प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मैम ने बंधनों की बात की तो मैं भी वैसा महसूस करती हूँ। मुझे ऐसा लगता है कि बंधन कुछ उम्र तक ही होता है। पर जब इनको देखा कि यह भी बंधनों में हैं तो मुझे अच्छा महसूस नहीं हुआ यह जानकार। परिवार वालों की ओर से भी अगर मैं बात करूँ। तो वो लोग सहज महसूस नहीं करेंगे कि मैं यहाँ आऊं।
तो वहाँ पर मैं उनसे छुपा कर आऊँ या मैं उनसे लड़ कर आऊँ? क्या ठीक है?
आचार्य प्रशांत: दोनों ही स्थितियों में, सोच उन्हीं की बात रही हो। फिर तो वही भगवान हैं। आदमी मंदिर की ओर चले और सोचे 'बिशन सिंह' के बारे में, तो उसका भगवान कौन है?
प्र: बिशन सिंह।
आचार्य प्रशांत: यहाँ आते हुए सोच रही हो, — "बता कर आऊँ, छुपा कर आऊँ, लड़ कर आऊँ", पर हर स्थिति में सोच तो 'बिशन सिंह' के बारे में ही रही हो? तो फिर बिशन सिंह ही भगवान है। तो यहाँ आकर क्या मिलेगा?
क्या बहुत मुश्किल है ये देख पाना की मन पर जेहन पर किसी का कब्ज़ा है, अधीनस्थ हो, अधिकृत हो और खुश हो?
इतना ही नहीं, और ज्यादा अधिकृत होने की योजना बना रही हो।




