प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। आपको देखकर बहुत ख़ुशी हुई। मैं आपको पिछले डेढ़ साल से सुन रही हूँ। मैंने आपके काफ़ी वीडिओज़ देखे हैं, और आपकी एक बात है जिसको मैं गहराई से समझना चाहूँगी।
आपने कहा है, अध्यात्म में रुचि, दिलचस्पी इतने मायने नहीं रखते। और भगवद्गीता के अध्याय अट्ठारह में सैतालिसवां श्लोक में कहा है —
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥
अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता।
~ श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय १८, श्लोक ४७)
प्र: तो आचार्य जी, मेरी सीमित समझ से श्रीकृष्ण क्या अपने झुकाव या स्वभाव के आधार पर काम करने की सलाह दे रहे हैं? और अगर मैं आपकी सलाह से तुलना करती हूँ, तो यह विरोधाभासी लगता है। तो आपसे समझना चाहूँगी।
आचार्य प्रशांत: इस पर तो मैं बहुत बार बोल चुका हूँ। इस श्लोक पर तो कम-से-कम पाँच-छह बार बोला है। आपने इसका क्या अर्थ पढ़ा है? इसका अनुवाद आपने क्या पढ़ा है?




