वक्ता: अंकित कह रहे हैं कि अगर मैं कहूँ ‘भूख लगी है’ या ‘दर्द हो रहा है’, तो क्या उसमें भी अहंकार है?
बात बड़ी सूक्ष्म है, ध्यान दोगे तो ही समझ में आएगी ।
जब तुम ये कहते हो, ‘मैं भूखा हूँ’ और तुम ये नहीं कहते कि ‘पेट भूखा है’ तो तुमने अपनी पहचान पेट के साथ बांध दी, अब तुम वही बोलोगे क्योंकि अंततः भूख तुम्हें नहीं पेट को लगी है । तुमने अपनी पहचान पेट के साथ बांध दी है, और एक बार तुमने अपनी पहचान शरीर के साथ बांध दी तो तुम्हें वही करना पड़ेगा जो शरीर तुमसे कहेगा, और तुम्हें वही वहम रहेगा कि ये तो मैं कर रहा हूँ । तुम भूल ही जाओगे कि ये तुमसे शरीर कह रहा है ।
तुमको पता है कि भूख का अर्थ क्या है? भूख का अर्थ है कि पेट इंधन की मांग कर रहा है । इस कारण कुछ रसायन(केमिकल्स) रिलीज़ हुए हैं और उन्होंने संदेश दिया है मस्तिष्क को । ये पुरे तरीके से एक मेकनिकल प्रक्रिया है जो एक मशीन के भीतर चल रही है । ऐसे समझ लो कि एक कार होती है, जब उसमें ईंधन कम होने लगता है तो उसमें एक बत्ती जल जाती है, उसी बत्ती के जलने का नाम है भूख । कि अब ईंधन कम हो गया है। ये पूरे तरीके से एक मेकनिकल प्रक्रिया है लेकिन तुमने इसे अपनी पहचान बना लिया है । तुमने अपने आप को इससे जोड़ लिया, तुमने ये नही कहा कि पेट में ईंधन की कमी है। नतीजा क्या हुआ ? नतीजा ये हुआ कि तुम शरीर के साथ अपने आप को पूरे तरीके से एक ही मानोगे । और क्या होगा? शरीर जो भी करेगा तुम्हें लगेगा कि तुम ही कर रहे हो । जिस तरह शरीर में कुछ केमिकल्स होते हैं जिनसे तुम्हें भूख लगती है, उसी तरह शरीर में कुछ और केमिकल्स होते हैं जिन्हें कहते हैं हॉर्मोन्स । एक उम्र आती है जब ये हॉर्मोन्स एक्टिव हो जाते हैं और तुम ये नहीं कहोगे कि अरे! ये तो कोई केमिकल प्रोसेस चल रहा है । तुम कहोगे कि मुझे प्रेम हो गया है । हुआ कुछ नही हैं, हुआ बस इतना ही है कि जैसे लोहा चुम्बक से आकर्षित होता है, जिसको विज्ञान अच्छे तरीके से समझा सकता है, उसी तरीके से तुम्हारे शरीर में भी पूर्णतया शारीरिक काम चल रहा है । कुछ रसायन(केमिकल्स) स्रावित(सिक्रीट) होते हैं जिनकी वजह से तुम विपरीत लिंग से आकर्षित होते हो, अगर लड़का है तो लड़की से और अगर लड़की है तो लड़के से ।




