी हूँ ही नहीं अपने बारे में जितना पहले होता था, मैं नहीं मानता मैं अपूर्ण हूँ।“ वो ये भी नहीं कह रहा कि, "मैं मानता हूँ मैं पूर्ण हूँ", वो कह रहा है, “बस पहले जिन बातों में बड़ा यकीन था, अब नहीं रहा।“

इसके भीतर से जहाँ अपूर्णता मिटी, तहाँ इसे क्या दिखना बंद हो जाएगा? वो वस्तु दिखनी बंद हो जाएगी; वो वस्तु तो हमें दिखती ही थी हमारी अपूर्णता के चलते, अपूर्णता गई तो वो वस्तु भी गई। वस्तुओं के मिट जाने को ही दूसरे शब्दों में कहा जाता है - प्रत्येक वस्तु में ब्रह्म का दर्शन होना।

आपसे कहा जा रहा है कि, “आप इस खम्भे को देखें, चाहे उस दीवार को देखें, चाहे इस ज़मीन को देखें, चाहे इन कपड़ों को देखें, चाहे उस मूर्ति को देखें, आप जब किधर को भी देखें और आपको ब्रह्म ही दिखाई दे, तब आपको यथार्थ ज्ञान हुआ”, ऐसा उपनिषद् कह रहा है। ग़ौर से देखो तो क्या कहा जा रहा है? कहा जा रहा है कि, “इसको देखो, उसको देखो, उसको देखो, उसको देखो, किसी को भी देखो, जब ब्रह्म ही दिखाई दे तो यथार्थ ज्ञान हुआ।“ आशय क्या है इस बात का? आशय ये कि, “भाई! कहीं भी देखो ये सब दिखाई ही ना दे, तुम कहीं भी देखो तुम्हें कुछ दिखाई ही ना दे,” ये कहा जा रहा है।

अगर सीधे ऐसे कह दिया जाए कि जिसको कुछ नहीं दिखाई देता उसको यथार्थ ज्ञान हुआ, तो ये बात पचेगी नहीं। तो ये कहने की जगह कि कुछ भी दिखाई देना बंद हो जाए, कह दिया गया कि जिधर को भी देखो उधर ब्रह्म ही दिखाई दे। कुछ भी दिखाई देना किस आशय में बंद हो जाए? कि दिखेगा तो तब न जब उससे हमारा कोई स्वार्थ संबंधित होगा? उस चीज़ से हमारा अब कोई स्वार्थ है नहीं, तो हमें वो दिखाई भी नहीं देती।

अच्छा चलो, यहाँ आप सब बैठे हो, सबको एक ही चीज़ क्यों दिखाई दे रही है? बहुत कुछ दिखाई दे सकता था न? सब एक ही तरफ़ को मुँह करके बैठे हो; एक तरफ़ को भी नहीं, जो इधर (बाएँ) हैं उन्होंने मुँह दूसरी (दाएँ वालों से दूसरी) ओर को कर रखा है, लेकिन इस तरीके से कर रखा है कि दिखाई देने वाली वस्तु सबकी साझी है, एक है।

क्या सब-कुछ देख रहे हो तुम?

श्रोतागण: नहीं।

आचार्य: तो तुम्हें वही दिखाई देता है न जिस चीज़ के साथ तुम्हारा कुछ स्वार्थ या हित जुड़ा होता है? ये है देखने का अर्थ। तो जब कहा जा रहा है कि, “तुम प्रकृति को देखोगे, चाहे ईश्वर को देखोगे, तुम्हें ब्रह्म ही दिखाई देगा, माने प्रकृति नहीं दिखाई देगी”, तो इसका क्या आशय हुआ? अभी हम कह रहे हैं कि तुम्हें वही चीज़ दिखाई देती है जिसके साथ तुम्हारा स्वार्थ जुड़ा होता है, और श्लोक कह रहा है कि तुम्हें प्रकृति दिखाई देनी बंद हो जाएगी, मतलब क्या हुआ? कि तुम्हें प्रकृति में अब स्वार्थ पता चलना बंद हो जाएगा, तुम समझ जाओगे कि, "प्रकृति से मेरा कोई स्वार्थ सिद्ध होने नहीं वाला", तो तुम्हें प्रकृति दिखाई देनी ही बंद हो जाएगी; आँखों को दिखाई देगी, मन को नहीं दिखाई देगी, तुम्हारे लिए अनुपयोगी हो जाएगी।

तुम्हें आ गई है बात समझ में कि इससे (प्रकृति से) कुछ नहीं मिलने वाला। “यह संसार कागज़ की पुड़िया, बूँद पड़े घुल जाना है।“ यहाँ क्या मिलना है? तो अब वो चीज़ हमें दिखाई ही नहीं देती, और जो चीज़ उपयोगी हो जाती है वो जागते में क्या, वो तो सोते में भी दिखाई देती है, कि नहीं दिखाई देती? जो चीज़ अनुपयोगी हो जाती है वो आँख के सामने पड़ी हो तो भी दिखाई नहीं देती; आँख को दिखाई देती है, मन पर कोई प्रभाव ही नहीं डालती तो दिखाई ही नहीं देती।

एक भीड़ से गुज़र रहे होते हो, आँखों को तो सब लोग दिखाई दे रहे हैं न? आँखों को तो सब लोग दिखाई देते हैं, आपको क्या सब लोग दिखाई देते हैं? भीड़ से गुज़र गए, भीड़ में एक चेहरा था, थोड़ी देर में वो आदमी आपके सामने लाया जाए, आपसे कहा जाए, “आपने देखा था इसे?” आपने उसे देखकर भी नहीं देखा।

तो यहाँ देखने का जो आशय है वो समझो; देखने का आशय है स्वार्थ-युक्त संबंध बनाना। तो यथार्थ ज्ञानी वो है जो अब संसार से स्वार्थ-युक्त संबंध नहीं बनाता - इस आशय में उसे संसार अब दिखाई नहीं देता।

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