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सच्ची शिष्यता पाए सच्चा गुरु || (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
20 min
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपका हमारे लिए क्या संदेश है?

आचार्य प्रशांत: (प्रेमपूर्वक हँसते हुए) मुझे ही ले चलो, मैं ही संदेश हूँ!

मज़ाक नहीं, मैं ही संदेश हूँ भाई! क्या संदेश दूँगा! जो भी संदेश दूँगा शाब्दिक होगा, तो अधूरा होगा। जैसे जी रहा हूँ देख लो, वही संदेश है। तो पूरा संदेश सुनना हो तो आ जाओ कभी, ज़िंदगी देख लो मेरी, वही संदेश है।

(एक श्रोता को इंगित करते हुए) क्यों रे!

प्र२: नमस्कार आचार्य जी। मैं काफ़ी समय से विभिन्न गुरुओं को सुन रहा हूँ, मगर हम इतना सुनने-समझने के बाद भी उनको अपने जीवन में क्यों नहीं उतार पाते?

आचार्य: राहत की साँस लो, बच गए। उनको उतार लिया होता जीवन में, तो फिर ये सवाल भी नहीं पूछ रहे होते; कहते, “बस उतर गया जीवन में, उतर ही गया!” फिर वो खड्डे में उतर रहे होते, उनके पीछे-पीछे तुम भी उतर रहे होते। उतार लिया उन्होंने तुम्हें!

प्रश्न में ही विरोधाभास है, देख नहीं रहे हो? कह रहे हो, “इतना सुनने-समझने के बाद भी जीवन में उतार क्यों नहीं पाते?” यदि गुरु वास्तव में श्रवण योग्य है, और तुमने उसको सुना है, समझा है, गुना है, तो अब जीवन में उतारने के लिए बचा क्या? जिन्होंने जाना है, उन्होंने तुमसे इतना ही तो कहा है - श्रवण, मनन, निदिध्यासन। और किसी ने पूछा, “और क्या?” तो कहा, “समाधि।” श्रवण, मनन, निदिध्यासन, समाधि— इसमें कर्म कहाँ है, जीवन में उतारना कहाँ है? इसमें कहीं लिखा है, कि “ये चार सोपान हैं, और तीसरे और चौथे सोपान के मध्य जो सुना है वो जीवन में उतरेगा”? वो बात ही कहने जैसी नहीं है, वो बात ही स्वयंसिद्ध है, कि अब जीवन में उतारने को बचेगा क्या! अगर श्रवण भी है और मनन भी है और अभ्यास भी है, फिर शांति भी है, तो अब ये कमी कहाँ से रह गई कि जीवन में नहीं उतरा? उतर तो गया जीवन में!

और अगर जीवन में नहीं उतरा, तो इसका अर्थ है कि सुना ही नहीं। ना सुनना अकसर भला होता है, क्योंकि अधिकांश आवाज़ें जो गुरुता के नाम पर गूँज रही हैं, सुनने लायक नहीं। पर यदि कभी कोई तुमको काबिल गुरु मिला, और उसके होते हुए भी तुम्हें लाभ नहीं हुआ, तो बात सीधी है - तुमने सुना ही नहीं। कुछ हैं जो सुनने काबिल नहीं, और कुछ हैं जिनको तुम सुनते नहीं; और बहुत सारे हैं जो सुनने काबिल नहीं, लेकिन जिनको तुम सुन लेते हो। सवाल असली रखो, सवाल सच्चे रखो। तुम्हारे सवाल ही असली और नकली गुरु के मध्य भेद करने वाली कसौटी बनेंगे। घटिया, छोटा, सतही, नकली सवाल है, तो उसका घटिया, छोटा, सतही और नकली उत्तर भी कोई भी गुरु दे देगा; लेकिन जब सवाल तुम्हारी गहनतम पीड़ा से उठता है, तो तुम किसी घटिया जवाब को बर्दाश्त नहीं करोगे।

तुम्हारी बीमारी ही नकली थी, तुम पहुँच गए चिकित्सक के पास — बहुत होते हैं, पहुँच जाते हैं — कि “बाएँ खोपड़े में दर्द हो रहा है।” अब तुम वहाँ पहुँच गए हो, उसने भी कहा, “अच्छा, तुम्हें बाएँ खोपड़े में दर्द हो रहा है! रखो, हज़ार रुपए रखो पहले, फिर बात करें।” अब तुमने रखे, उसने कहा, “ये लो, ये शक्कर है, चाट लेना!” वो भी खुश, तुम भी खुश। समस्या ही नकली थी, तो तुम्हें एक सस्ता और नकली समाधान रुच गया, अब यहाँ पर तुम्हें कोई योग्य चिकित्सक चाहिए ही क्यों? क्योंकि समस्या ही... नकली समस्या के समाधान के लिए तुम्हें क्या कोई प्रख्यात, प्रकांड चिकित्सक चाहिए? नहीं चाहिए, कोई भी चलेगा। लेकिन जिस दिन तुम्हारे प्राणों पर बनी होती है, उस दिन कोई घटिया चिकित्सक तुम बर्दाश्त नहीं करोगे; और तुम्हारे प्राणों पर बनी हुई है! तुम अपनी असली बीमारी ले कर के निकलो, और फिर देखो कि कौन तुम्हारी बीमारी का समाधान करता है। गुरु वो जो तुम्हारी नकली बीमारी को नकली घोषित कर दे और तुम्हारी असली बीमारी का समाधान कर दे। तुम आज तक अपनी नकली बीमारियों का ही ऐलान करते रहे हो। देखो न, यहाँ भी सवाल जो तुमने पूछा है, ये कोई बहुत सारगर्भित और गहरा सवाल है क्या? सवाल ही नकली है! असली सवाल तुम नहीं पूछ रहे।

नकली सवालों में उलझे रहोगे तो उम्मीद मत करना कि कोई असली तुम्हें समाधान के तौर पर, चिकित्सा के तौर पर, गुरु के तौर पर मिलेगा; नहीं मिलेगा! तुम्हारे अंतस में जो उबल रहा है, तुम्हारे भीतर जो चीत्कार कर रहा है, तुम्हारी जो अव्यक्त पीड़ा है, हिम्मत करो उससे रू-ब-रू होने की। और फिर उस पीड़ा को ले कर के जाओ और पूछो गुरु से, “तू इसको शमित कर सकता है? ये जीने नहीं दे रही मुझे, ये कलेजा खा रही है मेरा।” और फिर जो गुरु तुम्हारी उस असली और मूल समस्या को हल कर दे, उससे सुन लेना, उससे सीख लेना; उससे सुनना-सीखना भी सहज होगा। हमारा तो ये है कि भीतर कैंसर (कर्क-रोग) पनप रहा होता है और चिकित्सक के पास जा कर कहते हैं, “नाखून में गड्ढा है, इसका इलाज कराना है।” नाखून में इधर एक अभी गड्ढा दिख रहा है आपको? देखिए! जब ऐसी तुम्हारी बेईमानी है, तो तुम्हें फिर एक-से-एक बेईमान मिल जाएँगे बाज़ार में, वो तुम्हारी बेईमानी का समर्थन करेंगे, वो तुम्हारी बेईमानी से लाभ उठाएँगे। छोटे-मोटे टोटके कर देना तो किसी के लिए भी सम्भव होता है। देखते नहीं हो, तमाम झोला-छाप डॉक्टर घूम रहे होते हैं, उन्हें क्वैक बोलते हैं। कहीं निकलो इधर-उधर से, वहाँ पर वो एक चार फीट का तम्बू गाड़ कर बैठा है, वो कह रहा है, “यहाँ एच.आई.वी. का इलाज होता है।” दिखते हैं या नहीं दिखते हैं? कोई खान पहलवान, वो कह रहा है, “कितना भी तुम्हारा सब-कुछ ख़त्म हो गया हो, हाथ बचा ही ना हो, आ जाओ, हम हाथ लगा देंगे” इसी को बोला जाता है “नीम-हकीम खतरा-ए-जान!”

अपनी ओछी बीमारियों के लिए तुम नीम-हकीमों के पास घूमते रहे हो; और वो कई बार इलाज कर भी देते हैं, तुम्हें हो गई संतुष्टि? मैं चुनौती दे रहा हूँ! मैं कह रहा हूँ - असली बीमारी ले कर आओ, असली बीमारी ही कसौटी है। और उसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं। असली बीमारी छुपा कर नकली बीमारी को ले कर घूमना कहाँ की समझदारी है?

दोषोऽपि विहितः श्रुत्या मृत्योर्मृत्युं स गच्छति। इह पश्यति नानात्वं मायया वञ्चितो नरः।।

“‘मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है’, ऐसा कह कर श्रुति ने दोष भी बतलाया है। मनुष्य माया से ठगा जा कर ही संसार में नानात्व देखता है।”

~अपरोक्षानुभूति (श्लोक ४८)

प्र३: आदिशंकर घोषित कर रहे हैं कि मनुष्य मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है। मैं ज़रा अचम्भे में हूँ, कृपया रोशनी डालें। मरण से मरण तक जाना क्या है, और क्या मरण से मरण के मध्य जन्म और जीवन भी है?

आचार्य: हम इसकी चर्चा आज पहले ही प्रश्न में कर चुके हैं, कि तुम जहाँ से शुरू करते हो, वही तुम्हें आगे मिलता रहता है। विस्तार में आज बात करी है, कि जब तुम्हारी प्रेरणा ही अपूर्णता से है, तो आगे तुम अपने लिए और अपूर्णता रच लेते हो।

आदमी का जीवन मृत्यु से मृत्यु तक की यात्रा है। पूछ रहे हैं, “बीच में कुछ और भी है क्या? शुरू में मौत है, अंत में मौत है, बीच में कुछ और?” नहीं! बीच में भी मौत ही है, बेटा! तुम मौत से मौत तक मौत से हो कर यात्रा करते हो। तो फिर तुम क्या हुए, जीवित? नहीं, तुम मुर्दा हो! एक मुर्दा है जो मृत्यु से चला है, मृत्यु से हो कर गुज़र रहा है, और मृत्यु तक पहुँचेगा। तो कुछ हुआ क्या? कुछ हुआ ही नहीं। इसीलिए जानने वाले कहते हैं, “कुछ होता ही नहीं है!” मुर्दा ही चला था, मुर्दा ही चलता रहा, और फिर मुर्दे की ही यात्रा समाप्त हो गई, तो कुछ हुआ ही कहाँ? कोई आए, बोले, “फ़लाना मर गया”, तुम बोलो, “मर गया! ये जिया कब था?” कुछ हुआ ही नहीं!

खौफ़नाक बात ये कम है कि जो मर रहे हैं वो पहले से मरे हुए हैं, जानते हो और बड़ी खौफ़ की बात क्या है? जो पैदा होता है न, वो भी मुर्दा ही होता है। तुम उत्सव मनाते हो जन्म का, तुम कहते हो, “बधाई हो! घर में बच्चा ‘पैदा’ हुआ।” मुर्दा पैदा होता है! मुर्दा पैदा होता है, बच्चा नहीं पैदा होता, उसमें प्राण फूँकने होते हैं; और जन्म अवसर है उस मुर्दा बच्चे में प्राण फूँक देने का। जन्म किसका हुआ है? मुर्दे का। और जीवन किसलिए मिला है? ताकि उस मुर्दे में प्राण फूँक सको, लेकिन हम जीवन का उपयोग प्राणों हेतु नहीं कर पाते, प्राणों का कोई अनुसंधान होता ही नहीं; हम जैसे पैदा होते हैं, वैसे ही मर भी जाते हैं। श्मशान से श्मशान तक, ये आदमी का जीवन है, एक श्मशान का नाम होता है जन्मस्थान, दूसरे श्मशान का नाम होता है भूत-बँगला; नाम-भर का अंतर है।

कहे, “समझ में ही नहीं आया! अरे ऐसे कैसे? हमें तो लगा था बच्चा ज़िंदा पैदा होता है।” नहीं था ज़िंदा, गठरी पैदा हुई थी; गठरी पैदा हुई और फिर गठरी को ही तुमने अंततः जला दिया। गठरी से गठरी तक! कभी देखा है, मुर्दे को कैसे लपेटे होते हैं कपड़े में? देखा है? और कभी देखा है, जब बच्चा पहली बार लाया जाता है तो कैसे लपेटा होता है कपड़े में? बिलकुल एक-सा! वो भी निर्बल और ये भी निर्बल। अंतर बस इतना है कि ये जो बालक-रूपी मुर्दा है, इसे जी जाने का अवसर अभी प्राप्त है, ये अभी कई साल का अवसर लिए हुए है जिसमें संभावना है कि ये जी उठे। पर वो संभावना साकार हज़ारों-लाखों में किसी एक की होती है, बाकी तो सब मरे आए थे, मरे गए।

शंकर ने बखूबी लिख दिया है यहाँ पर, “मृत्योर्मृत्युं स गच्छति- मृत्यु से मृत्यु को जाता है।”

बीच-बीच में बर्थडे (जन्मदिन) भी मनाता है!

(श्रोतागण हँसते हैं)

अरे रे रे रे! मुर्दा जन्मोत्सव मना रहा है!

मौका बीता जा रहा है, अवसर से चूक रहे हो। अवसर वास्तव में है ही नहीं, मुर्दे के लिए क्या अवसर होता है! ‘अनुकंपा’ से चूक रहे हो। अवसर से तो ऐसा लगता है कि जैसे मुर्दे के पास कोई विकल्प हो, जैसे मुर्दे के कर्तृत्व पर निर्भर करता हो कि वो अवसर को भुना पाता है कि नहीं भुना पाता। अनुकंपा से चूक रहे हो, अनुग्रह से चूक रहे हो। मुर्दों का तो ऐसा है कि जैसे मुर्दा पड़ा है और ऊपर से रोशनी उतर आयी, बरसात हो गई, किसी का स्पर्श हो गया, हवा में कोई सुगंध तैर गई, और वो शनै:-शनै: जी उठा। इसे अवसर बोलेंगे क्या? बोल सकते हैं, पर ‘अनुग्रह’ बोलना ज़्यादा सटीक है, उससे चूक रहे हो, मत चूको! मर तो चुके ही हो, कौन जाने कब दफ़ना दिए जाओ! उससे पहले उठ भागो! नहीं तो सारी संभावना तुम्हारे साथ ही दफ़न हो जाएगी, जला दी जाएगी।

जो पैदा होता है वो जड़ होता है, जीवित मात्र चैतन्य को कहा जा सकता है। शरीर-भर हो, तो तुम उसे जीवित बोलते हो क्या? जिन्हें तुम श्मशान लाद जाते हो, उनके पास भी क्या होता है? शरीर तो होता ही है, शरीर-भर होने से जीवित हो गए? तो जीवित किसको मानते हो? जिसमें चेतना हो। और चेतना ये नहीं कि आँखें चल रही हैं और साँस चल रही है और मुँह चल रहा है तो चैतन्य हो गया। चैतन्य वो जो चेता हुआ है। चैतन्य वो जो सार-असार का, सत्य-असत्य का भेद करना जानता है। नहीं तो मुँह तो मुर्दे का भी चलाया जा सकता है, यात्रा तो मुर्दे की भी कराई जा सकती है। सचेत वो, जो होश में और बेहोशी में अंतर जानता है, भ्रम और सत्य में अंतर जानता है। ये जो बच्चा पैदा होता है ये जानता है? ये नहीं जानता, तो इसको जड़ पदार्थ ही कहना ज़्यादा उचित होगा।

छोटा जो पैदा होता है, वो तो अपने संस्कारों का ग़ुलाम है। कौन-से संस्कार? सामाजिक नहीं, दैहिक। उसकी तो जैसी देह है, ऐसा वो जीता है। छोटा-सा एक बच्चा देह के अलावा कुछ होता ही नहीं! उसके दो ही काम हैं - खाना और निकालना। एक नली-सी है वो, उस नली के एक छोर पर उसमें भोजन जाता है और दूसरे छोर से मल बाहर आता है, इसके अलावा वो कुछ करता नहीं दिन-भर। उसको तुमने क्या ध्यान करते देखा है? पढ़ते देखा है? दौड़ लगाते देखा है? जगत के विषय में विचार करते देखा है? उसको तो एक चीज़ देह-वश पता है – भोजन। बाकी सारी क्रियाएँ अपने-आप चल ही रही हैं — साँस चल रही है, हृदय चल रहा है, पाचन चल रहा है। और जब वो पैदा हुआ है तो बहुत सारी वृत्तियाँ ले कर पैदा हुआ है। उसके पास तुम जाओ और बोलो, "हूँ!" तो क्या करेगा? रोएगा। ये तुम्हें सिखाना नहीं पड़ा, ये उसकी देह में बैठी हुई है बात, कि कोई बोले, "हूँ!" तो रो पड़ो। तो इसको चैतन्य बोलना तो ठीक नहीं है न! वो भेद ही नहीं कर पाएगा। उसकी माँ भी उसके पास लाड़ में जाए और बोल दे, "हूँ!" तो क्या करेगा? वो रो ही पड़ेगा। और जैसा ये बच्चा पैदा होता है, ऐसा ही ये अपना पूरा जीवन बिताता है। बस पहले कुछ वृत्तियाँ अभिव्यक्त थीं और कुछ सुप्त थीं, जैसे-जैसे वो जीवन-यात्रा में आगे बढ़ता है, (बल्कि) मृत्यु-यात्रा में आगे बढ़ता है, वैसे-वैसे वो अभिव्यक्तियाँ, वो वृत्तियाँ भी, जो प्रसुप्त थीं, जागृत हो जाती हैं।

छोटे बच्चे में ‘काम’ नहीं होता। छोटे बच्चे के बगल में छोटी बच्ची बैठा दो, वो बलात्कार नहीं कर देगा, अभी उसकी वासना प्रसुप्त है। वो अभी ज़रा पंद्रह-साल आगे बढ़ेगा, फिर क्या होगा? कि वो जो शरीर की वृत्ति उसके भीतर सोई पड़ी थी, अब वो जग जाएगी, अब वो बलात्कार भी और कर देगा। फिर इसलिए तुम्हें उसे शिक्षा देनी पड़ती है, सिखाना पड़ता है, “स्त्री का सम्मान करो! हिंसा मत करो!” सोचो तो, क्यों सिखाना पड़ता है? क्योंकि हिंसा का बीज वो ले कर पैदा हुआ है। इसी को कहते हैं मुर्दे का पैदा होना। और अधिकांश लोग जैसे पैदा होते हैं, उससे और ज़्यादा गिरने की ही उनकी यात्रा होती है। इसीलिए फिर तुम खूब सुनते हो आम साहित्य और संस्कृति में, कि “बच्चों जैसा जीवन मिल जाए तो क्या बात है! बच्चों जैसा निर्दोष भोलापन मिल जाए तो क्या बात है!”

“मगर मुझको दिलवा दो वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी!” कैसे सुनते हो तुम उसको, भाव-विभोर हो कर के! सुनते हो कि नहीं? गाओ ज़रा! बहुत ज़ोर से 'हाँ' बोला, गाओ! “ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो।” हाँ?

प्र: (गाते हुए) “ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी। मगर मुझको लौटा दो बचपन की यादें, वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी। ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो।”

आचार्य: अब बहुत लोग जो ये सुनेंगे रिकॉर्डिंग , उनकी आँखें नम हो जाएँगी।

(श्रोतागण हँसते हैं)

ये मुर्देपन की इंतहा हो गई, तुमने मुर्दे को ही आदर्श बना लिया है। तुम कह रहे हो, “मुझे वैसे ही कर दो जैसा मैं पैदा हुआ था”, और पैदा ही क्या हुए थे? मुर्दे। पर हम इतने ज़्यादा मुर्दे हो जाते हैं कि बचपन का छोटा मुर्दा भी हमको बड़ा आलोकित-सा लगता है, बहुत ऊपर का लगता है, हम कहते हैं, “यही है उच्चतम आदर्श!” और बड़े-बड़े शिक्षक और बड़े-बड़े गुरुजन हवाला दे कर बोलते हैं, उदाहरण दे कर बोलते हैं, कि “तुममें एक दिन बच्चों जैसी निर्मलता आ जाएगी।” और जिन्होंने बच्चे पाले हैं, वो खूब जानते हैं कितनी निर्मलता होती है! अगर मल कहीं पाया जाता है तो बच्चे ही वाले घरों में पाया जाता है, और कह रहे हो ‘बच्चों जैसी निर्मलता!’ वो दिन-रात मल ही ले कर घूम रहा है। बच्चे निर्मल हैं तो हगीस किसके लिए है?

पर तुम और गिर जाते हो, और गिर जाते हो। बालक में तो वृत्तियाँ थोड़ी-सी प्रसुप्त हैं, प्रच्छन्न हैं, दबी हुई हैं। जैसे-जैसे आगे बढ़ते हो, वैसे-वैसे वो कचरा भी, जो सोया पड़ा था, वो प्रकट हो जाता है। तुम्हें शिक्षा मिलती है, तुम्हें सामाजिक संस्कार मिलते हैं, और वो मरीज़ की हालत और ख़राब कर देते हैं, मुर्दे की हालत और ख़राब कर देते हैं। अभी मुर्दे को दवाई दी जा रही है, और मुर्दा मुर्दे से मुर्दातर होता जा रहा है, *मोर डेड दैन द डेड*। और ये जो मरे-से-मरा आदमी है, फिर ये एक दिन जब मरता है तो तुम शोक मनाते हो, कहते हो, “मर गया!”

(श्रोतागण हँसते हैं)

गजब है! उसमें चैतन्य जगा कब? जिनमें चैतन्य जगा हो, उनको मान लो कि वो जिए; जिसका चैतन्य जगा ही नहीं, वो तो चलती-फिरती लाश है!

और अब तो तकनीक बहुत बढ़ गई है, लाशों में भी भीतर तुम मशीन इत्यादि लगा दो तो वो चलने-फिरने लगेंगी; वेंटिलेटर * और क्या होता है? जो * वेंटिलेटर पर पड़ा है, वो कभी मर नहीं सकता, तुम्हें हटाना पड़ता है। चिकित्सक आ कर पूछते हैं, कहते हैं, “हटा दें?” मुर्दा तो है, लेकिन अब साँस ले रहा है वो। तकनीक और बढ़ जाएगी। दो-चार रॉड लगानी है, एक चिप लगानी है, और मुर्दा चलना-फिरना, बात करना, खाना-पीना, सब शुरू कर देगा। चैतन्य नहीं आएगा लेकिन उसमें, होश नहीं आएगा, सत्य के प्रति प्रेम नहीं उठेगा उसमें, समाधि की आकांक्षा नहीं उठ जाएगी उसमें, उपनिषदों और गीता का अर्थ नहीं करने लग जाएगा। बड़े-से-बड़े कम्प्यूटर के सामने तुम रख दो, “अयं आत्मा ब्रह्म,” और कहो कि “बता! अर्थ बता!” और आज नहीं, अगर इंसान बचा रहा तो आज से पचास-हज़ार साल बाद भी तुम्हें जो कम्प्यूटर बनाना हो, बना कर उससे कहना कि “बता, 'तत् त्वम् असि ' का अर्थ बता!" वो अनुवाद कर देगा, करोड़ भाषाओं में पल-भर में अनुवाद कर देगा, लेकिन समझ कभी नहीं पाएगा।

जो समझ जाए वो ज़िंदा, जो समझ ना पाए वो मुर्दा। इसलिए शंकर कह रहे हैं कि मृत्यु से मृत्यु तक की यात्रा करते हो तुम, क्योंकि समझ तो तुम कभी-भी नहीं पाए; नासमझ पैदा हुए थे, नासमझ चलते रहे, और नासमझी में ही नष्ट हो गए।

* * प्र१: * * क्या चैतन्य होने की संभावना सभी इंसान में पहले से मौजूद होती है?

आचार्य: सबमें!

जीवित होने की संभावना के बिना तुम मुर्दे कहला ही नहीं सकते। समझो बात को!

(कप उठाते हुए) कभी बोलोगे, “ये कप मुर्दा है”? बोलोगे, “ये मुर्दा है”? मुर्दा उसी को बोलोगे न जिसमें जीवन की संभावना थी, बीज था? तो मैं अगर बार-बार बोल रहा हूँ, “तुम मुर्दे ही हो”, तो इसका अर्थ क्या है? कि तुममें जीवन की संभावना है। इसको (कप) थोड़े ही बोल रहा हूँ, कि “ये मुर्दा पैदा होता है, मुर्दा ही ख़त्म होता जाता है।” इसका (कप) क्या है, इसकी तो संभावना ही नहीं थी, तुम्हारी थी! इसीलिए तुम्हारी बात करते हुए बुद्धजन द्रवित हो जाते हैं, फिर अपना जीवन झोंक देते हैं तुम्हारी मदद के लिए, क्योंकि तुममें संभावना थी पर वो संभावना फलित नहीं हो पायी।

प्र१: ये बात मेरे मन में आती है कि असंख्य प्राणी इस पृथ्वी पर हो चुके हैं, और अभी भी हैं, सबके अंदर शुरुआत से ही भूख की विकृति, काम की विकृति, सभी विकृतियों को भेजा, और जैसा कि आपने कहा, सबके अंदर वो चैतन्य का बीज भी भेजा है। तो ऐसा क्यों हो गया कि दस-हज़ार साल की मानव सभ्यता के बाद चैतन्य इतना कम है और काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ, वो सारे पनप रहे हैं, और चैतन्य वाला बीज इतना नहीं पनप रहा?

आचार्य: ये भी भेजा, वो भी भेजा, जो तीसरा है, उसकी भी तो बात करो! चुनने वाले को भी तो भेजा! जड़ता भी भेजी, चैतन्य भी भेजा, और जो चुन सके, उसको भी भेजा।

और एक बार हक़ दे दिया कि चुनना तुम्हें है, उसके बाद ब्रह्म का काम ख़त्म! उसने तुम्हें दे दिया हक़, जो चुनना है चुनो। तो अब क्या हम ब्रह्म से सवाल कर सकते हैं कि “हमने ये क्यों चुना”? अब अगर तुम्हें सवाल करना है कि “अधिकतर लोग जीवन के ऊपर मृत्यु को क्यों चुनते हैं”, तो ये सवाल तुम्हें ब्रह्म से नहीं, लोगों से करना पड़ेगा। लोगों से जा कर पूछो न! ब्रह्म पर क्यों आरोप लगा रहे हो? उसने तो तुमको क्या दिए थे? विकल्प दिए थे, कि “रोशनी चुन लो कि अँधेरा चुन लो, सत्य चुन लो कि असत्य चुन लो”, और इतना करने के बाद वो स्वयं पीछे हट गया था, उसने कहा था, “अब सारा हक़ किसके हाथ में है? तुम्हारे हाथ में है।” तो अब निर्णय जो भी किया गया, जो भी चुनाव किया गया, उसके बारे में सवाल-जवाब करना है तो किससे करोगे? अपने-आप से पूछो न, कि “ये जो चुन रहे हो, काहे चुन रखा है?”

ऊपर वाले ने तो दोनों ओर चुनाव करने की ताक़त दी है तुमको, तुम एक ही ओर काहे भगे जा रहे हो, तुम जवाब दो। और ऊपर वाला अब निरपेक्ष है। एक बार ताक़त उसने तुम्हारे हाथ में दे दी, अब वो बीच में व्यवधान नहीं डालेगा, वो पीछे हट कर खड़ा हो जाता है। आज सुबह यही बात कर रहे थे। एक बार उसने तुम्हारे हाथ में कमान दे दी, वो कहता है, “अब मैं हटा! अब मैं हट रहा हूँ, मेरी लीला शुरू हो रही है। अब हक़ तुम्हें है, तुम्हें जो करना है करो!”

प्र: यही मायाजाल है।

आचार्य: यही लीला है, ना समझो तो यही माया है।

इसीलिए किसी मौके पर मैंने कहा था कि माया दीवार-भर नहीं है, माया द्वार भी है। क्योंकि विकल्प तो हमेशा मौजूद है न! ये प्रश्न मत करो कि “माया क्यों है?” प्रश्न ये करो कि “मैं हमेशा ग़लत चुन क्यों रहा हूँ? मैं जो ही चुन रहा हूँ, वही ग़लत चुन रहा हूँ, क्यों?” और इसका उत्तरदायी और कोई है ही नहीं; ब्रह्म क्या बोलेगा, बेचारा!

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