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मुक्ति डरावनी नहीं, बड़ी हार्दिक होती है || आत्मबोध पर (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
21 min
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम! मोक्ष के आकांक्षी के लिए आत्मबोध है, जिज्ञासु भी मुक्ति की ही बातें करते हैं। लेकिन, आचार्य जी, मुझे तो मुक्ति और मोक्ष आदि के प्रति उदासीनता ही है, और उदासीनता में डर भी शामिल है क्योंकि मुक्ति के कई अर्थ होते हैं। लेकिन, आचार्य जी, गुरु, प्रेम, ईश्वर, करुणा आदि विषयों पर जब आप बोलते हैं, तो मेरे अंदर एक मीठी-मीठी-सी झंकार बज उठती है और साथ ही अहम् के मिटने का भाव भी आता है। यह क्या बात है? कृपया मार्गदर्शन करें।

आचार्य प्रशांत: मुक्ति माने मुक्ति की छवि नहीं, मुक्ति माने सर्वप्रथम छवियों से ही मुक्ति। सदा से ही सामान्य जनों के लिए भी और आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिए भी मुक्ति, मोक्ष, निर्वाण, ब्रह्मलीनता इत्यादि शब्द ज़रा डरावने ही रहे हैं। उसकी वजह यह नहीं है कि ब्रह्मलीनता में या ब्रह्मनिर्वाण में या आत्मबोध में या मोक्ष में वास्तव में कुछ भयप्रद है या दु:खकारी है, बल्कि इसलिए क्योंकि हमने उनके बारे में छवियाँ बना ली हैं, क़िस्से कर लिये हैं, कहानियाँ रच ली हैं।

अब मुझे बताओ— निर्वाण के विषय में अधिकांशत: बोला किसने? क्या उन्होंने जो निर्वाण पद पर आसीन हुए, जो मुक्त हुए? उन्होंने तो बोला नहीं, और बोला भी तो कम ही बोला, क्योंकि जो मुक्त है, उसे बहुत इच्छा ही नहीं रह जाती कि वह मुक्ति का वर्णन करे। न उसे इच्छा रह जाती है और न ही उसे यह धारणा रह जाती है कि मुक्ति का वर्णन किया भी जा सकता है। जो मुक्त है, वह सर्वप्रथम तो यही कहता है कि बोलें क्या, बोलने को तो कुछ है नहीं।

“पहले बहुत कुछ था बोलने को, न जाने कितने क़िस्से-कहानियाँ बोलते ही रहते थे, अब क्या बोलें! आओ किसी और मुद्दे पर चर्चा करते हैं। संसार की बात करते हैं। संसार में बहुत कुछ है मैं जिस पर बोल सकता हूँ, पर अगर तुम मुझसे कहोगे कि मुक्ति पर बोलो, तो मेरे लिए बड़ा अटपटा हो जाएगा। और बातों पर बुलवा लो – बोलो तो दु:ख पर बोल दूँ, बोलो तो भ्रम पर बोल दूँ, माया पर बोल दूँ, मिथ्या पर बोल दूँ, पर मोक्ष पर क्या बोलूँ?” तो उन्होंने बहुत बोला नहीं।

अधिकांशत: किसने बोला मुक्ति पर? जिन्हें मुक्ति का कुछ पता नहीं। हाँ, जिन्हें मुक्ति की शायद अभिलाषा थी, जिन्हें मुक्ति का आकर्षण था, तो वो आकर्षण के मारे बहुत कुछ बोल गए। और फिर, चलो बोला जिसने बोला, कुछ उन्होंने बोला जो मुक्त थे, कुछ उन्होंने बोला जो अभी मुक्त नहीं थे, पर मुक्ति के बारे में सदा सुना किसने? क्या मुक्त पुरुषों की रुचि बच जाती है कि वह अभी मुक्ति के बारे में क़िस्से सुनें? मुक्त को तुम मुक्ति का विवरण दोगे, मुक्त को तुम मुक्ति के गीत सुनाओगे, तो वह मुस्कुराकर आगे बढ़ जाएगा।

मुक्ति की ज़्यादातर बातें सुनीं किन्होंने? जो बद्ध थे, जिन्हें अभी मुक्ति का कुछ पता नहीं है। उन्हें मुक्ति की प्यास तो हो सकती है, पर वो मुक्त स्वयं नहीं हैं। तो उनके कान में जो भी बातें पड़ीं, उन्होंने उन बातों से मुक्ति की एक छवि बना ली, और जो बद्ध मन है, वह जब मुक्ति की छवि बनाएगा तो क्या रहते हुए बनाएगा?

श्रोतागण: बद्ध रहे हुए।

आचार्य: अब बद्ध रहते हुए ही वह तस्वीर किसकी खींच रहा है? मुक्ति की। यह तो गड़बड़ हो गई न। यह वैसे ही बात है जैसे कि शराबी साधु की तस्वीर बनाए, तो वह ख़ुद तो नशे में हिल-डुल रहा है, योगी की तस्वीर कैसी बनाएगा? वो भी हिली-डुली ही तस्वीर होगी। जिस चीज़ का तुम्हें कुछ पता ही नहीं, उसकी तुम क्या तस्वीर बनाओगे! गड़बड़झाला होगा न? इसीलिए हमने मुक्ति को ले करके ख़ूब क़िस्से बनाए हैं, और वो सब-के-सब क़िस्से गड़बड़ हैं, अपितु घातक हैं। इसीलिए हमने ‘मोक्ष’ शब्द अपनी नादानी में अपने लिए डरावना बना लिया है।

एक वजह और भी है, उसको भी समझना। किसके कान में पड़ रही हैं मुक्ति की बातें? जैसा हमने कहा कि उसके कान में जो बद्ध है। जो बद्ध है, वह बद्ध है ही क्यों? याद करो, कल हम कह रहे थे कि लगातार तुम्हारे पास चुनाव उपलब्ध है। जो बद्ध है, वह बद्ध है ही क्यों? क्योंकि उसने बंधनों का चुनाव किया। अब जिसने बंधनों का चुनाव किया है, निश्चित रूप से वह मुक्ति और बंधन में किसको श्रेष्ठ मानता है? बंधन को श्रेष्ठ मानता है। यह बात तो उसके चुनाव से ही प्रत्यक्ष है।

उसे अगर मुक्ति श्रेष्ठ लगती होती, तो चुनाव किसका करता?

श्रोता: मुक्ति का।

आचार्य: उसने बंधन का चुनाव किया है, मतलब उसकी धारणा में, उसके मत में बंधन ही श्रेष्ठ होगा, ठीक? तो बंधन उसके लिए श्रेष्ठ है और उसकी दृष्टि में मुक्ति निम्नतर है, नीचे की बात है न। अब ऐसे मन से तुम अगर कहोगे कि मुक्त हो जाओ, तो वास्तव में तुम उससे क्या कह रहे हो? तुम उससे कह रहे हो कि श्रेष्ठतर को छोड़कर निम्नतर को चुन लो। बात को समझो, उसने किसका चुनाव कर रखा है?

श्रोता: बंधन का।

आचार्य: बंधन का। उसके चुनाव से क्या स्पष्ट होता है, कि उसके मूल्यांकन में, उसकी दृष्टि में क्या श्रेष्ठ है?

श्रोता: बंधन।

आचार्य: बंधन। अब उसकी दृष्टि में बंधन श्रेष्ठ है, उसने बंधन चुन भी लिया; मुक्ति उसके लिए नीचे की बात है। ऐसे मन से, ऐसे अहम् से तुम कह रहे हो कि मुक्ति ले लो, मुक्त हो जाओ, निर्वाण को प्राप्त हो जाओ, तो उसको क्या दिखाई दे रहा है? उसकी भ्रमित दृष्टि को क्या दिखाई दे रहा है? कि तुम उससे ऊँचा पद छोड़ करके निचला पद चुनने को कह रहे हो। तो वह निचले पद का वर्णन भी कैसे करेगा? जैसे किसी नीची चीज़ का किया जाता है। (हँसी)

इसीलिए वह मुक्ति को ले करके जो छवि खींचेगा, जो तस्वीर बनाएगा, जो क़िस्सा बनाएगा, वह क़िस्सा किसी निचली चीज़ का होगा। वह कहेगा, “मुक्ति वह जिसमें सुख छिन जाता है।”

तुम जाओ साधारण संसारी के पास, किसी गृहस्थ के पास, उससे कहो, "मुक्ति चाहिए?" अगर आदर्शवादी होगा, तो कहेगा, "हाँ, बताओ क्या बात है, थोड़ा सुन लेते हैं, वो भी सिर्फ़ तुम्हारा मन रखने के लिए और अपने आदर्शवाद की रक्षा के लिए।”

अगर दो टूक बात करता होगा, तो कहेगा, “अरे! हटाओ तुम मुक्ति वग़ैरह, बेकार की बातें। मुझे घर-गृहस्थी संभालनी है, मुक्ति किसको चाहिए?”

जाओ किसी माँ के पास, और उसको बोलो कि “माता जी, आपके पुत्र को आज ब्रह्म, मुक्ति प्राप्त हो गई।” वह चिल्लाकर, पछाड़ खाकर वहीं गिर जाएगी। तुम्हें क्या लग रहा है, उत्सव मनाएगी?

तुम्हारी पत्नी को कोई बता दे कि पतिदेव को निर्वाण मिला है अभी-अभी, पहले तो तुमको दो-चार मारेगी, फिर पुलिस की तरफ़ भागेगी। बोलेगी, “कौन है वह जिसने मेरे पति को निर्वाण दिलाया? कौन है मेरा दुश्मन?”

और दूसरों को हटाओ, ख़ुद जो आध्यात्मिक जिज्ञासु हैं, उनसे भी यदि अगर कह दिया जाए, “तुम्हें अभी तत्काल मुक्ति मिली जाती है, चाहिए?” तो कौन राज़ी होने वाला है, किसी को नहीं चाहिए, है न? यह सब इसीलिए है क्योंकि मुक्ति का मूल्यांकन कौन कर रहा है?

श्रोता: बंधन वाला।

आचार्य: बंधन वाला, और बंधन वाले के लिए तो मुक्ति निश्चित ही एक निम्नतर चीज़ है जो इससे साबित होता है कि उसने चुनाव कर रखा है बंधन का, तो इसलिए हम घबराते हैं मुक्ति से। वास्तव में हम मुक्ति से नहीं घबराते, हमने मुक्ति को जैसे परिभाषित कर रखा है, उस परिभाषा से घबराते हैं। हमने मुक्ति के बारे में जो बातें सुन रखी हैं, जो कहानियाँ सुन रखी हैं, मुक्ति को ले करके जो मान्यताएँ बना रखी हैं, हम उनसे घबराते हैं।

मुक्ति डरावनी नहीं है, मुक्ति का सिद्धांत डरावना है, मुक्ति की हमारी परिभाषा डरावनी है। मुक्ति को हमने अपने बंधनयुक्त हाथों से छू-छूकर बड़ा मैला कर दिया है। मुक्ति नहीं मैली हो सकती, मैला क्या हो गया है? मुक्ति शब्द मैला हो गया है, मुक्ति की धारणा मैली हो गई है, तो इसीलिए फिर उसमें कोई आकर्षण नहीं रहा। इसीलिए निर्वाण अब बड़ा सस्ता, बाज़ारू, घिसा हुआ शब्द हो गया है – 'निर्वाण कैफ़े', 'मोक्ष टूथब्रश'।

अभी निकल जाओ शहर में, कल कर लेना यही, गिनना कि ब्रह्म, आत्मा, मुक्ति, मोक्ष, निर्वाण, बोध इत्यादि शब्द तुम्हें कितने व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर मिलते हैं। दर्जन से नीचे कोई न गिन पाएगा। दाएँ देखोगे तो दाएँ, बाएँ देखोगे तो बाएँ, हर तरफ़ मुक्ति ही बिक रही है। अब ऐसी बाज़ारू मुक्ति किसको आकर्षित करेगी? कहे कि “हटाओ मुक्ति, इससे अच्छा तो हमारा व्यापार है, हमारी दुकान है, हमारा घर है। दो छोटे-छोटे बच्चे हैं, माँ बीमार है, उसकी सेवा करनी है। मुक्ति! होगा क्या मुक्ति से? शाम का राशन आ जाएगा? मुक्ति से नया फ़ोन आ जाएगा? मेरा पुराना ख़राब हो गया। मुक्ति से बच्चे की फ़ीस चली जाएगी? क्या होगा मुक्ति से?”

मुक्ति क्या है?

मुक्ति का मतलब है उसको छोड़ देना जिसकी तुम्हारे लिए कोई वास्तविक उपादेयता नहीं है। मुक्ति का अर्थ है ईमानदारी से पूछना कि तुम कौन हो, और जो तुम हो, वह होते हुए तुम्हें वास्तव में क्या चाहिए। जो कुछ तुम्हें चाहिए, उसके अलावा बाक़ी जो कुछ तुमने पकड़ रखा हो, फिर उसे बोझ जानकर त्याग देना, यही मुक्ति है। समझ ही गए होगे कि मुक्ति का मतलब सिर्फ़ छोड़ना ही नहीं है, मुक्ति का मतलब पाना भी है। जो तुम्हारे लिए आवश्यक हो, उसको पाना भी मुक्ति है। लेकिन देखो तुम्हारी कहानियों में, तुम्हारी क़िस्सों में कहीं मुक्ति के साथ पाना संबद्ध होता है?

मुक्ति का मतलब ही यही होता है कि राजा अपना महल छोड़कर चल दिया और गृहस्थ अपनी पत्नी छोड़कर चल दिया, माँ अपना पुत्र छोड़कर चल दी, तो यह तो सब डरावना ही है। मोह बहुत डरता है। बंधन इस तरह की बातें सुनेगा तो बहुत डरेगा।

याद रखना, अहम् को पूर्ति चाहिए, मृत्यु नहीं। अहम् बीमार मरीज़ की तरह है और बीमार मरीज़ बहुत चिल्ला रहा है, बहुत छटपटा रहा है। अहम् उस बीमार मरीज़ की तरह है जो बहुत चिल्ला और छटपटा रहा है। तुमने मुक्ति के बारे में जो क़िस्से बना रखे हैं, जानते हो वो क़िस्से क्या कहते हैं? वो क़िस्से कहते हैं, मरीज़ चिल्लाता था, छटपटाता था, शोर मचाता था। उसको चिकित्सक के पास लाया गया और चिकित्सक ने उसको उसके दु:ख से, उसकी यंत्रणा से, उसके शोर से, उसकी छटपटाहट से मुक्त करने के लिए उसको ज़हर दे दिया, यही मुक्ति है।

छटपटाते मरीज़ को ज़हर दे दो, यह मुक्ति है, ऐसा तुम्हारी कहानियाँ कहती हैं। कहानियाँ झूठी हैं। ये कहानियाँ यूँ ही गढ़ ली हैं तुमने। तुम्हारी कहानियाँ कहती हैं— मरीज़ शोर बहुत मचा रहा था, बड़ा दु:ख था उसके जीवन में, बड़ी वेदना, तो चिकित्सक ने उसको विष दे दिया। विष देते ही सारी चीख पुकार रुक गई, है न?

ऐसी हैं तुम्हारी कहानियाँ मुक्ति की। अब इन कहानियों को सुन करके कोई भी डरेगा ही।

वास्तव में मुक्ति क्या है? वास्तव में मुक्ति यह है कि मरीज़ बीमार था, बहुत चिल्ला रहा था, बहुत छटपटा रहा था, चिकित्सक ने प्रेमपूर्वक उसका इलाज किया, उसको दवा दी, औषधि दी और धीरे-धीरे प्रेम के स्पर्श से और दवा के प्रभाव से वह मरीज़ ठीक हो गया, और जब ठीक हो गया, तो सारी चीख-पुकार, सारी वेदना बंद हो गई। ऐसे मिलती है मुक्ति।

मुक्ति का मतलब होता है मरीज़ को स्वास्थ्य मिल गया, मुक्ति का मतलब यह नहीं होता कि मरीज़ को ज़हर मिल गया। हालाँकि दोनों ही स्थितियों में चीख-पुकार रुक जाती है; मरीज़ स्वस्थ हो जाए तो भी उसका चीखना रुक जाएगा और मरीज़ की मृत्यु हो जाए तो भी उसका चीखना रुक जाएगा।

तुमने बड़ी उलटी कहानियाँ बना ली हैं। तुम्हारी कहानियों में मुक्ति का मतलब होता है कि मरीज़ को ख़त्म ही कर दो, और तुम सिहर उठते हो। सिहर उठना तुम्हारा समझ में भी आता है, कहानियाँ ही इतनी ख़तरनाक हैं। तुम्हारी कहानियाँ ये हैं कि घर में तनाव बहुत था तो घर का पुरुष तनाव को अलविदा करके घर को छोड़-छाड़कर सन्यासी हो गया। यह क्या है? यह है ज़हर दे देना कि मरीज़ बहुत बीमार है, बहुत तड़प रहा है, ज़हर ही दे दो उसको, ख़त्म ही कर दो। जबकि वास्तव में मुक्ति का क्या अर्थ हुआ? कि घर में तनाव बहुत था, तो प्रेमपूर्वक अध्यात्म की औषधि से घर का इलाज किया गया और फिर घर का तनाव मिट गया। यह है वास्तविक मुक्ति। अब मुझे बताओ— क्या यह मुक्ति भी डरावनी है?

श्रोता: नहीं।

आचार्य: लेकिन आशा जी (प्रश्नकर्ता), आपके पास मुक्ति का जो क़िस्सा है, वह स्वास्थ्य की, चिकित्सा की, आध्यात्मिक औषधि की बात ही नहीं करता, और क्यों बात नहीं करता, वह भी बता देता हूँ, क्योंकि इलाज करने के लिए प्रेम चाहिए, क्योंकि इलाज करने के लिए संयम चाहिए, धैर्य चाहिए, साधना चाहिए। ज़हर दे देने में क्या साधना है! रोगी बहुत चिल्ला रहा हो, उसको ज़हर दे देने में श्रम लगता है क्या? पर धैर्यपूर्वक उसका इलाज करने में संयम चाहिए, श्रम चाहिए, प्रेम चाहिए, साधना चाहिए। वास्तविक मुक्ति यह सब माँगती है, क्या-क्या माँगती है? प्रेम, साधना, श्रम, संयम।

यह सब अहम् करना नहीं चाहता। अहम् न प्रेम जानता है, न धैर्य जानता है, न साधना जानता है, न संयम जानता है। तो वह ऐसा क़िस्सा गढ़ता ही नहीं जिसमें यह सब शामिल हो, क्या-क्या शामिल हो? श्रम, प्रेम, तपस्या, संयम। अहम् ऐसा क़िस्सा गढ़ेगा ही नहीं। वह मुक्ति को ले करके यही बात बनाएगा कि मुक्ति से बचकर रहना, क्योंकि मुक्ति का मतलब होता है कि जो बीमार है, उसको मार दो। बीमार को मारना नहीं है, बीमार को जीवन देना, स्वास्थ्य देना है। क्यों देना है, उसकी भी वजह समझो, क्योंकि मृत्यु स्वभाव नहीं, अमरता स्वभाव है।

जो बीमार है, उसे तुम मृत्यु की ओर भी ले जा सकते हो और उसे तुम स्वास्थ्य की ओर भी ले जा सकते हो, किधर को ले जाना चाहिए? बात नैतिकता की नहीं है, बात मॉरेलिटी की नहीं है; बीमार आदमी को मृत्यु की ओर भी ले जाया जा सकता है और स्वास्थ्य की ओर भी—मैं आध्यात्मिक अर्थों में बात कर रहा हूँ, मैं शारीरिक बीमारी की बात नहीं कर रहा—मैं किन बीमारियों की बात कर रहा हूँ? मैं बात कर रहा हूँ भ्रम की, मोह की, क्रोध की, भय की, इन बीमारियों की बात कर रहा हूँ।

जो बीमार है, उसे तुम मृत्यु की ओर भी ले जा सकते हो। जो बीमार है, उसे तुम स्वास्थ्य की ओर भी ले जा सकते हो। किधर को ले जाना बेहतर है?

श्रोता: स्वास्थ्य की ओर।

आचार्य: स्वास्थ्य की ओर ले जाना क्यों बेहतर है?

श्रोता: स्वभाव है हमारा।

आचार्य: बढ़िया। क्योंकि मृत्यु अर्थात् गहरा भय, मृत्यु अर्थात् गहरा भ्रम या मोह—ये स्वास्थ्य हैं ही नहीं, ये स्वभाव हैं ही नहीं। तो तुम इनकी ओर किसी को ले भी जाओगे तो तुमने उसकी कोई मदद नहीं कर दी। हो सकता है कि ऊपर-ऊपर से उसकी चीख-पुकार बंद हो जाए पर भीतर-भीतर उसकी छटपटाहट, उसकी वेदना और बढ़ा दी तुमने, तो यह तुमने कोई इलाज नहीं किया। यह मुक्ति नहीं है, यह तो और तुमने उसे महाबंधन में डाल दिया।

मुक्ति का मतलब है कि मरीज़ को ले ही जाना है स्वास्थ्य की ओर; जो भ्रमित है, उसको बोध देना है; जो हिंसा में है, द्वेष में है, उसको प्रेम देना है। अब बताओ, मुक्ति डरावनी है क्या? बीमार को स्वास्थ्य देना मुक्ति है, इस मुक्ति में कुछ डरावना है क्या? जिसका जीवन रूखा चल रहा है, उसकी शुष्कता पर करुणा के छीटें मारना मुक्ति है। बताओ, इसमें कुछ डरावना है क्या? अब नहीं है न?

पर तुमने मुक्ति का संबंध कभी प्रेम से जोड़ा ही नहीं। हमारी मान्यता में तो मुक्ति का मतलब होता है कि कबूतर घायल था, तड़प रहा था, हमने कहा, “बहुत तड़प रहा है, गर्दन मरोड़ दो इसकी।” ऐसी मुक्ति तो भयावह है, ऐसी मुक्ति से तो राम बचाए।

इसीलिए आपने आगे लिखा है कि जब मैं बोलता हूँ किसी भी विषय पर, तो वह आपको अपेक्षतया ज़्यादा भला लगता है, सुहाता है। कुछ आपने लिखा है कि मन झंकृत होने लगता है, कुछ मिठास अनुभव होती है। वास्तव में मैं जो कुछ बोल रहा हूँ, वह मुक्ति से और मुक्ति के लिए ही बोल रहा हूँ, भले ही मैं उसमें मुक्ति का नाम लूँ या न लूँ। तो अगर आपको मेरी बातें मीठी लगती हैं, मेरी बातों से आपकी मन वीणा झंकृत होती है, तो इसका मतलब आपको भी क्या पसंद है? आपको भी तो मुक्ति ही पसंद है। मैंने कभी भी बोला हो, कुछ भी बोला हो, किसी से भी किसी भी विषय पर बोला हो, बोला तो सदा एक ही लक्ष्य से है। क्या लक्ष्य रखा है?

श्रोता: मुक्ति।

आचार्य: तो आपको अगर मेरी बातें सुहाती हैं, तो आपको भी मुक्ति ही प्रिय है। लेकिन आपको कौन-सी मुक्ति प्रिय है? असली मुक्ति, क़िस्से-कहानियों वाली नहीं। अब यह कितनी विचित्र बात है! क़िस्से-कहानियाँ मुक्ति की बात इतनी ज़्यादा करते हैं, लेकिन आपको आकर्षित नहीं कर पाते। मैं हो सकता है कि मुक्ति की बात न भी कर रहा हूँ, हो सकता है कि मैं कोई बहुत सामान्य, साधारण-सी बात कर रहा हूँ, मैं उसमें मुक्ति शब्द का हो सकता है कि प्रयोग ही न कर रहा हूँ, लेकिन फिर भी वह बात आपको प्रिय लगती है।

आपको मेरी बातें नहीं प्रिय लगतीं, वास्तव में सबको एक ही सद्वस्तु प्रिय है और उस सद्वस्तु का नाम है ‘मुक्ति’। जब भी कभी कुछ हार्दिक रूप से प्रिय लगे, जब भी कभी कुछ ऐसा हो कि जिसके बारे में आप कहने लगे कि रूह को छू गया, तो समझ लेना कि वह कुछ ऐसा ही है जो एक बड़ी आंतरिक आज़ादी दिलाता है, नहीं तो और कुछ नहीं आपके मन को स्पर्श कर पाता, भले ही फिर उसको नाम कुछ भी दिया गया हो। नाम में क्या रखा है!

प्रेम माने मुक्ति। कल भी कहा था, आज पुनः याद दिला रहा हूँ। अगर प्रेम है और प्रेम का दावा है, तो तुम्हारी उपस्थिति से, तुम्हारे प्रभाव से तुम्हारे प्रियजन को मुक्ति ही मिलनी चाहिए। प्रेम और मुक्ति अलग-अलग नहीं चल सकते। समझना अच्छे से— प्रेम का मतलब ही यही है कि तुम्हारे होने से हमारे बंधन कटते हैं और हमारा तुम्हारे प्रति दायित्व यह है—दायित्व माने ज़िम्मेदारी, कल हमने इस शब्द का प्रयोग किया था कई बार—और हमारा तुम्हारे प्रति दायित्व ही यही है कि हम तुम्हारे बंधन काटेगे, प्रेम और कुछ है ही नहीं।

इस बात को अच्छे से समझ लीजिए। इस शिविर से आप और कुछ जानकर न जाएँ, इतना जान लें कि प्रेम का मतलब होता है दूसरे के बंधनों को काटने में सहायक होना, तो आपने सब सीख लिया, संसार में जीने की, रिश्ते बनाने और निभाने की कला आ गई आपको।

प्र२: बंधनों को काटना दूसरे के बंधनों को काटना है? अपने बंधनों को पहले काटना पड़ेगा न दूसरों के बाद में?

आचार्य: बढ़िया बात! तुम अपने बंधनों को काटने में बहुत आगे बढ़ नहीं पाओगे जब तक तुम दूसरे के बंधनों को काटने में सहायक नहीं हो रहे हो। वास्तव में यह धारणा ही कि “मेरे बंधन सिर्फ़ मेरे हैं और उनको मैं व्यक्तिगत रूप से काट सकता हूँ,” बंधन है। हम सबके बंधन एक से हैं, क्योंकि हम सब वृत्तियों के तल पर एक ही हैं। जिन्हें अपने बंधन काटने हों, वो अपने बंधन काटते हुए दूसरों की सहायता करें और जो दूसरे के बंधन काट रहे हों, उन्हें दिखाई देगा कि दूसरे के बंधन नहीं काट पाएँगे जब तक उन्होंने अपने नहीं काटे।

तो पहले क्या आया? कुछ नहीं आया पहले, दोनों साथ-साथ आए। यह मुर्गी और अंडे वाली बात है। पहले क्या आया? कुछ नहीं आया पहले। दूसरे की सहायता करनी हो तो अपनी करो और अपनी सहायता करनी हो तो दूसरे की करो।

तो जब मेरे पास लोग आते हैं जो दूसरे की सहायता करने के बड़े इच्छुक होते हैं, तो मैं उनसे पूछता हूँ, “तुमने पहले अपनी सहायता करी?” और जो मेरे पास लोग आते हैं जो अपनी सहायता करने के बड़े इच्छुक होते हैं, कहते हैं, “बताइए, बताइए, आचार्य जी, हमें मुक्ति कैसे मिलेगी?” तो मैं उनसे पूछता हूँ, “तुमने दूसरे की सहायता करी?”

अपनी मुक्ति चाहिए हो तो दूसरे की मदद करो और दूसरे की मदद करनी हो तो अपनी मदद करो।

ये दोनों पृथक बातें हैं ही नहीं, एक काम दूसरे के बिना हो ही नहीं पाएगा, क्योंकि हम सब बड़ी पुरानी डोरों से आपस में संबद्ध हैं। हम वास्तव में अलग-अलग हैं ही नहीं, पृथक व्यक्तित्व धोखा है; हम एक ही हैं। पृथकता धोखा है, कह सकते हो कि पृथकता ही बंधन है।

इस पृथकता के भाव को काटो, और जब पृथकता के भाव को काटोगे तो अपनी भी मदद करोगे और दूसरे की भी करोगे, क्योंकि अब तुम और दूसरा पृथक है ही नहीं। जब दो हैं ही नहीं, तो क्या अपनी मदद, क्या उसकी मदद? ख़ुद भी बचूँगा, तुझे भी बचाऊँगा, और तुझे अगर बचाना चाहता हूँ तो मुझे भी बचना पड़ेगा।

और कुछ?

प्र३: एक दर्पण की तरह है जिसमें हम अपने को देख सकते हैं।

आचार्य: कह सकते हो।

बहुत तरह के उदाहरण दिए जा सकते हैं। मुर्गी-अंडे वाली बात थी, जब चलते हो तो दो पाँव होते हैं न, बताओ, दोनों में से आगे कौन चलता है? दो पाँव होते हैं, दोनों में से आगे-आगे कौन-सा चलता है?

श्रोता: एक की सहायता से दूसरा।

आचार्य: या ऐसा है कि दायाँ ही आगे-आगे चलता है? तो बताओ न, एक को अगर आगे बढ़ाना है तो क्या करना पड़ेगा?

श्रोता: दूसरे को आगे बढ़ाना पड़ेगा।

आचार्य: यह है मुक्ति: अपनी, दूसरों की; अपनी, दूसरों की; अपनी, दूसरों की। आगे कौन बढ़ा? दोनों एक साथ आगे बढ़े मुक्ति की दिशा में। और तुम कहो, “नहीं, साहब, मुझे तो सिर्फ़ इसकी (हाथ की एक उँगली दिखाते हुए) मुक्ति चाहिए। यह मैं हूँ, ये दूसरे हैं (उसी हाथ की दूसरी उँगली दिखाते हुए) * ।" जो दिखते अलग-अलग हैं, पर अगर ठीक से देखो तो? ठीक से देखो तो एक ही हैं। दिखते…? * (दोनों उँगलियों के जोड़ की ओर इशारा करते हुए)

श्रोता: अलग-अलग हैं।

आचार्य: पर तुम कहो कि नहीं, मुझे तो बस इसको (हाथ की एक उँगली दिखाते हुए) मुक्ति तक पहुँचाना है, यह (दूसरी उँगली दिखाते हुए) पीछे छूटता रहे, क्योंकि यह तो दूसरा है, यह तो पराया है, तो यह भी नहीं पहुँचेगा। या तुम कहो कि नहीं, नहीं, हम तो बड़े निस्वार्थ हैं, हमें अपनी तो कोई परवाह ही नहीं, कि हम तो जो करते हैं, बस परिवार के लिए करते हैं—ऐसे भी लोग मिलेंगे, कहेंगे, “अपनी मुक्ति से हमें कोई मतलब नहीं, बस हमारा मुन्नू और हमारी मुनिया, इनको मुक्ति मिल जाए।” ठीक है, बिना अपनी मुक्ति के दिलवा लो मुन्नू और मुनिया को मुक्ति। हो नहीं सकता।

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