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मैं के आश्रय और अपूर्णता || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते । एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहीनम् ।।४०।।

इंद्रियाँ, मन और बुद्धि इस काम के आश्रय स्थल कहे जाते हैं। इनके द्वारा विचार बुद्धि को आवृत करके यह काम जीव को मोह लेता है।

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ३, श्लोक ४०

आचार्य प्रशांत: ‘इंद्रियाँ, मन और बुद्धि, इस काम के आश्रय स्थल कहे जाते हैं। इनके द्वारा विचार बुद्धि को आवृत करके’, मतलब ज्ञान को आवृत करके, छुपाकर, ‘यह काम, जीव को मोह लेता है।‘

काम की बात हो रही है। पिछले कुछ श्लोकों में काम की ही चर्चा थी, वही बात आगे बढ़ी है। अर्जुन ने प्रश्न किया था कि ‘कौन शत्रु है जीव का? कौन है जो जीव को मोहे लेता है और उससे तमाम तरह के पाप कराता है?’ तो उस पर कृष्ण का उत्तर था कि यह काम ही है, यही क्रोध बनता है, यही ज्ञान को ढके रहता है, जैसे धुआँ आग को ढके रहता है, गर्भ शिशु को ढके रहता है। यह काम ही है जो जीव का प्रथम शत्रु है।

तो उसी काम के विषय में कृष्ण आगे कह रहे हैं; क्या कहा? कि इंद्रियाँ, मन, बुद्धि, इन जगहों पर काम आश्रय पाता है, और इसके द्वारा ज्ञान आच्छादित हो जाता है, और जीव मोहित हो जाता है। अब थोड़ा समझेंगे।

काम क्या है? कामना माने क्या? अहम् का ही दूसरा नाम काम है। 'मैं' भाव ही काम है। काम माने माँगना, इच्छा करना। स्वयं का होना ही कामना का पहला परिणाम होता है। अस्तित्व, 'मैं' भाव, ये होते ही तभी हैं जब कामना हो। कामना माने अपूर्णता। आप विचार करिएगा, जिन क्षणों में आप बहुत तृप्त होते हैं, उन क्षणों में आपका होना मिट जाता है, आप होंगे नहीं। और आपकी बड़ी परेशानियों की घड़ियाँ वो होती हैं जिनमें आप अपने होने को बहुत प्रबल रूप से अनुभव कर रहे होते हैं, विवश हो गए होते हैं अनुभव करने के लिए। इसको बहुत गहराई से अपने भीतर उतरने दीजिए।

अहम् माने काम। 'मैं' कोई तथ्य नहीं है; ‘मैं’ बस एक अपूर्णता है। और मैंने कहा, तथ्य नहीं है क्योंकि वो एक कल्पित अपूर्णता है। 'मैं' स्वयं को ही दिया गया ये भाव है, ये विचार है कि कहीं कुछ कमी है, कहीं कुछ अपूर्ण है। वो अपूर्णता दुखी तो बहुत करती है, लेकिन साथ-ही-साथ वो हमें अस्तित्व में रखती है। वो न हो तो हमारा होना मिट जाए और उस न होने को हम बीच–बीच में थोड़ा–बहुत अनुभव करते भी हैं। थोड़ा-बहुत ही अनुभव कर पाने की जैसे हमारी क्षमता हो, थोड़ा-बहुत अनुभव कर पाने के लिए हम लालायित रहते हैं – आनंद मिल जाए, तृप्ति मिल जाए, थोड़ा-बहुत मिल जाए, महीने में एक दिन मिल जाए, दिन में एक घड़ी मिल जाए। उससे अधिक वो होने लगता है तो हम स्वयं ही उसको बाधित कर देते हैं। क्योंकि तृप्ति का बहुत बढ़ जाना, तृप्ति का भी परम पूर्णता की ओर पहुँचने लगना, अहम् के लिए, हमारे अस्तित्व के लिए जैसे एक खतरा होता है। वो खतरा नहीं हमसे बर्दाश्त होता।

अहम् माने 'काम’।

अहम् माने ‘अपूर्णता’।

तो हम जब जन्म लेते हैं, शारीरिक रूप से भी ज़्यादा मानसिक रूप से, जब हम कह पाते हैं 'मैं', जब ये भाव उदित होता है, 'मैं हूँ', वो भाव ही अपूर्णता का है, वो भाव ही कामना का है। ये जितने आप चलते-फिरते लोग देख रहे हैं, ये अपूर्णताएँ घूम रहीं हैं। ये कामनाएँ चल-फिर रहीं हैं। तो काम का जन्म है अहम् में। एक व्यक्ति का चेहरा, उसका चेहरा नहीं होता, वो अधूरी इच्छाओं का चेहरा होता है। आदमी की आँखें आदमी की आँखें नहीं होतीं, वो इच्छा झाँक रही है बाहर दुनिया की तरफ़ कि किसी तरह से पूरी हो जाऊँ।

'मैं' माने – कामना।

'मैं' माने – अधूरापन।

'मैं' माने – अतृप्त इच्छा।

उसका जन्म वहाँ पर है। अगर हम उसको एक वस्तु मानते हैं, अगर हम उसमें कोई सत्यता देखते हैं, और हम पूछते हैं कि वो आती कहाँ से है, तो उसका जन्म 'मैं' के साथ है। बाकी आप उसको यदि जान ही लें कि काल्पनिक है तो फिर तो उसका कोई जन्म है ही नहीं। पर हमारे लिए तो वो काल्पनिक नहीं है, हमारे लिए तो हमारा जीवन है, हम इच्छाओं में ही जीते हैं।

तो काम का जन्म होता है 'मैं' के साथ और ये जो 'मैं' है, फिर आगे कृष्ण कह रहे हैं कि वो आश्रय पाता है, कहाँ पर? इंद्रियों में, मन में और बुद्धि में। ये जो अधूरापन है, ये अधूरापन कहाँ से आया? हमने कहा अधूरापन आया अहम् के साथ, जैसे ही आपको ये भाव उठा कि 'मैं हूँ', वो वास्तव में अधूरेपन ने चीख मारी है कि 'मैं हूँ'। तो 'मैं हूँ' तो आया अहम् के साथ। 'मैं हूँ' तो अधूरापन है। फिर वो जो अधूरापन है, वो अपने अनुकूल एक संसार रचता है, उस संसार का नाम है मन।

कृष्ण कह रहे हैं, काम को आश्रय मिलता है तीन जगहों पर – इंद्रियों में, मन में और बुद्धि में। वो जो तीन आश्रयदाता हैं, वो किस तरह से काम करते हैं ये हम समझना चाह रहे हैं। ये जो अहम् है, ये अपने लिए एक संसार रचता है। अधूरा है न, तो इसे अपने अधूरेपन को बनाए रखने के लिए एक संसार रचना है, जिस संसार में ये अपने-आपको बार-बार दिलासा देता रहे और प्रेरणा देता रहे कि पूरापन मिल जाएगा। वो संसार रचा इसलिए नहीं गया है कि पूरापन मिल जाएगा; वो संसार रचा इसी हेतु गया है कि पूरापन न मिले। ये बात बहुत अलग है, ये बात बहुत क्रांतिकारी है कृष्ण की, यदि हम इसे अच्छे से समझ पाएँ तो।

हम इस दुनिया में बहुत कुछ पाने को खोजते रहते हैं – ये मिल जाए, तृप्ति मिल जाए तमाम तरीके से। लेकिन इस संसार का निर्माण ही इसलिए किया है अहम् ने ताकि तृप्ति न मिले। संसार इसलिए थोड़े ही है कि अहम् को मिटा दे, संसार तो इसलिए है ताकि अहम् को ज़िंदा रखे, और अहम् का क्या नाम है दूसरा? अपूर्णता। तो संसार फिर किसलिए है? संसार अगर अहम् को बचाए रखने के लिए है और अहम् का दूसरा नाम है अपूर्णता, तो संसार को रचने का अहम् का उद्देश्य ही क्या है? अपूर्णता बची रहे।

इसीलिए यदा-कदा जब पूर्णता किसी को उपलब्ध होती है, तो हम उसको प्राकृतिक घटना नहीं मानते। फिर हम कहते हैं, 'चमत्कार है, अनुग्रह है।' क्योंकि तुमने ऐसे संसार से पूर्णता पा ली जिसकी रचना ही हुई थी तुमको अपूर्ण रखने के लिए। जैसे किसी ने क़ैद की सलाखों का ही इस्तेमाल करके क़ैद से मुक्ति पा ली हो – ये घटना साधारण नहीं होती। संसार इसलिए रचा ही नहीं गया है। उसकी जो पूरी अभिकल्पना है, जो डिज़ाइन है उसका, वो इस तरह का नहीं है कि तुम संसार में जाओ और वहाँ तुमको रिहाई मिल जाए, वहाँ आनंद मिल जाए या उच्चतम ज्ञान मिल जाए या कुछ भी वास्तविक जैसा मिल जाए, प्रेम मिल जाए इस संसार में। संसार इस हेतु रचा ही नहीं गया है।

आप कहोगे, ‘अच्छा! भगवान निर्मम हैं क्या?’ भगवान ने थोड़े ही रचा है संसार, संसार कौन रचता है? संसार मन रचता है, मन का ही प्रक्षेपण, मन का ही जैसे प्रतिबिंब है संसार। और मन किसको आश्रय दे रहा है? काम को। वो काम क्या बोल रहा है? ‘मैं अपूर्ण हूँ।‘ तो जगत भी तुम्हारी अपूर्णता का ही प्रतिबिंब है।

जो जगत स्वयं अपनेआप में अपूर्ण है, निश्चितरूप से वो तुम्हें पूर्णता तो नहीं दे पाएगा न? एक भिखारी आईने में अपने-आपको देखता है, जिसको वो देख रहा है, उससे गले भी मिल ले तो वो राजा हो जाएगा क्या? भिखारी कौन? मन। और आईने में जो दिख रहा है वो कौन? संसार। अब ये जो भिखारी है और जिसने इसको आईने में देखा, ये दोनों गले मिलकर के नाचने लगें या दोनों ने जोड़ी बना ली, कोई उद्यम कर लिया। बोले, ‘हम पार्टनर्स हैं’, तो ये अरबपति हो जाएँगे क्या? भिखारी इंकॉर्पोरेटेड और इसका मार्केट, ये यूनिकॉर्न बन जानी है क्या? समझ में आ रही है क्या बात?

जगत में जोड़ का सिद्धांत नहीं चलता है, जगत में गुणा-भाग चलता है। हम सोचते हैं, 'मैं अधूरा सामने वाला अधूरा, मैं आधा सामने वाला आधा, हम दोनों जुड़ जाएँगे तो आधा और आधा एक हो जाएगा।' अस्तित्व ऐसा है ही नहीं। अस्तित्व में क्या चलता है? गुणा। वहाँ आधे और आधे को जब मिला दो तो चौथाई हो जाता है और यहीं आदमी मार खा जाता है। आदमी सोचता है कि भिखारी और भिखारी मिलकर के राजा बन जाएँगे। नहीं, भिखारी और भिखारी जब मिलेंगे तो भूख से मरता हुआ भिखारी बन जाएगा। पहले वालों के पास तो फिर भी हो सकता है कि कपड़ा न हो, रोटी थी, लेकिन इनके मिलन से जो उत्पाद निकलेगा उसके पास रोटी भी नहीं होगी। समझ में आ रही है बात?

ये हालत होती है संसार में पूर्णता की आशा से भटकते जीव की। वो जितना भटकता है, उतना ज़्यादा और भिखारी होता जाता है। वो जितना जगत को आज़माता है तृप्ति पाने के लिए, उसकी अतृप्ति और गहराती जाती है, क्योंकि हम मन को समझते ही नहीं हैं, हम जगत को समझते ही नहीं। हमको लगता है हम जीव हैं, ये जगत है, यहाँ हमें कुछ पा लेना है। कुल इतना-सा हमारा प्राकृतिक ज्ञान होता है, इतनी साधारण हमारी बुद्धि होती है। बात असली क्या है उसको समझिए! अच्छे से समझिए! कृष्ण कहाँ से आ रहे हैं उसको जानना ज़रूरी है। एक-के-बाद-एक श्लोक पर आप आगे बढ़ते जाएँ, छलाँग मारने से कुछ नहीं मिलता।

‘मैं’ कौन है? एक अतृप्ति। ऐसी अतृप्ति जो कहने को तो मिटना चाहती है पर मिटने से बहुत घबराती है। हमने प्रमाण के रूप में कहा कि अपने जो सबसे आनंद के, पूर्णता के, उपलब्धि के या प्रेम के क्षण हों, उनको याद करिए, उनमें आप तृप्त होते हैं। जब तृप्त होते हैं तो उसकी पहचान यह होती है, उसका प्रमाण यह होता है कि आपको अपना होश नहीं होता, 'मैं' मिट जाता है। तृप्ति का और आनंद का सूचक ही यही होता है कि आप अपने-आपको भूल जाएँगे। आप स्वयं से परे निकल जाएँगे। आत्मभाव लुप्त हो जाएगा, लीन हो जाएगा, उसी को बेख़ुदी भी कहतें हैं। ख़ुद से अलग हो जाएँगे। ये बात समझ में आयी?

तो कहने को तो हम उसकी तलाश में रहते हैं पर हमको वो चाहिए बहुत अल्प मात्रा में, एक सीमा के अन्दर। वो ज़्यादा मिलने लगता है तो हम घबरा जाते हैं, क्योंकि 'मैं' तृप्त हुआ माने 'मैं' मिटा। 'मैं' की तृप्ति माने 'मैं' का अंत। हमें क्या चाहिए? अंत भी न हो, तृप्ति भी मिल जाए। हम बने रहें और पूरापन भी हासिल हो जाए, वो हो नहीं पाता। ये 'मैं' की हालत है। जिस क्षण आप कहते हो, 'मैं हूँ' उस क्षण आप नहीं बोल रहे हो कि 'मैं हूँ'; कोई बिलबिलाती कामना बोल रही है कि 'मैं हूँ' और कोई मदद करो, मुझे पूरा करो इत्यादि-इत्यादि। वो अलग बात है कि मदद करने वाले को ही कामना अपना सबसे बड़ा शत्रु समझती है।

तो ये जो अहम् है, अब ये कहता है, ‘मैं हूँ’। भई! कहाँ पर हो? कुछ होना चाहिए न घर वगैरहा। सिर्फ़ बोल दोगे 'मैं हूँ', कोई पता पूछेगा तो क्या बताओगे? तो फिर अपना पता रचता है। उस पते का क्या नाम है? ये पूरा ब्रह्माण्ड। ये जो पूरा विशाल-विस्तृत जगत रचा है, ये सिर्फ़ इसलिए है ताकि 'मैं' अपना पता बता पाए, क्योंकि पता नहीं बताया तो खुल जाएगी पोल कि तुम हो ही नहीं। तुम होते तो तुम्हारा कोई पता होता। अगर 'मैं' रहे और संसार न रहे तो 'मैं' को मिटना पड़ेगा। 'मैं' बेघर हो जाएगा न। 'मैं' तो हूँ और पाँव के नीचे ज़मीन नहीं है, सिर पर आसमान नहीं है, तो 'मैं' कैसे हूँ? तो 'मैं' अपने बने रहने के लिए इतना लम्बा-चौड़ा प्रबन्ध करता है। क्या करता है? पूरे ब्रह्माण्ड की रचना कर देता है। ये ब्रह्माण्ड इसलिए नहीं है कि वो है ही और उसमें आप पैदा हुए हैं; ब्रह्माण्ड में आप नहीं पैदा हुए हैं, आपने ब्रह्माण्ड को पैदा किया है ताकि आप बने रह सकें।

ये सुनने में बात बड़ी विचित्र लग रही होगी। हमें लगता है हम तो इसी मिट्टी से उठे हैं, फिर जीते हैं इसी दुनिया में, फिर मर जाते हैं और दुनिया तो हमारे बाद भी रहती है, इसमें क्या बात है? कैसे? नहीं ऐसी बात नहीं है, ये जो आप बोल रहे हैं, ये बहुत स्थूल बात है। जिन्होंने जाना है, जो गहराई में गए हैं, जिन्होंने वेदान्त के मूल सिद्धांत दिए हैं, उन्होंने बार-बार बोला है – 'तुम जगत से नहीं हो, जगत तुमसे है।' तुम जगत को रचते हो स्वयं को ही आश्रय देने के लिए और ज़रा दो-टूक कहें तो स्वयं को ही धोखा देने के लिए।

तो मन क्या है? अहम् के इर्दगिर्द जो माहौल है; माहौल। हाँ भई! माहौल कैसा है? हवा कैसी चल रही है? रोशनी कैसी है? क्या सुनाई दे रहा है? लोग घूमते-फिरते दिख रहे हैं, बड़े-बूढ़े, नर-नारियाँ? अब ये माहौल रचा है मैंने अपने इर्दगिर्द। समझ में आ रही है बात? वो मन है।

कृष्ण यहाँ पर कह रहे हैं, ‘काम को आश्रय मिलता है मन में’, क्योंकि ये आश्रय नहीं मिलता तो 'मैं' क्या हो जाता? बेघर हो जाता। तो आश्रय दिया है, छत दी है कि हाँ भई! तुम छुप जाओ। तो दुनिया में अहंकार छुप जाता है। ‘बढ़िया! अच्छी जगह है।’ लेकिन जगह ऐसे ही पाता है जैसे क़ैदी क़ैदखाने में जगह पाता है। वहाँ मुक्ति नहीं है, जगह तो है, आश्रय तो है, छत तो है, लेकिन मुक्ति नहीं है।

फिर कृष्ण साथ में कह रहे हैं कि काम को आश्रय देने वाली इंद्रियाँ भी हैं और बुद्धि भी है। इंद्रियाँ क्या करती हैं? अब अगर ये तुम्हारा घर है तो चलोगे-फिरोगे भी। अगर ये तुम्हारा घर है जहाँ तुम्हें बहुत तरह की चीज़ें उपलब्ध होनी हैं, यहाँ तुम्हें प्राप्तियों की बड़ी सम्भावना है तो वो प्राप्तियाँ होनी भी चाहिए। इंद्रियाँ इसलिए हैं कि वो यत्न कर पाएँ कुछ पाने का। अभी ये सबकुछ है, ये पसार लिया तुमने चारों ओर, संसार पूरा बना लिया। अब इसमें उपलब्धि करने भी तो निकलोगे न? पूर्णता पाने भी तो निकलोगे न? उस पूर्णता पाने का उपकरण बनती हैं इंद्रियाँ।

ज्ञानेंद्रियाँ बताती हैं, ‘वहाँ उधर-उधर, उतनी दूर मिल जाएगी पूर्णता।‘ तो ज्ञानेंद्रिय ने बता दिया। फिर कर्मेंद्रिय क्या करेंगी? वो भाग कर जाएँगी कि वहाँ तक जाऊँ, वहाँ से पूर्णता उठा लाऊँ। तो मन ने तो यह किया कि यह ऐसे पूरा रच दिया और इंद्रियाँ फिर क्या करती हैं? इसमें दौड़-दौड़ कर चीज़ें उठाती हैं, देखेंगी, उठाएँगी और कैसे जल्दी-से-जल्दी उन चीज़ों को उठा लिया जाए, ये जुगाड़ बताने के लिए, युक्ति-उपाय लगाने के लिए है बुद्धि। तुम काम का इन सबसे सम्बन्ध समझ रहे हो?

मन ने क्या करा है? ये दुनिया रच दी। काम है कहाँ से? अहम् से। मन ने काम-केन्द्रित एक पूरी दुनिया रच दी। ज्ञानेंद्रिय ने देखा, वहाँ पर पूर्णता दिख रही है वहाँ पर, या तो खज़ाना है या तो सत्ता है या कोई और सुख का लोभ दिखाई दे रहा है, वहाँ दिख रही है, ये ज्ञानेद्रिय ने बताया है। फिर बुद्धि के पास गई, बुद्धि ने कहा, 'ठहरो, हम बताएँगे वहाँ से उठाकर कैसे लाना है।' तो बुद्धि ने उपाय लगाया, उपकरण बनाया, तकनीक बैठाई कि वहाँ से ज़्यादा-से-ज़्यादा सुख कैसे मिल सकता है। और ये सब जब कर लिया तो कर्मेंद्रिय गई और भोग के लिए उस वस्तु को उठा लायी। कृष्ण कह रहे हैं कि काम इन तीनों में आश्रय पाता है।

आगे बड़ी विचित्र बात बोली, बोले, ‘काम जीव को मोहित कर जाता है।‘ अब जीव माने क्या? अहंकार को ही तो जीव बोलते हैं। अहंकार जो देह से अभिमानी है, उसे जीव बोलते हैं। अहम् वृत्ति जो देह से जुड़ी हुई है, उसे जीव कहते हैं। काम जीव को मोहित कर जाता है। जीव को क्या मोहित करेगा? जीव की चेतना का नाम अहंकार होता है। तो काम अहम् को मोहित कर जाता है। अरे! बात तो हमने इससे शुरु करी थी कि काम अहम् का ही दूसरा नाम है, और यहाँ पर कृष्ण कह रहे हैं कि काम अहम् को मोहित कर जाता है; माने कौन किसको मोहित कर जाता है?

ये बात यहाँ फँसेगी और ये बात यहाँ फँसी नहीं तो अगला श्लोक समझ नहीं पाओगे, क्योंकि वहाँ पर बात ये की जा रही है कि स्वयं के द्वारा स्वयं को मुक्ति दो। स्वयं के द्वारा स्वयं को मुक्ति देने की बात तभी समझ पाओगे जब पहले यह समझोगे कि स्वयं के द्वारा स्वयं को फँसाया कैसे जाता है। हम ख़ुद को ही झाँसा कैसे देते हैं, पहले उसको समझो। फिर हम स्वयं को ही मुक्ति देने में सहायक कैसे हो सकते हैं, वो बात अगले और उसके अगले श्लोक में आएगी। समझ में आ रही है बात?

तो काम जीव को मोहित नहीं कर जाता है, हम स्वयं को ही मोहित कर जाते हैं। जैसे कोई बिलकुल कुरूप व्यक्ति आईने में अपने-आपको देखे और अपने-आपको झाँसा दे-दे, अपने-आपको सम्मोहित कर दे कि मैं कितना सुंदर हूँ। और न सिर्फ़ मैं कितना सुन्दर हूँ बल्कि मैं स्वयं से ही प्रेम में पड़ गया हूँ और उसकी आँखें आइने से बिलकुल चिपक कर रह जाएँ, वो हट ही न पाए आईने से, जैसे किसी ने बाँध दिया हो आइने से – हम ऐसे जीते हैं। हम मूलतः कुरूप हैं, क्योंकि सौंदर्य तो मात्र आत्मा में होता है, पूर्णता में होता है। लेकिन फिर भी वो न जाने अपनेआप को कितना सुंदर समझता है। वो अपनेआप को इतना सुन्दर समझता है कि वो अपने सौंदर्य को बचाने के लिए, जो उसका अपना स्वनिर्धारित सौंदर्य है, उसको बचाने के लिए जो वास्तव में सुंदर है, उसकी उपेक्षा, अवहेलना करने को तैयार हो जाता है।

कहने वालों ने हमसे कहा कि शिव ही सुन्दर हैं, 'सत्यम शिवम् सुन्दरं', पर अहंकार अपने-आपको इतना सुंदर मानता है कि वो शिव की उपेक्षा कर देता है। कहता है, 'वो क्या सुंदर हैं, असली सुंदर तो इधर है; सौंदर्य तो इधर देखो, हमारा देखो।' और फिर वो मोहित हो जाता है स्वयं से, 'मैं इतना सुंदर हूँ, मैं अच्छा हूँ।' वो अपने-आपको ही सम्मोहित किए हुए है। हम आत्म-सम्मोहन में जीते हैं। हमें अपना ही कुछ पता नहीं है, हम नहीं जानते बिलकुल कि यह कहना भी बड़ी अतिशयोक्ति है कि हमारी हस्ती दो-कौड़ी की है; असली बात यह है कि हमारी हस्ती है ही नहीं।

इसीलिए एकमात्र विनम्रता आत्मज्ञान है। जिसमें आत्मज्ञान नहीं है वो विनम्र हो ही नहीं सकता। आपकी हस्ती वास्तव में क्या है, ये बात तो आत्मज्ञान से ही पता चलेगी न। अन्यथा अपनी हस्ती के बारे में हो सकता है आप कोई दो-चार बहुत विनम्रतापूर्वक बातें बोल दें, ‘अरे, अरे, अरे! मैं तो छोटा आदमी हूँ, मैं तो सेवक हूँ, मैं तो खादिम हूँ, मैं तो भगवान का बंदा हूँ।‘ लोग इस तरह की बातें बोलेते हैं और सोचते हैं कि इससे उनकी विनम्रता का पता चलता है। विनम्रता का नहीं पता चलता, इससे अज्ञान का पता चलता है। विनम्रता तो तभी आएगी जब आप जान पाएँ कि आप हैं कौन। तो आपको जब पता चलता है कि आप हैं ही नहीं – इसको कहते हैं विनम्रता। 'मैं तो हूँ ही नहीं, एकदम नहीं; जो सबसे नीचे का हो सकता है, वो मैं हूँ।'

संतों ने कहा है, 'मैं तो ऐसा हो रहा, पाँव तले की घास।' ये आत्मज्ञान का लक्षण होता है कि पाँव तले की घास होने को तैयार होने लगे। और वो ही जिन्होंने कहा था कि 'मैं तो ऐसा हो रहा, पाँव तले की घास' उन्होंने ही कहा,'बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर'। जो खूब ऐसे अकड़कर, लंबा तनकर खड़ा हो, और वहाँ ऊपर खजूर हुआ पड़ा है, उसको जान लीजिए कि उसमें शून्य आत्मज्ञान है, कुछ नहीं जानता ये इसलिए इतना अकड़ा हुआ है। जैसे-जैसे आप जानने लगते हैं, वैसे-वैसे आप घास सदृश होने लगते हैं। जब पूरा ही जान जाते हैं तो घास भी राख हो जाती है। खजूर से घास होते हैं, घास से राख होते हैं, फिर राख भी मिट्टी हो जाती है और फिर मिट्टी भी कुछ नहीं। मिट्टी को मिट्टी कहने वाला भी मिट्टी हो जाता है, अब मिट्टी भी कैसे बचेगी? बात आ रही है समझ में?

तो, ‘इंद्रियाँ, मन, बुद्धि, इस काम के आश्रयस्थल कहे जाते हैं। उनके द्वारा ज्ञान को आवृत करके, काम जीव को मोहित कर लेता है।‘ किस ज्ञान की बात हो रही है यहाँ पर? ज्ञान की परिभाषा क्या है? वो जो आपको आपके प्राकृतिक भ्रमों से दूर करके आपकी सच्चाई दिखा दे, वो ज्ञान है। ज्ञान मन की वो अवस्था है जिसमें आप वही नहीं देख रहे होते जो आपकी आँखें आपको दिखाना चाहती हैं, जो आपकी वृत्तियाँ आपको सुझाना चाहती हैं, आप जब उससे ज़रा आगे जाने लगते हो – आवश्यक नहीं है कि विपरीत, पर आगे – तो उसे ज्ञान कहते हैं। आप उसी राह पर चल रहे हो जिस राह पर आपकी वृत्तियाँ और इंद्रियाँ ले जाना चाहती हैं, तो आप कितनी भी गति से चल रहे हों, उस राह पर आप रॉकेट हो गए हों, तो भी उसे ज्ञान नहीं बोलते।

ज़्यादातर लोग जो बहुत पढ़े-लिखे हैं लेकिन स्वयं को नहीं जानते, वो अज्ञान की राह के साधारण पथिक फिर नहीं हैं; वो अज्ञान की राह पर रॉकेट हैं। एक जो पहले पशु होता है, वो अज्ञान की राह पर बस यूँ ही चलता-फिरता एक साधारण जीव है। साधारण मनुष्य होता है जिसको आत्मज्ञान से कोई मतलब नहीं, वो अज्ञान की राह पर चलता एक पथिक है। और ऐसा व्यक्ति जो दुनियादारी खूब जानता है, हो सकता है वो बड़ा वैज्ञानिक ही हो गया हो, बड़ा अर्थशास्त्री है, बड़ा समाजशास्त्री है, दुनियादारी खूब जानता है, लेकिन अपना उसे कुछ पता नहीं। 'मैं-मैं' करता रहता है और 'मैं' की न प्रकृति जानता है, न स्वभाव – ऐसा व्यक्ति अज्ञान की राह पर रॉकेट है। उसको देखकर के हम बहुत जल्दी प्रभावित हो जाते हैं। रॉकेट तो लगता ही है प्रभावशाली, पर भूलना नहीं कि वो किस आयाम का रॉकेट है। जल्दी से किसी से प्रभावित मत हो जाया करो। हम तो प्रभावित ही नहीं होते, हम तो दब जाते हैं। इम्प्रेस भर नहीं होते, डॉमिनेट हो जाते हैं; ऐसे नहीं करते। गीता को साथ रखो तो जहाँ नहीं दबना चाहिए वहाँ नहीं दबोगे; यही तो लाभ है न। जो कृष्ण के साथ हो गया, उसे अब इधर-उधर शकुनी के सामने झुकने की ज़रुरत नहीं पड़ती।

ज्ञान की परिभाषा हमने क्या कही? मन की वो अवस्था जिसमें आप प्रकृति से अलग, परे, विपरीत कुछ देख पा रहे होते हैं, वो ज्ञान है। आपकी देह आपको कुछ दिखाना चाह रही है, आपके भीतर भावनाएँ उठ रहीं हैं, विचार उठा रहे हैं, दुनिया की भीड़ भी आपको उधर को ही धकेल रही है जिधर को आपकी देह। जैसे दुनिया की भीड़ और आपकी देह ने आपस में साँठ–गाँठ कर ली हो, और तभी आपको कुछ और समझ में आ जाता है।

आपके भीतर करुणा है, लेकिन आप एक ऐसी जगह से निकल रहे हो जहाँ बाज़ार में माँस-ही-माँस बिक रहा है, और आप बहुत-बहुत ज़्यादा भूखे हो उस वक़्त और आपकी देह आपको बार-बार क्या बोल रही है? ‘खा लो, खा लो!’ और आप जिस बाज़ार से गुज़र रहे हो, उस बाज़ार में माँस-ही-माँस बिक रहा है। और उन्होंने उसमें कई तरह की खुशबुएँ डाल दी हैं और वो तेल और घी और खुशबुओं की गंध तैर रही है, आपके नथुनों में प्रवेश कर रही है और वो सब जो खाने की जगहें हैं, उनके विक्रेता आ-आकर आपको आकर्षित कर रहे हैं, आपको न्यौता दे रहे हैं, ‘आइए-आइए हमारे यहाँ बैठिए, मेरा होटल सबसे अच्छा है।‘

अब ये क्या हो रहा है? आपकी देह ने और दुनिया ने गठबंधन कर लिया है। देह भी क्या कह रही है? ‘भूख लगी है, भोग लो।‘ और दुनिया में चारों ओर से आपको दिखाई क्या दे रहा है? खाने की चीज़ें हैं, जो आकर्षक तरीके से दिखाई जा रहीं हैं। दुकानों पर लटका दी गईं हैं, आपके मुँह में लार आ रही है बिलकुल। और कानों में आवाज़ क्या सुनाई पड़ रही है? 'आइए-आइए, हमारे यहाँ बैठिए, हम बहुत स्वादिष्ट खाना आपको देंगे, हमारा होटल सबसे अच्छा है।'

अब ये होता है – आपके भीतर की प्रकृति और ये जो बाहर की प्रकृति है ये हमेशा साँठगाँठ कर लेते हैं, एक होकर चलते हैं, ताल मिलाकर गाते हैं ये। ज्ञान का इस अवस्था में क्या अर्थ हुआ? ‘शरीर कुछ बोल रहा हो, समाज कुछ बोल रहा हो, मैं वो करूँगा जो उचित है’ – ये ज्ञान है। और इस क्षण में आप ये नहीं कह पाते तो आपको कोई ज्ञान नहीं है।

एक और उदाहरण देता हूँ – आप युवा हो रहे हैं, आपका शरीर बार-बार बोल रहा है कि आपको एक साथी चाहिए। शारीरिक तौर पर बड़ा सूनापन अनुभव होता है और साथ-ही-साथ आपके घर वाले, आपके दोस्त-यार, सब दुनिया वाले, रिश्तेदार, ये बार-बार आपसे आकर क्या कह रहे हैं? ‘बेटा, ब्याह कब होगा? आगे का क्या सोचा है?’ ये देख रहे हो, क्या हो रहा है? तुम्हारे शरीर ने और समाज ने आपस में साँठ-गाँठ कर ली है। शरीर भी यही कह रहा है, ‘किसी को पकड़ लाओ’, और समाज भी यही पूछ रहा है, ‘कब पकड़ोगे?’ ऐसी अवस्था में ज्ञान का क्या अर्थ होता है? 'शरीर कुछ कह रहा हो, ये जगत मुझे कुछ सुझा रहा हो, मैं वो ही करूँगा जो बात मेरे विवेक से निकल रही है।'

विवेक का अर्थ ही यही है, प्रकृति में और आत्मा में अंतर कर पाने को ही विवेक कहते हैं। सुन पाना कि कौनसी आवाज़ प्रकृति की है और किधर आत्मा का मौन है, दोनों में भेद रख पाना, यही विवेक है। आवाज़ें सब प्रकृति की हैं। विवेक का मतलब ही यही है – नहीं सुननी प्रकृति की आवाज़, नहीं सुननी है। शरीर कुछ बोल रहा होगा, जगत कुछ बोल रहा होगा, मुझे तो पहले किसी का मौन सुनना है। हो सकता है यदि उसका मौन ही मुखरित हो रहा हो जगत की किसी आवाज़ से, तो बात अलग है। पर उसकी संभावना बहुत कम होती है। जगत में तुम्हें कोई ऐसा मिल जाए जिसकी आवाज़ में आत्मा का मौन हो, इसकी बहुत कम संभावना है।

संभावना कम क्यों है? क्या किसी ने साज़िश करी है? नहीं, संभावना कम इसलिए है क्योंकि तुम्हारी पात्रता की संभावना बहुत कम है। क्या संभावना है इस बात की कि तुम में वो योग्यता है कि तुम आत्मा का मौन सुन पाओ? जिनमें ये योग्यता है, उनके लिए तो संभावना शत-प्रतिशत है। उनको तो प्रकृति की आवाज़ों में भी सत्य का मौन सुनाई दे जाएगा; पर हम वैसे हैं नहीं। तो हमको तो बस शोर-शराबा ही सुनाई देता है। जो जैसा होता है उसे वैसा ही सुनाई देता है। हम जैसे हैं, हमें वही सब सुनाई देता है – देह से भी, जगत से भी।

समझ में आ रही है बात?

और फिर जो भीतर थोड़ी-बहुत संभावना होती भी है ज्ञान की, उसको हम नष्ट होने देते हैं। कभी अगर किसी स्थिति से अनुकंपावश हम कुछ जान भी गए तो जो जाना है वो हमारे पास टिक नहीं पाता। कृष्ण अभी पिछले अध्याय में कह रहे थे, 'ज्ञान टिकता नहीं है।' जिसकी बुद्धि में धारणाएँ-मान्यताएँ, यही सब प्राकृतिक खेल बहुत भरे-बसे होते हैं, उसके पास ज्ञान टिकता नहीं है। ज्ञान मन की वह अवस्था है जिसमें आपके पास दृष्टि आ जाती है प्रकृति के पार देख पाने की। आपकी आँखें जैसे प्रकृति की दीवार को फाड़कर उसके पार देखने लगती हैं। वैसे तो जो प्रकृति की दीवार है, उसके इधर-उधर कुछ दिखता नहीं, एकदम ठोस है। पर कभी-कभी ऐसा होता है कि आपकी आँखें इस दीवार को पारदर्शी बना दें, वो क्षण आते हैं। उन क्षणों में हमारे सामने समस्या क्या रहती है? उसका उल्लेख हम पहले भी कर चुके हैं।

प्रकृति की दीवार के पार जो है, वो सत्य तो है पर हमारे लिए मृत्यु जैसा होता है। तो वो दिख भी रहा होता है तो हम आँखें बंद करना चाहते हैं। कुछ अगर देख लिया एक बार तो जो देख लिया उसको भुला देना चाहते हैं। उसी भुला देने की हमारी आदत को, वृत्ति को, कृष्ण यहाँ संबोधित करके कह रहे हैं कि ये जो काम है इसके द्वारा ज्ञान आवृत हो जाता है, जीव मोहित हो जाता है। ज्ञान होता तो है, पर ढक जाता है। नहीं! विवश नहीं हैं आप कि वो ढक ही जाएगा, काम का ज्ञान को ढक लेना हमारा चुनाव होता है। आप चाहें तो ढकेगा, न चाहें तो नहीं ढकेगा। समझ में आ रही है बात?

सबकुछ निर्भर इस पर करता है कि प्रेम किससे है। दुनिया के चटपटेपन से प्रेम है तो एक बात है और दूसरा वाला प्रेम अगर जगने लग गया है तो फिर दूसरी बात है बिलकुल। जितना मैं देख पा रहा हूँ, अब पंद्रह-बीस वर्ष होने को आ रहे हैं, किसी और चीज़ का तो बहुत कम है, सबसे ज़्यादा महत्व तो इसी बात का है कि तुम्हारे प्रेम की गुणवत्ता क्या है, तुमने चाह किसको लिया? यही जो काम है, जिसको कृष्ण कह रहे हैं कि जीव को पाप में ढकेले रहता है, यही काम जब वास्तव में अपनी पूर्णता चाहने लगता है तो ये जीव का सबसे बड़ा मित्र बन जाता है। इसी काम को बदलना होता है। इसका केंद्र बदल देना होता है – आपको चाहिए क्या?

दो ही तरह के लोग होते हैं – जिनको मूर्खता चाहिए, और जिनको कृष्ण चाहिए। आप चुन लीजिए आपको क्या चाहिए। सोच-समझकर चाहा करिए। अपनी चाहतों को प्राकृतिक ही मत रखिए बस, कि छोटे बच्चे ने जलेबी देखी और चाहत में हाथ बढ़ा दिया। बड़े बच्चे ने पैसा देखा और हाथ बढ़ा दिया। और बड़े बच्चे ने इमारत देखी और हाथ बढ़ा दिया। और बड़े बच्चे ने हवाई जहाज देखा और हाथ बढ़ा दिया। सोचकर तो चाहो क्या चाह रहे हो। जो चाह रहे हो, वही तुम्हारी ज़िंदगी बन जाएगा। नज़र रखा करो काम पर।

काम को यदि कृष्ण की तरफ़ तुमने प्रेरित और प्रेषित कर दिया तो जीवन निष्काम हो जाता है। निष्कामता से बड़ा कुछ है क्या? काम इतनी बड़ी चीज़ है कि जब मुक्ति की बात करनी पड़ी तो कृष्ण को भी बात काम के ही संदर्भ में करनी पड़ी। कहना पड़ा, ‘निष्काम’; इतनी बड़ी चीज़ है काम। तो माँगो भी तो क्या माँगो? निष्कामता माँगो, इसी को भक्ति कहते हैं। निष्कामता माँगिए!

तुम्हारा कुछ नहीं चाहिए, तुम ही चाहिए हो। तुमसे कुछ नहीं चाहिए, तुम्हें चाहते हैं। तुमसे कुछ चाहिए तो फिर ये सकाम प्रेम है। और तुम्हें ही चाहते हैं, ये फिर निष्काम प्रेम है। निष्काम क्यों है? क्योंकि तुम्हें चाहना, बात तो खतरनाक ही है; तुमसे कुछ चाहेंगे तो बहुत कुछ मिल जाएगा। जगत में उद्यम करेंगे तो ये पा लेंगे, वो पा लेंगे। दुनिया में जो मेहनत करते हैं, उन्हें चीज़ें तो मिल ही जाती हैं। तुम्हें ही चाहेंगे तो कुछ मिलेगा नहीं, जो है वो भी लुट ही जाना है। तुम्हें चाहना खतरनाक है, लेकिन फिर भी तुमसे प्रेम हो गया है। यही वजह है कि इतने कम लोग कृष्ण से प्रेम कर पाते हैं।

छोटा, क्षुद्र प्रेम सुखदायक होता है, और कृष्ण से प्रेम कर लो तो मृत्युतुल्य दुख मिलता है। 'हैं! मृत्युतुल्य दुख मिलता है फिर क्यों करें कृष्ण से प्रेम?' क्योंकि उस मृत्युतुल्य दुख का दूसरा नाम आनंद है। किसकी मृत्यु? कौन मिटता है? आपके दुख मिटते हैं। आपके दुख मिटते हैं पर आप अज्ञानी इतने हैं कि दुख को ही जीवन समझे बैठे हैं। तो जब दुख मिटता है तो कह देते हैं कि मृत्युतुल्य दुख मिला; वो वास्तव में जीवन की शुरुआत होती है।

प्रेम सही रखिए, जाँच-परख रहे पूरी। ‘किधर को जा रही है कामना? क्या माँग रहा हूँ जीवन से? माँगने लायक है क्या?’

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