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‘पानी में मीन प्यासी’ का अर्थ? || आचार्य प्रशांत, गुरु कबीर पर (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, कबीर साहब के भजन में ‘पानी में मीन प्यासी’ का अर्थ क्या है?

आचार्य प्रशांत: पानी में मीन प्यासी का अर्थ है कि वो प्यासी है ही नहीं, वो व्यर्थ ही प्यासी है। पानी में जो मीन है, पानी में जो मछली है वो पानी से अलग थोड़े ही है। तुम मुझे बताओ पानी में, पानी से अलग कुछ कहाँ से पैदा हो जाएगा? पानी में जो भी कुछ होगा वो पानी का ही तो एक आकार होगा न? पानी का ही तो एक रूप होगा?

इशारा समझना, पानी में कोई विजातीय तत्व तो आ नहीं जाएगा। कोई फॉरेन एलिमेंट (विदेशी तत्व) तो कहीं से आ नहीं जाएगा। पानी में जो कुछ है वो क्या है? वो पानी है, अब पानी ही आकर ले लेता है। पानी के क्या आकार हैं? समुद्र में, तलहटी में, पेड़-पौधे भी होते हैं वो पानी का ही आकार हैं, मछलियाँ हैं वो पानी का ही आकार हैं, इशारा समझो।

हम जानते हैं कि मछलियाँ भी पूरी तरह पानी का आकार नहीं हैं। मछली के शरीर में भी केवल अस्सी-नब्बे प्रतिशत ही जल होता है, दस-बीस प्रतिशत कुछ और भी होता है। पर इशारा समझो, मछली जिस चीज़ को माँग रही है वो माँगने की उसे ज़रूरत ही नहीं है।

क्योंकि वही चीज़ उसकी माँस-मज्जा है, वही चीज़ उसकी हस्ती है। पर मछली कल्पना कर रही है कि वो चीज़ उसके पास नहीं है। हम ये भी नहीं कह रहे कि मछली के चारों ओर समुद्र है तो मछली क्यों प्यास का प्रपंच कर रही है, हम कह रहे हैं मछली ही समुद्र है। मछली के चारों ओर समुद्र नहीं है। मछली ही समुद्र है।

अरे! मछली ही समुद्र है तो पानी काहे को माँग रही है? ये तो ऐसी ही बात हुई कि जैसे पानी ही प्यासा हो और पानी कह रहा हो कि ‘पानी दो, पानी दो, पानी दो।’

बात समझ में आ रही है?

तुम्हें जो चाहिए, जिसकी प्यास की तुम घोषणा करते हो। वो कोई और नहीं है वो तुम ही हो।

पानी यदि पानी माँगे तो किसको माँग रहा है? ख़ुद को ही तो माँग रहा है। तो तुम भी जिसको माँग रहे हो वो कोई और नहीं है वो तुम ही हो। तुम प्यासे हो किसके? तुम प्यासे हो अपनी पूर्ण अभिव्यक्ति देखने के। हम ऐसे हैं, जैसे ये स्पीकर है और इसमें तमाम तरह की धूल भर दी जाये।

कचरा-ही-कचरा और इसके तार अंड-बंड कर दिए जायें। अब इसमें से आवाज़ कैसी निकल रही है? आवाज़ कैसी निकल रही है?

श्रोता: घुटी हुई।

आचार्य: घुटी हुई, जैसे गला पकड़ लिया गया हो, ऐसी आवाज़ आ रही है इसमें से। पीछे से बोलने वाला तो कुछ भी बोले, क्या पता अमृत बरसा रहा हो? लेकिन अभिव्यक्ति नहीं हो रही। संदेश आ रहा है पर अभिव्यक्ति नहीं हो रही। हम अभिव्यक्ति के प्यासे हैं, हम उसी के लिए जी रहे हैं, उसी के लिए तड़प रहे हैं।

हम जानते हैं कि हम क्या हो सकते थे। जो हम हो सकते थे वो हमारे दिल में बैठा है और शरीर इसलिए था ताकि हम जो हो सकते थे उसकी अभिव्यक्ति हो एक्सप्रेशन (अभिव्यक्ति) हो। जैसे तुम्हारे सीने में कोई बैठा हो जो नाच सकता हो खुल करके लेकिन तुम्हारे बाजू, तुम्हारे हाथ, तुम्हारा तन, नाचता ही न हो। तो कैसा अनुभव करोगे? कैसा अनुभव करोगे?

वैसा ही, जैसा पूरी मानवता करती है। घुटा-घुटा। बहुत काबिलियत थी, बहुत सम्भावना थी। वो सारी सम्भावना व्यर्थ हो गई, बह गई, कूड़े में चली गई। ऐसे जीते हैं हम। और इसीलिए हर आदमी छटपटा रहा है, छटपटाओगे ही। तुम्हें जो होना था, जो होना स्वभाव था तुम्हारा, नियति थी तुम्हारी, उसकी जगह कुछ और हो गये हो। और जो हो गये हो उससे तुम्हें चैन मिल नहीं सकता।

तो परेशान तो रहोगे ही। और क्या होना है तुम्हें? कुछ और होना है? नहीं। होना तुम्हें वही है जो यहाँ बैठा है जो तुम वास्तव में हो। पर तुम कुछ और ही बन गये हो। अध्यात्म की सारी प्रक्रिया इसीलिए अनबिकमिंग (कुछ न होने) की है।

अपनेआप को कम करने की, छाँटने की, मिटाने की। जैसे मिट्टी में से सोना निकाला जाये। सोना कहाँ से आता है? मिट्टी से ही तो आता है, खनिज, मिनरल। और जब उसको खना जाता है तो तुम्हें क्या लगता है? वो चमक रहा होता है? वो कैसा होता है?

कभी किसी ने कोई खदान देखी है? माइन (खदान) देखी है किसी ने? उसमें से जो चीज़ खनकर आती है वो कैसी होती है? अरे! मिट्टी होती है। और कैसी होती है? और काहे का खनन होगा? कोयले की खान हो तो फिर भी थोड़ा काला-काला माल होता है।

बाकी जितनी ये मिनरल्स (खनिज पदार्थ) की खान होते हैं, उनमें से जो चीज़ खनकर आती है, वो सीधी-सीधी मिट्टी होती है। फिर उस मिट्टी को रगड़ा जाता है, घिसा जाता है, परिष्कार किया जाता है, रिफाईनमेंट (शोधन)। उसे तमाम तरह की प्रक्रियाओं से गुज़ारा जाता है।

उसमें जो व्यर्थ माल है उसको हटाया जाता है। और क्या है पूरी प्रक्रिया? और क्या है पूरी प्रक्रिया? जो कुछ उसमें व्यर्थ है उसको हटाओ और फिर जो शेष बचता है वो है सोना। तो अध्यात्म भी ऐसा ही है। हममें जो व्यर्थ है उसको घिस-घिसकर हटाया जाता है फिर कुछ जो चमकता है वो बाहर आता है।

उसका वैभव अलग है। अब हम सोना तो लिए हुए हैं, हृदय में और बाहर क्या चिपका रखी है? मिट्टी-ही-मिट्टी। और मिट्टी माने शरीर मात्र नहीं, ये जो तमाम ख़याल और धारणाएँ हैं जो मन में भर लीं हैं, ये सब मिट्टी हैं। तो ग्रन्थों का, गुरु का, अध्यात्म का काम होता है कि मिट्टी को हटाओ-हटाओ-हटाओ।

शुद्धि और कुछ है ही नहीं। नकारना, मिटाना, यही शुद्धि है। हटाओ। ताकि फिर वही बचे जिसकी तुम्हें प्यास हो। ताकि सिर्फ़ वही बचे जो तुम हो। अभी मीन इसलिए प्यासी है क्योंकि मीन-और-मीन के बीच में मिट्टी खड़ी हो गई है। ये बात अजीब है।

मीन-और-मीन के बीच में नकली मीन खड़ी हो गई है। तुम्हारे-और-तुम्हारे बीच में एक नकली तुम खड़ा है। फाउंडेशन (संस्थान) में चाबीओं के छल्ले बनते थे, साल दो साल पहले, उसमें से एक छल्ला अचानक याद आ गया। उसपर लिखा था— “इज़ देयर एनीथिंग दैट स्टैंड्स बिटवीन यू एंड यू एक्सेप्ट यू” (तुम्हारे और तुम्हारे बीच में तुम्हारे अलावा कोई और खड़ा है क्या?)

ये हमारी हालत है। जबतक तुम अपनेआप को पूरी उड़ान, पूरी अभिव्यक्ति नहीं दे देते। जबतक तुम टोटल एक्सीलेंस (पूर्ण उत्कृष्टता) और टोटल एक्सप्रेशन (पूर्ण अभिव्यक्ति) का स्वाद नहीं चख लेते।

तबतक तुम्हारी शक्ल मुरझाई हुई ही रहेगी, और तुम्हारी आँखों में शिकायत ही रहेगी। वो शिकायत इसलिए नहीं है कि तुम्हें ज़माने से धोखा मिला है। वो शिकायत इसलिए मिली है क्योंकि तुम, अपने साथ न्याय नहीं कर रहे हो। और एक बात याद रखना। टोटल एक्सीलेंस और टोटल एक्सप्रेशन एक ही बात होते हैं।

उत्कृष्टता और अभिव्यक्ति एक हैं। तुम न एक्सप्रेस्ड (अभिव्यक्त) हो, न एक्सीलेंट (उत्कृष्ट) हो। ये तुम्हारी हालत है। तुम घुटे-घुटे हो, जैसे तुम्हारी आवाज़; जैसे स्पीकर की आवाज़ दबा दी गई हो। न एक्सप्रेस्ड हो और न एक्सीलेंट हो। ये भी कब एक्सीलेंट होगा? (स्पीकर की ओर इशारा करते हुए)

जब ये फुल्ली एक्सप्रेस्ड (पूर्णतः अभिव्यक्त) होगा। इसके एक्सप्रेशन को ही तो एक्सीलेंस कहते हैं न? और अभी ये बिलकुल घूॅं-घूॅं करने लगे तो न ये एक्सप्रेस्ड है और न ही एक्सीलेंट है। उत्कृष्टता ही अभिव्यक्ति है, अभिव्यक्ति ही उत्कृष्टता है। जो तुम्हें होना है वो हो जाओ।

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