प्रकृति के तीन गुणों का वास्तविक अर्थ क्या है? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन। निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्।।
हे अर्जुन! वेद तीनों गुणों (सत, रज और तम) के कार्यरूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करने वाले हैं; इसलिए तू उन भोगों एवं उनके साधनों में आसक्तिहीन, हर्ष-शोकादि द्वंदों से रहित, नित्यवस्तु परमात्मा में स्थित, योग-क्षेम को न चाहने वाला और आत्म परायण बनो।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ४५
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमन। श्रीकृष्ण अर्जुन से तीनों गुणों का त्याग करके अनासक्त होने के लिए कह रहे हैं। मेरा प्रश्न है कि एक तरफ़ तो श्रीकृष्ण सतोगुण की प्रशंसा करते हैं और दूसरी तरफ़ तीनों गुणों के त्याग के लिए कहते हैं। तो क्या सतोगुण का भी त्याग किया जाए, और कैसे? कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: तमोगुण तुम्हारे घर के बिस्तर की तरह है। तुम उस पर पड़े हुए हो, तुमने खिड़की-दरवाज़े सब बंद कर लिए हैं, तुम बीमार हो और तुम नशे में हो। बिस्तर बहुत उम्दा है और बिस्तर के किनारे खाने-पीने की व्यवस्था है और शराबी के लिए शराब की भी। कमरा सहूलियतों से भरा हुआ है, एयर कंडीशनर (वातानुकूलक) है, संगीत है, टीवी है, सब प्रकार के विलास की सारी सामग्री है और दरवाज़ा बंद है। ये तमोगुण है – तुम बीमार हो और तुम बीमारी में खुश हो।
तुम गलत जगह पर हो और जहाँ तुम हो, वहीं पर नशे में सोए पड़े हो, उस जगह से तुम हट भी नहीं पा रहे — ये तमोगुण है। हटने का कभी-कभार विचार आता है तो तुम आलस के मारे फिर सो जाते हो। कभी थोड़ी अनासक्ति उठती है, मृगतृष्णा उठती है, तो उससे ज़्यादा तुम्हे प्रमाद उठता है। यह प्रमाद, यह आलस ही तमोगुण की निशानी है। तमोगुण का मतलब है नशा, चेतनाहीनता, एक भारीपन चेतना का, एक शिथिलता। नींद से बोझिल पलकें, नशे से बोझिल चेतना, ये तमोगुण है।



