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स्वधर्म माने क्या? क्या करना धर्म है? || आचार्य प्रशांत (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। आपको देखकर बहुत ख़ुशी हुई। मैं आपको पिछले डेढ़ साल से सुन रही हूँ। मैंने आपके काफ़ी वीडिओज़ देखे हैं, और आपकी एक बात है जिसको मैं गहराई से समझना चाहूँगी।

आपने कहा है, अध्यात्म में रुचि, दिलचस्पी इतने मायने नहीं रखते। और भगवद्गीता के अध्याय अट्ठारह में सैतालिसवां श्लोक में कहा है —

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥

अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता।

~ श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय १८, श्लोक ४७)

प्र: तो आचार्य जी, मेरी सीमित समझ से श्रीकृष्ण क्या अपने झुकाव या स्वभाव के आधार पर काम करने की सलाह दे रहे हैं? और अगर मैं आपकी सलाह से तुलना करती हूँ, तो यह विरोधाभासी लगता है। तो आपसे समझना चाहूँगी।

आचार्य प्रशांत: इस पर तो मैं बहुत बार बोल चुका हूँ। इस श्लोक पर तो कम-से-कम पाँच-छह बार बोला है। आपने इसका क्या अर्थ पढ़ा है? इसका अनुवाद आपने क्या पढ़ा है?

प्र: आचार्य जी, मुझे जो समझ में आता रहा है कि आपका जो उद्देश्य है, जिसके लिए आप ये दुनिया में आए हो, आपको वो करना चाहिए।

आचार्य: तो स्वधर्म का मतलब है — अहंकार के लिए वो कर्तव्य जो उसको आत्मा की ओर ले जाता है। इसमें आपकी जो प्राकृतिक रुचियाँ हैं, या जो आप पर प्रभाव पड़े हैं, जिनके कारण आपकी पसंद-नापसंद कुछ विकसित हो गई हैं; उनकी बात थोड़ी ही करी जा रही है।

स्वधर्म का मतलब वो धर्म थोड़े ही होता है जो आपको बचपन से पढ़ा दिया गया है। न ही स्वधर्म का मतलब होता है कि अपनी पसंद-नापसंद, वृत्ति, झुकाव पर काम करना।

स्वधर्म का अर्थ होता है — वह काम करना जो तुमको मुक्ति की ओर ले जाएगा। उसके लिए कहते हैं कृष्ण कि, 'वो काम इतना ज़रूरी है कि वो करते हुए यदि मृत्यु भी मिल जाए, तो अच्छी बात।'

इसमें ये कहाँ से आ गया कि अपनी रुचि के अनुसार काम करो! रुचि तो परधर्म होती है। और परधर्म के लिए कृष्ण कहते है कि, 'परधर्म भयावह होता है।'

ये अच्छे से समझिए!

रुचि परधर्म होती है।

प्र: सर, ये रुचि मतलब जो चीज़ मुझे करनी अच्छी लगती है?

आचार्य: हाँ, जो कुछ भी आपको करना अच्छा लगता है, वो परधर्म ही होता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि जो आपको करना बुरा लगता है वो स्वधर्म होता है; क्योंकि मन तुरंत विपरीत ध्रुव को पकड़ता है। मन कहता है कि, 'जो करना अच्छा लगता है अगर वो परधर्म है, तो स्वधर्म वह होगा जो करना बुरा लगता है।'

नहीं, जो करना अच्छा लगता है, वो भी परधर्म है—जिसको कृष्ण कह रहे हैं, भयावह है—जो करना बुरा लगता है, वो भी परधर्म है। जो करना सही है, वो अच्छे-बुरे के तल से अलग कोई चीज़ होती है। न पता है कि वो अच्छी लगेगी, न पता है कि वो बुरी लगेगी। वो कभी अच्छी लग सकती है, कभी बुरी लग सकती है। कभी न अच्छी लगे, कभी न बुरी लगे। कभी थोड़ी अच्छी, कभी थोड़ी बुरी लगे।

उसके साथ कुछ भी हो सकता है, उसका अच्छे-बुरे से कोई संबंध ही नहीं है; वो बस आवश्यक है। जो आवश्यक होता है, उसमें ये नहीं देखा जाता है कि अच्छा लग रहा है या बुरा लग रहा है; हो सकता है कभी अच्छा भी लग जाए। अच्छे पर नहीं चला जाता, आवश्यक पर चला जाता है। जो आवश्यक है उसको स्वधर्म कहते हैं।

प्र: सर, इसी से संबंधित मेरा एक प्रश्न है कि अगर हम किसी चीज़ में अच्छे हैं, जो मेरी ताक़त है, जिसमें मैं श्रेष्ठ कर सकती हूँ, जो आमतौर पर सलाह दी जाती है कि आपको ये काम करना चाहिए क्योंकि आप इसमें अच्छे हैं, तो क्या ये उसके लिए और मानवता के लिए ज़्यादा सही नहीं है? और कोई अपने कौशल में उत्कृष्टता प्राप्त करता है।

आचार्य: किसकी ओर? और कौन है ये? ये जो आप कह रही हैं 'कोई', ये कौन है? और उसकी इस ताक़त का क्या मतलब है? वो कौन है?

आप कौन हैं? आप एक अतृप्त चेतना हैं, ठीक? अब बताइए कि ताक़त का क्या मतलब हुआ? मैं एक मरीज़ हूँ, मेरी ताक़त क्या होगी? मेरे लिए क्या उचित है? मैं एक अतृप्त चेतना हूँ, तो मुझे क्या काम करना है, जो मेरे लिए उचित होगा?

प्र: ठीक होना।

आचार्य: ठीक होना। तो बस वही काम सही है आपके लिए, बाकी कोई ताक़त, कमज़ोरी नहीं होती। काम का चयन इस आधार पर नहीं किया जाता कि कौन से काम में आपकी प्राकृतिक निपुणता है, या जिसको कहते हैं प्रतिभा है; प्रतिभा वगैरह बहुत छोटी चीजें हैं।

कोई चीज़ आवश्यक है, उसमें आप अपनी प्रतिभा देखेंगी क्या? आपका कोई मित्र है, वो आग में जल रहा है—घर में बंद है और आग लग गई है। आपकी ताक़त ये बिलकुल भी नहीं है कि आप एक जलते हुए घर में घुस जाएँ। आपने फायर फाइटिंग का कोई कोर्स तो करा नहीं है; उसमें जो प्रशिक्षित और प्रतिभावान हैं, उसको आने में भी आधा घंटा है।

ठीक है?

दमकल की गाड़ी अभी आएगी आधे घंटे में, वो फँसी हुई है। और उनकी ताक़त है आग बुझाना, आपकी ताक़त नहीं है ये—तो आप क्या करेंगे, प्रतीक्षा करेंगे? आप कहेंगे, मैं तो वो करूँगी न, जो मेरी ताक़त है।

और आपकी ताक़त क्या हो सकती है? आपकी ताकत हो सकती है कोड लिखना, सॉफ्टवेयर कोड लिखना, तो आपका अंदर मित्र जल रहा होगा और आप बाहर बैठकर कोडिंग करेंगी? "क्योंकि मेरी तो ताक़त है कोडिंग।" और आग आपकी बिलकुल कमज़ोरी है, आप आग से डरती हैं, लेकिन आपका अंदर जल रहा है दोस्त, तो आप क्या करेंगी? कहेंगी क्या कि 'जो मेरी कमज़ोरी का काम है, वो मुझे थोड़े ही करना है'?

काम यह देखकर नहीं किये जाते कि ये ताक़त है कि कमज़ोरी है, वो सब बायोडेटा में लिखा जाता है। वो सब बहुत सतही और उथली चीजें हैं, उनमें कोई दम नहीं। काम ताक़त-कमज़ोरी नहीं, आवश्यकता माने धर्म देखकर करे जाते हैं। कोई है, उसको बचाना धर्म है। अब उसको बचाने की दिशा में मुझे कुछ आता हो, नहीं आता हो, क्या फ़र्क पड़ता है?

अगर मैं यही देखूँ कि मेरी ताक़त कौन सी थी जो मुझे परवरिश से या शिक्षा से मिली थी, तो मैं तो एक प्रशिक्षित इंजीनियर था, एक प्रशिक्षित मैनेजर था। मेरे पास तो कोई शिक्षा या कोई डिग्री तो है नहीं कि 'पीएचडी इन वेदांत।' लेकिन जो ज़रूरी है, वो करना होगा न। ये थोड़ी देखना होगा कि मेरी ताक़त कहाँ पर है। ताक़त हो, नहीं हो, जो ज़रूरी है वो करना है। उसको ही स्वधर्म कहते हैं। कृष्ण वही समझा रहे हैं।

इसी तरीके से जो अगला श्लोक है, वो है आपके सामने अभी?

प्र: हाँ, सर।

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्। सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥

दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि धुएँ से अग्नि की भाँति सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से युक्त हैं।

~ श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय १८, श्लोक ४८ )

आचार्य: इसका आपने क्या अर्थ पढ़ा है?

प्र: जो मुझे समझ में आता है कि दोषयुक्त होने पर भी—इसका मतलब है कि अगर आप अच्छे नहीं हैं, जो आप कर रहे हैं तो भी उसे नहीं छोड़ना चाहिए।

आचार्य: सहज कर्म का अर्थ वो कर्म नहीं होता जो आसानी से हो जाए; सहज कर्म का अर्थ होता है आत्मिक कर्म। वेदांत सौ बार समझाता है कि 'सहजता का संबंध मात्र आत्मा से है।'

तो सहज कर्म नहीं त्यागने, इसका मतलब यह नहीं है कि साँस लेना नहीं त्यागना है। और आमतौर पर हम जिन जगहों पर अनुवाद और व्याख्या पढ़ते हैं, उनमें इसी तरह की बातें लिखी होती हैं। वो सोचते हैं कि सहज कर्म का मतलब है, साँस लेना या खाना खाना या चलना-फिरना — ये सब सहज कर्म में नहीं आते। ये सब मुढ़ता के अनुवाद हैं।

आपने भी शायद एक अनुवाद लिखकर के भेजा था, वह बिलकुल ही ग़लत था। आपने जहाँ से भी पढ़ा है, वो अनुवाद बिलकुल ग़लत है। वहाँ पर जो व्याख्याकार हैं, वो कह रहे हैं, सहज कर्म माने साँस लेना।

सहज कर्म माने साँस लेना नहीं है; साँस लेना प्राकृतिक कर्म है, सहज कर्म नहीं। प्रकृति में सहजता नहीं होती, आत्मा में सहजता होती है। सहज कर्म है वो जो आपके सही केंद्र से, हृदय से, आत्मा से निकल रहा हो, उसको सहज कर्म कहते हैं। तो सहज कर्म को नहीं त्यागना है; सहज कर्म करते रहना है अपने सारे दुर्गुणों के साथ भी, क्योंकि आग के साथ धुआँ तो हमेशा होता है।

तुममें सौ दुर्गुण हैं, लेकिन फिर भी आत्मा की राह चलते रहो; तुममें सौ दुर्गुण हैं, अपने सब दुर्गुणों को लेकर भी सही काम करते रहो। तुममें कितनी भी कमज़ोरियाँ हों, उन कमज़ोरियों के साथ भी सही काम करते रहो; ये समझा रहे हैं कृष्ण। लेकिन जो अर्थ आप पढ़ते हैं और जो आपने कहा, वो अर्थ इसके बिलकुल उल्टा है, बिलकुल विपरीत है; अर्थ का अनर्थ कर दिया है बताने वाले ने।

देखिए, मैं कोई बड़ा भारी ज्ञानी या विशेषज्ञ नहीं हूँ, लेकिन विनम्रता के साथ कहता हूँ कि कम-से-कम वेदांत, भगवद्गीता, उपनिषद्, इनका अर्थ सही करें। तो भगवद्गीता पर अपनी सीमाओं के साथ जितना मैं कुछ बोल सकता था, बोला है। वो बात पुस्तक रूप में उपलब्ध है। कृपा करके उसको मंगा लें। अगर आपका भगवद्गीता से कुछ संबंध है, कोई आस्था है आपकी, तो उसको पढ़ लें।

इसीलिए जब आपने पूछा, तो मैंने तत्काल कहा कि, 'इस श्लोक पर तो मैं इतनी बार बोल चुका हूँ, उसके बाद भी भ्रांति क्यों।'

इसी तरह गीता पर वीडियो कोर्सेस की पूरी सीरीज़ है, कृपा करके उसको आप प्राप्त कर लें। और ये देखिए, अब मैं बोल रहा हूँ, मैं इसलिए नहीं बोल रहा हूँ कि मुझे उन सब चीज़ों को विज्ञापित करना है। उनके विज्ञापन वैसे ही बहुत चलते रहते हैं और क्या करूँगा। लेकिन आप इतने केंद्रीय श्लोकों को लेकर के इतने भ्रम में हैं, इसीलिए मेरे लिए ज़रूरी हो जाता है आपको यह सलाह देना।

प्र: सर एक अंतिम प्रश्न है, वो आपके बारे में है। आज सुबह ही आपका एक वीडियो प्रकाशित हुआ था, जिससे ये समझ में आता है कि आप अपना सारा वक़्त अपने मिशन को, अपने काम को ही देते हैं। मेरा सवाल यह है कि क्या आप कभी आलस्य या निराशा महसूस करते हैं? और यदि हाँ, तो इससे कैसे निपटते हैं?

आचार्य: मैं तो हमेशा ही निराश अनुभव करता हूँ, आलस्य भी रहता है, इसमें छुपाने की क्या बात है।

'आप इससे कैसे निपटते हैं?'

कुछ ज़रूरी है भाई!

वही वाला उदाहरण — आग लगी हुई है और अंदर कोई फँसा हुआ है, अब आलस आ रहा है तो क्या करोगे? नहीं बचाओगे? जितनी वृतियाँ किसी भी साधारण इंसान में होती हैं—आप में हैं, किसी में हैं—वो मुझमें भी हैं। ये भी हो सकता है कि थोड़ी ज़्यादा ही हों।

अब मैं क्या करूँ?

वो सब तो शरीर के साथ आता है; इंसान पैदा हुए हो तो वो सब चीज़ें तो होती ही हैं। लेकिन उनसे बड़ा कुछ होना चाहिए जीवन में। सबके जीवन में होता है।

बस ये स्वीकारना पड़ता है कि कोई दूसरी चीज़ है जो अपने आलस से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है। कोई दूसरी चीज़ है, जो अपने आलस से या अपनी पसंद-नापसंद वग़ैरह से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है। तो? उसको प्रेम कह सकते हैं, उसको ज़िम्मेदारी कह सकते हैं, कुछ भी कह सकते हैं उसको।

प्र: आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

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