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पता है क्या चाहते हो?
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: जब भी तुम चाहते हो, चाहते उसी को हो; वो जो उच्चतम है, जिसको उपनिषद् सम्बोधित कर रहे हैं कभी रुद्र, कभी परमात्मा कहकर। लेकिन मन की हालत बड़ी बेचारगी की है, वो चाह कुछ ऐसा रहा है जो उसकी चाह के आगे का है।

छोटे बच्चे को सागर चाहिए। वो कह रहा है, "देखो, मैं अपना बड़ा-से-बड़ा पात्र खोल दूँगा सागर पाने के लिए। मुझे पता है सागर बड़ी चीज़ है, तो सागर के लिए मैं अपना जो सबसे विशाल पात्र खोल सकता हूँ वो खोल दूँगा।" और वो कौन-सा पात्र खोल देता है? अपनी दो हथेलियाँ। अंजुली फैलाकर खड़ा हो जाता है, कहता है, "ये देखो, मैंने कुछ बचाकर नहीं रखा। ये नहीं किया मैंने कि एक अंजुली रखी सामने और एक जेब में। मैं पूरा सागर माँग रहा हूँ तो मैं अपनी भी पूरी पात्रता के साथ माँग रहा हूँ।" उसको ये नहीं समझ आ रहा है कि सागर तुम्हारी हथेली में नहीं आएगा, तुम्हें सागर में डूब जाना पड़ेगा; बस इतनी-सी गलती हो रही है।

चाहत तो ठीक है, लेकिन चाहत के केंद्र में अहंकार बैठा हुआ है। ये नहीं कह रहा कि "मैं सागर को मिलूँ," कह रहा है, "मुझे सागर मिले।" जबकि अगर तुम कुछ चाह रहे हो जो वास्तव में चाहने लायक है तो वो तुम्हें नहीं मिल सकता; तुम्हें उसको मिलना पड़ेगा। कोई ऐसी चीज़ अगर तुमने माँग ली जो तुम्हें मिल गई, तो वो चीज़ तुम्हारी हथेलियों से भी छोटी हो गई न? उसको पाकर करोगे क्या? एक तो तुम छोटे, ऊपर से तुम्हारी हथेलियाँ नन्हीं; उसमें कुछ समा गया, इससे तुम्हें क्या तृप्ति मिलेगी?

बच्चा अपने तल पर बड़ा ईमानदार है, क्या बोल रहा है? "देखो, मेरे पास बड़े-से-बड़ा पात्र क्या था? ये मेरी हथेलियाँ। ये देखो, मैं पूरा तैयार हूँ। कोई मुझ पर बेईमानी का आरोप न लगाए; मैं पूरा खोलकर तैयार हो गया कि लाओ, सागर इसमें भर दो।" अब बच्चे की प्रशंसा करें या उसको झड़क दें, समझ में ही नहीं आता।

ऐसे ही हम हैं।

चाहिए तो हमें वो सर्वोच्च शांति ही—जो उच्चतम है उससे नीचे का हमें कुछ चाहिए नहीं—लेकिन हमें सब कुछ चाहिए अपनी हथेलियों में।

हमें अपने वजूद की सीमाओं के भीतर वो चाहिए जो इतना बड़ा है कि उसमें हमारा वजूद सागर में बूँद की तरह खो जाए; वो हमें चाहिए। और चाहने में क्या बुराई है? इससे ऊँची, इससे पवित्र चाहत कुछ हो नहीं सकती, तुम सागर माँग रहे हो; पर कैसे माँग रहे हो? बड़ी चीज़ है, उसका अपमान होता है ऐसे माँगने में, कि "लाओ, वो हमें दे दो।" तुम्हारा तो ऐसा है जैसे कह रहे हो, "सागर पैक कर देना और होम -डिलीवरी दे आना।"

समझ में आ रही है बात?

अब बताओ, अध्यात्म कामना-विरोधी है क्या? अध्यात्म मूर्खता-विरोधी है। अध्यात्म कह रहा है कि, “तुम अपनी कामनाओं को समझते ही नहीं। तुम छोटी कामनाओं में उलझे हुए हो; तुम जान ही नहीं रहे कि कामना तुम्हें कभी किसी छोटी चीज़ की हो ही नहीं सकती, क्योंकि छोटे तो तुम पहले से ही हो।“ छोटे को छोटा मिलेगा तो उससे असीम थोड़े ही प्रकट हो जाएगा, या हो जाएगा? पत्थर में पत्थर जोड़ दोगे तो हीरा मिल जाएगा? पाँच भिखारी इकट्ठे हो जाएँगे तो करोड़पति बन जाएँगे?

कामना को समझो। कामना तुम्हारी सबसे बड़ी मित्र है अगर तुम समझ सको कि तुम क्या माँग रहे हो, और कामना से ज़्यादा तुम्हें कोई बर्बाद नहीं करता अगर जान ही नहीं पाए कि तुम्हें वास्तव में चाहिए क्या; और कामना के किसी अनुचित विषय की ओर दौड़ पड़े, उससे लिप्त हो गए, और जीवन भर आसक्त हो गए। तो अध्यात्म कामना-विरोधी नहीं है, अध्यात्म तुमको बता रहा है कि, “अच्छा है तुमने कामना की, लेकिन देखो कि वास्तव में तुम क्या चाह रहे हो।“

खतरा है। क्या खतरा है? जो तुम्हें चाहिए, कामना तुम्हें उस तक ले जाने का वाहन हो सकती है; लेकिन जिस तक जाना है वो इन्द्रियों के पकड़ में आएगा नहीं, वाहन इन्द्रियों के पकड़ में आ जाता है।

समझ में आ रही है बात?

तुम एक गाड़ी में बैठे हो, गाड़ी बड़ी सुन्दर है, और चालक बड़ा छैल-छबीला है। गाड़ी और चालक ये दोनों इन्द्रियों के विषय हैं या नहीं हैं? ये तो इन्द्रियों की पकड़ में आते हैं। लेकिन तुम जहाँ जाना चाहते हो, जिसकी खातिर तुमने गाड़ी और चालक करे हैं वो जगह बस एक धुंधली विस्मृति की तरह है तुम्हारे ज़हन में, एक बिलकुल मिटती हुई-सी गूँज की तरह है तुम्हारे मन में। तुम्हें उसका आकर्षण तो है, लेकिन तुम्हारे पास उसकी कोई रूपरेखा, नाम, छवि नहीं है। तो तुम बहुत ज़ोर भी लगाते हो तो तुम जान नहीं पाते कि जहाँ तुम पहुँच रहे हो या जहाँ तुम जाना चाहते हो, जिस उद्देश्य के लिए तुमने अपनी गाड़ी और चालक करे हैं, वो जगह कैसी है। उसकी कोई छवि नहीं है तुम्हारे पास; उसकी कोई छवि नहीं है, और गाड़ी सामने प्रत्यक्ष है इन्द्रियों के, और जो गाड़ीवान है वो भी बड़ा आकर्षक है। अब खतरा क्या है? खतरा ये है कि गाड़ी अब कहीं नहीं जाएगी, गाड़ी में ही गृहस्थी बस जाएगी।

कामना की जब भी भर्त्सना हुई है इसीलिए हुई है: तुम भूल ही जाते हो कि समस्त कामनाएँ कहाँ तक जाने के लिए हैं; तुम रास्ते की ही किसी चीज़ से नाता जोड़ बैठते हो, रास्ते में ही तम्बू गाड़ देते हो, घर ही बना लेते हो; ये समस्या है।

और बड़ा मुश्किल है ऐसा न करना, क्यों? क्योंकि गाड़ी चल रही है, एक दूरी तक चालक ने हमारा साथ दिया है, प्यारे लगने लग जाते हैं, बगल के हैं, दिखाई देते हैं, हाथ थाम सकते हो उनका; उनसे बड़ी स्पष्ट, बड़ी भौतिक मदद मिली है, उनसे कुछ पदार्थ-गत लाभ हुआ है जो पकड़ में आता है, दिखाई देता है, लिखा जा सकता है, गिना जा सकता है। और फिर मन को एक नैतिक बहाना भी मिल जाता है, तुम कहते हो, "ये जो गाड़ी और गाड़ीवान है इन्हीं का सहारा लेकर मैंने कितनी तरक्की करी है न? पिछले छह महीने में इन्हीं के साथ इतनी दूर तक आया, तो निश्चित रूप से मेरे लिए ये शुभ हैं; और अगर ये मेरे लिए शुभ हैं तो मैं इन्हीं के साथ जम क्यों न जाऊँ?”

वो तुम्हारे लिए शुभ हैं जब तक गाड़ी चल रही है; चलती का नाम गाड़ी। गाड़ी को पंचर करके तुमने बना दिया उसको खोली, घर, तो उस गाड़ी से ज़्यादा अशुभ क्या है तुम्हारे लिए? लेकिन फिर भी तुम्हारे पास बहाना रहेगा, तुम कहोगे, "बुरा आदमी नहीं है ये चालक। देखो, मुझे इतनी दूर तक लेकर आया था। बुरा होता तो मेरी इतनी मदद क्यों करता?" नहीं, वो बुरा नहीं था, वो मदद तो कर रहा था लेकिन देखो तुमने क्या कर डाला अपने साथ।

जो भी चीज़ें तुम्हें जीवन में आकर्षित कर रही हैं—चीज़ें, घटनाएँ, लोग—जानते हो वो तुम्हें क्यों आकर्षित करती हैं? कहीं-न-कहीं वो तुमको अंतिम सत्य की याद दिलाते हैं, इसीलिए तुम्हें आकर्षित करते हैं।

पर मामला ज़रा गड़बड़ हो जाता है। मामला ऐसा हो जाता है जैसे कि भूसे के एक ढेर में कस्तूरी पड़ी हुई हो; कस्तूरी की एक गाँठ पड़ी हुई है भूसे के एक ढेर के बीच, या भूसे के ढेर के बीच केसर की एक पोटली पड़ी है, केसर की एक गाँठ है छोटी-सी। अब कस्तूरी या केसर, इसमें से क्या उठ रही है? सुगंध। अब तुम दूर खड़े हो, और तुम्हें क्या लग रहा है सुगंध किसमें से आ रही है? भूसे में से, और तुमने दिल लगा लिया किसके साथ? भूसे के साथ।

हम सब भूसे के साथ ही दिल लगाते हैं।

जबकि उस भूसे में कहीं-न-कहीं दो-चार रेशे केसर के पड़े हुए थे, वास्तव में हमारा आकर्षण उन रेशों से था। कहीं छोटी-सी कस्तूरी की एक गाँठ उस भूसे के ढेर में छुपी हुई थी, वास्तव में हमें वो बुला रही थी, पर हमें समझ में ही नहीं आया; हमें लगा कि भूसा इतना सुगन्धित है तो हम भूसे को ही दिल दे बैठे।

जब किसी वस्तु पर, व्यक्ति पर बहुत मन आ रहा हो, बड़ा प्रेम, मोह उमड़ रहा हो, तब पूछो तो, कि, “ये जो पूरी चीज़ है, ये जो सामने पूरा समुदाय ही है, जो पूरा एक समुच्चय है, क्या ये पूरा ही आकर्षक है, या इसका कुछ बहुत, बहुत, बहुत छोटा-सा भाग है जो आकर्षक है?” ये ना हो, कि उस छोटे-से भाग की खातिर तुमने कई किलो, बल्कि कई क्विंटल भूसा अपनी ज़िन्दगी में प्रविष्ट करा लिया।

तुम्हें तो यही लग रहा था कि सारी सुगंध किससे आ रही है? भूसे से आ रही है, तो तुम सारा भूसा भरने लगे। सुगंध किससे आ रही है तुम्हारी दृष्टि में? भूसे से आ रही है। तो तुम अपनी गाड़ी लेकर आए, और उसमें भूसा भरने लगे दना-दन। और भरते-भरते बीच में तुम्हें एक अजीब-सी गाँठ दिखाई दी, तुमने कहा, "हह! ये बेकार की चीज़, फालतू। सुगंध किससे आ रही है? भूसे से। तो मैं किसे घर ले जाऊँगा? भूसा।" तुम भूसा घर ले आए, और असली चीज़ को क्या कर आए? फेंक आए। दोतरफ़ा चोट पड़ गई न?

पहली बात तो भूसा घर लाना नहीं चाहिए था। दूसरी बात, जिस चीज़ से तुमको वास्तविक आकर्षण था, चूँकि तुम उसका स्वभाव ही नहीं समझ पाए, तो तुमने उसको बिलकुल किनारे कर दिया, फेंक दिया। ये हम सब करते हैं; चाहे नौकरी का चयन हो, चाहे विवाह के लिए साथी का चयन हो, चाहे जीवन में मित्र का चयन हो, जितने भी चुनाव हों जीवन के, हम ऐसे ही करते हैं।

कोई भूल नहीं होती आपसे जब आप किसी की ओर आकर्षित होते हैं; उधर कुछ-न-कुछ है ज़रूर कस्तूरी या केसर जैसा, नहीं तो आप आकर्षित होते नहीं। बुरे-से-बुरे विषय में भी अगर आपको आकर्षण हो रहा है—बुरे से मेरा तात्पर्य है नैतिकता की, समाज की दृष्टि से बुरा—तो वो जो आकर्षक विषय है, वो अपने भीतर कस्तूरी का एक दाना, नहीं तो केसर का एक रेशा ज़रूर छुपाए हुए है, नहीं तो आप उसकी ओर आकर्षित होते नहीं। पर हम ये समझ ही नहीं पाते कि वास्तव में उसमें कौन-सी ऐसी चीज़ है जो हमें आकर्षित कर रही है; यहीं पर तो भूल हो जाती है। समझ रहे हो बात को? हम ठहर कर नहीं सोचते; हम चकाचौंध में आ जाते हैं बिलकुल।

ये बहुत अच्छा प्रयोग हो सकता है अपने साथ करने के लिए; जब भी कोई चीज़ मन पर छाने लगे तो थमकर पूछो, "छा रही है वो चीज़ तो है तो उसमें परमात्मा की पुकार ही, पर उसके किस अंश से आ रही है परमात्मा की पुकार? उसके भीतर के किस तल में बैठा हुआ है वो, जो मुझे वास्तव में आकर्षित कर रहा है?" ये पता होना चाहिए। निन्यानबे दशमलव नौ नौ प्रतिशत तो सामने वाला भूसा ही है, जैसे हम भूसे हैं।

यही श्वेताश्वतर उपनिषद् आगे जाकर आत्मा के परिमाण के बारे में कुछ बड़ी रोचक बातें कहता है: “ अणोरणीयान् महतो महीयान् ,” यानी अणु से भी छोटा है वो। फिर किसी हठी शिष्य ने बहुत आग्रह किया होगा, कि, “इतना छोटा होगा तो हमें कैसे पता चलेगा?” तो फिर ऋषि ने भी मन रखने के लिए बोल दिया होगा, कि, “ठीक है, तू अगर बहुत आकार ही उसका पूछ रहा है, तो बहुत छोटा है, अंगूठे जितना छोटा है, 'अंगुष्ठ मात्र'।“

तो इतने बड़े शरीर में ऋषि ने बहुत जगह भी निकाली सत्य के लिए तो कितनी जगह निकाली? अंगूठे बराबर जितनी। और आपको आकर्षण किससे हो रहा है? पूरे शरीर से, जबकि उसके भीतर अधिक-से-अधिक अंगूठे जितना है जो आकर्षण के काबिल है, पूजनीय है; और आप उसके पूरे शरीर के पीछे ही लग गए, जैसे कि उसके हाथ में, उसके नाक में, उसकी बातचीत में, उसके व्यवहार में, उसकी लैंगिकता में कुछ ऐसा है जो बड़ा ही शोभनीय है, "आहा! क्या फूल खिले हैं।"

बहुत रियायत दी है, तब बोल पाते हैं ऋषि, कि, “अंगूठे जितना, बस,” और जब अपने मन से बिलकुल शुद्ध बात कहते हैं तब कहते हैं कि अणु से भी छोटा; जैसे इतने बड़े शरीर में, वो जो कस्तूरी का दाना और केसर का रेशा है वो एक अणु से भी छोटा हो। वो आपको बुलाता है, जो सूक्ष्मतम है, जो लघुतम है, पर उसकी जगह आप किसकी ओर खिंच जाते हो? मुझे पता है कि मैं बहुत दोहराकर बोल रहा हूँ, मगर मैं खुद को भरोसा दिलाना चाहता हूँ कि कम-से-कम कुछ लोगों तक बात पहुँच गई है।

समझ में आ रही है बात?

ये हमारी बड़ी ज़िद है; हम स्थूल हैं, और हम आकर्षित स्थूल की ओर ही होंगे। हम भूसा हैं, आकर्षित हम भूसे की ओर ही होंगे।

या तो हम उत्सव मनाते हैं जब हमें सुगन्धित भूसा मिल जाता है, कहते हैं, "मैं तो जानता ही था। भूसे में ही सुगंध है, भूसा ही सत्य है, भूसा ही शिव है, भूसा ही सुन्दर है। क्या खुशबू उठ रही है भूसे में से!" जो हमारी गहरी कामना है, जब हम सुगन्धित भूसा देखते हैं तो वो कामना सत्यापित हो जाती है।

समझो, जब तुम किसी कृष्ण को, बुद्ध को, ऋषि को, ज्ञानी को देखते हो तो भीतर से बड़ा मज़ा उठता है। क्या मज़ा उठता है? तुम कहते हो, "ये जो शरीर जा रहा है न, देखो, यही तो ज्ञानी हो गया है। और ये तो हम जानते ही थे कि शरीर ही ज्ञानी होता है। अगर वो शरीर ज्ञानी हो सकता है तो एक दिन ये शरीर भी ज्ञानी हो जाएगा, माने हम शरीर भाव रखे-रखे ज्ञान प्राप्त कर लेंगे।" यही तो चाहते थे।

अब यही मान लिया न, कि जो सामने घूम रहा है वो अपने शरीरवान होने की वजह से, अपने शरीरी होने की वजह से ज्ञान को पा गया? और फिर हम उससे सवाल भी वैसे ही करते हैं, हम उससे पूछते हैं, "कब हुआ था आपका मोक्ष? अपने निर्वाण दिवस के बारे में कुछ बताएँ, तिथि, दिनांक, साल, माह, कुछ तो बताइएगा।" क्योंकि पूरा भरोसा है हमें कि महकता तो भूसा ही है, और जिनका भूसा अंदर से नहीं महक रहा होता तो वो ऊपर से ही इत्र छिड़कते हैं; उसको कहते हैं आयातित ज्ञान।

जब देखा कि किसी ऋषि का भूसा महक रहा है तो हमें और भरोसा हो गया कि भूसे में ही सुगंध का स्रोत है। अब हमारा भूसा महक नहीं रहा, तो हमने दो-चार श्लोक रटे जल्दी-जल्दी; इसे कहते हैं अपने ऊपर इत्र छिड़कना, ये आयातित ज्ञान है, ऊपर से डाल लिया भीतर से महक नहीं रहा तो।

पहली बात तो ऊपर से डालना अपराध, दूसरी बात कि भीतर अगर कस्तूरी है भी तब भी ये याद रखो कि भीतर कस्तूरी राई के दाने जितनी है, बाकी सब जो कुछ है वो उस दाने के इर्द-गिर्द जमा हुआ सिर्फ भूसा है; कामना यहाँ मात खाती है, कामना समझ ही नहीं पाती कि मुझे चाहिए क्या।

तुम बाज़ार में निकलते हो; कहीं चाट मिल रही है, कहीं पिज़्ज़ा मिल रहा है; जब तुम्हारे पास चाट का पत्तल आता है या पिज़्ज़ा की प्लेट (तश्तरी) आती है, तुम जानते हो तुम उसकी ओर क्यों आकर्षित होते हो? तुम्हें वो पूरा नहीं चाहिए, उसमें एक-दो ऐसे पदार्थ हैं, मसाले हैं, जिनकी खुशबू की ओर आकर्षित हो रहे हो। लेकिन तुम्हें ये पता ही नहीं है, ये ज्ञान ही नहीं है कि इसमें वो कौन-सी खुशबू है जो मुझे आकर्षित कर रही है; तो इस चक्कर में तुम पूरी चाट खा जाते हो, और पूरा पिज़्ज़ा खा जाते हो, जबकि वो पूरी चीज़ तो इतनी आकर्षक थी भी नहीं।

और जो चाट बनाने वाला है वो ये बात खूब अच्छे से जानता है; खासतौर पर जो सड़क किनारे खड़े होते हैं उन्हें पता है, वो जानते हैं कि आलू में तो ऐसा कोई स्वाद होता नहीं कि लोग टिक्की के दीवाने हो जाएँ। आलू क्या चीज़ है? आलू माने आलू। लेकिन जब तुम टिक्की खाते हो, अधिकांश तो वो आलू ही होती है, फिर भी कितनी स्वादिष्ट लगती है। तो ये क्या करते हैं, कि जहाँ भी पास से भीड़ गुज़र रही हो, तुम गुज़र रहे हो, थोड़ा-सा तेल छनछना देंगे। उसी समय पर उसमें से एक भभका उठेगा और तुम्हारी नाक में जाएगा; तेल का, मसाले का, तुम कहोगे, "आहाहा!" अब तुमको आकर्षित कर रहा है तेल-मसाला, और इस चक्कर में तुमने भीतर ले लिया बहुत सारा आलू। आकर्षित क्या कर रहा था? तेल-मसाला। भीतर क्या ले लिया? आलू। ठीक वैसे ही जैसे आकर्षित कर रही थी कस्तूरी, और भीतर ले लिया भूसा।

चीज़ें एक दूसरे के साथ जुड़ी हैं, गुत्थम-गुत्था हैं। सार-असार का भेद करना ही प्रज्ञावान की निशानी है।

“सार-सार को गहि रहे, थोथा देय उड़ाय।“ कस्तूरी-कस्तूरी को गहि रहे, भूसा देय उड़ाय। कामना ऐसी होनी चाहिए कि कस्तूरी की करी है और भूसे को अलग कर दिया; यही विवेक है। तो अध्यात्म कामना का विरोधी नहीं है; अध्यात्म भूसे की कामना का विरोधी है। अध्यात्म कह रहा है कि, “बिलकुल जी-तोड़ कामना करो, जान लुटा दो। चाहो, और ऐसा चाहो कि कहो कि जो चाहा है अगर मिला नहीं तो जिएँगे नहीं।“ अध्यात्म तो ऐसी कामना की बात करता है।

बड़े लोग कह गए हैं कि एक ही है जो प्रेम जानती है, कौन? मछली; जहाँ तुमने उसको सागर से निकाला, वो जान दे देती है। वो कहती है कि, “बाहर निकालोगे तो जिएँगे ही नहीं। निकाल लो बाहर, तुम बाहर हमें निकाल सकते हो पर हमें जीने के लिए विवश नहीं कर सकते; ख़त्म हो जाएँगे।“ कबीर साहब का है।

वो (मछली) है बस, जो प्रेम जानती है। प्रतीक की तरह कहा है; इसमें बहस मत करने लग जाना, कि, “जान-बूझकर जान नहीं देती है, वो तो उसके फेफड़ों की बनावट ऐसी है कि वो मर जाती है,” ये सब नहीं। जो बात जिस तल पर कही गई है उसी तल पर समझनी चाहिए।

कामना तो ऐसी होनी चाहिए जैसे मछली की है, “इसी के साथ रहना है, ये समुद्र मेरा है। ये नहीं मिलेगा तो अभी मर जाएँगे।“ नीचे की कोई बात नहीं। ऐसे नहीं, कि बेशर्म हैं, एक चीज़ माँगी, नहीं मिली, तो लतिया दिए गए, मुँह लेकर दूसरी दुकान में घुस गए और वहाँ से दूसरी चीज़ ले ली; ऐसे नहीं। “एक चीज़ माँगेंगे, एक चाहिए, और उसी के पीछे ज़िन्दगी लगा देंगे; और वो चीज़ नहीं मिलेगी तो ज़िन्दगी हमें प्यारी ही नहीं है। जीने का उद्देश्य क्या, जीने में मज़ा क्या अगर जिससे जीने की सत्ता मिलती है, जिससे जीने का वजूद मिलता है वही नहीं मिला तो, फिर जी किसके लिए रहे हैं?”

अध्यात्म तो ऐसी पागल कामना करने को बोलता है तुमको। अध्यात्म व्यापार वाली कामना की बात नहीं करता, कि, “देखो ज़रा फ़लानी चीज़ आ गई है, बड़ी अच्छी लग रही है, अगर मिल जाए तो। भाव ठीक लगाना; अगर एक-सौ-पाँच के अंदर मिलती है तो ज़रूर ले लेना, एक-सौ-पाँच से ऊपर मिलती है तो फिर नहीं लेंगे।“ ये व्यापार वाली कामना है, कि चाहिए भी चीज़, लेकिन उसके लिए दाम सीमित ही दे सकते हैं; एक सीमा से ऊपर दाम माँगोगे तो नहीं चाहिए।

अध्यात्म वाली कामना दूसरी होती है, “अनंत माँगा है, और उसके लिए दाम भी देंगे हम पूरे-पूरे, माने अनंत।“ छोटा कुछ माँगेंगे नहीं, और उसके लिए बड़े-से-बड़ा दाम चुकाएँगे; दोनों बातें हैं। हम दोनों बातों का उल्लंघन करते हैं; हम छोटा माँगते हैं, और क्योंकि पता है कि छोटी चीज़ माँगी है, तो उसके लिए बहुत दाम देने में हमें आफ़त आती है।

समझ में आ रही है बात?

अध्यात्म तो बड़े-से-बड़े प्रेमियों के लिए है। किसने कह दिया कि अध्यात्म सूखे हुए लोगों के लिए है? किसने कह दिया कि अध्यात्म ऐसे लोगों के लिए है जिनके दिल ही नहीं धड़कते? अध्यात्म से ऊँची आशिकी और कहाँ है? लेकिन भूसे की आशिकी नहीं; अगर भूसेबाज़ी करनी है तुम्हें अपने जीवन में, तो उसके लिए अध्यात्म का सहारा मत ले लेना।

बहुत भूसेबाज़ होते हैं। उनका यही आता रहता है कि, “आचार्य जी, आपकी बात तो अगर कृष्ण ने सुनी होती, तो कभी राधा उनके जीवन में नहीं आती, कभी इतनी गोपियाँ उनके जीवन में नहीं आतीं।“ तुम अपनी बात करो भूसे के सौदागर; कृष्ण और कस्तूरी की बात करना तुम्हें शोभा नहीं देता, 'प्रेम' शब्द का दुरुपयोग मत करो।

बात कुछ समझ में आ रही है?

आप अपनी कामनाओं पर गौर करिए, वहीं से पता चलेगा कि आप कौन हैं और क्या चाह रहे हैं; बिना मकसद के आप कुछ चाह नहीं सकते। मैं आपको कह रहा हूँ कि अगर आपको एक मिठाई भी अच्छी लगती है, तो उस मिठाई में कहीं-न-कहीं वो परम तत्व आपको आकर्षित कर रहा है, इसलिए अच्छी लग रही है वो।

ये बात बड़ी अजीब है। मिठाई में परम तत्व? होगा ज़रूर, नहीं तो वो मिठाई आपको बुलाती नहीं; होगा ज़रूर। लेकिन परम-तत्व पाने की जगह ये मत कर लेना कि घपा-घप मिठाई अंदर; मधुमेह से मरोगे, परमात्मा तो नहीं ही मिलेगा। ज़्यादातर लोगों का यही हाल है: मिठाई ने बुलाया, और मधुमेह ने मरवाया। परमात्मा? वो इस पूरे चक्कर में हाथ न आया।

हाँ, अपने-आपको राज़ी-खुशी रखने के लिए और अपने-आपको नैतिक दृष्टि से सहारा देने के लिए बहाना भी मिल गया, "वो मिठाई तो मुझे प्यारी ही इसलिए है क्योंकि मुझे उसमें परमात्मा दिखाई देता है।" अरे, तो परमात्मा तूने निकाल लिया होता मिठाई से। इतने दिन हो गए, परमात्मा तो तुझे कहीं मिलता दिखता नहीं; हाँ, मीठा खा-खाकर तू फूलता ज़रूर जा रहा है। किसको बुद्धू बना रहा है, कि, "मिठाई में तो मुझे परमात्मा दिख रहा है इसलिए मिठाई की ओर जाता हूँ"?

ये तर्क अगर किस्से की शुरुआत में दिया होता तो समझ में आता, कि,” नया-नया प्रेम प्रसंग शुरू हुआ है, मिठाई की ओर जा रहे हैं साहब। वहाँ पर सार-सार को गहि लेंगे, थोथा एक तरफ़ कर देंगे; मिठाई में से परमात्मा निकालकर ग्रहण कर लेंगे, और बाकी सब छोड़-छाड़कर आगे बढ़ जाएँगे।“ पर हमें तो ऐसा दिख ही नहीं रहा; तुम तो मिठाई की ओर गए, परमात्मा की तो प्राप्ति हुई ही नहीं और मीठा-मीठा खाकर तुम गोलगप्पे ज़रूर हुए जा रहे हो—मीठे की बात हो रही है तो गुलाबजामुन, अगर गोलगप्पा नहीं तो।

ये बात सूक्ष्म है। ये अंतर समझ में आ रहा है? देखो, अगर अपनी कामनाओं का दमन करोगे तो समझ में ही नहीं आएगा कि तुम कौन हो और माँग क्या रहे हो। दूसरी बात, कामनाएँ तो उठेंगी ही क्योंकि तुम भूखे-प्यासे आदमी हो, भूखे-प्यासे आदमी को कामना नहीं उठेगी तो क्या उठेगा? जिसके अंतर में ही छेद हो, जो वाकई भीतर से अपने-आपको अपूर्ण महसूस करता हो, कामना तो उसको उठेगी ही; और इस कामना के उठने में ही कामना से मुक्ति का मार्ग है।

अगर तुम समझ पाओ कि वाकई तुम्हें कस्तूरी की कामना है, भूसे की नहीं—ये अलग बात है कि वो कस्तूरी भूसे में ही छुपी हुई है—तो फिर तुम्हारा दायित्व क्या है? अभी हम फिर दोहरा रहे हैं मैं जानता हूँ, लेकिन आवश्यक है। तुम्हारा दायित्व क्या है? भूसे में से कस्तूरी निकालना; भूसे में लोटपोट होने को अध्यात्म नहीं कहते।

समझ में आ रही है बात?

यही दो तरह के लोग होते हैं दुनिया में: एक वो जिनको कस्तूरी भी बुला रही हो तो कस्तूरी को छोड़कर वो कस्तूरी के इर्द-गिर्द भूसा है, जाकर वो उठा लाएँगे। और दूसरे वो जिनको भूसे के एक महल के मध्य केसर का एक रेशा अगर दिखाई दे गया तो वो रेशा उठा लाएँगे और महल जैसा भूसा पीछे छोड़ आएँगे। यही दो तरह के लोग होते हैं; देखलो तुम कैसे हो।

जगत में कुछ भी ऐसा नहीं है जिसमें परमात्मा न हो। अब ईशावास्य की समझ आ रही है? "*ईशावास्यमिदं सर्वं*।" यहाँ बड़े-से-बड़े भूसे के ढेर के मध्य भी बैठा कौन हुआ है? परमात्मा ही बैठा हुआ है, "*ईशावास्यमिदं सर्वं*।" लेकिन फिर इसीलिए आगे " तेनत्यक्तेन भुंजीथा " भी बोलते हैं ऋषि, कि, “बेटा, जो चीज़ त्यागने लायक है उसे त्यागते-त्यागते ही भोग करना।“ या जो चीज़ कस्तूरी ने त्याग रखी है क्योंकि वो कस्तूरी नहीं है—कस्तूरी किसको त्याग देगी? जो कुछ भी कस्तूरी नहीं है उसको कस्तूरी त्याग देगी, क्योंकि कस्तूरी की तुलना में विजातीय हो गया न; अलग दुनिया का, अलग तल का, अलग जाति का हो गया—उसको हटा देना, फिर भोगना; व्यर्थ मत भोगने लग जाना।

तो भोग लो, लेकिन पता तो हो तुम्हें कि क्या भोगना है; भोग लो। मूढ़ में और ज्ञानी में ये अंतर नहीं होता कि ज्ञानी भोगता नहीं और मूढ़ भोगता है; मूढ़ में और ज्ञानी में ये अंतर होता है कि ज्ञानी स्वयं को जानता है, अपनी कामना को जानता है, इसीलिए वो कस्तूरी को भोगता है, और मूढ़ आत्मज्ञान के अभाव में भूसा भोगता है। भोगते तो दोनों हैं; क्योंकि जो पैदा हुआ है जीव बनकर, उसे भोगना पड़ेगा, और ये भोग ही उसके मुक्ति का मार्ग बनेगा। कामना ही सहायक है; फिर चौथी-पाँचवीं बार बोल रहा हूँ, ये कामना ही तुम्हारे मुक्ति का वाहक बनेगी; लेकिन भूसे की कामना नहीं।

ये न स्वयं करना, कि कामना का दमन कर रहे हो, न किसी ऋषि से, ज्ञानी से अपेक्षा रखना कि उसमें कामनाएँ न हों। अगर सीखना तुम किसी ऋषि से, ज्ञानी से, तो ये सीखना कि, “देखो, इसने कामना कितने ऊँचे तल की करी। माँग तो ये भी रहा है, किसी उद्देश्य के पीछे तो ये भी जा रहा है, पर कितनी शिद्दत है इसकी माँग में, इसकी कामना में कितनी तीव्रता है,” ये देखना; ये मत खोजने लग जाना कि जो माँग नहीं रहा है वो ज्ञानी है।

जो माँग नहीं रहा वो तो फिर मुक्त हो गया; और जो मुक्त हो गया वो फिर तुम्हारे किसी काम का नहीं है, क्योंकि वो अब इस दायित्व से भी मुक्त हो गया कि तुम्हारी मदद करे।

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