प्रेम विद्रोह होता है। क्योंकि प्राकृतिक स्थिति आपकी — बंधन, माने अप्रेम की होती है। प्रेम जो आपकी प्राकृतिक जन्मजात स्थिति है, उसके खिलाफ़ बड़ा विद्रोह होता है। उसी आग का प्रकाश ज्ञान बनता है। नहीं होगी वो आग, तो कहाँ से लाओगे दम ये कहने का कि, "अगर इसी को ज़िंदगी कहते हैं, तो नहीं जीना! इसी को चाहना जीवन है? नहीं चाहना! यही सब मानना ज़रूरी है? नहीं मानना!" कहाँ से लाओगे साहस?
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: सबको लगता है कि उनके पास आँखें हैं। सबको लगता है, उनके पास बुद्धि है, दिमाग़ है। और सबको लगता है कि वो ज़िंदा हैं, तो दुनिया का अनुभव ले ही रहे हैं। आपको ऐसा लगता है, फिर भी जिन्होंने ज़िंदगी को समझा है, उन्होंने आपसे आग्रह किया है कि थोड़ा और क़रीब से देखो — दुनिया को भी, लोगों की ज़िंदगी को भी, और अपने जीवन को भी। जो उधर चल रहा है, उसको भी ज़रा ठीक से देखो। और जो इधर चल रहा है, उसको भी ज़रा ग़ौर से देखो।
और हम कह देते हैं कि, "साहब, ये ग़ौर करने की ज़रूरत ही क्या है? हमारे पास आँखें हैं न! और आपको क्या लग रहा है कि इतनी उम्र हमने बिना कुछ देखे जाने ही बिता दी है? हमने देखा भी है, हमने जाना भी है।"
फिर भी जानने वाले आपसे आग्रह करते ही रहते हैं कि नहीं, शायद कहीं कोई भूल हो रही है। जाओ, थोड़ा और प्रयास करो। कुछ देखना आपसे चूक रहा है। कुछ है बात, जो अभी समझ नहीं पा रहे हो। कोई है तत्व, जिससे वंचित रह जा रहे हो, ज़रा ठीक से देखो न। इस "ठीक से देखने" के आग्रह को वो अवलोकन कहते हैं। अवलोकन। कहते हैं — जाओ,
अवलोकन करो — जगत का और जीव का। माने, दुनिया का और अपना। इन्हीं दोनों का करना होता है।




