जल्दी बड़े फैसले मत लो। जल्दी-जल्दी चीज़ों के पीछे मत भागो, जल्दी से कहीं भी जाकर के ग्राहक बनके या गुलाम बनकर मत खड़े हो जाओ। रुको, थमो। इसमें मत रहो कि अरे दूसरा उसको तो फलानी जगह इंटर्नशिप मिल गई, मैं ही पीछे रह गया। तुम 2 साल बात कर लेना यार, कोई देर नहीं हो गई। फिर होगा जॉब लग गई, फिर होगा उसका दूसरी यूनिवर्सिटी में एडमिशन हो गया, मैं ही रह गया। उसके बाद आएगा कि शादी हो गई, उसके बाद हो गया बच्चे हो गए। ये जितनी चीज़ें हैं इनमें सबसे आगे वो रहेगा जो सबसे पीछे रहेगा। ये जितनी चीज़ें हैं इनमें सबसे सफल वो रहेगा, जो सबसे विलंब से रहेगा।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: गुड इवनिंग सर। मेरा नाम समीर है सेकंड ईयर से हिंदू कॉलेज। सर मेरा प्रश्न ये है कि हम सब एक समाज में रहते हैं एंड एज़ अ टीनेजर ये मेरे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय है। तो सर, हम समाज के सामने इस तरह से मास्क क्यों लगाते हैं? भले ही व्यक्ति रैशनल हो, और जानता हो कि ये उसका ऑथेंटिक शेल्फ है जिसे वो समाज के सामने रखना चाहता है। लेकिन फिर भी उसे डर क्यों लगता है? ऐसा क्यों है सर?
आचार्य प्रशांत: जिससे डरे होते हैं ना उसके सामने सच नहीं बोल पाते, बस यही बात है। उसको तुम वही चेहरा दिखाओगे अपना जो चेहरा वो देखना चाहता है। ऑथेंटिक शेल्फ उसको कैसे दिखा दोगे? और ये जवाब कोई बड़ा अद्भुत विलक्षण गहरा जवाब नहीं है। ये ऐसी चीज़ है जिसको आप रोज़ अनुभव करते हैं। यहाँ आपके सब दोस्त यार होंगे आप उनके साथ एक तरह से व्यवहार रखते हैं उनके सामने आपका एक चेहरा होता है। फिर आप घर जाते हैं, वहाँ ताऊ जी हैं उनके सामने चेहरा दूसरा हो जाता है। गर्लफ्रेंड के सामने तीसरा हो जाता है। हो जाता है ना?: तो उनमें से कोई भी असली चेहरा नहीं है। सवाल में एक मान्यता बैठी हुई थी।




