प्रश्न: क्या इंसान का एक ही काम होता है – रहना और सोना? लेकिन सर, योजना आयोजित तो करनी पड़ती है। हर इंसान को खाना चाहिए, और इंसान खाने के लिए किसी की हत्या तक कर देता है। ज़िन्दगी में एक उद्देश्य तो है – खाना। जानवर तक को अगर खाना है, तो किसी का वो शिकार करेगा। तो इसमें भी तो उसने योजना आयोजित की। तो कैसे कह सकते हैं कि ज़िन्दगी निरुद्देश्य है?
वक्ता: अगर कोई ऊँचाई है जीवन की, तो वो ऊँचाई लक्ष्यहीनता की है – निरुद्देश्य होने की। पर हम जैसे हैं, हम उस ऊँचाई पर नहीं हैं। हमारी ज़िंदगी तो उद्देश्यों से ही भरी हुई है। हर काम हम उद्देश्य के लिए ही करते हैं; ठीक से समझना, निरुद्देश्य होना परम अवस्था है, जिसमें हमें कुछ पाना नहीं; हमें जो पाना था, वो हममें है ही, अब क्या पाना? कोई लक्ष्य हो ही नहीं सकता क्योंकि लक्ष्य होता है पाने के लिए।
परम अवस्था है कि मुझे कुछ पाना नहीं – “मैं भरा हुआ हूँ, कुछ चाहिए नहीं और”। कभी बहुत खुश भी होती हो, बिल्कुल आनंद-मग्न, क्या उस समय योजना आयोजित कर रही होती हो? यानि जब भरी हो, तो योजना आयोजित नहीं करती हो न? योजना आयोजित करना इस बात का सबूत है कि ‘अभी दुखी हूँ। अभी पूरी नहीं हूँ’। बात को समझो। प्रेम के क्षणों में भी क्या योजना आयोजित कर रहे होते हो? कि और क्या-क्या सम्भव है, क्या से क्या हो जाये। ऐसा तो नहीं होता? जो परम अवस्था है मन की, चित की, वो लक्ष्य-हीन अवस्था है। उसमें जो है, वो पूरा है; और कुछ चाहिए नहीं। लेकिन हम उस अवस्था में होते नहीं। हमारा जीवन उद्देश्यों से ही भरा हुआ है। हमारा जीवन कुछ न कुछ पाने के लिए ही भटकता रहता है, ठीक है न?
इसे चाहिए (मन को संबोधित करते हुए) । ये और माँगता है – ‘ये मिल जाये, वो मिल जाये। वो पालूँ। ये कर लूँ।’ तो अगर इसको भटकना ही है पाने के लिए, तो उचित है कि वो उस लक्ष्य-हीनता को ही लक्ष्य बना ले। एक ही उचित लक्ष्य है – लक्ष्य-हीनता।
एक ही उचित उद्देश्य है – निरुद्देश्य होना। यदि किसी को लक्ष्य बनाना है तो लक्ष्य-हीनता को लक्ष्य बनाओ। लक्ष्य बनाना है, तो ये लक्ष्य बनाओ कि लक्ष्य-हीन हो जाओ। ये बात समझ में आ रही है? क्योंकि जो मन की परम हालत है, उसमें तुम लक्ष्य-हीन होते हो न? वही तो परम है। जब बहुत आनंद में होते हो, तब तो कोई लक्ष्य नहीं बचता न?




