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लखुआ भूत ने मॉडर्न ओझा बनकर दही चटाई (हम चाटते गए) || (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपके हज़ारों वीडियोस हैं यूट्यूब पर, हर वीडियो में आपने किसी-न-किसी तरीके से धर्म या अध्यात्म की ही बात करी है — उपनिषद्, ब्रह्म, धर्म, अध्यात्म, भगवान। ये सब मिलकर भी दुनिया में जो इतना पाप, दु:ख, युद्ध, क्लेश, अवसाद, बलात्कार, हत्या इत्यादि है उसका आजतक खात्मा क्यों नहीं कर पाए?

दुनिया में सबसे धार्मिक देश भारत रहा है फिर भी भारत में इतने पाप होते रहे, लड़ाइयों में इतनी हार मिली भारत को। धर्म तो धर्म तब है न जब समाज से, मन से संताप मिटाए। वो मसीहा कैसा जो जनमानस को मुक्त ना कर पाए? तो बताइए मुझे कि धर्म आजतक भी पाप-पीड़ा, संताप, शोषण, युद्ध क्यों नहीं मिटा पाया?

आचार्य प्रशांत: दो चीज़ें हैं — एक जो तुम्हें दी और दूसरी जो तुमने उसका बना लिया। जो धर्म तुम्हें दिया गया वो ऋषियों के श्लोकों जैसा साफ, पवित्र था और जो धर्म तुमने बना लिया वो ज़रा अलग था, काफी अलग था।

तुम पूछ रहे हो कि “जब लड़ाइयाँ हो रही थी, पाप हो रहा था और जब युद्ध है और बलात्कार है और अवसाद है तो धर्म उन्हें आज तक कभी खत्म क्यों नहीं कर पाया पिछले हज़ारों सालों में?” क्योंकि तुम्हारा धर्म — ‘धर्म’ नहीं ‘तुम्हारा धर्म’, जो तुमने बना लिया है धर्म को — क्योंकि ‘तुम्हारा धर्म’ कहीं और व्यस्त था। ‘तुम्हारा धर्म’ व्यस्त था ये तय करने में कि बाल कटाए जाने चाहिए या नहीं कटाए जाने चाहिए। ‘तुम्हारा धर्म’ ये तय करने में व्यस्त था कि पीले रंग के परिधान पहनें या सफेद रंग के।

जो तुमने अपना प्रचलित धर्म बना रखा है उसे मतलब कहाँ रहा जीवन के मूल प्रश्नों से? उसे मतलब किन चीज़ों से रहा है? और आज भी जो समान्य जन संस्कृति में प्रचलित धर्म है उसको इन्हीं मुर्खतापूर्ण चीज़ों से ही मतलब है, “किस दिशा में मुँह करके खाना खाएँ?”

जो जनसाधारण में प्रचलित अध्यात्म है, वो इस प्रश्न का सामना ही कहाँ कर रहा है कि “अवसाद क्या है? और उसका समाधान क्या है?” कर रहा है क्या? या “युद्ध कहाँ से आता है? और युद्ध कैसे मिटाएँ?” अध्यात्म इन प्रश्नों का सामना ही नहीं कर रहा।

अध्यात्म कहीं और व्यस्त है। अध्यात्म व्यस्त है साँप उड़ाने में। अध्यात्म के सामने ये प्रश्न है कि “साँप किस तरीके से उड़ाया जा सकता है हवा में? और प्रतिमा पर दूध कितने क्विंटल चढ़ाना है?” उस पुजारी से जाकर के पूछो तुम, सवाल, कि, "साहब युद्ध की शुरुआत आदमी के मन में होती कहाँ से है?" तो उसे इस प्रश्न का उत्तर नहीं पता, क्यों नहीं पता? क्योंकि उसके जीवन में प्रश्न बिलकुल दूसरे हैं। उसके जीवन में प्रश्न ये है कि “दो दिन बाद मुझे ढाई-हज़ार किलो दूध की ज़रूरत है तो उसमें पानी कितना मिलाएँ? और दूध महँगा होता जा रहा है, फलानी जगह से लाएँगे तो इतने रुपए किलो पड़ेगा, वहाँ से लाएँगे तो इतने रुपए किलो पड़ेगा।” हमारा धर्म इन चीज़ों में व्यस्त है, तो जीवन के असली सवालों के जवाब कैसे दे धर्म?

“कौन-सी अंगूठी पहननी चाहिए किस उंगली में? सुबह ठीक कितने बजे उठना चाहिए?” हमारा धर्म तो इन चीज़ों में व्यस्त है। “गले में कितनी मालाएँ डालनी चाहिए और दिन में किस समय डालनी चाहिए?” धर्म के नाम पर यही सब चलता है न? धर्म का और क्या मतलब होता है? धर्म इन्हीं चीज़ों में व्यस्त है।

आँख खोलकर के भी साफ-साफ दिखाई नहीं देता है कि दुनिया में चल क्या रहा है। पर हमारा धर्म व्यस्त है आँख बंद करके मम्बो-जम्बो करने में। इंसान एक-दूसरे का खून पी रहे हों, चाहे इंसान आत्महत्या कर रहा हो, हमारा धर्म, हमारे धर्म-गुरु व्यस्त हैं भूत-प्रेत, झाड़-फूँक, टोना-टोटका ये बातें करने में। तो धर्म तुम्हें फिर जगत की वास्तविक समस्याओं का समाधान कैसे दे? मुझे बताओ न।

तुमने कभी धर्म के सामने जीवन के वास्तविक प्रश्न रखे हैं क्या? यहाँ तो धर्म के सामने प्रश्न ही यही होता है कि “बरगद के पेड़ पर भूत, और पीपल पर भूतनी, और बीच में भाँजी मार रहा है लखुआ प्रेत।” ये सब धार्मिक सवाल हैं, ये मुद्दे हैं धार्मिक‌!

“तो ये लखुआ प्रेत की शांति कैसे कराई जाए?” तो फिर एक ओझा आएगा, ओझा, और ओझा बैठकर मम्बो-जम्बो करेगा और बताएगा कि “देखो, पिछले जन्म में मैंने इतनी भूतनियाँ एकदम शंट करी थी और ये लखुआ प्रेत चीज़ क्या है! ये भूत का भूतनी से मिलन नहीं होने दे रहा।” और पूछा जाएगा कि “अच्छा, प्रेत है, ये कहाँ से आया?” तो बोलेगा, “फलाना मर गया था वो प्रेत बन गया।” बोला, “अच्छा आप मर जाओगे तो क्या बनोगे?” बोलेगा, “मैं मर जाऊँगा तो अगले जन्म में मैं तो ओझा ही बनूँगा, ओझा बनने में बड़ा फायदा है बस अगले जन्म में अंग्रेजी बोलूँगा लेकिन बातें वही करूँगा जो अभी करता हूँ — भूत-प्रेत, टोना-टोटका, झाड़-फूँक। फायदा बहुत है और फिर अंग्रेजी में बोलो तो अमेरिकन डालर भी आता है।” ये काम कर रहा है हमारा धर्म। धर्म के नाम पर ये चल रहा है तो बताओ धर्म फिर तुम्हें जीवन में विजई कैसे बनाए?

तुम कह रहे हो, “भारत की इतनी दुर्दशा क्यों हुई, अध्यात्म तो इतना था यहाँ पर?” क्योंकि जब भारत पर आक्रमण हो रहे थे तो हमारा धर्म ये सब करने में व्यस्त था कि “कौन-सी जाति किस जाति से ऊपर मानी जाए, कौन-सी नीचे मानी जाए। और किन जातियों को गाँव से कितने कोस दूर बसाया जाए।” ये धर्म के सामने सवाल हैं। धर्म इन मुद्दों में उलझा हुआ है। जब धर्म इन मुद्दों में उलझा हुआ है तो कौन-से उत्तर देगा तुमको बोलो?

आप किसी धार्मिक आदमी से मिलते हो तो आप उसे विचारशील पाते हो? वो वास्तव में जो जीवन के, समाज के, राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय, वैश्विक मुद्दे होते हैं उनका विचार कर रहा होता है? बताओ न मुझे। एक औसत साधारण धार्मिक आदमी धर्म के नाम पर किन चीज़ों में उलझा होता है? कि “वो फलानी पूर्णिमा किस दिन आ रही है? उस दिन जाकर के फलाने सरोवर में फलानी राख डालेंगे, उससे पितरों की शांति हो जाएगी।” जब धर्म के नाम पर ये मुद्दा है तो धर्म कैसे दुनिया से, मुझे बताओ न, दुख मिटा दे, संताप मिटा दे, कलह मिटा दे? कैसे?

जीवन से मोह हटे कि न हटे, मन से कुटिलता हटे कि न हटे, डर हटे कि न हटे भूत और भूतनी के बीच में से लखुआ प्रेत ज़रूर हटना चाहिए — ये अध्यात्म है। अभी तो मुझे वो सारे मुद्दे याद नहीं आ रहे हैं जिनको आध्यात्मिक मुद्दा समझा जाता है। “दाढ़ी हफ्ते में किस दिन बनाएँ किस दिन ना बनाएँ, बताइए?” — ये आध्यात्मिक मुद्दा है साहब। ये आध्यात्मिक मुद्दा है! इन्हीं मुद्दों में हम हज़ारों साल से उलझे हुए हैं।

धर्म जोकि ताक़त देने वाला असीम स्रोत हो सकता था हमने उसको बर्बाद करके, अपमानित करके अपने ऊपर बस एक बोझ बना लिया। धर्म अगर शुद्ध है तो धर्म से बड़ी कोई ताक़त दूसरी नहीं और धर्म अगर अशुद्ध है तो धर्म से बड़ा बोझ दूसरा नहीं। और भारत में धर्म को बर्बाद करने में बड़े-से-बड़ा किरदार रहा है धर्म गुरुओं का। जनता हमारी थोड़ी सी भोली रही है। कोई आदमी दाढ़ी-वाढ़ी एकदम बढ़ा करके, खासतौर पर बुज़ुर्ग हो गया हो, दाढ़ी सफेद हो गई हो, और संस्कृत में श्लोक बोल दे और ऐसे बात करे जैसे उसे सब कुछ पता है तो हमारे लोग मान लेते हैं। आज भी मान लेते हैं, सौ साल पहले भी मान लेते थे, हज़ार साल पहले भी मान लेते थे।

अब धर्म गुरुओं ने जनता को यही पढ़ाया कि तुम धार्मिक हो या नहीं ये इससे निर्धारित होगा कि तुम फलानी एकादशी पर उपवास करोगे या नहीं करोगे — जो लोग फलानी एकादशी पर उपवास करते हैं वो धार्मिक हैं, जो लोग नहीं करते वो अधार्मिक हैं। ये तो सीधी-सी बात है न?

तुम्हारे घर में मान लो किसी एकादशी वगैरह पर व्रत करने का चलन हो, पाँच लोग हों घर में जिनमें एक बूढ़ी दादी भी है और चार लोग तुम्हारे घर में व्रत रख रहे हैं और तुम कह दो — "हमें नहीं रखना" तो तुरंत तुम्हें क्या कहा जाएगा? "नास्तिक, अधार्मिक!" तो हमारे यहाँ पर धार्मिक होने का क्राइटेरिया ही क्या है? पैमाना ही क्या है? कि तुम ये रूढ़ियों में और परम्पराओं में और मूर्खताओं में यक़ीन करते हो कि नहीं करते हो।

धर्म को विकृत करके हमने एकदम अपने पैर की धूल बना डाला।

मैं कौन हूँ? मेरी भावनाएँ कहाँ से आती हैं? मेरे विचार कहाँ से आते हैं? मेरे डर कहाँ से आते हैं? मेरी हस्ती ही कहाँ से आती है? — इसपर विचार करने का तो कभी धर्म को समय ही नहीं मिल पाया क्योंकि धर्म लगातार व्यस्त रहा, लगातार व्यस्त रहा।

“फलाने लोगों ने फलानी कुँए से पानी पी लिया उनको पिटवाना है न”, धर्म व्यस्त है भाई! आत्म-जिज्ञासा कौन करे? आत्म-अनुसंधान कौन करे?

“फलाने कुँए से फलाने वर्ग के लोगों ने पानी पी लिया उनको पिटवाना है” — धर्म ये करने में व्यस्त है। गीता कौन पढ़े? धर्म व्यस्त है कि, "आज फलाना दिन है, आज फलाने आँटे की पूड़ियाँ बनेंगी और सबको खीर के साथ परोसी जाएँगी", धर्म व्यस्त है। गीता पढ़ने का तो धार्मिक लोगों को कभी समय ही नहीं मिला।

तुम धार्मिक लोगों के घरों में जाओ, गीता शायद रखी मिल जाए। फिर पूछो — "कितने लोगों ने पढ़ी है? सात-सौ में से सात श्लोक भी बता पाओगे?" नहीं, बता पाएँगे लोग, सात-सौ में सात नहीं बता पाएँगे। पूछो, "इतने उपनिषद् हैं, दो-सौ से ऊपर, दो भी रखे हैं आपके घर में? और उन दो उपनिषदों में दो श्लोक भी बता दो?" नहीं, नहीं बता पाएँगे, क्यों? क्योंकि धार्मिक लोग कहीं और ही व्यस्त हैं।

फलानी प्रतिमा के मुँह में फलाना आँटा लगाना है, इसमें व्यस्त हैं। कैसे पढ़ें उपनिषद्? कैसे पढ़ें? और अभी मैं कह दूँ कि ‘ब्रह्म सूत्र’, वेदांत तो पूरा नहीं होता ब्रह्म सूत्र के बिना। कहेंगे, “ब्रह्म सूत्र? ये तो नहीं पता, हाँ, ब्रह्मा जी की हमने कहानी सुनी थी तो ब्रह्मा जी की कहानी बता दें क्या?”

धर्म ‘ब्रह्म’ की बात कैसे करे, धर्म तो ब्रह्मा की कहानियों में मगन है। ना ब्रह्म से मतलब, ना गीता से मतलब, ना उपनिषदों से मतलब, अंधविश्वासों से मतलब है, कुट्टू के आँटे से मतलब है।

कहें, “क्या चबा रही हो भाभी?”

कहेंगी, “फलाहारी लड्डू है!”

ये ‘फलाहारी लड्डू’ कौन-से होते हैं?

अब ये धार्मिकता का प्रमाण दिया जा रहा है कि, "हम फलाहारी लड्डू चबा रही हूँ रे!" ये भाभी जी धार्मिक होंगी कभी? पर पूरे मुहल्ले में धार्मिक कहलाती हैं।

इनसे पूछो, "मीरा का कोई भजन बता दो?"

कहेंगी, “मीरा का कोई भजन नहीं पता, बिलकुल नहीं पता।”

"अच्छा, दादू साहब का कोई भजन बता दो?"

“अरे, नहीं।”

"कबीर साहब का कोई भजन बता दो?"

“अरे, नहीं-नहीं।”

तो वहाँ वो जो महिला टोली में जाकर के तुम जो भजन गाती रहती हो, वो क्या है?

बोली, “राजा इंद्र ने बाल्टी मँगाई।”

ये भजन‌ है!

ये भजन‌ है। ना सूर के भजन, ना मीरा के भजन। ना कबीर की याद, ना तुलसी की बात। “राजा इंद्र ने बाल्टी मँगाई” — ये भजन है और ये भजन भी बॉलीवुड के किसी आइटम नंबर के तर्ज पर गाया जा रहा है।

धर्म व्यस्त है, धर्म बहुत व्यस्त है।

अभी निमोनिया हो गया है मुझे, तो एक की धमकी आई थी, बोला, “बहुत हीरो बन रहे थे न, वो एक वीडियो निकाला था कि ‘क्या भूत-प्रेत होते हैं?’ उसमें बोले थे कि अगर भूत-प्रेत होते हों तो मेरा जो उखाड़ सकते हो उखाड़ लें, मेरा कुछ करके दिखा दें।” बोले, “वो जो गुरु हैं बड़े साहब, वो भूत-प्रेत उड़ाते रहते हैं। देखा, उन्हें नहीं हुआ न? कोविड ही नहीं हुआ, तुम्हें कोविड भी हो गया, फिर निमोनिया भी हो गया। वो तो इस बार लखुआ प्रेत ने तुम पर थोड़ी रियायत कर दी। अगली बार भूत और भूतनी दोनों आएँगे, और फिर फेफड़ा लेकर उड़ जाएँगे।” ये धर्म है, ‘बरगद वाला भूत और पीपल वाली भूतनी’ और जो ऐसी बातों को माने वो आदमी धार्मिक कहला रहा है।

“नई गाड़ी आई है मंदिर ले जाओ न!” फिर वहाँ वो पंडित खड़ा होता है वो नई गाड़ी के बोनट को खराब करता है। बहुत साल पहले की बात है, मुझे पकड़कर के कहा गया था कि, "ले जाओ!" बाईक आई थी। मैंने कहा “ये जो स्पोक्स है न, स्पोक्स , किलियाँ हैं टायर की, इन पर लगाओ, इन पर।”

मंदिरों को विद्या स्थली होना चाहिए था। कि जहाँ तुम जा रहे हो ताकि तुम्हारा ऊँचे-से-ऊँचा हित हो सके, तुम्हारी चेतना एकदम ऊँचाई पा सके। उसकी जगह मंदिर तुम ये कराने जाते हो, कि अभी गाड़ी आई है, जाएँगे और वो एक बार बोनट पर बनाएगा स्वास्तिक, एक बार बम्पर पर बनाएगा फिर एक लाल रंग का सस्ता-सा कपड़ा लेगा वो तुम्हारे रियर व्यू मिरर पर बाँध देगा, स्टेयरिंग पर बाँध देगा, स्टेयरिंग में कुछ लगा देगा। ये मंदिरों का इस्तेमाल हो रहा है। जिन मंदिरों को ऊँची चेतना का केंद्र होना चाहिए था उन मंदिरों में ये चल रहा है।

"धार्मिक आदमी है भाई ये लड़का, जब सुबह-सुबह कोई बड़ा काम करने निकलता है तो दही चाटकर निकलता है।" ये दही चाटना धार्मिकता हो गई, कि “देख, धार्मिक आदमी हैं दही तो चाटेंगे न?”

धर्म व्यस्त है!

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