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संतों का व्यक्तित्व नहीं, सार देखो || आचार्य प्रशांत (2016)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, रमण महर्षि जी के बारे में आप क्या विचार रखते हैं?

आचार्य प्रशांत: देखिए, उनकी जो जीवनी है, उसके विषय में तो स्मृति हो सकती है, विचार हो सकते हैं, लेकिन रमण महर्षि को मात्र एक जीवनकाल के रूप में देखना उनके सत्य से चूकने की बात होगी। सन्तों के विषय में जिज्ञासा बहुत सारभूत नहीं हो सकती, क्योंकि आप जब भी किसी सन्त के विषय में जिज्ञासा करेंगे, आप अधिक-से-अधिक ये जानना चाहेंगे कि किस क्षेत्र का था, किस सम्प्रदाय का था, क्या कहता था, क्या उसके मत थे, किस रूप में कहता था, किनसे मिला, जीवन में क्या-क्या घटनाएँ घटीं और यही सबकुछ। ये सबकुछ आपका ज्ञानवर्धन तो कर सकता है, पर आपको शान्ति नहीं दे सकता। मात्र ये जान लेना कि ये व्यक्ति कब पैदा हुआ था, किस मन्दिर में रहता था, कैसे आश्रम की स्थापना की, किन कृतियों का लेखक बना, किन लोगों से मिला-जुला, क्या वक्तव्य कहे, काफ़ी नहीं है।

तो कभी भी सन्तों के या गुरू के विषय में जिज्ञासा नहीं ही करनी चाहिए। हालाँकि, जिज्ञासा उठेगी मन में, मन जानना चाहता है। ये मत जानिए कि उसका व्यक्तित्व कैसा है, वो बहुत काम की बात नहीं है। मत पूछिए कि उसने किसी मौक़े पर क्या कहा, मत पूछिए कि वो क्या खाता है क्या पीता है, क्या उसके दोस्त हैं, विवाहित है या नहीं, कितना कमाता है, किसी विषय पर उसके मत क्या हैं। ये बातें काम की नहीं हैं। हालाँकि, ऊपर-ऊपर से देखने पर यही बातें आकर्षक और उपयोगी दोनों लगती हैं। मैं आपसे कह रहा हूँ कि आकर्षक लग सकती हैं, पर अनुपयोगी हैं। इससे आपको कोई फ़ायदा नहीं हो पाएगा।

बहुत लोग हैं जो ज्ञान के तौर पर, इतिहास के तौर पर आपको दुनिया के तमाम सन्तों के बारे में बहुत कुछ बता देंगे। आप उनसे पूछिए कि चैतन्य महाप्रभु, आपने कहा नहीं कि वो पूरा इतिहास उड़ेल देंगे। आप उनसे यूरोप के किसी सन्त का नाम ले लीजिए। आप बोलिए सेंट फ़्रान्सिस, वो सेंट फ़्रान्सिस की पूरी कथा बाँच देंगे। आप उनसे कहिए चुआंग त्ज़ू, वो चुआंग त्ज़ू के बारे में आपको वो भी बता देंगे जो कहीं उपलब्ध न हो।

उससे क्या हो गया? वो चैतन्य हो गये? वो सेंट फ़्रान्सिस हो गये? उन्हें चुआंग त्ज़ू छू गये? क्या हो गया उससे?

लेकिन हम ये जिज्ञासा करते ही हैं। और करते ही नहीं हैं, हम इस जिज्ञासा के आधार पर बड़े-बड़े निर्णय भी ले लेते हैं। हम ये भी घोषित कर देते हैं कि देखो, उन्होंने ऐसा किया, इस कारण वो महापुरुष हैं। हम यहाँ तक कर डालते हैं कि देखो, उन्होंने ऐसा किया, इसीलिए हमारे लिए भी यही करना अनुकरणीय है। हम कहते हैं, ‘देखो, हमारे अवतार थे, हमारे सन्त थे, हमारे पैग़म्बर थे; ऐसे मौक़ों पर उन्होंने ये वचन बोले। और उनके सामने जब ऐसी स्थिति आयी तो उन्होंने उसका ये उत्तर दिया। तो इससे ये सिद्ध होता है कि आगे भी जब किसी के जीवन में ऐसी स्थिति आये तो उसे भी ऐसा ही करना चाहिए।’

हम उदाहरण के तौर पर, आदर्श के तौर पर इस्तेमाल करने लग जाते हैं सन्तों को, महापुरुषों को। ये हमने बड़ा अनर्थ कर डाला! क्या एक रमण महर्षि किसी और को देखकर अपना आचरण तय करते थे? क्या किसी कृष्ण ने अपने पहले के किसी कृष्ण की नकल की है? क्या बुद्ध कुछ ऐसा कर या कह रहे थे जो किन्हीं अन्य बुद्धों ने उन्हें सिखाया था?

सन्त होने का अर्थ ही होता है पूर्णतया मौलिक होना। मौलिकता समझते हैं? गहरी निजता, सम्पूर्ण नवीनता। और नवीनता का मतलब देखिए ये भी नहीं है कि आप कुछ ऐसा करेंगे जो पहले किसी ने नहीं किया है, मुझे ग़लत मत समझिएगा।

नवीनता के नाम पर हम ये समझ लेते हैं कि अगर आज तक सब लोग आठ दिशाओं में गये हैं तो मैं नौवीं दिशा में जाऊँगा। नवीनता का ये मतलब नहीं होता। नवीनता का मतलब होता है कि अपने भीतर जो नवकेन्द्र है, ऐसा केन्द्र जो पुराना नहीं है, जो प्रतिक्षण नूतन है, जो इसी क्षण में है और इस क्षण के बाद नहीं है, या कि जो समय के पूर्णतया बाहर का है, मैं उससे सम्बन्धित हूँ। सन्त न तो वो दोहराता है जो उसके पहले के किसी और ने कर रखा है, और न ही उसे वो दोहराने से परहेज़ होता है जो उसके पहले किसी और ने कर रखा है।

आप ये सोचोगे कि वो किसी परम्परा का हिस्सा है, आप धोखे में हो। आप ये सोचोगे कि वो समस्त परम्पराओं का विरोधी है, तो भी आप धोखे में हो। वो वही कर रहा है जो उसके माध्यम से होना चाहिए, लेकिन हम वो नहीं करते। सन्त किसी और को नहीं देखता, हम सन्त को देखना शुरू कर देते हैं। सन्त की कोई विशेष रुचि नहीं होती ये जानने में कि दुनिया क्या कर रही है, हमारी रुचि सन्त में ही हो जाती है। और बड़ी-बड़ी पुस्तकें लिखी गयी हैं सन्तों के बारे में, दुनिया के तमाम पुस्तकालय भरे हुए हैं, और शोध चलता है।

कोई तय करने की कोशिश कर रहा था कि वास्तव में कृष्ण हुए थे कि नहीं। अभी आजकल भी अनुसन्धान चल रहा है कि द्वारिका नगरी कहाँ थी और कहाँ नहीं थी। किन्हीं बहुत पहुँचे हुए शोधकर्ताओं ने तो द्वारिका के अवशेष भी निकाल लिये समुद्र से। वो बोले, ‘यहाँ थी, देखो।’ तुम्हें क्या मिल जाएगा द्वारिका का होना या न होना सिद्ध करके? तुमने सिद्ध कर लिया कि द्वारिका थी तो तुम कृष्ण हो गये? तुमने सिद्ध कर लिया कि द्वारिका नहीं थी तो तुम्हारे भीतर का कृष्णत्व विलीन हो गया?

भारत ने इसीलिए बहुत महत्वपूर्ण नहीं समझा कि किसी राम की, किसी कृष्ण की जन्मतिथि या जन्म का वर्ष विशेषकर याद रखा जाए। आप अनुमान तो लगा सकते हो, आप कयास कर सकते हो, पर आपको ऐतिहासिक रूप से बिलकुल पता नहीं चलेगा। आप सिद्ध नहीं कर पाओगे कि ईसा पूर्व इस शताब्दी में, इस माह में, इस दिन कृष्ण का जन्म हुआ था।

और ऐसा नहीं है कि समय रखने की कला या समय का विज्ञान या गणित भारतीयों को उपलब्ध नहीं था, सबकुछ था। आप विक्रम संवत जानते हैं, आप शक संवत जानते हैं। टाइम कीपिंग (समय निर्धारण) आती थी लोगों को, पर उस चीज़ से उन्होंने महापुरुषों को मुक्त रखा। समय के भीतर उनको लेकर नहीं आये, उनका काल नहीं तय करना चाहा। उनके जीवन की घटनाएँ भी इस रूप में बतायीं कि जैसे परी कथाएँ हों, तथ्य रूप में सामने नहीं रखीं।

कह दिया कि कृष्ण ने अपनी छोटी उँगली पर गोवर्धन उठा लिया था। अब जानते हो आप कि नहीं होगा ऐसा, पर तथ्यों के भीतर सत्य को बाँधने की कोशिश ही नहीं की। पता था उनको कि सत्य तुम्हारी कल्पना के बाहर की बात है। तथ्य बँधे-बँधाए होते हैं, सीमा में होते हैं। सत्य असीमित है, इसीलिए तथ्य रूप में सत्य को पेश ही नहीं किया। कुछ उड़ती-उड़ती सी कहानियों के रूप में रखा — धुँधली सी, स्वप्नवत! जैसे दिखाई दे भी रहा हो और न भी दिखाई दे रहा हो। जैसे कुछ आधा विश्वसनीय हो और बाक़ी अविश्वसनीय हो, ऐसे बताया गया।

उस सबका अर्थ समझिए। उस सबका अर्थ यही है कि जो भी कुछ वास्तविक है, उसके बारे में तथ्यपरक अनुमान मत लगाओ, इशारे कर दो। कह दिया तुमने यदि कि किसी राम की जन्मतिथि ये है, तो उस दिन से तुमको राम को ठीक उसी तरह देह मानना पड़ेगा जैसे बाक़ी देहें जन्म लेतीं हैं। तुमने कह दिया कि ये रहा जीवनकाल कृष्ण का, तो तुमको कृष्ण को उसी तरीक़े से एक व्यक्ति मानना पड़ेगा जिस तरीक़े से बाक़ी व्यक्ति होते हैं जिनका सीमित जीवनकाल होता है। कृष्ण वो, जो न जन्में न मरें। रमण महर्षि को भी आपको उसी तरह देखना चाहिए। उनके विषय में क्या बोलें!

समझ रहे हैं बात को?

जो भी कुछ वास्तविक है, उसके विषय में वास्तविक ही जिज्ञासा करो, सतही नहीं।

ये कोई पूछने की बात नहीं होती है कि कोई क्या खाता था, क्या पहनता था, कहाँ आता-जाता था, किससे मिलता-जुलता था, कब सोता था, कब उठता था। अरे! उसका सार देखो। उसके जीवन की घटनाएँ नहीं, उन घटनाओं के पीछे का सत्य देखो। वो आवश्यक है। ऊपर-ऊपर का देखोगे तो ऊपर-ऊपर में ही उलझकर रह जाओगे।

कहोगे, ‘अच्छा, रमण महर्षि!’ रमण महर्षि कौन? ‘ये जो देह है।’ तो ठीक है, हम रमण महर्षि के अनुयायी हैं तो हम क्या करेंगे? हम उन्हीं की तरह कपड़े पहनेंगे। अब ये तुमने बड़ी छलाँग मारी! कि रमण महर्षि का शिष्य होने का मतलब है कि ऐसे ही चट्टान पर बैठ जाओ और हाथ में डंडी ले लो। या कि कृष्ण को मानने का अर्थ है कि मोरपंख! पर हम करते यही हैं। चूँकि हमें गहराई का कुछ पता नहीं होता, इसीलिए जो कुछ सतह पर है हम उसकी नकल उतार लेते हैं। हम कहते हैं कि हमारा गुरू था, हमारा मसीहा था, उसके दाढ़ी थी लम्बी तो हम भी दाढ़ी रखेंगे। क्या हो जाएगा उससे? (आचार्य जी व्यंग्य करते हुए)

तुम्हें यदि एक ही होना है उसके साथ, तो उसके भीतर की निर्मलता से एक हो जाओ न, उसकी निर्दोषता से एक हो जाओ। तुम उससे तो एक हो नहीं पाते, तो तुम किससे एक होना चाहते हो? उसके रूप से, उसके आकार से। वो दिखता कैसा है, तुम वैसा दिखना चाहते हो। हो जाओ, रामलीला में बहुत राम भरे हैं! वो अगले दिन फिर गुड़ बेच रहे होते हैं!

रामलीला का राम होना चाहते हो? रामलीला के राम को राम का एक-एक संवाद पता है, ये समझ लेना। राम भूल भी गये होंगे, इसको पता है। इसको राम के विषय में सब पता है। इसे वो तक पता है जो राम को भी नहीं पता, सब जानता है। राम के विषय में जानने से क्या हो जाएगा? अब तुम उनके जैसा होने की कोशिश करोगे, बस यही हो जाएगा।

ज्ञान मिला नहीं कि नकल शुरू हुई! ज्ञान का बस यही काम करता है अहंकार कि उसकी नकल कर लो। अब तुम धनुष डालकर चलोगे! धनुष डालकर गुड़ बेचोगे! या तिलक लगाओगे या पगड़ी पहनोगे या दाढ़ी बढ़ाओगे या बाल मुंडा लोगे! या हरा पहनोगे या सफ़ेद पहनोगे या गेरुआ पहनोगे, यही करोगे! इस नकल से क्या हो जाना है?

मीरा के गाने बहुत लोग गा रहे हैं, मीरा से बेहतर गा रहे होंगे। मीरा नहीं हो गये! बुल्लेशाह की धूम है! आप जाइए इंटरनेट पर, बुल्लेशाह लिखिए, देखिए कितने लोगों ने गा दिया। बुल्लेशाह तो इतने सुर में कभी गाते भी न होंगे! बुल्लेशाह के गाने में तो फिर भी कुछ ऊँच-नीच, कुछ उबड़-खाबड़ होगा, क्योंकि उनका ध्यान ही नहीं होगा राग पर, लय पर, और सुर पर और ताल पर। उनका दिल तो कहीं और है। ये जो गा रहे हैं, ये बिलकुल उत्कृष्टता के साथ गा रहे हैं, पर्फ़ेक्शन ! ये व्यावसायिक रूप से गायक हैं।

समझ रहे हैं बात को?

ये होता है जब आपको ज्ञान बहुत हो जाता है। बहुत हैं जो रटे बैठे हैं। उनसे आप पूछिए बाइबल, सुना देंगे पूरा, कहीं पर! उनसे आप कहिए उपनिषद्, सुना देंगे पूरा! उनसे आप कहिए क़ुरान, कंठस्थ है पूरी!

प्र: ये इनका काम है न, ये इन्होंने अपना काम बनाया है।

आचार्य: ये इन्होंने अपना धन्धा बनाया है!

देखिए, सत्य धन्धा नहीं हो सकता। और जिस क्षण आपने उसको धन्धे की तरह लेना शुरू कर दिया, उस क्षण आप वही कर रहे हैं जो आप पाँचवीं, छठी, दसवीं, बारहवीं में स्कूल में किया करते थे। कि रट लो ताकि नम्बर मिल जाएँ। रट लो ताकि लाभ हो जाए। उपनिषदों के श्लोक लाभ के लिए नहीं रटे जाते, वो दिल में उतर जाते हैं और विलुप्त हो जाते हैं। उपनिषद् ख़ुद कहते हैं कि जब हम अपना काम कर दें, उसके बाद हमें याद मत रखना। और कोई उन्हें याद ही रखे हुए है, और याद ही रखने को अपना धन्धा बनाये हुए है, इसका अर्थ यही है कि वो उपनिषदों से बहुत-बहुत दूर है।

कबीर किसी दूसरे की उक्तियों की दुहाई देते थे? कबीर जो बोल रहे हैं, वो कबीर है। कबीर जो बोल रहे हैं, वो उपनिषदों का दोहराव नहीं है। कबीर के मुँह से कबीर व्यक्त होते हैं। एकदम नया है सब! और आप कैसे हैं कि आपके मुँह से सब वही निकलता है जो कोई पहले बोल गया है? और आप ये बोलने में बड़ा गर्व अनुभव करते हैं। आप कहते हैं, ‘मैं तो बड़ा ज्ञानी हूँ। देखो, मुझे सब पता है।’ अरे! तुम्हें क्या पता है?

जिन्होंने ये कहा, क्या वो किसी और का कहा दोहरा रहे थे? जब वो नहीं दोहरा रहे थे तो तुम क्यों दोहरा रहे हो? तुम ज़रा अपनी आवाज़ भी तो सुनाओ, तुम कौन हो। हम ज़रा एक बात ऐसी भी तो सुनें जो तुम्हारे अन्तस से प्रस्फुटित होती हो। ऐसी तो एक बात नहीं! हाँ, ज्ञान बहुत है तुमको! वो ज्ञान सतही है, किसी काम का नहीं है। वो ज्ञान बल्कि हानिकारक है, ज़हर घोलेगा!

प्र: आचार्य जी, इसमें एक बात और आती है। अधिकतर लोग होते हैं जो आमदनी को ही ध्यान में रखकर काम करते हैं। एक तरह से देखें तो पैसा ही उन्हें उस काम में बनाये रखता है। उस काम में बने रहने के लिए उनके लिए कोई और प्रेरणा नहीं होती है। वहीं कुछ गिने-चुने लोग ऐसे भी होते हैं जो स्वेच्छा से अपने काम का चयन करते हैं, सत्योन्मुखी काम करते हैं, और उसे दृढ़तापूर्वक निरन्तर करते हैं क्योंकि उन्हें उस काम से प्रेम है। उनका प्रेरणास्त्रोत सिर्फ़ और सिर्फ़ पैसा नहीं होता, बल्कि वो एक ऊँचे मक़्सद के लिए काम कर रहे होते हैं।

तो ये जो दूसरी प्रवृत्ति के लोग होते हैं, इनकी तरह भी चल सकता है हमारा काम। पर कितने लोगों में इतनी ईमानदारी और साहस होता है कि वो एक काम सिर्फ़ इसलिए करते रहें क्योंकि उन्हें उससे प्रेम है? इस दुनिया में कितने लोग होंगे जिनमें इतना आन्तरिक बल और सत्य के प्रति अटूट प्रेम होगा?

आचार्य: आप जितना ज़्यादा दूसरे लोगों की ओर देखेंगी, उतना ज़्यादा आप अक्षम रहेंगी अपने भीतर की उस शक्ति को जागृत करने में। वो शक्ति दबी ही इसीलिए रहती है, क्योंकि आप दूसरों की ओर ज़्यादा देखते हैं। आपके भीतर यदि कोई अन्तःप्रेरणा उठ भी रही है, बिलकुल आपकी निजी, तो भी जहाँ आपने ये हिसाब लगाने की कोशिश की कि कितने दूसरे लोग हैं जो मेरे वाले रास्ते पर चलेंगे, तहाँ आपकी आग बुझ जाएगी। अपनी ऊर्जा को, अपनी आग को बुझाने का इससे बढ़िया तरीक़ा नहीं हो सकता कि दूसरों की बाट जोहते रहो, देखते रहो कि दूसरे भी चलें तो मैं चलूँगा। दूसरे चलेंगें नहीं, क्योंकि सबकी अपनी-अपनी दिशाएँ हैं।

प्र: दूसरे तो नहीं चलेंगे, क्योंकि उनका अपना काम है, दिशा अलग है। वो नहीं चलेंगे, लेकिन हमें चलना है। मैं ये कह रही हूँ कि शायद सभी लोग नहीं कर सकते ऐसा।

आचार्य: जब आप कहते हो सभी, तो आप किसकी ओर देख रहे हो, अपनी ओर या दूसरों की ओर?

प्र: अपनी ओर भी देखना ही होता है और…

आचार्य: अपनी ओर भी नहीं देखा जाता, मैं पूछ रहा हूँ…

प्र: अपनी ओर ही देखते हैं।

आचार्य: जब अपनी ओर ही देखते हो तो ‘सभी’ शब्द कहाँ से आया? आप ‘आप’ हो, या आप ‘सभी’ हो? बार-बार जब कहोगे न कि सभी के लिए, सभी के लिए, सभी, आप अपनेआप को अशक्त कर रहे हो।

प्र: हाँ, ये ग़लत है।

आचार्य: ग़लत-सही पता नहीं, पर कष्टप्रद ज़रूर है।

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