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परधर्म भयावह है || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् | स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह: || ३, ३५ ||

दूसरों के कर्त्तव्य का भली-भाँति अनुसरण करने की अपेक्षा स्वधर्म को दोषपूर्ण ढंग से करना भी अधिक कल्याणकारी है। दूसरे के कर्तव्य का अनुसरण करने से भय उत्पन्न होता है और स्वधर्म में मरना भी श्रेयस्कर होता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ३, श्लोक ३५

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। इस श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि अपना कर्तव्य अर्थात् स्वधर्म का पालन करना दूसरे के धर्म के अनुसरण करने से बेहतर है। ऐसा श्रीकृष्ण ने क्यों कहा है? कृपया मार्गदर्शन करें।

आचार्य प्रशांत: श्रीकृष्ण ने कहा है कि स्वधर्म बेहतर है क्योंकि स्वधर्म बेहतर है, और कोई वजह नहीं है। क्या तुम्हें ऐसा लग रहा है स्वधर्म श्रेष्ठ नहीं है परधर्म से? ऐसा लग रहा हो तो मुझसे पूछो। अन्यथा तुम मुझसे पूछोगे कि कृष्ण स्वधर्म को श्रेष्ठ क्यों बता रहे हैं, तो मैं कहूँगा इसलिए क्योंकि स्वधर्म श्रेष्ठ है, और क्या बात?

स्वधर्म का क्या मतलब है?

स्वधर्म का मतलब है अपनी स्थिति के प्रति ईमानदारी।

स्वधर्म का मतलब है कि अगर तुम्हारे दाएँ हाथ में दर्द है तो दवा दाएँ हाथ में लगाओ। और परधर्म का मतलब है कि तुम्हारे घर में सब बाएँ हाथ में दवा मलते हैं तो तुम भी बाएँ हाथ पर ही मल रहे हो, भले ही दर्द तुम्हारे दाएँ हाथ में है, ये है परधर्म।

परधर्म का मतलब है वो करना जो दूसरे कर रहे हैं।

और दूसरे जो कर रहे हैं, वो क्यों कर रहे हैं? क्योंकि उन्होंने भी किन्हीं दूसरों को करते देखा है। वो पागलपन है न।

स्वधर्म का मतलब है, मैं फ़िर दोहरा रहा हूँ, अपनी स्थिति के प्रति ईमानदारी। पता हो कि तुम्हारी हालत क्या है, और इसलिए फ़िर पता हो कि इस हालत में तुम्हें करना क्या है। जो तुम्हारे लिए करना उचित है, उसी का नाम धर्म है।

तो बहुत सीधी-साधी बात कह रहे हैं कृष्ण। अपनी हालत को देखो, क्या तुम दूसरों का अनुसरण, दूसरों की नक़ल कर रहे हो। दूसरे को लगी है भूख, वो खा रहा है। तुम्हें लगी है प्यास, दूसरे की नक़ल करके अगर खाने लग गए तो प्यास और बढ़ेगी। तो कहते हैं, "परधर्मो भयावह", भयानक अंजाम होगा दूसरे के धर्म का अनुसरण करने का। मत देखो कि दूसरे क्या कर रहे हैं, तुम देखो तुम्हारे चित्त में छेद कहाँ पर है। तुम अपने घाव का उपचार करो। दुनिया जो कर रही, वही पीछे-पीछे मत करने लग जाओ।

गौर से समझो कि तुम्हें जो चाहिए, वो क्या है और उसकी प्राप्ति में पूरी जान लगा दो—यही धर्म है।

कोई पैसे के पीछे भाग रहा है, किसी को कुछ चाहिए, किसी को कुछ चाहिए, तुमने कहा, “ठीक, यही चीज़ें तो होती हैं जीवन में पाने लायक। मैं भी इन्हीं के पीछे चल देता हूँ।” ये क्या कहलाएगा? परधर्म। श्रीकृष्ण कह रहे हैं, “ये भयानक है, भयावह है।”

सब कुछ-न-कुछ कर रहे हैं। दिक़्क़त बस ये है कि बिना जाने, बिना समझे कर रहे हैं; यूँ ही कर रहे हैं, नक़ल में कर रहे हैं। कुछ नहीं मिल रहा करने से, तब भी करे जा रहे हैं। अन्यथा ऐसा कैसे होता कि दुनिया में इतने विविध लोग हैं, इतने अलग-अलग हैं, फ़िर भी सब एक जैसा ही कर रहे हैं? ऐसा कैसे होता कि सुबह नौ बजे सड़क पर सब दिखाई देते हैं दफ़्तर की ओर जाते हुए? ऐसा कैसे होता? अगर सबको स्वधर्म का पालन करना है तो सब एक ही धर्म का पालन क्यों कर रहे हैं? सब एक ही दिशा में जाते क्यों दिखाई दे रहे हैं? इसी स्थिति को श्रीकृष्ण कह रहे हैं, “भयानक स्थिति है ये।” सब एक जैसा ही काम कर रहे हैं।

अगर सब अलग-अलग हैं तो ऐसा कैसे हो रहा है कि सब ज़िन्दगी एक ही तरह की जी रहे हैं और सबको एक जैसी ही चीज़ें चाहिए? और इन चीज़ों ने बड़ा उपद्रव मचा रखा है न? कहने को वो चीज़ होती है लेकिन तुम्हारी ज़िन्दगी खा जाती है। जब तुम चीज़ को भोग रहे होते हो, तुम्हें लगता है कि तुम चीज़ को खा रहे हो। और तुम क्यों खा रहे हो? क्योंकि सभी खा रहे हैं, तो चलो क्रेडिट कार्ड को भी खा लेते हैं। और फ़िर वो चीज़ तुम्हें खाती है, बहुत महीनों तक, सालों तक खाती है।

ये सिर्फ़ इसलिए हो रहा है क्योंकि धर्म नहीं है तुम्हारे जीवन में। परधर्म पर चल रहे हो; नक़ल पर चल रहे हो—आत्मा नहीं है तुम्हारे पास—संगति है, वो भी कुसंगति। दूसरों की देखा-देखी जी रहे हो, खा रहे हो, उन्हीं के नक्शेकदम पर चल रहे हो, और अभी भी होश नहीं आ रहा है।

विडम्बना पता है क्या है?

परधर्म पर चलने वाले की मजबूरी हो जाती है कि परधर्म पर और चले।

अपराध विषयक जो फिल्में वगैरह बनती हैं, डॉनों पर, माफ़िया पर, उसमें अक्सर ऐसा होता है। जो केंद्रीय किरदार होता है, चाहो तो उसे नायक बोल लो, उसे मध्यांतर के बाद होश आता है। प्रेम वगैरह हो जाता है। तो कहता है कि, "मैं अब इस बुराई की ज़िन्दगी को छोड़ना चाहता हूँ, ये क़त्ल-ओ-आफ़त ख़त्म करना है।" और वो बहुत सारे क़त्ल वगैरह पहले कर चुका है, खूब खून-खच्चर। तो जब वो बोलता है कि "मुझे अब गैंग छोड़ना है", तो उसको खड़ा किया जाता है डॉन के सामने। डॉन कहता है, “ठीक है। तू छोड़ सकता है, पर छोड़ने से पहले तुझे एक आख़िरी क़त्ल करना होगा।” और आगे क्या होता है, हम सभी जानते हैं। क़त्ल छोड़ने के लिए भी कहा जाता है एक क़त्ल और करो। ग़लत राह का ऐसा ही हिसाब-किताब है।

परधर्म चूस ही लेता है आपको अपने भीतर, जैसे दलदल। जितने समय तक उसमें रहो, बाहर आना उतना ही ज़्यादा मुश्किल होता जाता है। दलदल तो फ़िर भी ठीक है, वो तुम्हें समा लेगा अपने अंदर और तुम्हें ख़त्म कर देगा, एक तरह से तुम्हारी जो शारीरिक पीड़ा है उसका अंत हुआ।

परधर्म में तुम मरते भी नहीं, परधर्म में दलदल के कीड़े बन जाते हो। इंसान धँसता जाता है दलदल में, धीरे-धीरे वो दलदल का कीड़ा बन जाता है और दलदल में खुश रहना सीख लेता है, इसीलिए भयावह है। तुम मरोगे भी नहीं, तुम जियोगे, दलदल के कीड़े की तरह जियोगे। भला होता अगर तुम्हें अफ़सोस होता, तुम्हें अफ़सोस भी नहीं होगा, तुम उस दलदल में ख़ुशी मनाओगे, *हैप्पी-हैप्पी*। ये परधर्म है। चेत सकते हो तो चेत जाओ। और फ़िर कहा जाएगा कि स्वधर्म का पालन करो तो कीड़ा क्या बोलेगा? “ठीक है यहाँ। समस्या क्या है?”

बहुत सारे वीडियो हैं मेरे मुक्ति के विषय पर, उन पर कमेंट (टिप्पड़ी) आते हैं, “पर आचार्य जी, मुक्ति चाहिए क्यों?” और जिसने पूछा है, उसने बड़ी मासूमियत से पूछा है कि "मुक्ति की ज़रूरत ही क्या है?" यह अब दलदल का कीड़ा बन चुका है, उसे मुक्ति चाहिए ही नहीं, वो खुश है दलदल में। इसको बल्कि मुक्ति दोगे तो ये छटपटाएगा। जैसे पानी से मछली को निकाल लो तो तड़पती है न, वैसे ही दलदल से दलदल के कीड़े को निकाल लो तो तड़पता है।

कई लोगों की अध्यात्म में आने पर ऐसी ही हालत होती है जैसे पानी में से मछली को निकाल लिया गया हो, दलदल से कीड़े को निकाल लिया गया हो। वो यहाँ बैठ भी नहीं पाते, थोड़ी देर बैठते हैं, फ़िर भागते हैं। जल बिन मछली। भयावह लग रहा है न सुनने में ही?

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