आचार्य प्रशांत: जब बोला जाता है ‘साक्षी’, ‘बोध’, ‘चैतन्य’, तो ऐसा लगता है जैसे कोई बड़ा जगा हुआ इंसान होगा, और यहाँ हम कह रहें हैं कि ना, जो ‘साक्षी’ है, जो ‘बुद्ध’ है, जो ‘चैतन्य’ है, वो तो पूरा ही धुत है। छवि बनी हुई है कि वो गंभीर क़िस्म का आदमी है।
‘साक्षी’ इन दो आँखों से नहीं देखता, वो किसी और आँख से देखता है। उसकी ये आँखें तो हो सकता हो कि बंद सी ही दिखाई दें, ये बिल्कुल लग सकता है कि वो नशे में है; लगेगा ही कि वो नशे में है। साधारण आदमी होता है जो सीधी राह चलता है, उसके क़दम तो बहके-बहके से ही चलेंगे।
अभी कल या परसों किसी ने पूछा कि ‘नृत्य’ क्या है? तो बात आई कि जब भी कभी कुछ खिलवाड़ में होता है, कुछ पाने की अभीप्सासे नहीं होता है, तो वही नृत्य बन जाता है; और जब भी कभी कुछ भी मानसिक गतिविधि के चलते होता है, कुछ पाने के लिए, कहीं पहुँचने के लिए, तो वो दौड़ बन जाता है। तो गति दो तरह की हो सकती है: या तो दौड़, या नृत्य। दो ही तरह का होता है। इंसान कुछ भी कर रहा है, बोल रहा है, बैठा है, चल रहा है, कोई भी कर्म हो रहा है, वो कर्म के प्रकार दो ही होंगे: या तो वो दौड़ रहा होगा या नाच रहा होगा।
साक्षी नाचता है।
और ‘दौड़ने’ वाले को ‘नाचने’ वाला बहका-बहका ही लगेगा। वो कहेगा पगला गया है, इतना महत्वपूर्ण काम है करने के लिए, इतनी महत्वपूर्ण जगह है पहुँचने के लिए, इतना कुछ है पाने के लिए, और ये पगला नाच रहा है। तो नाचता हुआ सा ही लगेगा। तो ख़ूब नशा है उसे और नशा ऐसा है जिसमें साक्षी ये भी जानता है कि पिलाने वाला कौन है।
कौन है? साकी कौन है? कौन है साकी?



