प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, रमण महर्षि जी के बारे में आप क्या विचार रखते हैं?
आचार्य प्रशांत: देखिए, उनकी जो जीवनी है, उसके विषय में तो स्मृति हो सकती है, विचार हो सकते हैं, लेकिन रमण महर्षि को मात्र एक जीवनकाल के रूप में देखना उनके सत्य से चूकने की बात होगी। सन्तों के विषय में जिज्ञासा बहुत सारभूत नहीं हो सकती, क्योंकि आप जब भी किसी सन्त के विषय में जिज्ञासा करेंगे, आप अधिक-से-अधिक ये जानना चाहेंगे कि किस क्षेत्र का था, किस सम्प्रदाय का था, क्या कहता था, क्या उसके मत थे, किस रूप में कहता था, किनसे मिला, जीवन में क्या-क्या घटनाएँ घटीं और यही सबकुछ। ये सबकुछ आपका ज्ञानवर्धन तो कर सकता है, पर आपको शान्ति नहीं दे सकता। मात्र ये जान लेना कि ये व्यक्ति कब पैदा हुआ था, किस मन्दिर में रहता था, कैसे आश्रम की स्थापना की, किन कृतियों का लेखक बना, किन लोगों से मिला-जुला, क्या वक्तव्य कहे, काफ़ी नहीं है।
तो कभी भी सन्तों के या गुरू के विषय में जिज्ञासा नहीं ही करनी चाहिए। हालाँकि, जिज्ञासा उठेगी मन में, मन जानना चाहता है। ये मत जानिए कि उसका व्यक्तित्व कैसा है, वो बहुत काम की बात नहीं है। मत पूछिए कि उसने किसी मौक़े पर क्या कहा, मत पूछिए कि वो क्या खाता है क्या पीता है, क्या उसके दोस्त हैं, विवाहित है या नहीं, कितना कमाता है, किसी विषय पर उसके मत क्या हैं। ये बातें काम की नहीं हैं। हालाँकि, ऊपर-ऊपर से देखने पर यही बातें आकर्षक और उपयोगी दोनों लगती हैं। मैं आपसे कह रहा हूँ कि आकर्षक लग सकती हैं, पर अनुपयोगी हैं। इससे आपको कोई फ़ायदा नहीं हो पाएगा।
बहुत लोग हैं जो ज्ञान के तौर पर, इतिहास के तौर पर आपको दुनिया के तमाम सन्तों के बारे में बहुत कुछ बता देंगे। आप उनसे पूछिए कि चैतन्य महाप्रभु, आपने कहा नहीं कि वो पूरा इतिहास उड़ेल देंगे। आप उनसे यूरोप के किसी सन्त का नाम ले लीजिए। आप बोलिए सेंट फ़्रान्सिस, वो सेंट फ़्रान्सिस की पूरी कथा बाँच देंगे। आप उनसे कहिए चुआंग त्ज़ू, वो चुआंग त्ज़ू के बारे में आपको वो भी बता देंगे जो कहीं उपलब्ध न हो।







