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मात्र एक विशेष विधि से पढ़े जाते हैं उपनिषद
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: उपनिषदों की, बल्कि अधिकांश आध्यात्मिक ग्रंथों की भाषा उनके रचनाकारों की ही तरह थोड़ी-सी विशिष्ट है। वो उन्हीं शब्दों का प्रयोग करते हैं जिन शब्दों का प्रयोग हम और आप करते हैं क्योंकि भाषा में, शब्दकोश में शब्द तो वही हैं। लेकिन उन साधारण शब्दों का भी प्रयोग जब किसी तत्वज्ञानी, किसी ऋषि द्वारा किया जाता है, तो उन शब्दों में, अर्थ के दूसरे आयाम उतर आते हैं।

जैसे कि जब कहा जाए कि "परमेश्वर ने हिरण्यगर्भ को देखा" तो हमारी सामान्य भाषा में देखने से आशय होता है आँखों से देखना, इंद्रियों से देखना। साधारण आँखों के अनुभव को हम कहते हैं देखना। आँखों से जो अनुभव हुआ, उसको हमने कह दिया देखा। लेकिन कोई आध्यात्मिक ग्रंथ जब कहे कि देखा तो थोड़ा सावधान होकर पढ़ना होगा। वहाँ पर देखने से आशय होता है समझना, देखी जा रही वस्तु के अतीत (पार) होना, देखी जा रही वस्तु के पीछे होना, एक तरह से साक्षी होना।

जैसे अंग्रेजी भाषा में सीइंग (देखने) के दो अर्थ होते हैं, अन्य भाषाओं में भी होते हैं। जब आप किसी से कहते हैं " ओह आई सी ," तो इसका मतलब ये नहीं होता है कि अभी-अभी आपने आँख खोलकर देख लिया। इसका क्या अर्थ होता है? इसका अर्थ होता है कि आप उस मुद्दे को समझ गये। वैसे ही जब आप किसी को हिंदी में भी समझाते हैं, आप कहते हैं, "देखो कमल, बात ऐसी नहीं है।" कमल आपके सामने खड़ा है; उसे आप कोई बात समझाना चाह रहे हैं। आप कह रहे हैं, "देखो कमल, बात ऐसी नहीं है।" तो स्थिति ऐसी थोड़े ही हैं कि कमल फिलहाल आँखें बंद करके खड़ा है, और आप उससे कह रहे हैं, "कमल, आँखें खोलो।"

उसे आप क्यों कह रहे हैं, "देखो"? "देखो" से क्या आशय है? कि समझो। ये जो बाहर की आँखें हैं, माँस की आँखें, इनसे तो सभी देख रहे होते हैं; ज़रा अंतर्दृष्टि का उपयोग करो। उसको हम कहते हैं 'देखो'। और अंतर्दृष्टि के उपयोग में भी देखने से क्या आशय है? कि तुम जिस विषय की बात करी जा रही है, उसके बारे में कल्पना कर लो? तुम उसके बारे में आसक्त हो इसीलिए कोई कहानी गढ़ लो?

तो आंतरिक तौर पर सीइंग या दर्शन या दृष्टि तभी संभव है जब आप देखी जा रही वस्तु से या विषय से आसक्त न हों, लिप्त न हों। तो देखने में अनासक्ति का भाव निश्चितरूप से समाहित है; अनासक्ति के बिना साफ दृष्टि नहीं हो सकती। अनासक्ति के बिना आपको वो नहीं मिल सकती जिसे कृष्ण कह रहे हैं निर्मल इंद्रिय या स्वच्छ इंद्रिय। अनासक्ति के बिना आँखें चिपकी ही रहेंगी। 'आँखें चिपकी ही रहेंगी' माने क्या? आपकी आँख थोड़े ही उड़कर जाएगी और किसी विषय से चिपक जाएगी। 'आँख चिपकी रहेगी' माने मन चिपका रहेगा।

बात समझ रहे हैं?

तो एक बहुत अलग तरीके से पढ़ना पड़ता है आध्यात्मिक ग्रंथों को, बड़े सम्मान के साथ पढ़ना पड़ता है, लगातार याद रखना होता है किसकी बात हो रही है। जिनकी बात हो रही है वो हमारे जैसे नहीं हैं। तो हम अपने जीवन के सिद्धांत और घटनाएँ और उदाहरण उनके ऊपर न थोपें। हम अपने मापदंडों पर उनको न नापें-तौलें। बहुत ज़रूरी है।

रमेश ने सुरेश को देखा। ये हमारी आम ज़िन्दगी से एक वाक़या है, है ना? रमेश ने सुरेश को देखा। कैसे देखा? और सुरेश को ही क्यों देखा? रमेश ने सुरेश को ही क्यों देखा? क्योंकि सुरेश ने रमेश से सौ रुपये उधार ले रखे हैं, तो इसलिए देखा। नहीं तो देखने को तो वो महेश को और नरेश को भी देख सकता था। महेश को और नरेश को क्यों नहीं देखा? क्योंकि उनसे कोई स्वार्थ नहीं था, कोई प्रयोजन नहीं था, तो उनको नहीं देखा। तो हमारे देखने में हमेशा कौन-सी चीज़ जुड़ी हुई होती है? स्वार्थ। तुम यूँ ही थोड़े ही कभी किसी चीज़ को देखते हो? देखने के लिए तो सौ विकल्प उपलब्ध होते हैं, देखते किसको हो? जिधर स्वार्थ होता है। तो जब आप कह रहे हो, "रमेश ने सुरेश को देखा," तो वो बिल्कुल एक निचले तल की घटना है।

बात समझ में आ रही है?

अब आप जाते हो उपनिषदों के पास, और वहाँ लिखा हुआ है, "परमात्मा ने हिरण्यगर्भ को देखा," और आप सोचते हो कि भाषा तो वही है, तो माने ये भी वैसा ही होगा देखना कि जैसे रमेश ने सुरेश को देखा। यहीं पर बहुत ज़बरदस्त भूल होती आ रही है क्योंकि हमें आजतक गीता को और उपनिषद को पढ़ना ही नहीं आया। कृष्ण और अर्जुन के संवाद को भी हम वैसे ही सोच लेते हैं जैसे रमेश और सुरेश बातचीत कर रहे हो। और 'परमात्मा ने हिरण्यगर्भ को देखा,' ये भी हमें वैसा ही लगता है जैसे सुरेश ने रमेश को देखा।

ये बड़े गहरे अहंकार की बात है न हमारी। हमें लगता है देखना तो वैसा ही होता होगा ना जैसा हमारा होता है; क्योंकि हममें कोई कमी है क्या? तो मैं उदित (सामने बैठे हुए स्वयंसेवी) को देखूँ कि अमित (सामने बैठे हुए स्वयंसेवी) को देखूँ, और कृष्ण अर्जुन को देखें, बात तो एक ही है। क्यों? क्योंकि हम कोई कृष्ण से कमज़ोर हैं?

अहंकार देख पा रहे हो यहाँ पर? तो इसीलिए तुम वो जो शब्द हैं—देखा या सुना या संबोधित किया या संबंधित हुए—इनके शब्द जब किसी उपनिषद में उपयोग हो रहे हों, प्रयुक्त हो रहे हों, चाहे किसी गीता में प्रयुक्त हो रहे हों, चाहे किसी तत्वदर्शी के द्वारा प्रयुक्त हो रहे हों, हम उनके अर्थ बिल्कुल वही रख लेते हैं जो उनके अर्थ होते हैं हमारे रोज़मर्रा के निम्नतलीय परिपेक्ष में।

हम मानते ही नहीं कि एक साधारण स्त्री किसी पुरुष को देखती है या किसी पुरुष की बात करती है, और मीरा कृष्ण की बात करती हैं, तो बात-बात में अंतर है। हम नहीं मानते। हमें लगता है कि बात तो बात है। एक साधारण महिला भी तो किसी पुरुष के लिए गाने गा सकती है? मीरा ने भी कुछ कल्पना करके किसी पुरुष के लिए गाने गा दिये, तो गाना तो गाना है।

हमें समझ में ही नहीं आता कि हम मीरा नहीं हैं। हमें ये समझ में ही नहीं आता कि हमारी हस्ती और कृष्ण की हस्ती में कितनी दूरी है। या ऐसे कह लीजिए कि हम मानना नहीं चाहते; क्योंकि मानेंगे, तो अहंकार को चोट पड़ेगी—चोट ही नहीं पड़ेगी, सुधरने का दायित्व भी आ जाएगा। उसमें बड़ा कष्ट होता है, कीमत भी चुकानी पड़ती है, तो कौन माने?

समझ में आ रही है बात?

तो अब जो बड़ा साधारण मन होगा, औसत मन होगा, उसी को मैं 'अहंकारी मन' कह रहा हूँ क्योंकि अज्ञान ही अहंकार है।

औसत मन का होना माने अज्ञानी होना। अहंकार और क्या होता है?

हम क्या सोचते हैं कि जो ऊँचा हो जाता है उसमें अहंकार होता है? नहीं साहब, अहंकार तो निचाईयों में वास करता है। जो जितना औसत आदमी है, जो जितना साधारण आदमी है, वो उतना ज़्यादा अहंकारी है, तभी तो वो साधारण रह गया। बात आ रही है समझ में?

तो जो साधारण मन होगा वो इस बात की कल्पना कैसे बैठाएगा? कहेगा, "सुरेश ने रमेश को देखा, मैंने गीता और मीता को देखा। मैं जानता हूँ कैसा होता है। मैं वहाँ खड़ा होता हूँ; गीता, मीता, और सुरेश वहाँ खड़े होते हैं, और ऐसे आप चित्र बना सकते हो कि यहाँ खड़ा हुआ है रमेश, और वहाँ खड़ा हुआ है सुरेश, और वो ऐसे देख रहा है।"

उपनिषद कहेंगे कि परमात्मा ने हिरण्यगर्भ को देखा, तो वो तत्काल क्या करेगा? वो तत्काल ऐसे उठाएगा अपना ब्रश या कलम और झट से एक तस्वीर बना देगा जिसमें एक परमात्मा खड़ा हुआ है, एक हिरण्यगर्भ खड़ा हुआ है और परमात्मा हिरण्यगर्भ को देख रहा है। और वो कह देगा, "देखो, हमारी बात बिल्कुल सही है। और इसका प्रमाण उपनिषद हैं—उपनिषद में लिखा हुआ है ना कि परमात्मा ने हिरण्यगर्भ को देखा।" तो वो ऐसे ही बिल्कुल बना देगा।

यही काम तो हम करते आए हैं। चाहे वो पुनर्जन्म की बात हो, चाहे वो जीवात्मा की बात हो, चाहे दिव्यदृष्टि की बात हो, हमने यही तो करा है। बहुत सूक्ष्म बातों के हमने एकदम स्थूल अर्थ निकाले हैं। और जब किसी ने हमें चुनौती दी है, समझाना चाहा है कि "आप स्थूल अर्थ निकाल रहे हैं। स्थूल अर्थ नहीं है, भाई; बात बहुत सूक्ष्म है। शब्द भले ही वही है जो आपकी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का है, लेकिन यहाँ पर उसका अर्थ दूसरा है।" तो हमने कहा, "नहीं, बिल्कुल भी नहीं! हम जानते हैं, हम बिल्कुल जानते हैं।"

यही वजह है कि जिन ग्रंथों को, जिन आध्यात्मिक-धार्मिक ग्रंथों को शांति का, समझ का, बोध का, और मुक्ति का साधन होना चाहिए था, वही बन जाते हैं तमाम तरह के क्लेश, हिंसा, अज्ञान, यहाँ तक कि आतंकवाद के कारण; क्योंकि आपको उनको पढ़ना ही नहीं आता।

ग्रंथ तो अपनी जगह है। ग्रंथ को पढ़ने वाला कौन है? क्या ग्रंथ स्वयं ग्रंथ को पढ़ रहा है, बोलो? ग्रंथ में हो सकता है खोट ना हो, लेकिन उसे पढ़ने वाला कौन है? पढ़ने वाले तो आप हैं ना। आपको कैसे पता आप सही पढ़ रहे हैं? आप कहेंगे, "ग्रंथ में ही तरीका लिखा है कि ग्रंथ को कैसे पढ़ा जाए।" आपको ये भी कैसे पता कि आप उस तरीके को सही पढ़ रहे हैं? ले-देकर जो कुछ भी पढ़ना है आपको पढ़ना है ना। और आप अगर अपनी अहंकार भरी आँखों से ही पढ़ रहे हैं, तो सब गड़बड़ हो जाएगी ना।

दो तरह के दोष होते हैं: एक तो होता है कि ग्रंथ को पढ़ेंगे ही नहीं। एक है कि नहीं पढ़ेंगे ग्रंथ को। ग्रंथ को न पढ़ना एक दोष है और ग्रंथ को गलत पढ़ना दूसरा दोष है। कहना मुश्किल है कि ज़्यादा बड़ा दोष कौन-सा है। पहले दोष में अहंकार कहता है, "ग्रंथ को अलग रखो; मैं तो अपनी मनमर्ज़ी चलाऊँगा।" दूसरे दोष में अहंकार ऊपर-ऊपर से दिखाता है कि थोड़ा विनम्र हो गया है। कह रहा है, "मैं ग्रंथ को पढूँगा," लेकिन वो ग्रंथ को पढ़ता अपने प्रयोजन के लिए ही है। पढ़ता ग्रंथ को है, और उसमें अर्थ अपने ठूँस देता है।

समझ में आ रही है बात?

यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः।

हिरण्यगर्भ पश्यत जायमानं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु॥

जो रूद्र, इंद्र आदि देवताओं को उत्पन्न करने वाला और बढ़ाने वाला है तथा सबका अधिपति और महर्षि है, जिसने सबसे पहले उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भ को देखा था, वह परमदेव परमेश्वर हमें शुद्ध बुद्धि से युक्त करे।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद (अध्याय-४, श्लोक-१२)

"जो रूद्र, इंद्र आदि देवताओं को उत्पन्न करने वाला और बढ़ाने वाला है।" अब 'उत्पन्न करना', 'बढ़ाना', ये हमारी भाषा के शब्द हैं। भाषा तो सदा हमारी ही होगी; सत्य तो मौन है, उसकी कोई भाषा तो होती नहीं। अब 'उत्पन्न करने' से हम क्या आशय लेते हैं हमेशा? पैदा करना। तो जहाँ हम पढ़ेंगे कि परमात्मा ने रूद्र, इंद्र आदि देवताओं को उत्पन्न किया, तहाँ हमें लगेगा कि वैसी ही कोई उत्पत्ति हो रही होगी कि जैसे कि कोई कुम्हार मिट्टी के दिये बना देता है, घड़ा बना देता है, या जैसे किसी फैक्ट्री से कोई सामान उत्पन्न हो जाता है, निर्माण हो जाता है या जैसे माँ-बाप मिलकर किसी शिशु का निर्माण कर देते हैं। तो ऐसे ही किसी तरीके से कुछ उत्पत्ति हो रही होगी, जबकि यहाँ जो उत्पत्ति हो रही है वो बिल्कुल विशेष तरीके से हो रही है।

हम द्वैतात्मक दुनिया में जीते हैं, तो हमारे सारे शब्द भी द्वैतात्मक कहानियाँ ही कहते हैं। द्वैतात्मक कहानियाँ कैसे? फैक्ट्री अलग और फैक्ट्री से जो सामान उत्पन्न हो रहा है वो अलग। कुम्हार अलग और कुंभ अलग, लौहार अलग और लोहा अलग। जबकि यहाँ जिस उत्पत्ति की बात हो रही है, उस उत्पत्ति में द्वैत नहीं है।

परमात्मा ने देवताओं का निर्माण ऐसे नहीं करा है कि जैसे कोई मिट्टी से किसी चीज़ का निर्माण कर देता है। जब भी कभी परमात्मा या आत्मा या सत्य के विषय में बात हो, तो वहाँ निर्माण का अर्थ होता है कि परमात्मा स्वयं ही अपना निर्माण बन गया; क्योंकि उसके पास कुछ और था ही नहीं निर्मित करने के लिए।

लौहार के पास में लोहा होता है, तब तो ना वो उससे चाकू बनाता है या औज़ार या फावड़ा या कुछ और बनाता है। लौहार के पास क्या होना चाहिए? लोहा। परमात्मा के पास क्या है? परमात्मा के पास लोहा है ही नहीं, क्यों नहीं है लोहा? क्योंकि अद्वैत है वहाँ पर। अद्वैत का क्या मतलब होता है? सत्य मात्र, एक ही, तो लोहा कहाँ से आएगा? तो जब लोहा नहीं है और निर्माण करना होगा, तो कैसे होगा निर्माण? उसे खुद ही कुछ और बन जाना पड़ेगा। ये है उत्पत्ति का मतलब।

लेकिन इसी बात को जब किस्से-कहानियों में दर्शाया जाएगा, यही बातें जब लोक-संस्कृति में आ जाएँगी तो कैसी बन जाएँगी? कोई टीवी सीरियल आ रहा होगा, उसमें आपको कैसे दिखाया जाएगा? कि एक परमात्मा महाराज हैं, बुढ़ऊ, सफेद दाढ़ी वगैरह करके, वो बैठे हुएँ हैं किसी सिंहासन पर, और वो ऐसे हाथ घुमा-घुमा कर देवता पैदा किए जा रहे हैं। और आप देखेंगे और कहेंगे, "जय हो! जय हो! धन्य हो! धन्य!"

आपको लगेगा ऐसे ही तो निर्माण होता है जैसे हलवाई लड्डू का निर्माण करता है। ऐसे नहीं है; यहाँ बात दूसरी है, यहाँ बात सूक्ष्म है। इन शब्दों को ज़रा अलग तरीके से पढ़ना है।

समझ में आ रही है बात?

आ रही है क्या? (एक श्रोता की ओर इशारा करते हुए) तो फिर सिर हिलाओ ना, बांगड़ू की तरह क्या देख रहे हो ऐसे? (हँसते हुए) तुम भी अद्वैत ही हो बिल्कुल। ठीक है? आगे बढ़ो।

"और जो सबका अधिपति और महर्षि (महर्षि माने? जानने वाला, ज्ञानी) है, जिसने सबसे पहले उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भ को देखा था, वह परमदेव परमेश्वर हमें शुद्ध बुद्धि से युक्त करे।"

"और जो सबका अधिपति है।" सब पर राज करने वाला है, स्वामी है सबका, और जो सर्वज्ञ है। फिर शब्द-शब्द का फेर है, समझना पड़ेगा। अपनी सामान्य भाषा में जब हम बोलते हैं सर्वज्ञ, तो आशय क्या होता है? जब आप किसी को बोलते हैं, "ये तो सर्वज्ञ है।" 'ज्ञ' माने जानने वाला; 'सर्वज्ञ' माने सब जानने वाला; अल्पज्ञ माने कम जानने वाला; विज्ञ माने ख़ूब जानने वाला, ठीक है?

तो जब हम अपनी सामान्य भाषा में बोलते हैं कि कोई खूब जानकार है, तो उसका क्या मतलब होता है? वो ये भी जानता है, ये भी जानता है, ये भी जानता है, ये भी जानता है। तो ये कहानी कहाँ से आ रही है? ये हमारे द्वैतात्मक मॉडल (नमूने) से आ रही है; कि कोई जानकार है माने वो ये भी जानेगा, ये भी जानेगा…

तो पृथ्वी पर जो बड़े-से-बड़ा ज्ञानी होता है, चलो वो मान लो दस हज़ार चीज़ों के बारे में जानता है—इतना भी बड़ा मुश्किल है पर मान लो, ठीक है? तो उसी बात को आगे बढ़ाकर हम क्या कर देते हैं? हम कहते हैं, "परमात्मा सर्वज्ञ है, तो वो दस करोड़ चीज़ों के बारे में जानता होगा।" और फिर वही बात प्रतिबिम्बित होती है हमारी प्रार्थनाओं में जब हम कहते हैं, "हे ईश्वर! तुम तो सब जानते हो ना।" हमें लगता है वो वैसा ही है जैसे पड़ोसी गुप्ता जी हैं। वो मोहल्ले के हर घर का हाल-चाल रखते हैं।

तो वो तो अधिक-से-अधिक क्या हैं? विज्ञ। विज्ञ माने? खूब जानने वाला, ज्ञानी, ठीक है? तो विज्ञ हैं तो पूरे मोहल्ले की खबर रखते हैं। किसके यहाँ चना सड़ गया; किसके कुत्ते को कब्ज़ हो गया; किसका बछड़ा किसकी बछिया के साथ भाग गया। ये सब गुप्ता जी को पता होता है। तो हम सोचते हैं कि जो परमात्मा है, चूँकि वो सर्वज्ञ है, इसीलिए वो गुप्ता जी का ही कोई बहुत विस्तृत रूप होगा, जैसे कहा अभी, सुपरलेटिव (उत्तमावस्था)। समझ में आ रही है बात?

तो हमें लगता है जैसे गुप्ता जी को सब घरों का हाल पता है, परमात्मा को पूरे ब्रह्मांड में सबके घरों का हाल पता होगा कि क्या चल रहा है, क्या नहीं चल रहा है। और ये मूर्खतापूर्ण धारणा लेकर हम चलते ही जा रहे हैं, चलते ही जा रहे हैं। इसके मूल में क्या है समझ रहे हो? अहंकार आयामगत परिवर्तन को स्वीकार नहीं करना चाहता। ये है मूल बात।

अहंकार क्या बोल रहा है? समझो, अहंकार बोल रहा है, "मैं हूँ, गुप्ता जी। और मुझे कितने घरों के बारे में पता है?" मान लो पच्चीस घरों के बारे में पता है। "और परमात्मा को पच्चीस हज़ार या पच्चीस करोड़ के बारे में पता है, तो यही जो पच्चीस का मेरा अपना आँकड़ा है ज्ञान का, इसको ही अगर मैं बढ़ाता चला जाऊँ, बढ़ाता चला जाऊँ; मैं जैसा हूँ—मैं अभी कैसा हूँ? मैं हर घर में ताँक-झाँक करने वाला हूँ—मैं इसी को और बढ़ा दूँ, तो बढ़ाते-बढ़ाते-बढ़ाते एक दिन मैं परमात्मा बन जाऊँगा।" ये अहंकार का दृष्टिकोण है। ऐसी ही हमने अभिकल्पना कर रखी है परमात्मा की। अहंकार ये तो मानता है कि परमात्मा बड़ा है, पर ये नहीं मानता कि परमात्मा आयामगत रूप से अलग है। वो मानता है कि मैं जैसा हूँ, इसी को अगर बहुत बढ़ा दिया जाए, इसी का संवर्धन कर दिया जाए, तो परमात्मा जैसी कोई चीज़ पैदा हो जाएगी।

बहुत सारे तो घूम भी रहे हैं, पूरा एक संस्थान है, पूरा एक अभियान है जो कहता है, "परमात्मा सागर जैसा है; हम बूँद जैसे हैं।" ये ज़बरदस्त अहंकार की बात है। वो कह रहे हैं, "देखो आकार का अंतर है, गुण का कोई अंतर नहीं है। हम सब छोटी-छोटी, नन्हीं-नन्हीं जीवात्माएँ हैं जिन्हें जाकर परमात्मा में मिल जाना है, जैसे बहुत सारी बूँदें जाकर सागर में मिल जाती हैं; तो है तो देखो सागर और बूँद एक ही, लेकिन सागर ज़्यादा बड़ा है ना? तो वैसे ही जीवात्मा और परमात्मा एक ही हैं, बस परमात्मा ज़्यादा बड़ा है।"

जैसे गुप्ता जी और परमात्मा एक ही हैं। बस गुप्ता जी को पच्चीस घरों में ताँक-झाँक करनी है, और परमात्मा ज़बरदस्त रूप से वॉयरिज़्म (दर्शनरति) का एडिक्ट (आदी) है, तो उसे ब्रह्मांड में, हर घर में, हर घर में ही नहीं, हर रसोई में, हर शयनकक्ष में, हर शौचालय में ताँक-झाँक करनी है। गुप्ता जी का रोल मॉडल है 'परमात्मा'। कह रहे हैं, "इतना कर ले जाता है! हमें तो पच्चीस घरों का ही पूरा नहीं पता चलता; कुछ-न-कुछ ऐसा रह जाता है जो पकड़ में नहीं आया हमारी।

तो अहंकार ऐसे चलता है, और हमेशा से अहंकार ऐसे ही चला है। हमारी जो पूरी अभिकल्पना रही है परमसत्ता की, वो ऐसी ही रही है। हमने परमात्मा को अपना ही कोई फुलाया हुआ, फैलाया हुआ संस्करण माना है। " गॉड इज़ एन इन्फ्लेटेड वर्ज़न ऑफ मैन (भगवान मनुष्य का एक फैला हुआ संस्करण है)।" तो हमने ईश्वर को अपने से ऊपर बस एक तरीके से माना है, क्या? हमसे बड़ा है, पर साहब, हमसे अलग नहीं है। हो तो तुम भी हमारे ही जैसे, बस फूल ज़्यादा गए हो।

तो इसीलिए फिर हमने अपने देवी-देवताओं के बारे में जो कहानियाँ रचीं, वो सब कहानियाँ हमारे ही जैसी थी। हम ब्याह करते हैं, तो हमने देवताओं का और देवियों का भी ब्याह करा दिया; क्योंकि बात तो वही है। गुप्ता जी जब परमात्मा की कल्पना करेंगे, तो वो यही तो कह रहे हैं, "भाई, मैं पच्चीस के बारे में जानता हूँ, तू पच्चीस लाख के बारे में जानता है।" तो अधिक-से-अधिक ये कह देंगे कि "मेरी एक बीवी है, तेरी एक हज़ार बीवियाँ होंगी। मेरे पास एक करोड़ रुपये हैं, तेरे पास हज़ार करोड़ रुपये होंगे।"

अब समझ पा रहे हो कि गीताओं का, उपनिषदों का, दुनिया के सब धर्म ग्रंथों का विकृत अर्थ क्यों करते हैं हम? क्योंकि वो विकृति करने में हमारा स्वार्थ है।

हम ये मानते रहना चाहते हैं कि हम ठीक-ठाक ही हैं। परमात्मा होने का अर्थ बस ये होता है कि हम जैसे हैं उसको दस हज़ार से गुणा कर दिया जाए। हमें बदलना नहीं है; हम बस जिस राह जा रहे हैं उस पर और आगे जाना है। परमात्मा बस इसी राह पर है, पर हमसे बस ज़रा आगे है। हम उसे अपने से ऊपर नहीं मानते हैं, हम उसे अपने से आगे मानते हैं। ऊपर जाने का तो मतलब ये होता था कि तुम इस राह पर चलना छोड़ो; तुम्हें उठना पड़ेगा। हम अपनी राह नहीं छोड़ना चाहते; हम जैसे हैं हम वैसे ही रहना चाहते हैं।

और उस पर भी धौंसबाज़ी हमारी ये कि हम ऊपर नहीं उठेंगे, बल्कि ऊपर जो परमात्मा है उसको अपने जैसा प्रदर्शित कर देंगे। तो हम दिखा देंगे कि दो देवताओं में ईर्ष्या के मारे लड़ाई हो गई आपस में। यहाँ तक दिखा देंगे कि एक बार ब्रह्मा और विष्णु में आपस में बहस हो गई, लड़ाई हो गई। वो दोनों श्रेष्ठता के लिए होड़ कर रहे थे। क्यों ऐसा दिखा देंगे? क्योंकि हमारे मन में ईर्ष्या रहती है, क्योंकि हम श्रेष्ठता पर मरते हैं। तो हम ये भी दिखा देंगे कि ब्रह्मा और विष्णु में श्रेष्ठता के लिये लड़ाई हो गई। समझ में आ रही है बात?

जितनी हमारी घरेलू माथापच्चियाँ हैं, वो सब हमने देवताओं के सर भी मढ़ दी हैं। देखा है तुमने? देख लो तुम कोई पौराणिक धारावाहिक या पढ़ लो कोई पौराणिक कहानी। उसमें बस पात्रों के नाम बदल दिये जाएँ, तो तुम कहोगे ये तो घर-घर की कहानी है, ये तो मेरी कहानी है, मैं यही तो हूँ।

ये अहंकार है।

और यही अंतर है उपनिषदों और पुराणों में। पुराण, परमसत्ता को भी तुम्हारे जैसा बना देते हैं, और उपनिषद कोशिश करते हैं तुम्हें परमसत्ता जैसा बना देने की। मैं कोई पुराणों का विरोधी नहीं हूँ, लेकिन मैंने हमेशा कहा है कि अगर आपने उपनिषद नहीं पढ़े हैं, तो पुराण आपके लिए उपयोगी तो नहीं होंगे, खतरनाक भी हो सकते हैं। पुराणों की उपयोगिता सिर्फ तब है जब पहले आपने वेदांत का अध्ययन किया हो, नहीं तो पुराण आपको भारी पड़ सकते हैं। उनमें बहुत कहानियाँ हैं, और उन कहानियों का आप अर्थ अनर्थ कर लेंगे।

बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु॥

वो हमें शुभ बुद्धि से संयुक्त करे।

~ श्वेताश्वतरोपनिषद (अध्याय-३,श्लोक-४)

अब शुभ बुद्धि माने क्या? उत्तर भारत में परंपरा है। घर के बाहर लिख दिया जाता है "शुभ-लाभ।" तो हमारे लिए तो शुभ और लाभ साथ-साथ चलते हैं। हमारे लिए तो लाभ ही शुभ है, और शुभ ही लाभ है। "शुभ-लाभ!" लाभ का बहुत बड़ा संबंध लोभ से है। तो हमारे लिए शुभ का भी संबंध… आपका नुकसान हो जाए, और कोई आपसे आकर कहे, "अरे! बड़ा शुभ हुआ," तो संबंध कुछ विशेष दूर तक चलेंगे नहीं, कि चलेंगे?

हमारे लिए शुभ क्या है? वो जिसमें हमें लाभ होता हो, हमें कोई प्राप्ति होती हो, अहंकार और चौड़ा हो जाता हो।

तो अब जब यहाँ पर कहा जा रहा है कि "वह परमदेव हमें शुभ बुद्धि प्रदान करे।" तो हम शुभ बुद्धि का अर्थ वैसा ही कर लेंगे कि शुभ बुद्धि वो जिससे हमारी कामनाएँ पूरी होती हों, जिससे घर में एक गाड़ी और आती हो, दो-चार गहने और आते हों, सरकारी नौकरी लग जाती हो लड़के की। यही तो शुभ बात होती है, और क्या होता है शुभ? जबकि उपनिषदों की भाषा में शुभ का अर्थ होता है मुक्ति। जो चीज़ तुम्हें मुक्त करती जाए, करवाती चले वो शुभ है। उपनिषद कह रहे हैं शुभता माने मुक्ति; तुम कह रहे हो शुभता माने प्राप्ति। और अब जब शुभ शब्द का इस्तेमाल करेंगे उपनिषद, तो बताओ बिल्कुल उल्टा अर्थ कर लिया इस श्लोक, इस ऋचा का कि नहीं करा? सब उल्टा हो गया न?

तो सवाल ये नहीं है कि उपनिषदों की बात कितनी सही है या आज कितनी प्रासंगिक हैं? सवाल ये है कि तुम्हारे पास आँखें हैं इसको पढ़ने की? सवाल ये है कि किस नियत से आ रहे हो इनके पास?

और इसीलिए मुझे विवश होकर फिर दोहराना पड़ रहा है कि उपनिषदों ने स्वयं ही घोषित किया, भारतीय परंपरा में बहुत से ग्रंथों ने स्वयं ही घोषित किया कि "हमारे पास वही आएँ, जो वास्तव में मुक्ति के अभिलाषी हों; बाकी लोग हमारे पास आएँगे, तो अपना समय भी खराब करेंगे, और हमारे विकृत अर्थ भी करेंगे, अपना नुकसान भी करेंगे।"

नियत साफ होनी चाहिए ना। भाई, नियत मनोरंजन की है, और तुमने उपनिषद उठा लिये, कुछ मिलेगा नहीं। इतना ही नहीं होगा; तुम उपनिषदों को लेकर दुष्प्रचार और करोगे। जो भी तुम्हारी नियत थी, तुम उसी नियत को जायज़ ठहराने के लिए उपनिषदों के श्लोक उद्धृत करना शुरू कर दोगे। हो गया ना दुरुपयोग?

तो उपनिषदों का सही अर्थ समझने के लिए क्या पात्रता चाहिए? मुक्ति की अभिलाषा।

बड़ी तीव्र मुमुक्षा होनी चाहिए। नहीं तो फिर तो तुम जो पढ़ना चाहते हो, वही तुमको यहाँ मिल जाएगा। जैसे कहते हैं ना पार्थसारथी, "बेटा, तुम मुझे जैसे देखना चाहोगे, वैसे देख सकते हो।" उससे अर्थ बस एक है: कृष्ण माने? जो सर्वोच्च है, सर्वोत्तम है। वो कह रहे हैं, "ये तुम्हारे हाथ में है कि तुम दुनिया में किस चीज़ को ऊँचे-से-ऊँचा मानते हो।" जो भी तुमने ऊँचे-से-ऊँचा माना, वही तुम्हारा कृष्ण हो गया। तुम चाहो तो पैसे को ही मान लो कि सबसे ऊँची चीज़ है, तो अब तुम कृष्ण को किसमें देख रहे हो? पैसे में। तुम ये कर सकते हो। कृष्ण कह रहे हैं कि तुम्हारे हाथ में है।

पर तुम कृष्ण को अगर ऐसी किसी निचली चीज़ पर जोड़ दोगे, तो कृष्ण मुस्कुरा कर कहते हैं कि "बेटा, फिर मैं भी तुम्हारी ज़िन्दगी को बिल्कुल निचली जगह पर छोड़ दूँगा। जितनी ऊँचाई तुम मुझे दोगे, उतनी ऊँचाई मैं तुम्हें दूँगा।"

चौथा अध्याय, श्रीमद्भगवतगीता, ग्यारहवां श्लोक।

* "तुम मुझे जितनी ऊँचाई दोगे, मैं ठीक उतनी ऊँचाई तुम्हें दे दूँगा; क्योंकि जो ऊँचाई तुम मुझे दे रहे हो, वास्तव में वो ऊँचाई तुम अपने आपको दे रहे हो।" *

तो ये हमारे हाथ में है। तुम जैसे चाहो उपनिषदों को वैसे देख सकते हो, लेकिन तुम जितने निचले तरीके से देखोगे उपनिषदों को, तुम्हें उनसे उतने ही निचले तल का लाभ होगा, बल्कि यह भी हो सकता है कि तुम्हें नुकसान ही हो जाए।

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