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मौत के राज़ || (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कुछ मुद्दे हैं जिनपर आप पिछले दस साल से बोल रहे हैं, जैसे — आत्मा, चेतना, मन, मृत्यु, पुनर्जन्म। हाल ही में बातचीत सीरीज़ (श्रंखला) के माध्यम से आपने इनपर स्पष्टता भी दी है, फिर भी कई लोग हैं जो एक ही सवाल बार-बार घुमाकर अन्य तमाम माध्यमों से हम तक पहुँचा रहे हैं। वो इन बातों को या तो समझ नहीं पा रहे हैं या समझना चाहते नहीं हैं। जैसे उदाहरण के तौर पर आपने मौत के विषय में कल ही बात की थी। अब कितने सारे लोग हैं जो फोन कॉल के माध्यम से, कमेंट्स के माध्यम से और अन्य माध्यमों से हम तक यह बात पहुँचा रहे हैं कि ऐसा कैसे हो सकता है कि देह मर जाए और फिर भी मेरा कुछ है जो मौत के आगे ना जाए? तो आप ज़रा मौत के विषय पर एक आख़िरी स्पष्टता दे ही दीजिए।

आचार्य प्रशांत: जिसको हम जीवन बोलते हैं, वह क्यों है? हम बोलते हैं — मनुष्य जीवित है, जीव जीवित है, वह जीवन क्या है पहले यह समझें।

प्रकृति है, यह सब जो पूरा बिखरा हुआ संसार है, जो कुछ भी दिखाई देता है वह सब प्रकृति है; जड़, चेतन। इसी प्रकृति का एक तत्व, एक एलीमेंट होता है — अहं वृत्ति, *आई टेंडेंसी*। प्रकृति में जो चीज़ें हैं वह ‘ आई ' नहीं बोल रही हैं। यह (पेन) ‘*आई*’ नहीं बोल रहा, वह गिलास ‘ आई ' नहीं बोल रहा। इनमें से कोई भी नहीं कहता ‘मैं' या ‘अहं'। तो जो ना बोले ‘अहं' वह कहलाता है — जड़, क्या? इंसेंटीएंट , जड़, वह जड़ हो गया है। उसी प्रकृति में एक ऐसा तत्व भी है जो बोल रहा है ‘ आई ', ‘अहं', उसको क्या बोलते हैं? अहं वृत्ति। उसे बोलते हैं — अहं वृत्ति, *आई टेंडेंसी*। वह सिर्फ़ एक वृत्ति है वस्तु नहीं, यह स्पष्ट समझो।

तो प्रकृति में भी एक टेंडेंसी होती है, वृत्ति होती है ‘ आई ' बोलने की। वह जो ‘ आई ' बोलती है, वृत्ति, वह जाकर के चीज़ों से अपने-आपको जोड़ती रहती है। तो जो चीज़ सबसे ज़्यादा पसंद है उस आई टेंडेंसी को जुड़ने के लिए उसे कहते हैं देह, द बॉडी , मनुष्य का शरीर या जानवरों का शरीर या कोई भी ऐसा प्राणी जो ‘मैं' बोलता है, उसका शरीर। समझ लो कि उस शरीर के साथ यह जो अहं वृत्ति है यह जुड़ी हुई है। अब अहं वृत्ति को क्या मिल गया? कुछ मटीरियल (पदार्थ) मिल गया, अहं वृत्ति खुद मटीरियल या भौतिक नहीं है, पर उसको एक पदार्थ मिल गया है और पदार्थ के अलावा वह कहीं पाई नहीं जा सकती, वह पदार्थ के साथ ही लगातार संयुक्त है। पदार्थ का और उसका बिलकुल चोली-दामन का साथ है। क्योंकि भाई प्रकृति में तो चीज़ें-ही-चीज़ें हैं, कोई वृत्ति अपने-आपमें तो प्रकृति में हो नहीं सकती। वृत्ति कहाँ घूमेगी? प्रकृति में अगर वृत्ति घूमने लगी तो वृत्ति भी एक वस्तु हो जाएगी। प्रकृति में जो कुछ है वह वस्तु है, चाहे स्थूल वस्तु चाहे सूक्ष्म वस्तु।

तो यह जो शरीर है अब इसमें अहं वृत्ति वास कर रही है, इसका मतलब यह नहीं है कि कहीं बाहर से आकर वास कर रही है। वह इसी शरीर के साथ समझ लो बड़ी हुई है, इसी शरीर में पलती है, इसी शरीर में उसका लगातार ठिकाना है।

प्र: उस अहं वृत्ति ने चमड़े को ही क्यों चुना, इस गिलास को क्यों नहीं चुना?

आचार्य: उसकी वजह है। वह अहं वृत्ति मुक्ति चाहती है, गिलास के साथ जुड़कर के उसको मुक्ति नहीं मिल सकती। यह जो शरीर है आदमी का वह कुछ इस तरह का निर्माण है प्रकृति का कि जब वह इससे जुड़ेगी तो संभावना हो जाती है कि यह जो मनुष्य है, जो ‘मैं’ बोल रहा है वह इतना ऊँचा उठा ले अपने-आपको चेतना के तल पर कि अहं वृत्ति को मुक्ति ही मिल जाए। अहं वृत्ति माने एक तरह की अपूर्णता। वह अपूर्णता पूरी हो जाए। तो जो बिलकुल सर्व-व्यापक है प्रकृति में, निर्विशेष है, इंपर्सनल है, निर्व्यक्तिक, उसे तुम बोल देते हो वृत्ति, उसे हम क्या बोलते हैं? वृत्ति। वही वृत्ति जब तुममें अपने आपको एक्सप्रेस (व्यक्त) करती है तो उसको बोल देते हैं — अहंकार। वह व्यक्ति का फिर व्यक्तिगत अहंकार हो गया, पर्सनल * । अहं वृत्ति * पर्सनल नहीं है लेकिन अहंकार पर्सनल है।

अब वह जो अहं वृत्ति है वह पूर्णता माँग रही है, वास्तव में प्रकृति ही पूर्णता माँग रही है, प्रकृति का ही तो तत्व है अहं वृत्ति। तो यह अहं वृत्ति पूर्णता माँग रही है, इसके लिए यह इतने सारे लोगों में अहंकार बनकर प्रकट हो रही है। जैसे कि अहं वृत्ति बार-बार आज़मा रही हो, कोशिश कर रही हो कि, "मैं फलाने में अहंकार बनकर के प्रकट होती हूँ, क्या पता फलाना मुझे मुक्ति तक पहुँचा दे।" तो किसी भी व्यक्ति के शरीर का समझ लो फिर एक ही औचित्य है कि वह उस शरीर का इस्तेमाल करके उस अहं वृत्ति को - जो उसके भीतर व्यक्तिगत अहंकार बनकर बैठी है - उस अहं वृत्ति को मुक्ति तक पहुँचा दे। शरीर इसलिए है, इसको हम जीवन बोलते हैं।

हम मौत की बात कर रहे थे न? तो मौत से पहले समझ रहे हैं कि जीवन क्या है। प्रकृति जीव को पैदा कर रही है ताकि जीव के माध्यम से प्रकृति स्वयं मुक्त हो सके। तुम चाहो तो इसको एक चित्र वगैरह बनाकर समझ सकते हो।

प्रकृति का ही तत्व है — अहं वृत्ति, आई टेंडेंसी * । वह * आई टेंडेंसी अपूर्ण है। उसको हमेशा ही यह रहता है कि, "मैं कौन, मैं कौन?" वह ‘*आई एम*’ के आगे प्रश्नचिन्ह लगाकर बैठी हुई है, "मैं कौन, मैं कौन? मेरा क्या नाम है?" तो वह अहं वृत्ति पूर्ण होने के लिए जितने भी लोग हैं सबका सहारा लेती है और चूँकि वह पूर्णता नहीं पा रही है इसीलिए वह और-और नए-नए लोगों का सहारा लेती जाती है, जो भी नया बच्चा जन्म लेता है उसपर उम्मीदें अपनी टिका देती है। और वह अहं वृत्ति हर व्यक्ति में किस रूप में प्रकट होती है? हमने कहा उसके व्यक्तिगत अहंकार के रूप में प्रकट होती है। तो यह जो तुम्हारा शरीर है यह वास्तव में प्रकृति ने इसीलिए पैदा किया है कि इसके माध्यम से तुम प्रकृति की ही जो अहं वृत्ति है उसको ले जा सको पूर्णता तक। तो यह जीवन है।

फिर से समझो — तुम्हारा शरीर कहाँ से आ रहा है? प्रकृति से आ रहा है। प्रकृति ने यह शरीर पैदा ही इसीलिए किया है। शरीर में ही इसके कण-कण में, इसकी एक-एक कोशिका में क्या है? अहं वृत्ति, जो यहाँ क्या बनकर बैठी है? व्यक्तिगत अहंकार। प्रकृति ने यह शरीर पैदा ही इसीलिए किया है ताकि इस शरीर के माध्यम से अहं वृत्ति पहुँच सके मुक्ति तक। यही इस शरीर के होने का कारण है, यही इस शरीर के होने की एक ही जायज़ वजह है वरना इस शरीर की कोई कीमत नहीं है।

अब बात समझ रहे हो कि प्रकृति लगातार पैदा क्यों किए जाती है जीवों को? अगर तुम यह समझ लो कि प्रकृति लगातार पैदा क्यों करती जाती है जीवों को तो तुम यह भी समझ लोगे कि प्रकृति लगातार मारती क्यों जाती है जीवों को।

प्रकृति जिस भी नए जीव को पैदा कर रही है उससे उम्मीद लगा रही है, क्या? मुक्ति की। प्रकृति जिस भी नए जीव को पैदा कर रही है उससे मुक्ति की उम्मीद लगा रही है। तो प्रकृति उसे कितने दिन तक ज़िंदा रखेगी? अब तुम खुद ही बताओ।

प्र: जब उसे दिख जाएगा कि यह अनुपयोगी हो गया है तो उसे मार देगी।

आचार्य: यही, इसी को मौत कहते हैं। जब दिख गया कि यह शरीर जो है अब चेतना को मुक्ति तक पहुँचाने का साधन, मीडियम नहीं बन सकता तो प्रकृति कहती है, "भाग! काहे को ज़िंदा है, मर जा।"

प्र: इस गाड़ी का ईंधन खत्म हो गया है इससे अब मैं और आगे नहीं जा सकता।

आचार्य: यह गाड़ी अब किसी काम की नहीं है, इस गाड़ी से अब कोई उम्मीद नहीं रखी जा सकती तो प्रकृति कहती है, "गाड़ी ही खत्म करो, दूसरों को मौका दो। तुम कब तक बैठे खाते रहोगे, तुम मर जाओ ताकि वह जो खाना है वह दूसरे खा सके। क्या पता दूसरे काम कर सकें, कौनसे वाला काम? वही मुक्ति वाला काम। तुम खत्म हो जाओ।" तो यह मृत्यु है। मृत्यु जैसे प्रकृति का एक चुनाव है। प्रकृति तुमको जीवन के रूप में मौका देती है, तुम उस मौके पर अगर सफल नहीं हो रहे — तुम्हें जिस वज़ह से पैदा किया गया है, तुम्हें जिस मिशन के लिए पैदा किया गया है तुम उस मिशन में सफल नहीं हो रहे तो प्रकृति कहती है, "कब तक तुमको ढोते रहें? तुमको मज़े मारने के लिए पैदा थोड़े ही किया था। तुम्हें पैदा ही इसलिए किया गया था कि तुम्हारे शरीर के माध्यम से अहं वृत्ति पूर्णता तक पहुँचे। वह काम तो तुम कर नहीं पा रहे, जब वह काम तुम नहीं कर पा रहे तो जिओगे क्यों। चलो खत्म हो जाओ।"

तो प्रकृति इसीलिए तुम्हें एक निश्चित अवधि देती है, साठ साल, अस्सी साल। कि भाई, इतना समय मिला है इतने समय में मुक्ति तक पहुँच जाओ। इतने समय में मुक्ति तक पहुँच गए तो ठीक, नहीं तो खत्म हो जाना। इसी तरीके से अभी हमने इसको एक आध्यात्मिक तल पर समझा, इसी तरीके से इसको इवोल्यूशनरी (विकास के) तल पर समझो।

तुम्हारे शरीर में जब कहीं चोट लग जाती है, या कोई कोशिका संक्रमित, इनफ़ेकटेड हो जाती है तो वह कोशिका मर क्यों जाती है — हम मृत्यु समझना चाहते हैं — वह कोशिका मर क्यों जाती है यह बताओ? जानते हो हर कोशिका अपने भीतर एक चीज़ रखती है जिसको बोलते हैं सुसाइडल बैग * * लाइसोसोम उसका नाम होता है। यह कोई गहरी बात नहीं कक्षा दस की जीवविज्ञान की बात है, लाइसोसोम बोलते हैं उनको। वह खुद यह देखते हैं कि अब क्या यह जो कोशिका है आगे काम करने लायक बची है, अगर नहीं बची है तो कहते हैं कि फिर यह फालतू ही ऊर्जा क्यों खाए, खाना क्यों खाए? वह लाइसोसोम खुद ही खत्म कर देता है। प्रकृति ख़ुद ही किसी ऐसी चीज़ को ज़िंदा नहीं रहने देना चाहती जो आगे फ़िजूल की है।

इसी तरीके से समझो कि जब एक व्यक्ति को इन्फेक्शन हो जाता है तो बताओ वह मर क्यों जाता है। प्रकृति ने व्यक्ति पैदा किए, मान लो दस लोग हैं उनमें से एक को इन्फेक्शन हो गया। वह इन्फेक्शन कोई भी इन्फेक्शन हो सकता है, वह जब बहुत बढ़ेगा तो वह व्यक्ति मर जाएगा। प्रकृति उसे क्यों मार दे रही है? प्रकृति उसे इसलिए मार दे रही है क्योंकि प्रकृति का उद्देशय यह नहीं है कि आप जिये जाओ। प्रकृति की इसमें कोई रुचि नहीं है कि आप मौज मारो और जीओ, प्रकृति की रुचि किसमें है? मुक्ति में। प्रकृति कहती है इसको इन्फेक्शन लगा है, यह दूसरों में भी फैलाएगा, इसलिए इसको मार दो। इसलिए जो इनफ़ेकटेड आदमी है, प्रकृति उसको मार देती है। प्रकृति कहती है, "अगर यह ज़्यादा जियेगा तो क्या करेगा। इसकी अपनी ज़िंदगी तो अब किसी काम की बची नहीं है, अगर यह ज़्यादा जियेगा तो क्या करेगा? मेरे और जो माध्यम हैं जिनसे मेरी यह उम्मीद है कि क्या पता ये मुक्ति तक पहुँच जाएँ, उनको भी ख़राब करेगा।" तो प्रकृति इनफ़ेकटेड आदमी को मार देती है। मृत्यु को समझो, मृत्यु क्या चीज़ है।

इसी तरीक़े से जब कोई कोशिका इनफ़ेकटेड हो जाती है, तो कोशिका खुद ही फैसला कर लेती है कि मुझे मरने दो क्योंकि मैं अगर जीती रही तो मैं औरों को मार दूँगी। शरीर में सेल्यूलर लेवल पर जो प्लांड सुसाइड होती है, एपोप्टोसिस बोलते हैं उसको, आपकी हर कोशिका बिलकुल हर समय जाँच रही है कि मैं कब तक किसी काम की हूँ। और वह कोशिका जैसे ही पाती है कि मैं किसी काम की नहीं हूँ वह स्वतः खत्म कर देती है अपने-आपको, इसे एपोप्टोसिस बोलते हैं। इसी तरीक़े से आप अगर यहाँ पर कोई टिश्यू कोशिकाएँ रखी हैं, सेल्स रखे हैं, उन पर आप हथौड़ा मार दो, उनमें टूट-फूट हो गई, तो भी कोशिका खत्म कर लेती है अपने-आपको उसको नेकरोसिस बोलते हैं। कोशिका को अगर ज़बरदस्त चोट लग जाए तो भी वह खत्म कर लेगी अपने-आपको, उसे नेकरोसिस बोलते हैं।

यह शरीर ही, यह प्रकृति द्वारा दिया गया शरीर ही साफ़-साफ़ कह रहा है कि, "मैं अगर सही काम कर सकता हूँ, तो ही मैं चलूँगा, नहीं तो मैं चलना नहीं चाहता।" यही मृत्यु है।

सही काम कौनसा? सही काम यह नहीं कि दुकान और आगे बढ़ानी है और यह सब। सही काम यह कि चेतना को और ऊँचाईयों तक पहुँचाना है ताकि अहंकार बिलकुल विगलित हो जाए, अहंकार क्यों खत्म हो जाए? क्योंकि अहंकार ही कष्ट है। तो जीवन का उद्देश्य यही है, जीवन माने इस शरीर का उद्देश्य यही है कि वहाँ तक पहुँच जाओ जहाँ कोई कष्ट नहीं है, माने जहाँ पर अहंकार नहीं है। और अगर तुम वहाँ तक नहीं पहुँच पा रहे तो मरो। यह मौत है।

तो आपका जो शरीर है वह मरने का स्वयं फैसला करता है। वह कहता है कि, "भाई अब मेरी हालत ऐसी नहीं रही है कि मैं किसी भी ऊँचे काम को कर पाऊँ, तो मैं क्यों जीऊँ?" तो शरीर कहता है ख़त्म होना है। सीधा-सीधा बहुत सरल खेल है यह मौत का।

अब बताओ इसमें क्या बात समझ में नहीं आई? बिलकुल एकदम निचले तल पर जाकर सोचो क्योंकि मैं देख रहा हूँ कि जो भी बात बोलता हूँ बहुत सारे लोगों को समझ में आ नहीं रही है।

प्र: यह जो पूरा ग्रैंड मिशन चल रहा है, सवाल तो बाद में आएँगे, पहले तो मेरे लिए ही बहुत नई बात आपने बताई, तो यह जो पूरा ग्रैंड मिशन चल रहा है, इसका पता अहंकार को बिलकुल नहीं है। अगर अज्ञानी है अहंकार तो उसको कोई आइडिया ही नहीं होगा कि उसके माध्यम से क्या करवा रही है प्रकृति।

आचार्य: अज्ञान का मतलब यही है कि तुम जीव बनकर बैठे हो पर तुमको पता ही नहीं है कि यह जीवन तुमको क्यों मिला है। तुम सोच रहे हो, "मुझे जीवन इसलिए मिला है कि मैं मज़े मार लूँ, मैं यह कर लूँ, मैं वह कर लूँ, इधर-उधर फ़िजूल समय खराब कर लूँ।" तुम्हें यह जीवन माने समय इसलिए मिला है ताकि तुम सब बंधनों से, सब कष्टों से मुक्त हो सको, सारे अज्ञान को पीछे छोड़ सको, जीवन इसलिए मिला है।

तुम अगर सही चल रहे हो तो सेल्यूलर लेवल पर जो गतिविधी होती है उसे बोलते हैं मिटोसिस (कोशिका विभाजन), वह है जिजीविषा, द टेंडेंसी टू कैरी ऑन (आगे बढ़ते रहने की वृत्ति)। जो तुम्हारी सेल्स होती हैं वह मल्टीप्लाई करती हैं। वह कहती हैं, "अभी उम्मीद बाकी है आगे बढ़ते रहो, आगे बढ़ते रहो।" जानते हो सबसे ज़्यादा तेज़ी से सेल्स किसमें मल्टीप्लाई करती हैं? छोटे बच्चों में, क्योंकि प्रकृति को उनसे सबसे ज़्यादा उम्मीद है कि एक और पैदा हुआ है क्या पता यही कृष्ण निकल जाए। और जब वह बूढ़ा हो जाता है तो सेल्यूलर एक्सपेनशन बिलकुल कम हो जाता है।

प्र: जैसे अहं-वृत्ति वहाँ आशा खो रही हो।

आचार्य: अहं वृत्ति कह रही है कि, "अब इससे होगा नहीं, अब इससे होगा नहीं।" तो उसमें फिर जो मिटोसिस है वह बिलकुल कम हो जाता है, एपोप्टोसिस (कोशिका क्षरण) बढ़ जाएगा। प्रकृति कह रही है, "इससे नहीं होगा, अस्सी साल का हो गया है इससे नहीं हुआ है। क्या फायदा कि इसकी सेल्स और मल्टीप्लाई करें। तो इसको अब रहने दो, इसको हटाओ, खत्म करो।"

प्र: अब आपने जो पूरा ग्रैंड मिशन जो बताया यह सीक्वेंशियल (क्रमात्मक) है, आप कह रहे हैं कि जो यह अहं वृत्ति होती है वह प्यासी होती है और उसको पानी चाहिए और वह पानी के लिए शरीर को गिलास की तरह इस्तेमाल करती है, वाहन की तरह इस्तेमाल करती है ताकि वहाँ तक पहुँच सके। तो जो लोग पुनर्जन्म की बात करते हैं वह भी तो यही बोलते हैं न कि कोई सीक्वेंशियल चीज़ है।

आचार्य: पुनर्जन्म तो मैं भी कह रहा हूँ कि होता है पर पुनर्जन्म अहं वृत्ति का होता है, व्यक्तिगत अहंकार का नहीं होता।

प्र: पर लॉजिक (तर्क) यह कहता है कि अगर अहं वृत्ति बड़ी मेहनत करके किसी व्यक्ति को एक स्तर से दूसरी स्तर ले जाती है और फिर वह व्यक्ति आधे रास्ते में मर जाता है तो फिर अगले जन्म में अहं वृत्ति उसी व्यक्ति पर और आशा डालकर उसे और आगे बढ़ाना चाहेगी।

आचार्य: उसपर क्यों डालेगी? भाई अँधेरा बहुत है, मैं दिए जला रहा हूँ, कुछ दिए बुझ गए, मैं दूसरे दिए जलाऊँगा। जब मैं दूसरे दिए जला रहा हूँ तो पिछले बुझे हुए दीयों का पुनर्जन्म थोड़े ही हो गया। अहं-वृत्ति नए-नए दिए जलाती रहती है पर जो दिया एक बार बुझ गया सो बुझ गया। उस बुझे हुए दिए की ज्योति उछलकर जाती थोड़े ही है कि दूसरे दिए में बैठ गई। यह ऐसा हम फिल्मों में कई बार देखते हैं कि कोई मरा है तो उसके शरीर से यूँ ज्योति निकलकर के जा रही है, यह फिल्मों ने और बाबाओं ने बड़ा धोखा फैलाया है। तो प्रकृति हर जिस व्यक्ति को पैदा कर रही है उसको एक दिए कि तरह पैदा कर रही है और उम्मीद यह है कि यह दिया सूरज बन जाए। अब यह उस दिए के ऊपर है कि वह सूरज बनेगा कि नहीं बगेना। अगर वह सूरज नहीं बनेगा तो एक तय अवधि के बाद वह दिया बुझ जाना है, बस थोड़ा सा ही तेल दिया जाता है हम सबको।

प्र: कोई अठानवे प्रतिशत पहुँच गया था अपने लक्ष्य तक, उसके बाद वह बुझ गया, वह अगला फिर अठानवे से नहीं शुरू होगा?

आचार्य: बुझ गया तो बुझ गया, अब अगले से कोशिश की जाएगी कि, "भाई तू सौ प्रतिशत तक पहुँच जा।" वह शून्य से ही शुरू करेगा। हर दिया शून्य से ही शुरू करता है। और अगर वह शून्य से आगे शुरू भी करेगा तो सीखा उस दिये ने नहीं है, सीखा प्रकृति ने है। प्रकृति ने सीखा है ताकि जो अगला दिया बनाए वो उसको थोड़ा बेहतर बना दे। यह प्रकृति ने सीखा है।

प्र: कंटेनर चेंज कर देगी।

आचार्य: वह कंटेनर बड़ा कर देगी, जो तेल है वह थोड़ा बेहतर किस्म का डाल देगी, बाती थोड़ी और बेहतर हो सकती है। यही तो प्रकृति की पूरी यात्रा है, यही एवोल्यूशन है। कि हर व्यक्ति जो पैदा हो रहा है वह पाँच-हज़ार साल पहले पैदा हुए व्यक्ति से कुछ मामलों में अलग होता है। प्रकृति खुद इंसान को बदलती रहती है और उसका जो औब्जैकटिव है, लक्ष्य है वह यही है कि मुक्ति मिले। इसी को फिर जैसे कि तुम नित्शे को ले लोगे तो उन्होंने कहा था कि इस पूरे खेल का, एवोल्यूशन का जो उद्देश्य है वह है सुपरमैन पैदा हो। उन्होंने कह दिया सुपरमैन पैदा हो, भारत ने कह दिया कि मुक्ति मिल जाए, वह एक ही बात है। लेकिन इतना तो सबको समझ में आया है कि यह जो पूरा खेल चल रहा है इसका उद्देश्य आदमी को बेहतर-से-बेहतर बनाना है। उस मुक़ाम पर आदमी को ले आना है जहाँ उसकी चेतना हर तरह के बंधनों से पूरी तरह मुक्त हो। यह है इस पूरे खेल का उद्देश्य।

तो मौत कोई रहस्यमई घटना नहीं है। मौत वैसे ही है जैसे जीवन है। जैसे कोई पैदा होता है वैसे ही वह मर जाता है। बिलकुल प्राकृतिक घटना है। कोई यह न पूछे कि, "दिया बुझ गया तो उसकी रौशनी कहाँ गई? दिया बुझ जाता है तो बताओ कहाँ जाती है उसकी लौ?" कहीं नहीं जाती बस बुझ जाती है। एक दिए की लौ उछलकर के दूसरे दिए में नहीं चली जानी है।

प्रकृति नए-नए दिए जलाती रहती है और हर दिए की अपनी रौशनी होती है। हर दिए के ऊपर ज़िम्मेदारी दी गई है कि वह अपनी रौशनी को, मैं कह रहा हूँ, सूरज बना दे। नहीं बना पा रहा तो प्रकृति फिर उससे ना-उम्मीद हो जाती है, निराश हो जाती है, कहती है, "भाग, खत्म हो जा।"

प्र: यह जो पूरा खेल है यह इंपर्सनल (अव्यक्तिक) है।

आचार्य: बिलकुल, तुम्हारी नज़र में पर्सनल है, क्योंकि तुम्हें अपनी व्यक्तिगत मुक्ति तक पहुँचना है पर प्रकृति की दृष्टि से देखो तो किसी भी व्यक्ति का कोई महत्व नहीं है। प्रकृति के लिए तुम सिर्फ़ एक ज़रिया, एक उपकरण हो। प्रकृति कह रही है, "तुम्हारे माध्यम से अहं-वृत्ति मुक्ति तक पहुँचे।"

प्र: बहुत लोग यह भी प्रश्न उठा रहे थे पिछले वीडियो से ही कि जब इसमें मेरे लिए कुछ है ही नहीं, मेरे मरने के बाद ना आगे का कुछ होना है, पूरी यात्रा वहीं रुक जाएगी तो मैं आज ही सुसाइड (आत्महत्या) कर लेता हूँ फिर।

आचार्य: नहीं, तुम कर सकते हो, लेकिन तुम यह भी तो समझो कि तुम्हें पैदा ही क्यों किया गया है। अगर तुम इतनी खोपड़ी चला रहे हो, कह रहे हो, "मैं आज ही मर जाता हूँ", तो इतनी खोपड़ी और चला लो न कि अगर ना होना ही बहुत बढ़िया बात है तो तुम हुए ही क्यों पहले? भाई, आत्महत्या का यही तो मतलब है कि अभी मैं हूँ अस्तित्वमान, मैं होने से प्रवेश कर जाता हूँ ना होने में। अगर ना होना ही इतनी बढ़िया बात होती तो तुम होते ही क्यों? माने पैदा ही क्यों होते?

प्र: यह बात नहीं समझ आई।

आचार्य: नहीं समझ आ रही बात? भाई, तुम कह रहे हो, "मैं अभी हूँ, मुझे बहुत कष्ट है। इससे अच्छा है मैं मर जाता हूँ, मैं आत्महत्या कर लेता हूँ।" आत्महत्या माने अब तुम नहीं हो, तुम्हारी दृष्टि में कि, "अब मैं नहीं हूँ।" अगर ना होना ही इतनी बढ़िया बात होती कि तुम उसको पाने के लिए आत्महत्या करने के लिए तैयार हो तो तुम होते ही क्यों? तुम पैदा ही क्यों होते? तुम पैदा हुए हो इसका मतलब ना होने से होने में कुछ बेहतर बात है, क्या बेहतर बात है? बेहतर बात यह है कि अगर तुमने आत्महत्या कर ली तो तुम्हें वह बिलकुल पता नहीं चल पाएगा जो पता चलने के लिए सर्वप्रथम यह मानव शरीर पैदा हुआ है, तुम उस मौके से चूक जाओगे।

प्र: जहाँ आपको अहं-वृत्ति ले जाना चाहती है, जो चखाना चाहती है आपको।

आचार्य: यह ऐसी सी बात है कि जैसे रसोई में कुछ पक रहा है और बहुत स्वादिष्ट पक रहा है लेकिन उसमें मिर्च का बघार वगैरह लग रहा है, बढ़िया। और प्याज कट रही है। तो माहौल कैसा हो गया अभी घर का, हवा कैसी हो गई? बिलकुल तीखी हो गई। थोड़ी साँस घुटने लग गई है, आँखों में जल रहा है कुछ, आँसू आ रहे हैं, यह सब हो रहा है तो भाई साहब बोले, "मैं तो भाग रहा हूँ इस घर से!" यह आत्महत्या हो गई कि, "इस घर में मुझे कुछ कड़वा लग रहा है, कुछ आँखों में चुभ रहा है, बहुत बघार-वघार है।" तुम भाग सकते हो लेकिन तुम चूक जाओगे अगर भाग गए तो। किस चीज़ से चूक जाओगे? वह जो व्यंजन तैयार हो रहा है न उससे तुम चूक जाओगे। तो आत्महत्या करने में यह गड़बड़ है कि तुम भाग तो सकते हो लेकिन फिर तुम उस संभावना से बिलकुल वंचित रह जाओगे जो एक जीव को उपलब्ध है।

जीव को आनंद की संभावना उपलब्ध है, जीव को प्रेम की संभावना उपलब्ध है। तुम मर गए तो कौनसा प्रेम, कौनसा आनंद? और प्रेम और आनंद मरने से बहुत ऊपर की बातें है, प्रमाण दिए देता हूँ। जो प्रेम में होते हैं, जो आनंद में होते हैं वह मरना नहीं चाहते। उन्हें मरने से न कोई मतलब होता है न वो मरने की इच्छा रखते हैं, न वह मरने से घबराते हैं। मृत्यु उनके लिए एक बिलकुल अप्रासंगिक, इररेलेवेंट वर्ड हो जाता है। तो इससे क्या सिद्ध हुआ? कि मौत से ऊपर की संभावना, ज्योयफूल संभावना, आनंदप्रद संभावना जीवन में है। अगर तुमने जीवन ही मार दिया तो तुम उस संभवना से वंचित रह जाओगे, इसलिए आत्महत्या कुछ बढ़िया बात नहीं है।

प्र: आपने बायोलॉजी का मेनशन करके भी समझाया है मृत्यु को।

आचार्य: देखो, बायोलॉजी का मेनशन करके इसलिए समझाया क्योंकि अध्यात्म और विज्ञान बिलकुल अलग बातें नहीं बोलते, कभी भी नहीं बोलते। जो भी लोग यह बोलें कि विज्ञान ऐसा बोलता है लेकिन अध्यात्म ऐसा बोलता है, वह ना अध्यात्म समझते हैं ना विज्ञान समझते हैं। अध्यात्म और विज्ञान, जहाँ तक पदार्थ की बात है, जहाँ तक जिसको आप जीवन बोलते हो, व्यक्ति का होना, उसकी बात है, उसमें बिलकुल एकमत रहेंगे, सहमत रहेंगे। बल्कि विज्ञान का तो हर आध्यात्मिक आदमी को पता भी होना चाहिए और ज़बरदस्त इस्तेमाल भी करना चाहिए। अगर आप ज़िंदगी को वास्तव में समझना चाहते हैं तो विज्ञान का तो आपको इस्तेमाल करना ही पड़ेगा। उससे आपको ज़िंदगी को समझने में और अध्यात्म को समझने में बड़ी सहूलियत होगी। बहुत सारी आध्यात्मिक बातें हैं जो आपको समझ में ही नहीं आएँगी अगर आपका वैज्ञानिक आधार सुदृढ़ नहीं है तो।

प्र: मौत जो आपने समझाई है, आपने बायोलॉजी का मेनशन लिया है उसमें, वह तो बात ठीक है, सटीक समझ में आ गई मुझे।

आचार्य: अगर आ भी गई है तो उसको खोद-खोद कर बाल की खाल निकालो क्योंकि लोगों को समझ नहीं आनी है।

प्र: उससे पहले की बात जो आपने बताई उसमें यह सवाल बहुत उठ रहा होगा और उठा ही है कि यह अहं-वृत्ति कहाँ से आई, यह अहं-वृत्ति क्यों प्यासी है, क्योंकि यह तो मिस्टीसिज़्म (रहस्यवाद) है, यह तो आप मानेंगे ही।

आचार्य: बहुत तुम्हें ग़ौर से समझना पड़ेगा अहं-वृत्ति कहाँ से आई। यह कौन कह रहा है, "अहं-वृत्ति है"? अहम ही कह रहा है न? अहं के अलावा कोई बोलता है अहं-वृत्ति के बारे में? यह पेन करेगा क्या अहं-वृत्ति की बात? नहीं करेगा न। तो अहं-वृत्ति का अनिवार्य लक्षण और अनिवार्य काम है अपने-आपको अभिव्यक्त करना। उसकी अभिव्यक्ति में ही वह है। अहं का काम है कहना कि, "मैं हूँ।" तो जब तुम कह रहे हो कि अहं वृत्ति कहाँ से आई तो कौन पूछ रहा है यह?

प्र: अहंकार पूछ रहा है।

आचार्य: अहम-वृत्ति यहाँ से आई। जब तुमने पूछा अहं-वृत्ति कहाँ से आई, वह वहाँ से आई, तुम्हारे पूछने से आई। अब यहाँ पर तुम्हें भीतर प्रवेश करना पड़ता है। अहं-वृत्ति कहाँ से आई? अहं-वृत्ति कब आई? तुम्हारे पूछने से आई और जब तुमने पूछा तब आई। तुम आत्मा हो जाओ, तुम शांत हो जाओ, प्रश्न ही ना बचे तो अहं-वृत्ति कहाँ है? चूँकि तुम पूछ रहे हो अहं-वृत्ति के बारे में, चूँकि तुम "अहं, अहं, अहं, मै, मैं, मैं" कर रहे हो इसलिए अहं-वृत्ति है। तुम शांत हो जाओ, ना अहं है ना अहं-वृत्ति।

नहीं समझे?

ठीक अभी-अभी आई, इसी पल आई, जब तुमने पूछा तब आई। मैं पूछ रहा हूँ, "मैं कहाँ से आया?" तुम इस वाक्य की बनावट पर ही ग़ौर करो बहुत कुछ खुलेगा। मैं पूछ रहा हूँ ‘मैं’ कहाँ से आया। अरे बाबा! मैं पूछ रहा हूँ तो मेरे पूछने से आया न, और मैं का पूछना मैं के साथ-साथ चलता है। मैं बिना पूछे रह नहीं सकता, हमने कहा अहं की अभिव्यक्ति और अहं का होना दोनों एक बात हैं। तो मैं और पूछना दोनों एक साथ चलते हैं।

प्र: पर जैसे आप मॉडल समझा रहे थे न तो यह लग रहा था कि यह एक टेलिओलॉजिकल चीज़ है। पहले ऐसा था, फिर अहं-वृत्ति आई।

आचार्य: नहीं-नहीं ऐसा कुछ नहीं है कि समय में ऐसा चल रहा है कि फिर यह हुआ, फिर यह हुआ। समय इन सबके भीतर चल रहा है। देखो यह जो बातें हैं यह सिर्फ़ यूँ ही नहीं हैं कि कोई मॉडल बनाकर के हवा-हवाई कुछ उछाला जा रहा है। जो इन बातों को समझेगा उसे जीने का उद्देश्य समझ में आ जाएगा। तुम यूँ ही नहीं पैदा हुए हो, तुम्हारी एक-एक कोशिका में क्या बैठी हुई है? अहं बैठा हुआ है। तो वह जो अहं है वह तुम्हारी एक-एक कोशिका के माध्यम से कुछ पाना चाहता है। वह शरीर में जो अहं है किसी भी एक जगह पर निवास नहीं करता, वह कहाँ बैठा हुआ है फिर से बोलो? तुम्हारी एक-एक कोशिका में। तुम्हारी एक-एक कोशिका में बैठकर वह जाँचता रहता है लगातार कि अभी ज़िंदगी जीने लायक है या नहीं है, और अगर ज़िंदगी जीने लायक नहीं है तो लाइसोसोम को एक्टिवेट (सक्रीय) किया जाए, सुसाइडल बैग खोला जाए, हम मर जाएँगे।

अहं जो है ‘मैं', तुम्हारी एक-एक कोशिका बोलती है ‘मैं'। वह कभी बोलती है ‘मैं’ जीना चाहती हूँ और कभी वह बोलती है ‘मैं’ जीना नहीं चाहती। कभी वह जब बिलकुल प्रसन्न हो जाती है, उसको लगता है कि मामला उम्मीद का है आगे, तो वह कहती है — मैं सिर्फ़ जीना ही नहीं चाहती मैं फैलना चाहती हूँ। फिर वह एक कोशिका छह कोशिकाएँ बन जाती हैं, वह खुद ही मल्टीप्लाई हो जाती हैं, विभाजित हो-होकर खुद ही। तो तुम्हारी एक-एक कोशिका में अहं बैठा हुआ है, ऐसे कह दो कि शरीर ही अहं है। शरीर ही व्यक्तिगत अहंकार है। इसीलिए तो बार-बार बोलता हूँ कि जब शरीर जलेगा तो व्यक्तिगत अहंकार भी जलकर राख हो जाएगा। बची क्या रहेगी? अहं-वृत्ति है वह बची रहेगी, टेंडेंसी बची रहेगी, उस टेंडेंसी में यह जो हरकत करी थी, हरकत तो खत्म हो गई।

उदाहरण के लिए मेरी टेंडेंसी है चीज़ें बनाने की, चीज़ें तोड़ देने की, मैं प्रकृति हूँ। मेरी क्या टेंडेंसी है? प्रकृति हूँ और प्रकृति एक कलाकार है, चित्रकार है। प्रकृति क्या? एक कलाकार है एक चित्रकार है। उसकी टेंडेंसी है, उसकी वृत्ति है कि वह चीज़ बनाती है और हर चीज़ को जब वह बनाती है तो उससे उम्मीद करती है कि यह चीज़ पूर्ण हो, उत्कृष्ट हो, सर्वश्रेष्ठ हो। वह पूरी उसमें जान लगा देती है और जब जान लगा देती है वह चीज़ बन जाती है, कुछ देर तक वह उससे अपनी उम्मीद बाँधे रहती है। "क्या यह वही उत्कृष्टतम है जो मैं बनाना चाहती थी?" और जब वह देखती है कि यह वह उत्कृष्टतम नहीं है जो वह बनाना चाहती थी तो ख़ुद ही उसको तोड़ देती है ताकि वह जो उसका माल-मसाला है उसका इस्तेमाल करके कुछ और बनाया जा सके। उस माल-मसाले से कुछ और नहीं भी बने तो भी इसको सामने क्यों रखें? इसको सामने रखने पर झुंझलाहट होती है।

मैं प्रकृति हूँ, मैंने अभी-अभी यह (कटोरा) बनाया, और बड़ी मेहनत से बड़ी उम्मीद से बनाया और मैंने जो यह बनाया यह नालायक निकला। मैंने इसको मौके बहुत दिए, मैंने साठ साल दिया, मैंने इसे अस्सी साल दिया, मैंने बहुत मौके दिए कि भाई चेतना को बढ़ा, जीवन को साकार, सार्थक कर पर इसने कुछ सुनी नहीं। और यह जगह भी घेर रहा है, खाना भी खा रहा है, इस पृथ्वी पर बहुत अनंत लोगों के लिए तो खाना-वाना भी नहीं है तो प्रकृति बहुत सारे मौके देने के बाद इसको पकड़कर तोड़ देती है। इसको मृत्यु कहते हैं कि, "अब तू किसी काम का नहीं रहा अब तू वापस जा।"

प्र: अहम-वृत्ति का वह उपकरण जो पूर्णता को उपलब्ध नहीं हो पाया उसको मौत मिल जाती है, आपने बताया है। जो उपकरण पूर्णता को उपलब्ध हो गया, अंततः मौत तो उसे भी मिलनी है। इन दोनों मौतों में फ़र्क़ क्या होगा?

आचार्य: फ़र्क़ यह है कि जो उपकरण पूर्णता को उपलब्ध हो गया उसके माध्यम से, उसको देखकर — अब मैंने यह (कटोरा) बनाया और यह पूर्णता को उपलब्ध हो गया, इसके माध्यम से प्रकृति को ही मुक्ति और शांति मिल जाती है। कलाकार की सोचो। जिस कलाकार ने कुछ ऐसा बना लिया कि उसको देखकर के वह कहे कि, "यह उच्चतम है जो मैं बना सकता था, जो उच्चतम है वह मिल गया, आसमान ही मिल गया मुझको", तो उससे कलाकार को क्या मिल जाएगा? बिलकुल पूर्ण शांति, पूर्ण तृप्ति मिल गई।

प्र: यह खेल चले जा रहा है, चले जा रहा है, हम देख रहे हैं, हम बात कर रहे हैं अभी लोग पैदा हो रहे हैं, बच्चे पैदा हो रहे हैं, इसका मतलब अभी तक कोई भी उपकरण पूर्णता को उपलब्ध नहीं हुआ है? क्योंकि अगर हो गया होता तो यह खेल रुक जाना चाहिए था।

आचार्य: प्रकृति जब तुम कहते हो चले ही जा रही है, चले ही जा रही है, राम हुए, कृष्ण हुए, अवतार हुए, जीसस हुए, क्राइस्ट हुए, तो प्रकृति ने इनको बनाया, इनके बनाने के बाद भी प्रकृति चली क्यों जा रही है? तुम पूछ रहे हो।

इसको ऐसे समझो, प्रकृति किसके लिए चली जा रही है? राम और कृष्ण के लिए चले जा रही है क्या? या तुम्हारे लिए चले जा रही है।

प्र: उनके बाद वालों के लिए।

आचार्य: उनके बाद तो तुम हो न? क्यों चली जा रही है?

प्र: मैं आया ही क्यों जब वो अपना काम पूरा कर चुके थे?

आचार्य: तुम आए हो क्योंकि तुमने यह प्रश्न पूछा है। जो पूर्णता को उपलब्ध हो गए उनके लिए तो प्रकृति का चलना बंद ही हो गया न?

प्र: उनके लिए कैसे? आपने कहा न, यह तो पर्सनल मुद्दा ही नहीं है, यह पूरा मुद्दा ही वहाँ चल रहा है।

आचार्य: हाँ, मुद्दा वहाँ चल रहा है तो लेकिन उसी मुद्दे ने तुम्हारा निर्माण किया हुआ है। सब लोग प्रकृति को अपनी-अपनी दृष्टि से देखते हैं न? जिसकी दृष्टि अभी साफ़ नहीं है उसको लगेगा कि प्रकृति का चक्र चल ही रहा है। जिसकी दृष्टि साफ़ हो गई उसके लिए प्रकृति का चक्र रुक गया, माने समय का चक्र रुक गया, माने वह समय से बाहर आ गया। कलाकार ने अपना काम कर लिया, कलाकार अब उठकर के सोने चला गया, इसी को कहते हैं प्रकृति पहुँच गई लय तक, सब समाप्ती हो गई। नहीं समझे?

यह जो कटोरा था, जो पूर्णता को उपलब्ध हो गया था, क्या यह कटोरा अब कह रहा है कि, "सृजन का चक्र अभी भी चल रहा है"? वह तो नहीं बोल रहा। यह कौन बोल रहा है कि यह सृजन का चक्र अभी भी चल रहा है? यह प्रश्नकर्ता बोल रहा है। यह प्रश्नकर्ता क्यों बोल रहा है? क्योंकि प्रश्नकर्ता को अभी पूर्णता उपलब्ध नहीं हुई। जब तक तुम्हें पूर्णता उपलब्ध नहीं होगी तुम्हारे लिए यह सृजन का और विनाश का चक्र चलता रहेगा।

प्र: और एक और बात, यह छवि न बनाई जाए कि यह चक्र जब खत्म हो जाएगा तो आपको ऐसा दिखेगा कि कुछ भी नहीं है और बच्चे पैदा होना बंद हो गए हैं। हालाँकि कुछ लोगों के लिए यह बंद हो चुका हो।

आचार्य: हाँ, जिसके लिए रुकना होता है उसके लिए रुक गया। जिसके लिए नहीं रुकना उसके लिए चलता रहेगा। जिनके लिए रुकना था उनके लिए रुक गया।

प्र: जिनके लिए अभी यह चलायमान है उसका मतलब यह है कि वो अभी त्रुटिपूर्ण उपकरण हैं।

आचार्य: इसको अगर लग रहा है कि अभी तो प्रकृति का चक्र तो चल ही रहा है इसका मतलब इसको मुक्ति नहीं मिली है, इसको नहीं मिली है। जिन्हें मुक्ति मिल जाती है उनके लिए प्रकृति का चक्र रुक जाता है। उनके अहं को पूर्णता मिल जाती है, उस पूर्णता को ही आत्मा कहते हैं।

प्र: मैं यह देख पा रहा हूँ बहुत लोग यह सवाल ज़रूर पूछेंगे कि यह सब बातें अपनी जगह सही हैं पर लोग अगर अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में हैं, सुबह उठ रहे हैं, नौकरी पर जा रहे हैं, पचास तरह के लफड़ों से डील कर रहे हैं रोज़, और उन्हें सच में इन मुद्दों से ज़्यादा कुछ फ़र्क़ भी नहीं पड़ता, प्रकृति क्या है, यह अहं-वृत्ति क्या है। वह तो यह अनुभव करेंगे न कि, "मैं इसमें हूँ ही क्यों?" ऐसे सवाल भी बहुत आते हैं कि, "मैं क्यों हूँ इसमें?" यह तो मेरे साथ बहुत अनफ़ेयर गेम (अन्यायपूर्ण खेल) हो रहा है।

आचार्य: नहीं, यह सवाल उनको आते ही नहीं न, यही तो समस्या है। वह यह पूछते ही नहीं कि, "मैं कौन हूँ, मैं कहाँ हूँ, मैं क्यों हूँ, जो अभी दफ्तर जा रहा हूँ, बाज़ार जा रहा हूँ, मैं क्यों जा रहा हूँ?"

यही जो सवाल पूछने लग जाए वह मन फिर आध्यात्मिक हो गया। ज़्यादातर लोग इन सवालों में उतरते ही नहीं। जो इन सवालों में उतरेगा वह अंततः इस बात तक पहुँच जाएगा कि तुम्हारा जन्म किसी उद्देश्य, किसी मिशन के लिए हुआ है। तुममें और कीड़े-मकोड़े में अंतर है, और कीड़े-मकोड़े और पत्थर में अंतर है। तुम अकेले हो जिसके भीतर का अहंकार मुक्ति-मुक्ति छटपटाता है। कीड़े-मकोड़ो में वह छटपटाहट बहुत कम होती है और जिसको तुम पत्थर के रूप में देखते हो उसमें वह छटपटाहट ना के बराबर होती है, वह होती ही नहीं।

प्र: जो प्रकृति की लीडर है वह अहं-वृत्ति है, प्रकृति अपने-आपको मेनिफेस्ट (ज़ाहिर) कर रही है अहं-वृत्ति के माध्यम से। और अहं-वृत्ति का मोटिव (उद्देश्य) है कि वह शांति को उपलब्ध हो, उसकी जो बेचैनी है वह खत्म हो और उसके लिए वह जो यह ह्यूमन बॉडी (इंसानी शरीर) है इसको वह अपना राइट व्हिकल (उचित वाहन) मानती है।

आचार्य: द बेस्ट व्हिकल (श्रेष्टतम वाहन)। और इसीलिए संतो ने बार-बार जो मनुष्य योनि है उसकी बहुत प्रशंसा की है।

प्र: तो ये बाकी योनियाँ हैं ही क्यों अगर ये अहं-वृत्ति के मिशन में कोई भागीदार ही नहीं हैं?

आचार्य: अरे भाई, जो प्रकृति यह कटोरा बना रही है वह यह कटोरा एक बार में थोड़े ही बना देती है, इस कटोरे के साथ में और भी कई चीज़ें बनती हैं। वह चीज़ें भी प्यारी हैं, भले ही वह चीज़ें पता है कि अंतिम उद्देश्य तक नहीं पहुँच पाएँगी लेकिन उनका थोड़ा-बहुत कुछ-न-कुछ, कुछ-न-कुछ उपयोग है इसलिए वह मौजूद हैं। और कुछ हो ना हो उनका एक उपयोग तो है ही है कि यह जो कटोरा है यह उनका समुचित और करुणामय उपयोग कर सकता है मुक्ति तक पहुँचने के लिए।

नहीं समझे?

एक जीव है, एक पशु है, एक पक्षी है, वह स्वयं नहीं पहुँच सकता मुक्ति तक पर तुम उस पशु को देखकर के, उस पक्षी को देखकर के कुछ ऐसा जान सकते हो कि तुम मुक्ति तक पहुँच जाओ। तो प्रकृति तरह-तरह के निर्माण करती है लेकिन उन निर्माणों में जो एक निर्माण है जिसके माध्यम से वह मुक्ति की आकांक्षी है वह मनुष्य है।

बाकि निर्माण क्या फिर फ़िजूल हैं? क्या मनुष्य फिर उनका शोषण करे? नहीं वह फ़िजूल नहीं हैं, उनकी बड़ी उपयोगिता है। वो नहीं होंगे तो फिर मनुष्य भी मुक्ति तक नहीं पहुँच सकता। मनुष्य ने अगर उनसे सही संबंध नहीं बनाया तो मनुष्य भी मुक्ति तक नहीं पहुँच सकता तो उनकी यह उपयोगिता है। वह स्वयं नहीं मुक्त हो जाने वाले लेकिन वह तुम्हारी मुक्ति में सहयोगी ज़रूर हो जाएँगे। और अगर तुम मुक्ति तक पहुँचते हो तो तुम फिर एक बहुत अविश्वसनीय बात पाते हो कि अगर तुम मुक्त हो रहे हो तो तुम्हारे साथ-साथ वो सब भी मुक्त हुए जा रहे हैं। यह कैसे होता है? यह वही जान सकता है जो मुक्ति तक पहुँचा है। तो इसीलिए इस बात को आगे नहीं बढ़ाएँगे।

प्र: यहाँ पर मैं देख पा रहा हूँ कि घूम कर क्वेस्चन (सवाल) आ सकता है कि यह जो पूरा मॉडल बताया इसमें यह भी कहा जाता है न कि इतनी लाखों योनियाँ हैं और उन योनियों में अगर आप अपनी किसी छोटी योनि में, किसी पशु की योनि में या किसी कीट-पतंगे की योनि में अपना जो काम है वह ठीक से करते हैं...

आचार्य: कीट-पतंगा कुछ सही या ग़लत करता ही नहीं है, उसके लिए कुछ फुलेस्ट या हाल्फ फुल या लोवेस्ट कुछ होता ही नहीं। वह तो जैसा है वैसा ही है। उसके सामने विकल्प नहीं होते कि, "घास खाऊँ कि माँस खाऊँ?" यह आदमी के पास विकल्प होता है कि घास खाऊँ कि माँस खाऊँ। ना शेर के पास, ना खरगोश के पास। उनके पास ऐसा कोई विकल्प होता ही नहीं है तो वो सही-ग़लत, पाप-पुण्य कुछ कर नहीं सकते। तो कोई कहे कि पशुओं को उनका कर्मफल मिलता है तो बात कुछ सही नहीं है।

प्र: वहाँ वह चॉइस (विकल्प) ही नहीं है। वो खेल वहाँ चल ही नहीं रहा है जो इंसानों के साथ चल रहा है।

आचार्य: इंसान के साथ एक बिलकुल अलग खेल चल रहा है। बाकि सब जीवों की अपेक्षा इंसान में एक बहुत ही विशिष्ट खेल चल रहा है।

प्र: उसी खेल का भाग है कि हम उस खेल के बारे में बात कर रहे हैं।

आचार्य: बहुत बढ़िया! उसी खेल का भाग है कि हम उसके बारे में बात कर रहे हैं। हम समझना चाह रहे हैं। कोई भी अन्य जीव समझने का बहुत इच्छुक नहीं होता। जानने का तो फिर भी इच्छुक हो सकता है, नॉलेज (ज्ञान) का, जैसे खरगोशों को बहुत बार यह जिज्ञासा रहती है कि, "वहाँ रखा क्या है?" तो जाएँगे, झाँकेंगे, उनमें जानने की इच्छा तो हो सकती है, जिसे आप अण्डरस्टैंडिंग कहते हो, समझना, बोध, वह किसी पशु का आग्रह नहीं होता।

प्र: अभी जितनी भी हमने बातचीत की, मौत को जितना भी समझ पाया हूँ, और जीतने भी काउंटर क्वेस्चन पूछ पाया हूँ उससे मुझे यह बात दिखी कि मौत तो वैसे ही है जैसे अभी यह बातचीत हो रही है।

आचार्य: मौत ऐसी है कि जैसे यह बातचीत अगर मुक्ति की दिशा में जा रही है तो मृत्यु नहीं है, यह बातचीत अगर मुक्ति की दिशा में नहीं जा रही है तो प्रकृति तुमको देख रही है तुम्हारे ही भीतर बैठकर के। वह कह रही है, "समय खराब करने के लिए तुम्हें पैदा किया था? मर!" तुम्हारे ही भीतर तुम्हारी एक-एक कोशिका तुमको देख रही है और वह जब पाएगी कि तुम फ़िजूल काम ही कर रहे हो तो वह धीरे-धीरे मृत्यु की तरफ बढ़ने लग जाती है स्वयं ही। या फिर प्राकृतिक संयोग ऐसे बनने लग जाते हैं कि तुम मृत्यु की तरफ खुद ही बढ़ जाते हो। या फिर जब तुम ऐसे काम कर रहे हो जो मुक्ति की तरफ नहीं जा रहे तो तुम्हारा शरीर — यह मस्तिष्क में यह भी तो कोशिकाओं का ही संग्रह है — कुंद हो जाता है और बहुत असंतोष में जीता है, बहुत कुपित होकर, बहुत अतृप्त होकर के जीता है।

प्र: एक कमेन्ट पढ़ा था यूट्यूब पर कि आप जैसे मौत को समझाते हैं वह बात — क्योंकि आपने पहले भी बहुत वीडियो में समझाई है, बायोलोजिकल प्रोस्पेक्टिव से शायद आप आज पहली बार इतनी विस्तारपूर्वक बता रहें है पर आप इस मुद्दे पर सैंकड़ों वीडियो में पहले भी बोल चुके हैं, कुछ ऐसा नया नहीं है, लोग समझ नहीं पा रहे हैं उसका पता नहीं क्या कारण है। एक कमेंट मैंने पढ़ा था उसमें एक सज्जन पूछ रहे थे कि किन्हीं गुरुदेव की किताब भी आ रही है और वह मौत को बड़ा ही जादुई और टोना-टोटका, आफ्टर-लाइफ , उस एंगल (दृष्टिकोण) से देख रहे हैं और वह इतनी ज़्यादा अपीलिंग (आकर्षक) लग रही है लोगों को तो मतलब एक तरफ आपसे सुना कि यह भी बहुत वैज्ञानिक बात है।

आचार्य: आध्यात्मिक, वैज्ञानिक दोनों।

प्र: एक तरफ वहाँ पूरा खेल है कि हवा-हवाई, जादू-टोना, शू-शा।

शरीर गिरा पड़ा है और आत्मा इधर-उधर टहल रही है। फिर जब यह गेम फिनिश (खेल ख़त्म) हो गया, अब मृत्यु के बाद कुछ और शुरू हो गया, उसका पता सिर्फ कुछ ही लोगों को है जिनमें गुरुजी शामिल हैं या सिर्फ़ गुरुजी शामिल हैं।

आचार्य: तुम्हारा सवाल फिर दूसरा होना चाहिए, तुम्हारा सवाल होना चाहिए कि जानने के बाद भी, चीज़ों को समझने के बाद भी, हमारे भीतर ऐसा क्या है कि हम यह झूठ पर इतना भरोसा करे बैठे रहते हैं, हमारे भीतर क्या है जो झूठ को छोड़ना ही नहीं चाहता?

हमारे भीतर जो चीज़ झूठ को छोड़ना नहीं चाहती उसी को तो अज्ञानी अहं कहते हैं न। हमें कुछ बड़ा चाहिए, हम उसी बड़े को पाने के लिए ज़िंदा हैं। उसी को कभी मुक्ति कह देते हैं, कभी सच कह देते हैं, कभी आनंद कह देते हैं, कभी कुछ और कह देते हैं। लेकिन जो हमें बड़ा चाहिए उससे हम अपरिचित हैं। वह हमें चाहिए तो पर हम उसके बारे में जानते कुछ नहीं हैं तो धोखा हो जाने का खतरा रहता है। तुम्हें चाहिए पर जो तुम्हें चाहिए तुम उसका नाम पता कुछ जानते नहीं। तो यह हो सकता है, बहुत संभावना है कि जो तुम्हें चाहिए तुम उसकी जगह कुछ और पकड़ लो यह सोचकर कि, "यह वही है जो मुझे चाहिए।" यह हो जाता है।

बाबाजी हैं, बाबाजी एक बहुत बड़े मंच पर चढ़े हुए हैं, सामने हज़ारों की भीड़ है और बाबाजी वहाँ पर बिलकुल ज़बरदस्त किस्म की परंपरागत, प्राचीन वेषभूषा पहने बड़े रुआब के साथ भाषण बाँट रहे हैं, और लोग बिलकुल भावुक हुए जा रहे हैं, भक्त बिलकुल द्रवित हुए जा रहे हैं और आप उस भीड़ में पहली बार पहुँचें। आप पहली बार पहुँचे और यह सब माहौल देख रहे हैं, वहाँ रोशनियाँ लगी हुईं हैं, पैसा बरस रहा है बिलकुल, बड़े-बड़े कैमरे लगे हुए हैं, स्क्रीन लगी हुई हैं, गुरुजी के अपने कपड़े ऐसे हैं कि एक सेट दो-लाख रुपए का आता हो, इतनी बड़ी भीड़, क्या व्यवस्था है बिलकुल पंच-सितारा होटल जैसी।

आप प्रभावित हो जाते हो, आप इंप्रेस हो जाते हो। अब इतनी सेल्फ-अवेयरनेस , आत्मज्ञान आपमें है नहीं कि आपको पता चल सके कि आप किस चीज़ से प्रभावित हो रहे हो। प्रभावित तो आप हो गए पर एगजेक्टली किस चीज़ से आप प्रभावित हुए हो यह आप नहीं जान पा रहे। आपको लगता है कि आप गुरुजी के वचनों से प्रभावित हुए हो जबकि प्रभावित आप वास्तव में किस चीज़ से हुए हो? वह जो लग्जरी है, और वह जो गुरुजी का रुआब है, उनके राजनेताओं से सम्बंध हैं। भाई, यह तो हमारी आम ज़िंदगी में भी होता है न कि फलाना बोलता है — देखो, मैं जानता हूँ सांसद को तो आप तुरंत उससे प्रभावित हो जाते हो। अब कोई बोले — सांसद छोड़ दो मैं तो प्रधानमंत्री को जानता हूँ सीधे तो आप तो और प्रभावित हो जाते हो उससे। आपको पता भी नहीं चलेगा कि आप किस चीज़ से प्रभावित हो।

आपको लगेगा गुरुजी का ज्ञान इतना है कि मैं प्रभावित हो गया। वह ज्ञान नहीं है, वह पौशाक है, वो जो उनके इधर-उधर के सम्बंध हैं, वह जो उनके ख़ास तरीके से अपनी फ़ोटो खिचवा रहे हैं, ख़ास तरीके के उनके वीडियो बन रहे हैं, वह जो उन्होंने लाखों प्रशंसकों की, मूर्खों की भीड़ इकट्ठा कर ली है आप उन सब चीज़ों से प्रभावित हो जाते हो। जितना आप प्रभावित होते जाते हो उतना आपकी सोचने समझने की शक्ति खत्म होती जाती है तो फिर बाबाजी आपको और नचाते हैं। वह फिर आपको बताएँगे मौत के बारे में हवा-हवाई बातें और कहेंगे, "यह देखो फलाना मर गया है लेकिन फिर भी मैं उसको उठाकर चला दूँगा। आदमी मर जाता है लेकिन उसका सूक्ष्म शरीर बाहर चाय पीता रहता है।" तो यह सब अपना उनका चलता रहेगा। चाय नहीं तो फिर नारियल पानी, या कद्दू का रस।

प्र: सांसद को जानता हूँ, प्रधानमंत्री को जानता हूँ, वह जानता हूँ जो मौत के बाद आएगा, वह एक सबसे ज़्यादा लोगों को लगता है कि अच्छा यह तो वह भी जानते हैं जो मौत के बाद आएगा तो शायद ये हमें बचा सकते हैं।

आचार्य: तो अपने अज्ञान की वजह से हम हर उस आदमी के सामने तुरंत झुक जाते हैं जो हमारे अज्ञान को ज्ञानी लगता है। अब सवाल यह है कि अगर तुम अज्ञानी हो तो तुमने अपने अज्ञान का ही इस्तेमाल करके यह निर्णय कैसे कर लिया कि कौन ज्ञानी है?

यह बड़े फिर मूर्खता की बात हो जाती है। इसके आगे क्या होता है? इसके आगे यह होता है कि एक बार आपने किसी को गुरुजी मान लिया — तुम पूछ रहे थे न कि इतना समझा रहा हूँ फिर भी लोग समझने से इंकार क्यों कर देते हैं? वह इसलिए क्योंकि लोगों ने जिनकी बातें पकड़ रखी होती हैं मैं उन बातों के बिलकुल ख़िलाफ़ बोल रहा हूँ।

अब मान लो तुमने किसी को गुरुजी मान रखा है, अब मैं जो बातें बोल रहा हूँ वह तुम्हें साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा है कि सही हैं लेकिन तुम्हारा अहंकार कहेगा कि, "मैंने फलाने को गुरुजी माना था वह गुरुजी ग़लत कैसे हो सकते हैं?"

बात यह नहीं है कि गुरुजी ग़लत हो सकते हैं या नहीं हो सकते हैं बात यह है कि मैंने उन्हें गुरुजी माना था, अरे मैंने उन्हें गुरुजी माना था तो अगर वह ग़लत हुए तो कौन ग़लत हुआ? मैं ग़लत हुआ। तो मैं मानूँगा ही नहीं कि मेरे गुरुजी ग़लत हैं। मैं कुछ भी करके अपने गुरुजी को सही साबित करने की कोशिश करता रहूँगा क्योंकि वह मेरे गुरुजी हैं। यह अहंकार की, व्यक्तिगत अहंकार की बात है। मान लो न सीधे-सीधे तुमसे ग़लती हो गई। तुम पर्फेक्ट हो क्या? तुम हर निर्णय में ग़लती करते हो, यह मानने में तुमको क्या दुविधा है कि गुरु जिसको तुमने मान लिया वहाँ भी ग़लती की थी?

यह तुम मान लेते हो कि मैंने शादी ग़लत की, यह भी तुम मान लेते हो मैंने नौकरी ग़लत कर ली। जब ज़ाहिर सी बात है कि तुम जब हर निर्णय ग़लत ही करते हो या अधिकांश निर्णय ग़लत ही करते हो। शर्ट भी तुम खरीदने गए, चप्पल भी तुम खरीदने गए, वहाँ भी तुम्हें सही समझ में नहीं आया कि कौनसी चप्पल ठीक है तो तुम्हें यह कैसे समझ में आ गया था कि किस किताब में लिखी कौनसी बात ठीक है? या कौनसे बाबाजी ठीक हैं, कौनसे गुरुजी ठीक हैं? जैसे तुम ज़िंदगी में हर चीज़ को समझने में गड़बड़ कर गए वैसे ही तुमने गुरुजी को समझने में गड़बड़ कर दी। गुरु-घंटाल को तुमने गुरु बना लिया लेकिन अब अहंकार तुम्हारा इतना है कि तुम्हें सही बात बताई भी जा रही है तो तुम कहते हो, "नहीं पर मेरे गुरुजी ने तो कोई और बात बोली तो मैं कैसे मान लूँ आपकी बात? और मेरे गुरुजी तो बहुत बड़े आदमी हैं, उनका बड़ा नाम था, करोड़ो उनके अनुयाई हुए हैं, उन्होंने ऐसा बोला, उन्होंने वैसा बोला।"

अरे बाबा, आदमी जो बताएगा उसके अनुसार तुम सत्य का निर्धारण करोगे या सत्य के अनुसार तुम निर्धारित करोगे कि कौनसा आदमी ग़लत है और कौनसा सही है? नहीं समझे?

हमारा अहंकार एक आदमी से चिपक गया है तो हम कह रहे हैं जो उस आदमी ने बोला वही सत्य है। होना यह चाहिए कि तुम यह देखो कि क्या सही है फिर यह देखो कि वह किस आदमी ने बोला और जिस आदमी ने सही बात बोली वह आदमी सही है। हम उल्टा चलते हैं। हम यह देखते ही नहीं कि जो बात बोली गई है वह कैसी है। पावरफुल (ताक़तवर) आदमी जो भी बोल दे वह सही है और जो बाबाजी है उसको भी अच्छे से पता है कि पावरफुल हो गए तो तुम कुछ भी बकवास उछालते रहो इधर-उधर की वह सब चलेगा। कान से कबूतर निकाल दिए मैंने, और मेरी नाक से साँप उड़ते हैं। कुछ भी तुम बोल दो सब चलेगा। लोग इतने अँधे हो जाएँगे कि वो सवाल ही नहीं उठाएँगे। तो वो फिर इसलिए हर तरीके से पावर (ताक़त) इकट्ठा करने की कोशिश करते हैं और आपको बेवकूफ़ बनाते रहते हैं। उनका पूरा गेम (खेल) जो है वह आध्यात्मिक किसी तरीक़े से नहीं है। वह पूरा खेल पावर और पॉलिटिक्स का है।

प्र: एक हफ्ते से लगातार पुनर्जन्म विषय पर आप बोल रहे हैं और उसके बावजूद लोग घुमा-घुमा कर घुमा-घुमा कर — एक सज्जन ने तो आप पर ही आरोप लगा दिए कि आचार्य जी आपको पता है कि पुनर्जन्म होता है आप बस हमें बता नहीं रहे क्योंकि अभी हम उस लेवेल (स्तर) पर आए नहीं हैं। तो आप बस कुछ सीनियर सीकर्स (वरिष्ट जिज्ञासुओं) को ही बताते हैं यह बात, आपने कुछ हिडेन कैप्सूल्स (छुपे हुए कैप्सूल) अभी रख रखे हैं जो मैच्योर सीकर्स (परिपक्व जिज्ञासुओं) को ही आप देंगे।

आचार्य: प्रकृति ऐसों को देखकर के बहुत निराश होती है। प्रकृति कहती है, "मैंने तुम्हें किसलिए पैदा किया था और तुम यह क्या बेवकूफ़ियाँ कर रहे हो।" फिर ऐसे ही जीवन का परिणाम एक मौत है, एक कलपती हुई मौत, एक बिलखती हुई मौत। फिर इसीलिए कबीर साहब आदि संत बार-बार तुमको यमराज माने हमारे भैंसे वाले का स्मरण कराते रहते हैं कि मौत आ रही है, सही काम करो नहीं तो मौत तो आ ही रही है। मौत तो प्रकृति ने तय कर रखी है तुम्हारे लिए। प्रकृति ने तुमको एक सीमित समय दिया है, इस सीमित समय में या तो मुक्ति पा लो नहीं तो मौत पाओगे।

प्र: प्रकृति तो कहते हैं कि निर्दयी होती है।

आचार्य: प्रकृति निर्दयी है। प्रकृति को ना तुमसे कुछ लेना-देना है ना मुझसे। प्रकृति कहती है, "मैंने यह इतने दिए जलाए हैं।" भाई, प्रकृति को अगर एक से ही उम्मीद होती तो एक ही दिया जलाती न? प्रकृति तो खुद ही करोड़ों दिए जलाती है क्योंकि उसे पता है कि करोड़ों में कोई एक ही होगा जो बढ़कर के सूरज बनेगा। तो प्रकृति को किसी एक दिए से कोई मोह-ममता नहीं होती। एक दीया जिये एक दीया मरे, प्रकृति को क्या फ़र्क़ पड़ता है।

प्र: अगर प्रकृति शरीर को उतना ही चलाती है जब तक वह मुक्ति के लिए एक अच्छा उपकरण है तो ऐसा क्यों होता है कि जो लोग सही जीवन नहीं जी रहे हैं वह लोग नब्बे-नब्बे साल तक पड़े हुए हैं और जिये जा रहे हैं और विवेकानंद जैसे सच्चे ईमानदार जो धार्मिक हैं वह इतनी कम आयु में मौत को उपलब्ध हो जाते हैं? और ऐसा भी देखा जाता है कि धार्मिक आदमी है और बहुत सच्चा जीवन जी रहा है लेकिन बीमारियों से ग्रस्त है और बाकी जितने व्यर्थ लोग हैं वो स्वस्थ घूम रहे हैं।

आचार्य: देखो, फ़िज़िकल हेल्थ (शारीरिक सेहत) की, शारीरिक स्वास्थ्य की तुम्हारी जो परिभाषा है वह डॉक्टरों वाली है। वह परिभाषा यह कहती है कि अगर तुम दौड़ने-भागने के लिए ठीक हो तो तुम हेल्दी (स्वस्थ) हो, अगर तुम खाने-पीने के लिए ठीक हो तो तुम हेल्दी हो, अगर तुम संतान उत्पन्न करने के लिए ठीक हो तो तुम हेल्दी हो। तो तुम इस आधार पर देखते हो कि किसका शरीर ठीक है किसका शरीर ठीक नहीं है। तुम कहते हो जो बढ़िया खुराक ले सकता हो वह हेल्दी है, स्वस्थ है। तुम कहते हो जो यहाँ से उठकर वहाँ तक दौड़ लगा दे वह स्वस्थ है, शारीरिक तौर पर।

जो सही परिभाषा है शारीरिक स्वास्थ्य की वह बिलकुल दूसरी है। जिसका शरीर मुक्ति के लिए काम आ पा रहा है, जिसका शरीर ऐसा है कि मुक्ति के लिए काम आ पा रहा है सिर्फ़ वह स्वस्थ है। भाई, शरीर कुछ भोग पाए इसलिए थोड़े ही बना है शरीर। द बॉडी इज़ जस्ट एन इन्स्ट्रुमेंट ओपटिमाइज्ड टू अटेन लिबेरेशन (शरीर मुक्ति के लिए एक उपकरण है)। हमको इन्स्ट्रुमेंट (उपकरण) की वैलिडिटि (वैधता) या हेल्थ इसी आधार पर नापनी होगी कि वह किस सीमा तक लिबेरेशन डिलीवर कर रहा है। नहीं समझे?

भाई, चम्मच एक उपकरण है, इसको बनाया गया है ताकि यह भोजन प्लेट से मेरे मुँह तक ला सके। शरीर भी ऐसे ही है, वह एक प्रयोजन के लिए बनाया गया है। अब तुम कहते हो कि यह बॉलीवुड के लोग हैं यह शरीर फुलाए बैठे हैं, यह इतने फिट हैं, चेहरे चमक रहे हैं जबकि ये एक नंबर के नालायक हैं, ड्रग्स ले रहे हैं सबकुछ है तब भी शरीर इतना बढ़िया है।

तुम उनके शरीर को इतना बढ़िया बोल ही इसीलिए रहे हो क्योंकि तुम कंजम्प्शन (भोग) के माइंड-सेट (मानसिकता) से आ रहे हो। उनका शरीर किस लिए बढ़िया है? उनका शरीर किस उद्देश्य के लिए बढ़िया है? उनका शरीर दूसरों को लुभाने के लिए बढ़िया है। तो तुम कह रहे हो बढ़िया है। क्या यह परिभाषा होती है बढ़िया होने की? शरीर के बढ़िया होने की क्या यह परिभाषा होती है कि वह शरीर बढ़िया है जिसके माध्यम से तुम दूसरों को लुभा सकते हो, या जिसका इस्तेमाल करके तुम बहुत सारा खाना खा सकते हो, या सेक्स कर सकते हो, क्या यह शरीर के बढ़िया होने की निशानी है? शरीर बढ़िया है या नहीं यह चीज़ किसी पैथोलोजी के रिज़ल्ट से नहीं पता चलेगी।

उस शरीर के माध्यम से जो व्यक्ति है, जो उस शरीर का मालिक है, उस शरीर के माध्यम से वह हाईएस्ट पीक , पिनेकल , उच्चतम शिखर पा पा रहा है या नहीं, यह शरीर के स्वस्थ होने या ना होने की निशानी है। तो विवेकानंद अगर अपने शरीर के माध्यम से अड़तीस की उम्र में बहुत ऊँचाईयों को पा गए तो उनका शरीर बहुत स्वस्थ था, अति-स्वस्थ था। किसने कह दिया शरीर का सौ-साल चलना ज़रूरी है? शरीर सौ-साल चल रहा है और बड़ा स्वस्थ है और खोपड़ा बिलकुल बंद है, बत्ती बिलकुल गुल है तो तुम इस शरीर को स्वस्थ क्यों बोल रहे हो?

सिर्फ़ इसलिए कि ऐसा शरीर दौड़-भाग कर सकता है और उसमें माँसपेशियाँ खूब हैं, वज़न बढ़िया है, तो यह शरीर स्वस्थ थोड़े ही कहला गया। यह तो स्वास्थ्य की परिभाषा ही हमारी ग़लत है। चूँकि हमारी स्वास्थ्य की परिभाषा ग़लत है इसीलिए हमें समझ में ही नहीं आता कि शरीर का वास्तविक औचित्य क्या है, शरीर क्यों है। वह शरीर स्वस्थ है जिस शरीर से मुक्ति का परिणाम मिल रहा हो, भले ही मेडिकल साइन्स कहती रहे कि यह शरीर बीमार है। और कई बार अगर तुम मुक्ति की तरफ बढ़ रहे हो तो उसका अनिवार्य नतीजा यही होता है कि शरीर बीमार पड़ जाता है। कई बार यह ज़रूरी होता है। कई बार अगर तुम आज़ादी की तरफ बढ़ रहे हो तो उसका अनिवार्य नतीजा यह होता है कि तुम्हारे शरीर को सूली पर टाँग दिया जाता है। कोई बात नहीं।

भाई, शरीर किस लिए था? मुक्ति के लिए था। मुक्ति अगर मिल रही है तो शरीर की परवाह कौन करे। शरीर का तो कुल उद्देश्य मुक्ति था, मुक्ति ही मिल रही है तो शरीर की परवाह कौन करे। और शरीर को बचाने का बहुत फायदा क्या अगर बचाने के कारण, बचाने की प्रक्रिया में ही जीवन मुक्ति से और आनंद से दूर हुए जा रहा है, तो काहे को बचाए फिर शरीर को?

प्र: मॉडर्न मैडिसिन वाले पैमाने नहीं लगा सकते आप इसके साथ?

आचार्य: नहीं, बिलकुल भी नहीं। क्योंकि देखो, जब मॉडर्न मैडिसिन को तुम लेते हो तो उसके लिए द हेल्थ ऑफ द बॉडी इज़ इट्सेल्फ एन अब्सोल्यूट (शरीर का स्वास्थ्य ही अपने-आप में पूरा होता है)। वह यह नहीं कह रहे कि, "तुम अपने शरीर के साथ करोगे क्या?"

डॉक्टर यह नहीं पूछेगा कि, "अगर मैंने तुम्हारा शरीर बढ़िया कर दिया तो तुम इससे पाप करोगे या पुण्य?" डॉक्टर को लगता है कि शरीर का स्वास्थ्य अपने-आपमें एक अंत है, एक एंड है, एक गोल (लक्ष्य) है। जबकि शरीर का स्वास्थ्य अपने-आपमें गोल नहीं होता, शरीर का गोल लिबेरेशन (मुक्ति) है, स्वास्थ्य थोड़े ही कोई गोल है।

प्र: एक ऐसा शरीर जिसमें मुक्ति की संभावना हो वही स्वस्थ शरीर है।

आचार्य: बिलकुल! अब अष्टावक्र आठ जगह से टेढ़े थे, तो मेडिकल साइन्स की नज़र में तो बीमार हो गए वो, लेकिन वो सुपर हेल्दी (अति-स्वस्थ) हैं। प्रमाण क्या है इस बात का? उनके माध्यम से अष्टावक्र गीता आई। जिस शरीर से, जिस घट से अष्टावक्र गीता जैसी कोई चीज़ उत्पन्न हो रही है वह अस्वस्थ कैसे हो सकता है? दूसरी ओर कोई हो सकता है बिलकुल गामा पहलवान और ज़िन्दगी भर उसने कुछ नहीं किया है बस बकरा चबाया है तो यह बहुत ही अस्वस्थ शरीर रखे हुए है भले ही दूर से ऐसा लग रहा है कि इसका शरीर स्वस्थ है।

प्र: वह अहम-वृत्ति का त्रुटिपूर्ण उपकरण है, हमारे पैमानों पर फिर भी एक बार को बहुत सही लग रहा है।

क्या यह भी कहा जा सकता है कि जो पुनर्जन्म का तर्क देते हैं वह कहते हैं कि फिर इतने गुणो में विविधता क्यों है हर व्यक्ति में और ऐसा क्यों होता है कि कुछ लोग अमीर घर में पैदा होते हैं कोई गरीब घर में?

आचार्य: मिट्टी अलग-अलग है दिए की भाई, बाती अलग-अलग है। तेल अलग-अलग है। देखो कोई अमीर घर में पैदा हुआ, कोई गरीब घर में पैदा हुआ यह तुम्हारे लिए बहुत बड़ी बात है, प्रकृति के लिए नहीं बड़ी बात है।

प्र: कुछ लोग विकलांग पैदा होते हैं।

आचार्य: वह भी प्रकृति के लिए बड़ी बात नहीं है। वह तो तुम्हारा अहं है जो कुछ चीज़ों को बढ़िया मानता है, कुछ परिस्थितियों को बढ़िया मानता है तो उनको पाने पर बहुत उछलना शुरू कर देता है। वह नहीं मानता बढ़िया तो कहता है — अरे, मेरा बड़ा दुर्भाग्य मुझे अच्छी परिस्थितियाँ नहीं मिली जन्म के समय पर। तुम अभी यहाँ छत पर खड़े हो जाओ और यहाँ बहुत सारे बीज छींट दो, कुछ बीज जाकर के गिरेंगे बिलकुल बढ़िया वाली मिट्टी पर, कुछ बीज चले जाएँगे खरगोशों के मुँह में वह बिलकुल उन्हें खत्म ही कर देंगे, कुछ बीज सड़क पर पहुँच जाएँगे, कुछ बीज रेतीली मिट्टी पर गिर जाएँगे। कोई बीज शिकायत करने थोड़े ही आ रहा है कि, "मुझे ऐसा जन्म क्यों मिला?" उनसे अलग-अलग तरीक़े के पौधे जन्मेंगे और बहुत संभव है कि रेतीली मिट्टी पर भी जो पौधा जन्मे वह बहुत सुंदर फूल दे।

उदाहरण के लिए आप रोते हो कि, "हाय! मैं गरीब घर में क्यों पैदा हुआ और ज़रूर मेरा कर्मफल है कि मैं गरीब घर में पैदा हुआ और ज़रूर किसी फलाने ने पिछले जन्म में अच्छे कर्म किए थे कि वह अमीर घर में पैदा हुआ।" तुमको कैसे पता कि गरीब घर में पैदा होना तुम्हारे लिए कोई ग़लत बात है? बुद्ध बहुत अमीर घर में पैदा हुए थे उन्हें वह घर छोड़कर भागना पड़ा। कबीर साहब को ले लो, रैदास साहब को ले लो ये तो बहुत गरीब घर में पैदा हुए थे, और तब भी ये ज़बरदस्त रूप से चमके।

तो यह तो चूँकि तुम धन के पीछे बावले रहते हो, इसीलिए तुम्हें यह बात बड़े अन्याय की लगती है कि, "अरे फलाना बच्चा गरीब क्यों पैदा हुआ? फलाना बच्चा अमीर क्यों पैदा हुआ?" प्रकृति की नज़र में क्या अमीरी क्या गरीबी। वह तो ऐसे कह लो कि सबको अलग-अलग परिस्थितियों में पैदा कर रही है कि क्या पता कौन जो किस परिस्थिति में पैदा हुआ है वह आगे निकल जाए, खिल जाए। प्रयोग कर रही है, परमुटेशन-कोंबिनेशन आज़मा रही है, अलग-अलग तरीके के प्रयोग कर रही है, चलो अमीर बना दो, चलो गरीब बना दो। उसके लिए ना अमीरी की कोई कीमत है ना गरीबी की कोई कीमत है, उसके लिए बस मुक्ति की कीमत है। बहुत लोग हैं जो मुक्ति इसीलिए नहीं पा पाते क्योंकि वो अमीर घर में पैदा हुए तो अब बताओ अमीर घर में पैदा होना सौभाग्य है या दुर्भाग्य है?

प्र: ऐसा भी कहा जाता है कि जिन्हें एंलाईटेंड होना होता है इस जीवन में उनका जन्म बहुत संभावना होती है कि ब्राह्मण परिवार में और एक वेल टू डू फ़ैमिली (ख़ुशहाल परिवार) में होता है, ताकि उन्हें इन सब मुद्दों में फाइट (लड़ाई) ना करनी पड़े और वो जो रियल इश्यू (असली मुद्दा) हैं उनपर फ़ोकस कर सकें। तो वैल्यू जजमेंट आदमी खुद कर रहा है।

आचार्य: यह तुम्हारा वैल्यू जजमेंट है तुम कहते हो, "अरे! लड़की काली पैदा हुई है, बड़ा अभाग है, बड़ा अभाग है।" यह तो तुम्हारा अपना सोशल बायस है न? यह तुम्हारी अपने सामाजिक घटिया संस्कार हैं कि तुम कहते हो, "अरे देखो फलानी लड़की काली पैदा हुई, फलानी गोरी पैदा हुई", ज़रूर जो गोरी पैदा हुई है उसके पिछले जन्म के अच्छे कर्म हैं। यह कैसी बात है? काला भी एक रंग है, गोरा भी एक रंग है, तुम क्यों ज़बरदस्ती उसमें आक्षेप लगा रहे हो?

प्र: या घर में दो भाई हैं उसमें एक सफल निकल गया एक असफल हो गया।

आचार्य: भाई, वह सक्सेस (सफलता) तुम्हारे पैमानों पर है न? जिस सफलता की तुम बात कर रहे हो वह तुम्हारे अनुसार सफलता है, प्रकृति के अनुसार नहीं सफलता है, प्रकृति के अनुसार एक ही सफलता होती है — मुक्ति, *लिबरेशन*। और उस एक सफलता को पाने के लिए प्रकृति हर तरह के प्रयोग करती है।

प्र: प्रकृति के लिए बस भेद है।

आचार्य: प्रकृति में भेद हैं, अच्छा-बुरा नहीं है, ऊँचाई-नीचाई नहीं है, वरीयता नहीं है। तो प्रकृति में भेद बहुत होते हैं, ऊँचाई-नीचाई प्रकृति में बस एक होती है — चेतना की ऊँचाई, चेतना की नीचाई, वस्तु कोई ऊँची-नींची नहीं है।

प्र: जी। और उस वैविध्य के पीछे भी कह सकते हैं कि कारण यह है कि वह अलग-अलग प्रयोग करना चाहती है।

आचार्य: सबकुछ वह आज़माना चाहती है। वह इतनी उत्सुक है, यह समझ लो इतनी ज़्यादा वह तड़प रही है मुक्ति के लिए कि इस तरह का भी कटोरा बनाएगी, इस तरह का भी बनाएगी, यह चीज़ भी बनाएगी, वह चीज़ भी बनाएगी। इंसानों में हर तरह के गुण रखेगी, किन्हीं भी दो इंसानों को एकसा नहीं बनाएगी। उसकी पूरी कोशिश यही है कि क्या पता कौनसा मेरा प्रयोग सफल हो जाए। क्या पता कौन इस प्रयोग के माध्यम से मुक्ति तक पहुँच जाए।

प्र: क्या यह भी कह सकते हैं कि यह अलग-अलग तरह के अवसर सिर्फ़ बर्थ (जन्म) के टाइम (समय) पर नहीं हैं हर दिन हैं?

आचार्य: बहुत बढ़िया, बहुत अच्छे, बहुत अच्छे। हर संयोग समझ लो तुम्हारे सामने जो आ रहा है, जीवन की हर स्थिति तुम्हारे सामने जो आ रही है वह इसीलिए आ रही है कि तुम उसका इस्तेमाल करके आगे बढ़ सको, ऊँचा बढ़ सको। तो वह प्रकृति सारे संयोग तुमको इसीलिए दे रही है कि उनका तुम सही इस्तेमाल करो। तुमको अगर पैसा दे रही है प्रकृति तो इसलिए दे रही है कि पैसे का सही इस्तेमाल करके वहाँ ऊपर मुक्ति तक, चेतना की ऊँचाई तक पहुँच जाओ। तुमको अगर गरीबी दे रही है प्रकृति तो इसलिए दे रही है कि उस गरीबी से कुछ सीखो और मुक्त हो जाओ। जो भी तुमको आ रहा है अच्छा-बुरा, सुख-दुःख वह इसीलिए आ रहा है कि तुम उसका इस्तेमाल करके मुक्त हो सको।

प्र: मंगलवार को आठ बजे एक सिचुएशन (स्थिति) आई वह एक नया जीवन है। उस जीवन में भी आप मुक्त हो सकते हो जैसे आपने पिछले डिस्कशन (चर्चा) में कहा था और फिर जब आपका अगला पुनर्जन्म होगा वह ठीक होगा।

आचार्य: हर स्थिति पर तुम्हें वह करना होता है जो तुम्हें ऊँचाई की ओर ले जाए। और जब तुम ऊँचाई की ओर जाते हो तो फिर वहाँ से संभावना बनती है और ऊँचा जाने की। तो इसी शरीर के भीतर बहुत सारे तुम्हारे पुनर्जन्म होते रहते हैं। और कर्मफल तुम्हें प्राप्त होता रहता है। कर्मफल तुम्हें ऐसे नहीं प्राप्त होगा कि इस शरीर के बाद तुम्हें एक बढ़िया, सुंदर और अमीर शरीर मिलेगा। कि अगर तुमने अभी अच्छे कर्म किए हैं तो अगले जन्म में तुम एक सुंदर और अमीर घर में पैदा होओगे। कर्मफल ऐसे नहीं मिलता, कर्मफल ऐसे मिलता है कि अभी आज अगर तुमने जीवन में सही निर्णय लिए तो अगले पल तुम्हें और ताक़त मिलेगी और सही निर्णय लेने की, देखो कर्मफल मिल गया। कर्मफल मिल गया, पुरस्कार मिल गया तुमको। अगर मैं सही हूँ तो मैं और सही हो सकता हूँ, अगर मैं सही हूँ तो अगले पल में मुझे और आनंद मिल सकता है, यह नहीं कि मैंने अगले पल के आनंद की कोशिश की थी, मैंने तो बस इस पल में सही होना था, मुझे तो इस पल वह करना था जो मेरी चेतना को ऊँचा ले जाए लेकिन उसका मुझे पुरस्कार क्या मिला? फल क्या मिला? फल यह मिला कि अगले पल में मैं और सही हो सकता हूँ।

तो इसी जन्म के भीतर जो भी तुम्हारे पुनर्जन्म होने हैं वह हो जाएँगे। इसी जन्म के भीतर होंगे। इसी जन्म के भीतर कष्ट है, मृत्यु है, मुक्ति है, सब कुछ है। यह सारी बातें कि मैं मरूँगा और फिर मैं फलानी जगह जन्म लूँगा और फिर मुझे मुक्ति मिलेगी यह व्यर्थ हैं।

प्र: आपसे आज जो मौत की परिभाषा सुनी, जिस नज़रिए से उसको समझा है उससे मुझे भी और मुझे लगता है सभी श्रोताओं को एक वृहद भाव उठा होगा, क्योंकि ऐसा लग रहा है कि आप अकेले नहीं हैं, पूरी प्रकृति जो है आपके माध्यम से कुछ करवाना चाह रही है।

आचार्य: आपके भी और सबके माध्यम से। तो इससे तुम यह भी समझ लो कि प्रेम का क्या मतलब होता है। अब यहाँ यह श्रोता खड़ा है, इसके माध्यम से भी प्रकृति क्या प्रयोग कर रही है, क्या कोशिश कर रही है? कि यह भी कहाँ पहुँचे? वहीं मुक्ति की ऊँचाईयों तक। तो अगर प्रेम है इस श्रोता से तो तुम उसकी किस तरह से मदद करोगे? ऐसे नहीं मदद करोगे कि इसको और माँस खिला दो, शराब पिला दो या मज़े दिला दो, प्रेम का मतलब होगा कि मैं उसकी सहायता करूँ उसे वहाँ तक पहुँचाने के लिए जिस तक पहुँचने के लिए उसका जन्म हुआ है। यह प्रेम हो गया।

अगर तुम ये मूलभूत बातें समझते हो तो जीवन से जुड़े जितने सवाल हैं वह अपने-आप एक-एक करके स्पष्ट हो जाएँगे।

प्र: धन्यवाद आचार्य जी, अब इस वीडियो के बाद भी अगर कुतर्क आ रहे हैं तो...

आचार्य: कुतर्क आते रहेंगे, पर कुतर्क इसलिए आ रहे हैं क्योंकि हम डरे हुए हैं। हम डरे हुए हैं। हमने कहीं पर अपनी धारणा बाँध दी है, अपनी मान्यता हमने कहीं बाँध दी है। कह सकते हो कि जिसको आप अपना ज़मीर या अपनी अंतरात्मा बोलते हो वह आप कहीं पर जा करके गिरवी रख आए हो। किसी प्रभावशाली व्यक्ति के सामने आप वह गिरवी रख आए हो और अब आपको बहुत डर लग रहा है कि, "मैं कैसे मान लूँ कि उस व्यक्ति को गुरु मानने में मैंने भूल कर दी थी?" या कि, "इन सब लोगों के जिनके प्रभाव में मैं रहा उन प्रभावों को मैंने स्वीकार बेहोशी में कर लिया था?" यह मानने में आपको तकलीफ़ हो रही है।

तो कुतर्क लोग करते रहेंगे, उसका हम कुछ कर नहीं सकते। याद रखो प्रकृति का बनाया हर दिया सूरज नहीं हो जाता। हमारी भी कोशिश यही है कि कुछ दिये अपनी पूर्ण संभावना को प्राप्त हो जाएँ। जो दिये बस टिमटिमाते रहना चाहते हैं, धीरे-धीरे करके बुझ जाना चाहते हैं हम चाह कर भी उनकी बहुत मदद नहीं कर पाएँगे।

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