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लालच करोगे तो डर लगेगा || पंचतंत्र पर (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: मैं आईआईटी में था, उन दिनों रैगिंग हुआ करती थी ज़बरदस्त। ये जो फ़स्ट यिअर (प्रथम वर्ष) के लड़के आएँ नए-नए, इनको नाम दिया जाता था 'फच्चा'; फ़स्ट यिअर का बच्चा यानी फच्चा। इनको डरा दिया जाए। रैगिंग का अर्थ ही यही था, उसके साथ दुर्व्यवहार हो रहा है, डराया जा रहा है, उसकी टाँग खींची जा रही है, तरीक़े-तरीक़े से उसको कोंचा जा रहा है। और रैगिंग चलती थी बमुश्किल पंद्रह दिन, एक महीने, उसके बाद एक चीज़ होती थी ‘फ्रेशर्स पार्टी’ , और उस दिन माना जाता था कि अब रैगिंग का अंत हो गया।

कुछ बातें मैंने देखी थीं। ये जो लड़का था, फच्चा, प्रथा ये थी कि उसकी रैगिंग वही ले सकते हैं जो उसके हॉस्टल (छात्रावास) के लोग हैं, बाहर वाले नहीं ले सकते। प्रथा है। पर ये सबसे डरता था। ये हॉस्टल से बाहर निकल जाए, इंस्टीट्यूट (संस्थान) पहुँच जाए, वहाँ कोई भी इसके सामने पड़े, ये तुरंत उसके सामने सिर झुका दे। इसको हॉस्टल में ये सिखाया जाता था कि इसके तथाकथित सीनियर्स (वरिष्ठों) द्वारा—और ये सीनियर कौन है? सीनियर कोई नहीं है, वो अठारह साल का सेकंड यिअर (द्वितीय वर्ष) का लड़का है। वही बहुत बड़ा बादशाह हो गया, वही रैगिंग लेता था।

तो ये सीनियर सिखाया करें कि सीनियर जब भी सामने पड़ेगा तो सिर झुकाओगे, और कुछ दो-चार बातें बता दी जाती थीं। कभी बता दिया जाता था कि छाती पर हाथ रखकर सिर झुकाओगे, कहीं कुछ कर दिया जाता था, सीनियर के सामने मुस्कुराओगे नहीं, कहीं किसी जगह परम्परा चलती थी कि सिर पर हाथ रख लोगे जैसे ही सीनियर सामने आए। होता है न, कुछ भी। ऐसे ही होता था।

ये इतने डर जाते थे कि ये इंस्टीट्यूट में रहे, और आठ-दस हॉस्टल थे अलग-अलग, इन्हें पता भी नहीं कि सामने जो आ रहा है, वो किस हॉस्टल का है, ये उसके सामने भी सिर झुका दे और कोई भी इन्हें डाँट दे, सुन ले। कई बार तो जो सामने आ रहा होता था, वो इंस्टीट्यूट का चौकीदार हो, ये उससे भी तुरंत डर जाए। कई बार तो जो सामने आ रहा हो, वो दूसरे हॉस्टल का फच्चा हो, ये उसके सामने ही लेट जाए और फिर उठे तो देखे कि वो इसके सामने लेटा हुआ है। ये तो बात है रैगिंग के काल की, रैगिंग पीरियड की।

अब सुनो। फ्रेशर्स पार्टी हो जाए, रैगिंग ख़त्म हो गई, उसके बाद भी ये बहुत दिन तक चलता रहता था। ये याद ही नहीं आता था कि हम कौन हैं, यहाँ क्यों हैं। एक-दो दफ़े मैंने कुछ को पकड़ा और मैंने पूछा, "अच्छा, एक बात बताओ, तुम रैगिंग बर्दाश्त क्यों कर रहे हो? ये सब जो हो रहा है, तुम क्यों कर रहे हो?" उनको नहीं पता था। बर्दाश्त करना होता है, डरना होता है। डर एक परम्परा है, परम्परा का पालन करना होता है। तो बात समझ रहे हो? मेरे साथ चल पा रहे हो?

एक लड़का हॉस्टल में आया है। वो आईआईटी एंट्रेंस एग्जाम (प्रवेश परीक्षा), जेईई नाम से होता है, उसको क्लियर (उत्तीर्ण) करके आया है। वो अपनी पात्रता पर आया, अपनी मेरिट पर आया है। उसे किसी सीनियर से डरने-दबने की कोई ज़रूरत नहीं है। वो अपनी फ़ीस ख़ुद दे रहा है। वो अपने दम पर भीतर आया है। पर सीनियर उसके सामने खड़ा है और उससे कह रहा है, “चल, जूता चाट,” और वो चाट रहा है। और ये कितनी अजीब बात! हम ऐसे हैं।

हमें समझ में ही नहीं आता कि बहुत सारे काम पूरी तरह अनावश्यक हैं; तुम नहीं करो, तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। यहाँ तक कि जब रैगिंग पीरियड ख़त्म भी हो जाता है, तब भी हमें ये यक़ीन नहीं होता कि हम आज़ाद हैं। जिस लड़के की रैगिंग हो रही है, उसकी तुलना करो उस व्यक्ति से जो यहाँ बैठकर दफ़्तर की फ़ाइलें निपटा रहा है और द्वार पर यमराज खड़ा है। उसको ये यक़ीन ही नहीं हो रहा कि ये सारा काम छोड़ा जा सकता है।

जैसे इस व्यक्ति को ये यक़ीन नहीं हो रहा कि इन फ़ाइलों को छोड़ा भी जा सकता है, वैसे ही उस रैगिंग वाले लड़के को यक़ीन नहीं होता था कि रैगिंग से ऑप्ट आउट (बाहर निकलना) किया जा सकता है। आवश्यक नहीं है कि मैं ये सब बर्दाश्त करूँ; मैं मना कर सकता हूँ। और सामने कोई फ़ौज थोड़े ही खड़ी है, सामने कौन खड़ा है? अरे! अठारह साल का लड़का, जोकि कई बार ऐसा होता था कि जो फच्चा आया है, वो उम्र में अपने सीनियर से ज़्यादा बड़ा है, ज़्यादा बड़ा भी है, ज़्यादा रौबीला भी है।

भाई, मैं आईआईटी दिल्ली की बात कर रहा हूँ, यहाँ पंजाबी भी आए, आसपास के ही इलाके इधर से आएँ, पूर्वी उत्तरप्रदेश से आएँ—देशभर से आते थे पर ये लोग थोड़े ज़्यादा रहें। और उत्तर भारतीय लड़के, उनमें जाट समुदाय से भी हैं, गुर्जर समुदाय से भी हैं, वो अच्छे, कद भी बढ़िया, उनके दाढ़ी भी हो। कई ऐसे होते थे, वो फर्स्ट यिअर में आए हैं, उनके दाढ़ी है, लेकिन वो कर क्या रहे हैं? ‘जी'। तुम ये क्यों कर रहे हो? और तुम किसके सामने झुक रहे हो?

ये जो सीनियर है, ये ऐसा है कि तुम डकार मारो और ये चित्त हो जाए। पाँच फुट तीन इंच इसका कद और ये ऐसा (दुबला-पतला) सीनियर है, और ये खड़ा है और इसके सामने एक रौबीला पंजाबी, छः फुट, दाढ़ी, पगड़ी, और इसी ने उसे बोला, "चल, चल, दौड़ लगा।" और वो दौड़ लगा रहा है। तुम ये क्यों कर रहे हो? तुम डकार क्यों नहीं मार देते? वो वहीं गिर जाएगा।

ये तुम बुद्धि की सीमा देखो, और मैं बात कर रहा हूँ अभी उनकी जिनको कहा जाता है कि बहुत-बहुत बुद्धिमान लोग हैं। आई.क्यू. (बुद्धिमत्ता) के पैमाने पर अगर तुम जेईई क्लियर करने वाले, लाँघने वाले वर्ग का आई.क्यू. लोगे तो देश में तो ऊँचे-से-ऊँचा निकलेगा ही, शायद पूरी दुनिया में ऊँचे-से-ऊँचा निकले। बड़ा मुश्किल होता है; सौ लोग अगर आवेदन देते हैं तो एक का चयन होता है, एक का या एक से भी कम का। ये हमारे बुद्धिजीवी हैं!

अब देख लो कि बुद्धि कितनी बड़ी चीज़ है। बुद्धि ठूँठ है, बुद्धि एक मुर्दा ठूँठ है। हम बात कर रहे हैं आल इंडिया जेईई रैंक वन की, ये दस लाख लड़कों को पछाड़कर आया है। दस लाख लड़कों ने वो परीक्षा लिखी थी और ये दस लाख लड़कों को पछाड़कर आया है। इसकी अखिल भारतीय रैंक क्या है? प्रथम वरीयता पर बैठा है। और ये कर क्या रहा है? ये सीनियर के कमरे में झाड़ू मार रहा है। “तू ये क्यों कर रहा है?” वो नहीं बता पाएगा।

बुद्धि जब तक परमात्मा को समर्पित न हो, बहुत बड़ा बोझ है। बुद्धि दो ही के इशारे पर चलती है— या तो परमात्मा के या कामना के। ग़ौर से समझ लेना, बुद्धि तुम जब भी चलाओगे किसी के इशारे पर चलाओगे। बुद्धि के अपने प्राण नहीं होते, उसकी लगाम हमेशा किसी के हाथ में होती है। उसकी लगाम हो सकती है या तो परमात्मा के हाथ में या कामना के हाथ में।

बुद्धि की लगाम अगर कामना के हाथ में है तो बुद्धि तुमको बहुत नुकसान पहुँचाएगी; तुम्हारी ही बुद्धि तुम्हारी दुश्मन हो जाएगी। इसी को कहते हैं कुबुद्धि, तुम्हारी ही बुद्धि तुम्हारी दुश्मन है। तुम्हारे सारे तर्क तुम्हीं पर भारी पड़ेंगे। तुम्हें सब लग रहा होगा कि ठीक है, पर तुम्हारा हिसाब तुम्हें कहीं का नहीं छोड़ेगा।

जानते हो लालच क्या था? क्यों आदमी डर जाता है और वो ये ख़्याल ही नहीं कर पाता कि मैं इन सब चीज़ों को दरकिनार कर सकता हूँ, मैं इन सब चीज़ों को अस्वीकार कर सकता हूँ, रैगिंग इत्यादि को? चाहे हम उस लड़के की बात करें जो रैगिंग बर्दाश्त किए जाता है और चाहे हम उस आदमी की बात करें जो जानता है कि मृत्यु क़रीब है, समय सीमित है, फिर भी फ़ाइलें निपटाए जाता है। दोनों की ही बुद्धि पर कब्ज़ा किसने किया हुआ है? कामना ने। और कामना माने डर। बेटा, जहाँ कामना है, वहाँ डर होगा ही होगा। हो ही नहीं सकता कि तुममें कामना हो और तुममें डर न हो।

“हमें चार साल यहाँ ही तो रहना है, यही तो हमारा घर, हमारा परिवार है, सीनियर्स से पंगे ले करके थोड़े ही रहेंगे,” ये तीक्ष्ण मेधा वाले अखिल भारतीय विजेताओं का तर्क है, "मिल-जुलकर रहना चाहिए।” और मैं बात कर रहा हूँ आज से पच्चीस साल पहले की। तब एक लालच भी रहता था, सीनियर्स से किताबें मिलेंगी। और मिलता कुछ नहीं था; दो फटे पन्ने, लटकाकर घूमो उनको।

जो गणित और भौतिकी की उलझी हुई समस्याएँ हल कर देते थे, उन्हें इतना विचार नहीं आता था कि बैच में अगर किसी एक के पास भी किताब है, तो हम फोटोकॉपी करा लेंगे, भाई। किताब के लिए इतनी ज़हालत झेलना थोड़े ही ज़रूरी है। और ऐसी कौन-सी किताब है जो बाज़ार में नहीं मिलती पर सीनियर के पास ही मिलती है, गुप्त किताब सीनियर ने ही छापी है? और मान लो कि नहीं भी मिलती है, तो किसी के पास तो होगी, जिसके पास होगी, उसी से ले करके ज़ेरॉक्स करवा लेना। पर ये ख़्याल ही नहीं आता था।

ये ख़्याल ही नहीं आता था कि अगर आईआईटी और प्रोफ़ेसर्स (प्राध्यापक) कोई किताब रेकमेंड (सुझाना) कर रहे हैं, कोई किताब मान्यता प्राप्त है, कोई किताब अनुमोदित है कि ये किताब आपकी टेक्स्टबुक (पाठ्यपुस्तक) है, आप इससे पढ़ेंगे, तो फिर लाइब्रेरी (पुस्तकालय) वो किताब मुहैया भी तो कराएगी। ऐसा थोड़े ही होगा कि प्रोफ़ेसर कह देगा, “ये किताब पढ़ो,” और आप पूछो कि “ प्रोफ़ेसर साहब, ये किताब कहाँ है?” तो कहे, “वो तुम जानो!” ऐसा तो होगा नहीं। इतनी बड़ी लाइब्रेरी किसलिए है? ये ख़्याल ही नहीं आता था। तब पूछा जाए कि “क्यों तुम इतना अपमान बर्दाश्त करते हो?” तो कहे, “किताब मिलेगी न!”

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