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जानबूझ कर नासमझी क्यों करते हैं? || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
25 min
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आचार्य जी, जो चीज़ें हम समझते हैं, जैसा हमें लगता है कि हम समझ रहे हैं, वो जानबूझ कर भी हम उसके खिलाफ़ क्यों जातें हैं? जैसे इसी मोह के सम्बन्ध में ही, कि हमें पता है कि इन सब चीज़ों से मोह है। जैसे कल बात हो रही थी कि खाली होना चाहिए, अब हमें पता है जैसे हम नौकरी कर रहे हैं कहीं पर भी तो प्रमोशन के बाद और जिम्मेदारियाँ बढ़ेगी, और समय नहीं दे पाएँगे किसी भी चीज़ को, अध्यात्म के लिए, आत्ममंथन के लिए, ये सब जानने के बावजूद भी हम उसी दिशा में क्यों जाते हैं?

और समझ और मोह में क्या चुनना है, कौन-सा रास्ता चुनना है इसका निर्धारण कौन करता है? जैसे कल भी बात हो रही थी, आप कह रहे थे कि अपने-आपमें कुछ अच्छा बुरा नहीं है, उसके पीछे उसका संचालन कौन करता है वो निर्धारित करती है कि हमारी दिशा सही है या नहीं, तो उसका निर्धारण आत्मा करती है या मन?

आचार्य प्रशांत: नहीं आप ही करते हैं, अहं ही करता है उसे अपने लिए जो ठीक लगता है वो करता है। मैं कई दफ़े कहता हूँ आप बादशाह हैं, आपको ज्ञान दिया जा सकता है पर आपको बोधयुक्त जीवन जीने के लिए विवश नहीं किया जा सकता। आपको सब कुछ बताया जा सकता है, पर जो कुछ आपको बताया जा रहा है आप उसका अनुपालन करें इसकी कोई आश्वस्ति नहीं है। करेंगे आप वही जो आपको अपने लिए हितकर लग रहा है। उसमें भी आपको अधिक-से-अधिक प्रेरित किया जा सकता है, कि देख लो तुम्हारा वास्तविक हित कहाँ पर है, देख लो कि तुम्हारा हित कहाँ है। आप न देखें तो आपको मजबूर नहीं किया जा सकता। तो अंतिम फ़ैसला तो आपको ही करना है।

यहाँ भी सामने जो व्यक्ति बैठा है वो आपसे कुछ बातें कह सकता है, आपके घर जा कर या आपके दफ़्तर जाकर के वो आपका जीवन तो नहीं जी सकता ना? कि जी सकता है? तो अंततः करना तो आपको ही है। बहुत बातें बतायी जा सकती हैं, लेकिन आप फ़ैसला ही कर लें कि आपको वैसे ही चलना है, आपको वही सब करने में सुख है जो अभी तक आप करते आ रहें हैं तो फिर आप वही करेंगे। उसके बाद क्या होगा? उसके बाद आपको ज़िंदगी सिखाएँगी। जब आप किसी की मानने को राज़ी नहीं होते तो फिर सिखाने के लिए एक ही शिक्षक बचता है — ज़िंदगी। उससे तो भाग कर नहीं जा सकते न? बाकी तो सब शिक्षकों से तुम किनारा कर लोगे। इसकी भी बात सुन ली, इसकी भी बात सुन ली, हर जगह से फ़ारिग हो गए। किससे तुम कभी भी निवृत्त नहीं हो सकते? कौन है वो?

श्रोतागण: जीवन।

आचार्य: जीवन। फिर जीवन सिखाता है। अगर गलत निर्णय लिये हैं तो फिर जीवन बताएगा कि गलत निर्णय लिये हैं। बस उसमें एक छोटा-सा पेंच है, क्या? जब कोई व्यक्ति सिखाता है तो वो आपकी भाषा में सिखाता है, जब कोई व्यक्ति सिखाता है तो वो आपसे थोड़ी करुणा रख के, थोड़ा रिश्ता रख के सिखाता है, जब जीवन सिखाता है तो आपसे कोई रिश्ता इत्यादि नहीं रखता, उसका डंडा बिल्कुल निरपेक्ष बजता है, वो ये देखता ही नहीं कि आप कौन हो। वो कहता है कर्म किया, अब कर्मफल भुगतो; हमें नहीं पता तुम्हारा नाम क्या है। माफ़ी माँगने मत आ जाना, यहाँ कोई रियायत नहीं मिलेगी।

तो या तो जब बताया जा रहा है कि मोह घातक है तो समझ लो कि मोह घातक है, चुपचाप सीधी राह पर आ जाओ। या फिर मोह के रास्ते पर ही चलते रहो और इंतेज़ार करो कि जीवन का डंडा बजे। और जब उसका डंडा बजता है तो वो ये नहीं देखता कि तुम्हारे सर पर लग रहा है, कि पाँव पर लग रहा है, कि नाक फोड़ दी कि क्या कर दिया। फिर तुम जिओ, मरो, जो करो, ज़िंदगी का रोड-रोलर फिर ये नहीं देखता कि सामने क्या आ गया; जो कुछ भी सामने आएगा सब पिचेगा।

समझ में आ रही है बात?

बहुत लोग आते हैं वो यही कहते हैं, कहते हैं, आचार्य जी पढ़ा, सुना, देखा बात हम जान तो सब गए हैं, सिद्धांत तो सब समझ में आ गए हैं, पर जीवन में नहीं उतर रहे हैं। मैं कहता हूँ इसको बस थोड़ा-सा संशोधित करो, कहो कि 'मेरी जीवन में इन्हें उतारने की कोई मर्ज़ी नहीं है।' ये मत कहो कि जीवन में उतर नहीं रहे हैं। तुम्हारा जीवन है भाई! तुम उसमें जो करना चाहो वो हो के रहेगा। तुम तय कर लो कि तुम्हें अगले बीस घंटे खाना नहीं खाना है तो नहीं खाओगे, तुम तय कर लो कि आज तुम्हें लाल कपड़े पहनने है तुम पहनोगे, तुम तय कर लो कि यहाँ से बाहर निकल के दाएँ की जगह बाएँ जाओगे तो तुम जाओगे।

तो इतनी विवशता दिखाते हुए झूठी मजबूरी के साथ क्यों कह रहे हो कि समझ में सब आ गया पर जीवन में उतर नहीं रहा। जैसे कि ज्ञान को इल्ज़ाम दे रहे हो कि 'तू उतर क्यों नहीं रहा जीवन में!' ये देख रहे हो ना कि तुमने किस ढंग से बोला है। ये नहीं कहते कि मैं उतार नहीं रहा उसको, मैं उसे प्रवेश ही नहीं करने दे रहा जीवन में, जानबूझ के मैं अड़ा हुआ हूँ, कि कितनी भी बातें सुन लूँ उनपर अमल नहीं करुँगा। बात को भी इस तरीके से कहते हो जैसे कि कर्ता आप हो ही नहीं, जैसे करने वाला कोई और है।

'हम जानते तो सब हैं पर होता नहीं है।' होता नहीं है कि करते नहीं हो। 'नहीं, होता नहीं है।' अच्छा, तो कौन नहीं होने देता, किसकी ज़िम्मेदारी है करना? 'नहीं, होगी किसी की, जिसकी भी है वो करता नहीं है।' हाँ भई! देवदूत उतरेंगे तुम्हारा काम करने के लिए? फ़रिश्ते आएँगे तुम्हारी गाड़ी चलाने? तुमने तय ही कर लिया है कि गाड़ी नहीं चले, तो कैसे चल देगी? गूगल कार को भी तुम्हारी अनुमति तो चाहिए होगी ना चलने के लिए, ड्राइवर भले न चाहिए हो। तुम उसे अनुमति ही नहीं दे रहे चलने की और कहते हो 'चलती नहीं है।' बड़े मासूम हो!

'हम क्या करें, हम तो नादान है, मायूस हैं, कमज़ोर है, मजबूर हैं, हमारी लाचारगी कि तो कोई इंतेहा ही नहीं। आचार्य जी, आपकी एक भी बात ज़िंदगी में उतरती नहीं है।' भक्क! मेरे चेहरे पर बेवकूफ लिखा है क्या? सब उतरेगा बेटा! ऊपर वाले की लाठी बजने दो सब उतरेगा। टेढे से टेढे लोग सीधे हो जाते हैं। जिन्हें कोई गुरु सीधा नहीं कर पाता, उन्हें ज़िंदगी सीधा कर देती है। मत सुनो मेरी बात।

ऐसे ही आते हैं लोग, वो भी कहते हैं, 'नहीं, किसी की बात क्यों सुने, किसी से क्यों सीखें, किसी की किताब काहे को पढ़ें, कोई ग्रंथ क्यों पढ़ें। मैं अपने अनुभवों से सीखूँगा।' मैं कहता हूँ बेशक! आप जैसों के लिए वही रास्ता उचित है। आपको वही करना ही चाहिए। ये वो लोग हैं जो कह रहे हैं कि 'हमें तैरना नहीं सीखना, मैं समुद्र से सीखूँगा। तैराकी सीखूँगा नहीं, मैं सीधे समुद्र में कूद जाऊँगा।' बिल्कुल सम्भावना है कि दस हज़ार में से ऐसा एक आदमी तैरना सीख जाएँ, लेकिन नौ हज़ार नौ सौ निन्यानवे तो डूबेंगे। तुम्हें ऐसे ही सीखना है तो ऐसे सीख लो। कौन कह रहा है!

ये वो लोग हैं जो ये कह रहे हैं मैं किसी से नहीं सीखूँगा कि गाड़ी कैसे चलाते हैं, ''लाओ, चाबी दो। नयी-नयी गाड़ी आज सुबह ही डिलीवर हुई है घर पर। चाबी निकालो, मैं सीधे सड़क पर ले के जाऊँगा और सीख लूँगा।' बिल्कुल हो सकता है कि दस हज़ार में से ऐसा एक आदमी बिना टाँग तुड़ाए घर वापस आ जाए, लेकिन नौ हज़ार नौ सौ निन्यानवे वो होंगे जिनकी गाड़ी भी जप्त होगी, दूसरों को भी मारेंगे, खुद भी मरेंगे। ये वो हैं जो कहते हैं, 'नहीं-नहीं, हम तो अपने अनुभवों से सीख लेंगे ना। लाइफ इज़ दि बेस्ट टीचर।' जाओ सीखो!

समझ में नहीं आता तुमको? वो जो हमारे पीछे के बड़े वाले बाप-दादा हुए हैं, वो काहे के लिए इतने धर्म ग्रंथ छोड़ गए थे अगर सब जीवन से ही सीख सकते तो, बताना जरा? ये बाइबिल, गीता, कुरान काहे छोड़ी गईं हैं हमारे लिए? क्यों छोड़ी गई हैं, जीवन से क्यों नहीं सीखते सीधे? किताबों से क्यों सीखना है? अष्टावक्र तो फिर मूर्ख ही रहे होंगे! पूरी संहिता रच डाली। और क्या ज़रूरत थी कि इतने मोटे-मोटे वेद संकलित किए जाते, वो भी ऐसे समय में जब लिखते नहीं थे? ज़रूरत क्या थी? वो भी कह देते न कि सब लोग सीधे ही?

श्रोता: ज़िंदगी से सीखो।

आचार्य: 'ज़िंदगी से सीखो बेटे ज़िंदगी से', जाओ! ज़िंदगी से सीखो। ये उनकी करुणा थी, उन्होंने कहा, 'सीख तो लोगे ज़िंदगी से पर दस हजार साल लगेंगे। और एक बटा दस हजार सम्भावना है कि कुछ सीख पाओगे।' अगर तुम्हारे पास अनन्त समय होता तो निश्चित रूप से तुम्हें ये छूट दे दी जाती कि जाओ और ज़िंदगी से सीखो। पर जीने के हैं चार दिन और तुम लगाओगे सीखने में चार हजार दिन, तो बेटा सीखोगे कब? तो इधर-उधर की बात करना बंद करो, जो बताया जा रहा है उससे तर्क करने के बाद भी, उसको जाँचने, मापने, तौलने के बाद भी, अगर बात ठीक लगी रही है तो उस पर चुपचाप सर झुकाकर अमल करो। ये मज़ाक की बात नहीं है, एक ही ज़िंदगी है, बर्बाद मत कर देना।

और कोई उपलब्धि भले मुश्किल होती हो ज़िंदगी में, एक काम करना बहुत आसान होता है, क्या? ज़िंदगी बर्बाद कर देना। क्योंकि वो काम करने के लिए कुछ करना ही नहीं होता, वो काम अपने-आप हो जाता है। बुद्धु बन के बैठे रहो, कुछ नहीं करना है, ज़िंदगी अपने-आप बर्बाद हो जाएगी। हाँ, ज़िंदगी आबाद करने में, जीवन सार्थक करने में, श्रम-साधना करने पड़ते हैं; बर्बाद तो स्वत: हो जाती है। बच्चा पैदा हुआ उसे छोड़ दो, बर्बाद ज़िंदगी! अपने-आप। छोड़ो वो सब शायरी की बातें कि 'मासूम बच्चा पैदा हुआ है, अरे उसे दूर रखना मजहब की किताबों से उन्हीं ने तो बिगाड़ दिया है, उसको तो इंसानियत सिखाओ, इंसान बनेगा।' घंटा बनेगा!

जिसको सही सीख नहीं मिली और जो सही सीख पर अमल नहीं कर पाया, उसकी सजा ये होगी कि वो जानवर भी नहीं बनेगा, जानवर से भी बदतर निकलेगा। जानवरों को तो कम-से-कम एक गारंटी मिली हुई है, कि वो जानवर है जानवर ही रहेंगे, जानवर से नीचे के कुछ नहीं हो सकते, हैवान नहीं हो सकते, पिशाच नहीं हो सकते। इंसान को ख़तरा है, इंसान रिस्क पर है। इंसान को अगर सही शिक्षा नहीं मिली और उसने उस सही शिक्षा पर अमल नहीं करा, तो वो जानवर से भी बदतर हो जाएगा। लेकिन आजकल ये बड़ा चलन चलता है ह्यूमनिज़्म , इंसानियत।

ये चीज़ क्या है इंसानियत समझाना मुझे। इंसान माने क्या, हाड़-माँस? कहेंगे, 'नहीं-नहीं, इंसान माने इंसान की बुद्धि, हम अपनी बुद्धि लगाकर तय करेंगे कि क्या सही है क्या ग़लत है।' इन पगलो को पता ही नहीं है कि बुद्धि आती कहाँ से है। कल चर्चा करी थी न बुद्धि आती कहाँ से है? बुद्धि भी अतीत से आ रही है आपके, बुद्धि भी आपके कोशिकाओं में बसी हुई है, बुद्धि भी संस्कारित है, कन्डिशन्ड है। बुद्धि लगा के तुम जान क्या लोगे पागल! उपकरण भर है बुद्धि। पर ये आजकल ख़ूब चल रहा है ह्यूमनिज़्म।

कहते हैं 'नहीं, सेक्यूलर इथिक्स (धर्म निरपेक्ष नैतिकता) होने चाहिए।' ये कहाँ से आएँगे इथिक्स (नैतिकता), ज़रा बताना? कहाँ से आएँगे? 'नहीं वो तो पता है, यूँ ही पता है न।' कैसे पता है यूँ ही, माने कैसे? कैसे पता है? तो कहते हैं 'ना, न हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा इंसान की औलाद है इंसान बनेगा।' इससे ज़्यादा बेवकूफ़ी भरी बात कभी बोली नहीं गई। इंसान को इंसान बनाने के लिए धर्म चाहिए। धर्म नहीं है तो ये मत सोचो कि जो आदमी का बच्चा पैदा हुआ है वो इंसान बन जाएगा, मैं कह रहा हूँ वो जानवर से भी बदतर बनेगा।

ये बड़ा प्रचलन हो गया है आजकल। कई लोग तो कहते हैं दुनिया की सब समस्याओं का कारण ही धर्म है। कम्यूनिस्टों के पास जाओ, साम्यवादीयो के पास जाओ वो कहेंगे ' रिलिजन (धर्म) ने ही तो बर्बाद कर दिया है दुनिया को। आज तक दुनिया में सबसे ज़्यादा लोग मारे किस नाम पर गए? धर्म के नाम पर। आज तक सबसे ज़्यादा अंधविश्वास किसने फैलाए? धर्म ने फैलाए।' बिल्कुल हुआ है ये सब धर्म के नाम पर, ये भी तो बता दो कि धर्म न होता तो आदमी आदमी से क्या ऐसे कुर्सी पर आमने-सामने बैठकर बात कर रहा होता? जानवर तो नहीं करते हैं।

तुम्हें ये सिखाया किसने कि दो लोग शांति-पूर्वक एक-दूसरे के सामने कुर्सी पर बैठकर बात कर सकते हैं? वैज्ञानिकों ने सिखाया? ये किसी प्रयोगशाला का आउटपुट (उत्पादन) है? कहाँ से सीखा तुमने ये? ये भी तुम्हें धर्म ने ही सिखाया है, पर हम भूल जाते हैं। हमें लगता है, नहीं साहब! ज़रुरत ही नहीं है कुछ, आई विल लर्न फ्रॉम लाइफ (मैं जीवन से सीखूँगा), इंसानियत। इंसानियत से ज़्यादा खोखला शब्द कुछ नहीं होता है। आप जिसको आज इंसानियत कह देते हो, भूलिए नहीं कि वो इंसानियत भी मज़हब से ही आयी है। धर्म न हो तो कौन सिखाएगा आपको इंसानियत। धर्म के बिना आपको क्या लगता है आप रेडीमेड इंसान हो? एक नये ताज़े पैदा हुए बच्चे को जंगल में छोड़ दो और फिर देख लो कि इंसानियत चीज़ क्या होती है, देख लो!

मानवता को ऋणी होना चाहिए उन चंद लोगों का। वो मु्श्किल से कुछ सौ, कुछ हज़ार लोग थे, जिन्होंने ध्यान की गहराइयों में प्रवेश किया। जिन्होंने आदमी की चेतना को ऊँचाईया दी। जिनके दम पर आज आदमी अपने-आपको गौरव से आदमी कहता है। और कहता है कि मनुष्य सब योनियों में, सब प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ है। यूँ ही नहीं सर्वश्रेष्ठ है, वो उन कुछ लोगों के दम पर सर्वश्रेष्ठ है; नहीं तो आप भी वही हो जो कोई और जानवर है, बस आप थोड़े बुद्धिमान जानवर हो, लेकिन, बुद्धि से क्या हो गया, वृत्तियाँ तो पाशविक ही हैं, भीतर तो गोरिल्ला ही है ना? हाँ बुद्धिमान गोरिल्ला है, तो? है तो गोरिल्ला ही। तो वो जो मुट्ठी भर लोग हैं, साहब, उनकी बात सुनना सीखिए, उनकी बातों के बिना कुछ नहीं!

कह तो देते हो सेक्यूलर इथिक्स (धर्म निरपेक्ष नैतिकता) के नाम पर, कि लव इज़ मॉय रिलिजन (प्रेम मेरा धर्म है)। ज़रा बताना प्रेम होता क्या है? बताओ प्रेम क्या होता है? बताओ? हटाओ बिल्कुल धर्म को; धर्म अलग कर दो और अब बताओ प्रेम क्या होता है? न हो कोई कृष्ण तो कैसे जानोगे कि प्रेम क्या होता है, बोलो? न हो कोई कृष्ण तो जानते हो प्रेम का क्या मतलब होगा? यही सब — मोह, आसक्ति, अटैचमेंट , पजेसन , यही हो जाएगा प्रेम। प्रेम क्या है ये धर्म ने ही तो सिखाया है, धर्म नहीं तो प्रेम कहाँ!

और जब धर्म की बात आती है तो धर्म के वाहन को मत भूल जाना। जिस रुप में आप धर्म को जानते हो, वो हमारे अपने ध्यान से अद्भूत नहीं है। वो किसी और पर उतरा है और उसने पूरी दुनिया में बाँटा है। जिस पर उतरा है उसकी बात सुनना सीखो भई, या फिर ऐसे हो जाओ कि सीधे वो तुम पर ही उतरे, वो भी हो सकता है, लेकिन उसकी सम्भावना वही है दस हजार में एक। या तो ऐसे हो जाओ आपका ध्यान इतना गहरा हो जाए, आपका समर्पण इतना सच्चा हो जाए कि परम चेतना आपको भी उपलब्ध हो जाए। हो जाइए ऐसे, हो सकते हैं, हजारों लोग हुए हैं आप भी हो सकते हैं। पर अगर आप वैसे नहीं है तो कम-से-कम इतना तो करिए कि जो जानते हैं, और जानकर के बताना चाहते हैं, बाँटना चाहते हैं उनकी बात सुनिए तो। मैं नहीं कह रहा हूँ कि आँख मूँदकर मान लीजिए, पर सुनना तो सीखिए। सुनिए, सम्मान दीजिए। उस बात के साथ उलझिए, जिरह करिए। तर्क करिए, काटने की कोशिश करिए। और ये सब करके भी अगर वो बात न कटे, सच्ची लगे तो फिर उसे बिना किसी विरोध के, बिना उत्पात किए जीवन में उतारिए, अमल करिए।

धर्म की महत्ता आप समझते हैं? जो ऐसे कबीले है जिनका आज तक भी सभ्य संसार से बहुत कम सम्पर्क है, उनके भी अपने धर्म हैं। मनुष्य एक धार्मिक प्राणी है, आदमी बिना धर्म के हो ही नहीं सकता, क्योंकि आदमी की चेतना फड़फड़ाती है, झटपटाती है, उसे धर्म चाहिए। आदमी बैचेन पैदा होता है, उसे धर्म चाहिए।

अंडमान में, उड़ीसा में, झारखंड में, छत्तीसगढ़ में, दक्षिण अमेरिका में, अफ्रीका में अभी भी कुछ ऐसे जनजातीय लोग हैं जिनका शेष विश्व से सम्पर्क बहुत थोड़ा है, वो अभी भी अपनी पुरानी परम्पराओं में जी रहे हैं, पर उनके पास भी उनके तरह का कुछ-न-कुछ धर्म है ज़रूर। वो भी किसी के सामने झुकते हैं, वो भी पूजा करते हैं, उनकी भी धारणाएँ हैं; पशुओ की नहीं होती, पशु किसी के सामने नहीं झुकते। आदमी को धर्म चाहिए।

मान मत लेना कि प्रेम तो इंसानियत है, वो तो हम यूँ ही सीख लेंगे। नहीं सीख पाओगे पागल! बिना धर्म के प्रेम नहीं सीख पाओगे।

बिना धर्म के बोध नहीं, बिना धर्म के मुक्ति नहीं, बिना धर्म के सरलता नहीं, बिना धर्म के अनासक्ति नहीं। और ये सब नहीं तो तुम्हारी फिर ये दुनिया चलेगी कैसे बताओ? वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाएँ भी कैसे चलेंगी अगर अनासक्ति न हो, अगर ईर्ष्या और स्पृहा इन्हीं का बोलबाला हो तो? चल लेंगी ये प्रयोगशालाएँ? वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाएँ भी तभी चल पाती हैं ना, जब दो वैज्ञानिक आपस में एक-दूसरे से ईर्ष्या नहीं कर रहे। वैज्ञानिकों को किसने सिखाया कि दूसरे की तरक्की को देख के भी मुस्कुरा दो, शुभकामनाएँ रखो, ईर्ष्या मत रखो? वैज्ञानिकों को क्या ये बात विज्ञान ने सिखायी? बोलो? एक प्रयोगशाला भी सुचारू रुप से तभी चल पाती है ना जब उसमें जो वैज्ञानिक हैं—और बड़े ऊँचे दर्जे के वैज्ञानिक होंगे, लेकिन अगर वैज्ञानिक भी एक-दूसरे से ज़बरदस्त रुप से ईर्ष्या करने लगें और कलह करने लगें, और दो नर वैज्ञानिक एक मादा वैज्ञानिक के पीछे भिड़ जाएँ आपस में, तो चल लेंगी दुनिया की प्रयोगशालाएँ? बोलो। तो इन वैज्ञानिकों को भी कौन सिखा रहा है जीने के नियम? विज्ञान तो नहीं सिखा रहा ना?

बहुत लोगों का यही मानना है, कि 'नहीं, ज़िंदगी की ये जो मूलभूत बातें हैं वो तो हमें भी पता होती हैं।' ये अनुभववादी है। इनका धर्म क्या है? अनुभव। ये अनुभववादी लोग हैं, इनका मानना है कि हम अनुभव से सीख लेंगे। ये बहुत ख़तरनाक लोग हैं। ये अज्ञानी तो है ही, ये आज के शैतान बनते जा रहे हैं। इन्होंने चारों तरफ़ यही भ्रम फैला दिया है। न ये कहते हैं कि किसी ऋषि की ज़रूरत है, न गुरु की ज़रूरत है, न किसी ग्रंथ की, न किसी शास्त्र की ज़रूरत है। ये कहते हैं हमारा अनुभव काफ़ी है, हम अनुभव से सीख लेंगे। ये कहते हैं 'हम भी तो इंसान हैं। हमारी भी तो बुद्धि है। हम भी तो देखते सुनते हैं; हम ख़ुद ही पता कर लेंगे।' इनसे बचिए, और इनके जैसा होने से बचिए।

वो स्थिति आती है जब आपको किसी सहारे की ज़रूरत न रह जाए, पर वो स्थिति बाद में आती है। उस स्थिति तक पहुँचने के लिए सहारे लेने पड़ते हैं। दस हज़ार में से नौ हज़ार नौ सौ निन्यानवे लोगों को सहारे की ज़रूरत होती है, और ये कोई अपमान की बात नहीं है। कि आप कहें कि 'अरे, बुद्ध और महावीर को तो किसी के सहारे की जरूरत नहीं पड़ी। उन्होंने तो खुद ही पता कर लिया। हम किसी से कम है क्या? जब वो किसी का सहारा लिए बिना पहुँच गए, तो हम कम हैं क्या उनसे?' तुम उनसे तो तत्काल तुलना कर देते हो, आइंस्टीन से क्यों नहीं करते? जाओ वहाँ भी करो। नहीं, वहाँ झुक जाओगे बिल्कुल।

नहीं कई वैसे आजकल है जो आइंस्टीन पर भी अपने गंदे हाथ रख देते हैं, ऐसे बहुत है। तुम यूट्यूब पर जाकर के अगर आइंस्टीन पर सर्च करोगे तो वहाँ पर वैज्ञानिक रुप से बने हुए वीडियो कम मिलेंगे, गुरु इत्यादियों के भाषण ज़्यादा मिल जाएँगे। ये बिल्कुल पकड़ लेते हैं और कहते हैं 'आइंस्टीन बेकार है, mc^2 का क्या मतलब है; कुछ नहीं!' mc^2 की तो इतनी दुर्गति करी है कि पूछो मत; मतलब घिस डाला उसको। और ये वो आदमी है जो mc^2 पर और थ्योरी ऑफ रिलेटिविटि पर बोलने की कोशिश कर रहा है जिसको पाइथागोरस थ़ियरम (प्रमेय) नहीं आता। इसको पाइथागोरस की स्पेलिंग नहीं आती, और ये जनरल और स्पेशल रिलेटिविटि पर व्याख्यान दे रहे हैं। गुरुदेव बैठ गए हैं 'नहीं, वो आइंस्टीन अपना ही बच्चा था, ज्यादा कुछ समझता नहीं था। हम बताते हैं तुम्हें।'

इनसे पूछो लॉरेंस ट्रांसफॉर्मेशन पता है तुमको; अभी लिखवाओ, और अगर तुम्हें लॉरेंस ट्रांसफॉर्मेशन नहीं पता तो तुम पूरी दुनिया से माफ़ी माँगो कि तुमने आइंस्टीन के बारे में कुछ बोल कैसे दिया। तुम d(x^2)/dx नहीं कर सकते, इनसे तुम पूछोगे कि x^2 को अगर डिफरेंशिऐट (अवकलित) करें तो क्या आएगा, तो ये बता नहीं पाएँगे, लेकिन ये बात सीधे आइंस्टीन की करते हैं।

जब ये बोल रहो हों, बस इनके सामने आ के लिख दिया करो d(x^2)/dx थोड़ा आप बता दीजिए उसके बाद बात करेंगे; इतना बता दीजिए बस! जो कि एक ग्यारहवीं के लड़के को भी बात पता होती है। आप इतना ही बता दीजिए। और ये नहीं पता है तो इतना मुँह क्यों खोल रहे हो।

ख़ैर ये तो गुरु लोग हैं, ऊँचे लोग हैं (व्यंग करते हुए), आम आदमी कम-से-कम अभी ये धृष्टता नहीं करता, कि अपने-आपको जो भौतिक दृष्टि से सफल लोग हैं उनके समकक्ष रख दे। आपसे कहा जाए रतन टाटा, आप कहोगे, 'नहीं-नहीं, वो तो नहीं।' तब आप नहीं कहोगे, हम किसी से कम नहीं। आपसे कह दिया जाए अम्बानी,अदानी, आप कहोगे 'हे हे हे।' तब आप किसी से नहीं कहोगे हम किसी से कम नहीं। कोई ऐसे खिलाड़ी इत्यादि भी हो, अभी आपसे कह दिया जाए कि बल्ला ले के आइएगा थोड़ा आपको खड़ा करेंगे जसप्रीत बुमराह के सामने, तो हेंहेंहें कर के भग जाओगे। वहाँ पर नहीं कहते कि हम किसी से कम नहीं। कि कहते हो, बोलो?

चलो क्रिकेट में उतना नहीं समझ में आ रहा। हैवीवेट बॉक्सिंग — किसी थुलथुल मोटे को बोल दिया जाए कि वजन तो तेरा हेवीवेट वाला ही है, आ जा रिंग में उतर हैवीवेट बॉक्सर के सामने। तब तो ये व्यक्ति नहीं बोलेगा न कि हम किसी से कम नहीं। यहाँ तो मान लेते हो कि नहीं, हम नीचे है। पर जब बुद्ध और महावीर की बात आती है तब तत्काल कह देते हो 'अरे! जो उन्हें पता लगा, हमें भी पता लग जाएगा। इसमें क्या रखा है? ये तो लफ़्फ़ाज़ी है, बोलने की बातें हैं, उन्होंने किया क्या? बोलते ही तो रहे। हम भी बोल सकते हैं, 'अहिंसा परमो धर्म:' लो!, है ना कूल बात। इसमें क्या है? ज़बान ही तो चलानी है, बीड़ू अपन भी चला सकता है।' समझ में ही नहीं आता, झुकने को ही नहीं तैयार होते।

जब पढ़ते थे तो कभी जाकर के अपने मैथ्स टीचर से बोला कि समझ में तो आ गया है कि a^2+b^2=c^2, पर अमल करने का मन नहीं करता कसम से! जब इग्ज़ाम में आएगा तो हम तो लिखेंगे a+b=c, तब बोलते थे क्या? वहाँ तो जो बात पता चली तत्काल उस पर अमल कर देते थे ना? कर देते थे कि नहीं कर देते थे? इसलिए कर देते थे क्योंकि पाइथागोरस की जो बात है वो भौतिक है, और हम बड़े भौतिक लोग हैं। तो भौतिक तल पर हमें जब कुछ बताया जाता है तो हम मानने को तैयार हो जातें हैं, और कृष्णों और बुद्धों की जो बात है वो परा भौतिक है, तो उनकी बात पर हम फिर बहस करने लग जाते हैं, हम कहते हैं हम नहीं मानेंगे, हम नहीं मानेंगे।

भई! तुम इतने ही बड़े विद्रोही हो, तुम इतने ही बड़े क्रांतिकारी हो तो तुम न्यूटन्स लॉज़ मानने से भी मना करो ना। तुम बोलो, न्यूटन भैया बोले कि दीवार पर मुक्का मारो जितनी जोर तो दीवार भी पलट के उतनी ही जोर से मुक्का मारती है, हम मानते ही नहीं, जाओ दे दो सर दीवार में।

न्यूटन के ख़िलाफ़ क्यों नहीं व्रिदोह करते बताओ ना? क्यों नहीं कहते कि 'न्यूटन से हमें सीखने की ज़रूरत क्या है, इंसानियत काफ़ी है। मैं अपने जीवन और अपने अनुभवों से सीखूँगा।'? जा के दे दो सर दीवार में और बोलो, 'मैं अपने अनुभवों से सीखूँगा।' नहीं तब नहीं बोलोगे, तब तत्काल मान लोगे, भई, न्यूटन ने बोला है तो बात ठीक ही होगी।

आप न्यूटन की भी नहीं मान रहे हैं, आप देह की मान रहे हैं। पता है कि वहाँ अगर नहीं मानोगे बात को तो देह को नुकसान हो जाएगा, और मुक्त पुरूषों की बात न मानने में कोई तत्काल नुक़सान दिखता नहीं है, वहाँ लगता है नहीं भी मानो तो क्या बिगड़ गया। कुछ बिगड़ा क्या? कुछ बिगड़ा नहीं, तो क्रांतिकारी बनने का अच्छा मौका है, नारा लगाओ कि सब मज़हब झूठे हैं, सब सिखाने वाले पाखंडी है, किसी की सुनने की, किसी की बात पर अमल करने की कोई ज़रूरत नहीं।

पूरी बात समझ में आ रही है कि क्यों नहीं अमल करते? ये सब तर्क है आपके पास इसलिए आप नहीं अमल करते, ये बहुत प्रचलित तर्क हैं, ये तर्क सबके पास है इसीलिए लोग नहीं अमल करते। अच्छा, आपको आज अगर दिखायी दे रहा हो मान लीजिए कि गीता के छठे अध्याय के आठवें श्लोक में जो बात लिखी है वो नहीं मानी तो तत्काल दो लाख का नुकसान हो जाएगा, तो अमल करोंगे कि नहीं करोगे? अभीभूत हो जाओगे श्रद्धा में, गिर पड़ोगे, लोटने लगोगे, क्योंकि दिख रहा होगा कि दो लाख गए। अभी नहीं मानो तो दो लाख का नुकसान होता दिखता नहीं है ना। हाँ तुम न्यूटन की बात नहीं मानोगे, केप्लर की बात नहीं मानोगे, श्रोडिन्गर की बात नहीं मानोगे, हाइजेनबर्ग की बात नहीं मानोगे तो वहाँ नुकसान तत्काल दिख जाएगा। वहाँ नुकसान दिख जाएगा ना? वहाँ नुकसान दिखता है इसीलिए चुपचाप सर झुका के उनकी बात मान लेते हो। वहाँ नुकसान दिखता इसलिए है क्योंकि हमारी आँखे सिर्फ़ ग्रॉस चीज़ें ही देख पाती है, स्थूल चीज़ें ही, तो वहाँ पर नुकसान दिख जाता है।

ज्ञानियों की बात न मानने से जो नुकसान होता है वो आंतरिक होता है, सटल , सूक्ष्म। उसको देख पाने की हमारी औकात नहीं। क्योंकि कुछ भी सटल (सूक्ष्म) हम ज़िंदगी में कब देख पाए? तो वहाँ जो नुकसान हो रहा होता है, वो हमें पता ही नहीं चलता। हम कहते हैं हमें पता ही नहीं चला, इसका मतलब नुकसान हुआ ही नहीं। ठीक है ऐश करो!

हो रहा है नुकसान, समझ क्यों नहीं रहे भई! न्यूटन की बात न मानो एक बार की, चल जाएगा, अधिक से अधिक सर फूटेगा। पर कृष्ण की बात अगर नहीं मान रहे हो तो ज़िन्दगी ही फूट जाएगी।

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