काँवड़ यात्रा - कहाँ से चली थी, कहाँ को जा रही? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, जैसा कि हम सबको पता है कि सावन का महीना चल रहा है और इस समय कावड़ यात्रा चल रही है। मेरा प्रश्न उसी पर है कि इस यात्रा में ढोल-नगाड़े, हेलीकॉप्टर से फूल वर्षा, यही है, या फिर कुछ धर्म-अध्यात्म भी है इस यात्रा में?
आचार्य प्रशांत: देखिए, कर्म के पीछे कर्ता कैसा है, सब कुछ इस पर निर्भर करता है। आप कितने बोध, कितनी स्पष्टता के साथ कोई भी धार्मिक कर्म कर रहे हैं, उस कर्म की गुणवत्ता उस बोध, उस स्पष्टता पर निर्भर करती है, उसके अलावा कुछ नहीं।
अगर आप ‘शिवत्व’ का अर्थ समझते ही नहीं, ‘बोध क्या है?’ जानते नहीं, तो उसके बाद आप कितना भी तीर्थाटन करें या कर्मकांड करें, उससे कोई लाभ मिलने वाला नहीं है। फिर आपका जो कृत्य है, वो बस एक बाहरी प्रतीक बनकर रह जाएगा। उससे लाभ कुछ नहीं होगा, बल्कि नुक़सान ज़रूर हो सकता है। हाँ, आप जो भी करने जा रहे हों—चाहे आप पहाड़ चढ़ने जा रहे हैं, चाहे आप मंदिर जा रहे हैं, चाहे आप पूजा-अर्चना करने जा रहे हैं और चाहे आप काँवड़ यात्रा करने जा रहे हैं—आप भलीभाँति जानते हैं कि उसके पीछे सत्य क्या है, ‘गंगा’ किसका प्रतीक हैं और गंगाजल लेकर के आना वास्तव में क्या महत्व रखता है; सिर्फ़ तब उस यात्रा के कुछ मायने होते हैं।
देखिए, मूल बात से हमेशा शुरू करना चाहिए — धर्म का पूरा क्षेत्र किसलिए है? धर्म, विशुद्ध धर्म, अध्यात्म होता किसलिए है? मन की सफ़ाई के लिए, मन को दुःख से मुक्त करने के लिए। इसके अतिरिक्त धर्म का कोई प्रयोजन नहीं है, ठीक? और जब वो आनंद मिल जाता है या जब दुःख से, बंधनों से मुक्ति मिल जाती है तो उसके बाद फिर धर्म का कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। धर्म एक माध्यम है मन को उसकी सही मंज़िल तक लाने के लिए, ठीक? ये बात हममें से बहुत लोग समझते नहीं हैं। हम धार्मिक बन जाते हैं और ये नहीं जानते कि धर्म है ही क्यों। हमें लगता है, बस कोई चीज़ है जिसका सब पालन करते हैं तो हमें भी करना चाहिए, या हमें कोई पहचान मिल गई है तो उस पहचान को पकड़ कर रखना है, इसी का नाम धार्मिकता है। नहीं, धर्म न तो परंपरा का नाम है न पहचान का नाम है; धर्म मन को दुःख से, भ्रम से, बंधन से मुक्त करने का नाम है।



