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सच को नहीं, झूठ को तलाशो
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: राघव ने प्रश्न पूछा है, कहते हैं, “आचार्य जी प्रणाम, ज़िन्दगी में लगातार एक अभाव का विचार बना रहता है। जब किसी चीज़ में डूब जाता हूँ, या जब संतों को सुनता हूँ और पढ़ता हूँ, तो वो चला जाता है, लेकिन पुनः वापस आ जाता है। कोई भी चीज़ इस आंतरिक प्यास को बुझा नहीं पा रही है। ये शायद इसीलिए है क्योंकि मुझे अपना काम पसंद नहीं है और उसपर भरोसा भी नहीं है। ये भरोसा नहीं है कि जो कुछ भी मैं कर रहा हूँ वो सार्थक चीज़ है। तो मैं करना तो चाहता हूँ उसको, जो सार्थक है सचमुच, पर मैं मजबूर हूँ।"

ये सब, राघव, किस्सेबाज़ी है।

क्या है सार्थक, जिसे तुम करना चाहते हो? और जो तुम करे जा रहे हो, तुम्हें कैसे पता वो सार्थक नहीं है?

सत्य की दुनिया में देखना और करना साथ-साथ होते हैं। जैसे दो बिलकुल करीब की समानांतर रेखाएँ। इतने करीब की, इतने करीब की, कि जैसे एक हो गई हों।

तुम सार्थक की चिंता बिलकुल छोड़ दो। उन सबसे कह रहा हूँ जो सत्य के, या सार्थकता के साधक हैं, खोजी हैं, प्रेमी हैं। तुम सत्य की चिंता छोड़ो, हटाओ, तुम अपनी खोज रद्द करो। तुम मुझे पहले ये बताओ कि क्या तुम्हें ठीक-ठीक पता है कि अभी तुम जिसमें उद्यत हो वो निरर्थक है? नहीं, तुम्हें ये नहीं पता।

तुम अपने वर्तमान जीवन की निरर्थकता का पूर्ण बोध किए बिना किसी अन्य सार्थकता में कूदना चाहते हो। वास्तव में तुम झूठे आदमी हो। तुम्हारी मंशा क्या है बताए देता हूँ।

तुम दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहते हो। अभी जो तुम्हारे बाएँ हाथ में है, ये तुम्हें निरर्थक दिख नहीं रहा, तुम्हारा कोई इरादा नहीं है इसे फेंक देने का, इसे तुम पकड़े रहना चाहते हो। साथ-ही-साथ तुम महत्वाकांक्षी हो, तुम कहते हो कि, “इसी लड्डू पर लिखा था, इसी लड्डू ने बताया, इसी लड्डू के डब्बे पर विज्ञापन था कि कोई दूसरा भी लड्डू होता है। 'भँगेड़ी लाल हलवाई, हमारे यहाँ इमरती भी मिलती है और सोनपापड़ी भी'।"

अब इमरती तुम ले आए हो, पर इमरती तुम जिस डब्बे में लाए हो उसी डब्बे पर सोनपापड़ी का भी नाम था। इमरती से तुम्हें कोई समस्या नहीं है, इमरती से तुम्हें कोई मुक्ति नहीं चाहिए, पर इमरती को लाने की ही प्रक्रिया में तुमने सोनपापड़ी का नाम पढ़ लिया है, और तुम चाहते हो कि इस हाथ में रहे इमरती, और इस हाथ में रहे सोनपापड़ी। जैसे कि संसार ने ही तुम्हें सत्य नाम का एक किस्सा, एक खिलौना दे दिया हो।

जो रिश्ता इमरती और सोनपापड़ी में है, वही रिश्ता संसार और सत्य के किस्सों में है। दोनों एक ही चीज़ हैं, मिठाइयाँ, दोनों एक ही आयाम में हैं। पर अधिकांशतः सभी संसारियों को लगता है कि जैसे संसार से भिन्न कोई सत्य है, और जो सत्य वो पकड़े बैठे होते हैं वो कुछ नहीं होता। वो दूसरी मिठाई ही होती है, वो संसार से भिन्न तो होता है पर उतना ही जितनी कि सोनपापड़ी इमरती से भिन्न होती है। कुछ रंग अलग है, पर रंग दोनों में है। कुछ आकार अलग है, पर आकार दोनों में है। कुछ स्वाद अलग है, पर स्वाद दोनों में है, कुछ वज़न अलग है, पर वज़न दोनों में है, तो ले दे कर बात ये ठहरी कि दोनों ही पदार्थ हैं।

संसारी का सत्य भी मात्र पदार्थ है, और संसारी को सत्य तक जाने की चेष्टा भी उसके किसी संसारी गुरु ने दे दी है। संसार से ही उसपर कोई प्रभाव पड़ा है तो वो कह रहा है कि, "अब मुझे सत्य चाहिए।" संसार छोड़ना नहीं है उसे, न उसे सत्य चाहिए, उसे 'सांसारिक सत्य' चाहिए। उसे सत्य सत्य नहीं चाहिए, उसे सांसारिक सत्य चाहिए।

इमरती के डब्बे ने बता दिया 'सोनपापड़ी' और सांसारिक गुरु ने बता दिया 'सांसारिक सत्य'। उसने तुम्हें बता दिया, “अरे कुछ सार्थक होता है, अरे कोई ब्रह्मलोक है, अरे कोई आनंद की अवस्था होती है, अरे भीतर कुछ रिमझिम बरसेगा, पीठ पर साँप रेंगेंगे, भीतर चक्र-ही-चक्र घूमेंगे, खोपड़ी में रंध्र खुल जाएगा, फव्वारा फूटेगा।"

आइ.सी.यू. पहुँचोगे, और कुछ नहीं होगा।

(सभी श्रोता हँसते हैं)

समझ में आ रही है बात?

सार्थकता की बात मत करो। मैं पहले तुम्हें चुनौती देकर पूछ रहा हूँ, तुम्हें निरर्थकता समझ में आई है? तुमने जो पकड़ रखा है, उसकी निरर्थकता आई है समझ में? और नहीं आई समझ में, तो तुम सार्थकता की बात क्यों कर रहे हो?

निरर्थकता छोड़े नहीं छूटती, निरर्थकता को पकड़े-पकड़े कह रहे हैं, “सार्थकता चाहिए।" झूठ को पकड़े-पकड़े कह रहे हैं, “सच चाहिए।"

तुम जहाँ हो, पहले उसकी निरर्थकता देख लो, फिर किसी सार्थक उद्यम में लगना। देखो कि कहाँ घुसे हुए हो, देखो कि क्या कर रहे हो।

जैसे कि कोई शादी के भद्दे और अश्लील उत्सव में नाचे और साथ-ही-साथ कहे, “मुझे गुरु का सान्निध्य चाहिए।" जैसे कि कोई धनपशु मुनाफे के, कि तनख्वाह के फेर में, तीसों दिन चाकरी मचाए, और तीसों दिन चाकरी मचाने के बाद कहे, “मुझे मुक्ति चाहिए।“ कि जैसे काजू बर्फी, सोनपापड़ी, इमरती, रसगुल्ला, बर्फी, भोगते हुए कोई बोले, “ये उपवास की प्रक्रिया है।"

लोग आते हैं, मिलते हैं मुझसे, बात करते हैं, सबको सत्य चाहिए। मैं किसी से ये पूछता ही नहीं कि, "तुम्हारी सत्य की प्यास कितनी तीव्र है?" लोग बहुत किस्से सुनाएँगे, ऐसे-ऐसे गीत गाते हैं कि कान पक जाएँ। मैं तो तहकीकात करता हूँ, इनवेस्टिगेटिव स्पिरिचुअलिटी (खोजी आध्यात्मिकता) है मेरी। मैं जीवन में घुसता हूँ, मैं पूछता हूँ, “बताओ, सुबह से शाम तक करते क्या हो?”

आप में से भी कुछ लोग मुझसे मिले होंगे तो पाया होगा कि मेरा सवाल यही होता है कि, “ज़िन्दगी बताओ ज़िन्दगी, करते क्या हो? ये मत बताओ कि परमात्मा की कितनी लालसा है, कि कृष्ण प्रेम में कितने पागल हो, कि राम के कितने दीवाने हो। हटाओ बेकार की बातें, ज़िन्दगी बताओ। करते क्या हो? किससे मिलते हो? किससे जुलते हो? कहाँ जाते हो? कहाँ खाते हो? धंधा क्या है तुम्हारा? रिश्तेदारी किससे है? किनकी संगत में उठते-बैठते हो?”

मैं ये जानना चाहता हूँ कि असत्य के प्रति तुम्हारा नज़रिया क्या है। सत्य के प्रति तो वैसे भी कोई नज़रिया हो नहीं सकता। सत्य है कहीं, कि उसके प्रति नज़रिया रखोगे? सत्य तो वहाँ जहाँ दृष्टि जा नहीं सकती। किसी भी कोण पर तुम चले जाओ, सत्य तुम्हें दिखेगा नहीं, न दृष्टि न कोण, तो सत्य के प्रति कैसा दृष्टि-कोण?

मैं बात असत्य की करता हूँ, मुझे बताओ असत्य से खीझ कितनी है तुम्हें? मैं चिढ़े हुए लोग देखना चाहता हूँ, मैं खीझे हुए, उत्तेजित, विद्रोही लोग देखना चाहता हूँ। मुझे लोग चाहिए जो ऊब चुके हों, जो कह रहे हों, “अब और नहीं, बहुत हार चुके, बहुत पिट चुके, बहुत धोखे खा चुके, अब और नहीं।"

परमात्मा के मीठे गीत संसार ने बहुत गा लिए। हम इतने मायावी लोग हैं कि उन मीठे गीतों को हमने अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए इस्तेमाल कर किया। तो मीठे गीत वगैरह गाने की मेरे यहाँ कोई बात नहीं, यहाँ तो खरे-खरे सवाल हैं।

“दिन भर जो करते हो, उसमें डर कितना शामिल है? प्रेम है अपने काम से? जिनके साथ रहते हो, उनसे रिश्ते कैसे हैं? विपरीत लिंगी को देखते हो, मन में क्या ज्वार-भाटा उठता है? धन के प्रति क्या रवैया है? परिवार के प्रति क्या रवैया है? अतीत की कितनी याद आती है? भविष्य को लेकर कितने आशंकित रहते हो?” मैं तो यही बातें पूछूँगा।

“सत्य की तरफ चलते हो और घर वाले रोक देते हैं, तो क्या हाल होता है तुम्हारा? और जब कोई प्रेमी या मित्र तुम्हें सत्य की ओर प्रेरित करता है, तब क्या हाल होता है तुम्हारा? असत्य दिख जाता है कि असत्य है, पर उससे कुछ सुविधाएँ मिल रही होती हैं, कुछ भोगों की पूर्ति हो रही होती है, तब क्या निर्णय लेते हो तुम? जानते हो कि अभी कर्तव्य शेष है, पर नींद सता रही है, तब सो जाते हो, या आँखों पर ठंडा पानी डालते हो?” मैं ये पूछूँगा।

इससे पता चलता है कि वास्तव में सत्य के कितने प्रार्थी, कितने ग्राहक हो तुम। किस्सेबाज़ी से नहीं।

“दुनिया को किए वादे ज़्यादा प्यारे हैं तुम्हें या सच्चाई को समर्पण, ये बताओ। जानते हो कि जो अधर्मी हैं, संसार को नष्ट किए दे रहे हैं, दुःख के दूत हैं, उनसे पैसा लेते हुए हाथ नहीं काँपते तुम्हारे? और जहाँ जानते हो कि सच्ची, खरी बात है, वहाँ से दूरी बनाते लाज नहीं आई तुम्हें?” मैं तो ये पूछूँगा। “किसके पास हो और किससे दूर भाग बैठे?”

ये बहुत छोटी-छोटी और ज़ाहिर बातें हैं, पर पूछी जानी ज़रूरी हैं। “रिश्तेदारी किससे है तुम्हारी, उनसे जिनसे हाड़-माँस का सम्बन्ध है, या सत्यता और गुरुता से? आज के दिन को देखो, बीते हुए दिन को देखो, बीते हफ़्ते को देखो, और बताओ, कि कितने पानी में हो तुम?"

सार्थक की बात मत करो, निरर्थक को पहले निरर्थक तो जानो। तुमने तो निरर्थक को ही सार्थक समझ रखा है, और झूठों से जीवन को भर रखा है, जैसे कि कोई किसी भोंदी बारात में अश्लील नृत्य करता हो, और कहे कि, “मैं तो भक्तिमग्न होकर नाच रहा हूँ। मीरा भी तो नाची थीं सड़क पर, और मैं भी तो सड़क पर नाच रहा हूँ।" तुम तो निरर्थक को ही सार्थक बोले पड़े हो, तो सार्थक की कैसी तलाश? जिसे मदिरालय में गंगाजल मिल गया हो, वो देवालय क्यों जाएगा? जिसे झूठ ही अब सच लगने लगा हो, उसे किस सच की तलाश रह जाएगी?

जब निरर्थक साफ़-साफ़ दिखाई देता है कि निरर्थक है, तो भीतर से आग उठती है, वो आग अपना ही कलेजा जलाकर रख देती है, यही है अहंकार का जलना। दिल जलता है, भीतर कुछ राख-राख सा हो जाता है, चेहरा स्याह हो जाता है, आँखें लाल हो जाती हैं, आदमी बर्दाश्त नहीं कर पाता, कहता है, “कहाँ फँसा हुआ हूँ! आदमी हूँ कि चूहा, नपुंसक, क्या हूँ, बर्दाश्त कैसे कर लेता हूँ रोज़-रोज़ यहाँ फँसा रहना?”

तुम्हें निरर्थक दिखा होता तो तुम फँसे रहना झेल पाते? जब आदमी निरर्थक को निरर्थक देख लेता है, तब उसी 'देखने' को सार्थकता कहते हैं, इसके अतिरिक्त सार्थकता कुछ होती नहीं। सार्थकता की तलाश मत करो, निरर्थकता पर कड़ी नज़र रखो। झूठ को बाँधे हुए सच की तरफ़ जाना बड़े-से-बड़ा पाखंड है। शैतान को मन में बसाए भगवान की ओर जाओगे तो वरदान नहीं पाओगे, शाप और मिलेगा।

"हाथ सुमरनी, पेट कतरनी, पढ़त भागवत-गीत। आन देव की पूजा कीन्हीं, गुरु से रहा न मीता।।"

देखो कैसे-कैसे देवताओं की पूजा करते हो। बल से डरते हो, कोई चढ़ ना जाए तुम्हारे ऊपर। किसी भी तरह का बल हो, धन बल, मोह बल। ये तुम साँड देव की पूजा कर रहे हो।

जो ही हिलने-डुलने लगे, आँखों को आकर्षक लगने लगे, कहीं का भी नचैया-गवैया, उसी के आगे तुम छैला हो जाते हो, दीवाने हुए। कोई सिनेमा के पर्दे पर नाच रहा हो, कोई टी.वी. में नाच रहा हो, तुम्हारी आँखें वहीं जाकर चिपक जाती हैं। शादी ब्याह में देखो। मौजूद हैं यहाँ पर लोग, जिन्होंने सत्य के ऊपर शादियों को चुना, इसलिए कह रहा हूँ।

तो साँड देव के बाद पूजा होती है भाँड देव की। भाँड समझते हो न? अश्लील नृत्य करने वाले, अश्लील गीत गाने वाले। उनसे बाज़ आ जाओ तो असली देवता मिल जाएँ।

जिस दिन निरर्थक को निरर्थक देख लोगे उस दिन सवाल नहीं पूछोगे, उठकर भागोगे। बात खत्म।

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