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क्यों जीना पड़ता है स्त्रियों को मजबूरी में?
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मैम ने बंधनों की बात की तो मैं भी वैसा महसूस करती हूँ। मुझे ऐसा लगता है कि बंधन कुछ उम्र तक ही होता है। पर जब इनको देखा कि यह भी बंधनों में हैं तो मुझे अच्छा महसूस नहीं हुआ यह जानकार। परिवार वालों की ओर से भी अगर मैं बात करूँ। तो वो लोग सहज महसूस नहीं करेंगे कि मैं यहाँ आऊं।

तो वहाँ पर मैं उनसे छुपा कर आऊँ या मैं उनसे लड़ कर आऊँ? क्या ठीक है?

आचार्य प्रशांत: दोनों ही स्थितियों में, सोच उन्हीं की बात रही हो। फिर तो वही भगवान हैं। आदमी मंदिर की ओर चले और सोचे 'बिशन सिंह' के बारे में, तो उसका भगवान कौन है?

प्र: बिशन सिंह।

आचार्य प्रशांत: यहाँ आते हुए सोच रही हो, — "बता कर आऊँ, छुपा कर आऊँ, लड़ कर आऊँ", पर हर स्थिति में सोच तो 'बिशन सिंह' के बारे में ही रही हो? तो फिर बिशन सिंह ही भगवान है। तो यहाँ आकर क्या मिलेगा?

क्या बहुत मुश्किल है ये देख पाना की मन पर जेहन पर किसी का कब्ज़ा है, अधीनस्थ हो, अधिकृत हो और खुश हो?

इतना ही नहीं, और ज्यादा अधिकृत होने की योजना बना रही हो।

प्र: समाधान क्या है?

आचार्य प्रशांत: बिशन सिंह से ही पूछो।

चलो, समस्या क्या है। पढ़ी-लिखी हो। कोई बिमारी नहीं। अपने देश में हो। भाषा ठीक है। काम का अनुभव भी हो गया है। इस शहर को भी जानती हो। तो क्यों डर है और क्यों दबाव है?

प्र: बड़ी मजबूती से जकड़ा हुआ है परिवार ने।

आचार्य प्रशांत: ये तो फिर वही बात कर दी — मोह माया; मैं फिर तथ्यों पर आ रहा हूँ। तुम्हारा बिगड़ क्या जाएगा? शरीर से मजबूत हो, शिक्षा से मजबूत हो, अनुभव से मजबूत हो। तुम्हारा कोई बिगाड़ क्या लेगा?

प्र: भावनात्मक निर्भरता...

आचार्य प्रशांत: तथ्यों की बात करो। सब भावनात्मक निर्भरता पदार्थगत होते हैं। दैट व्हिच यू कॉल्ड इमोशन, इज़ मोस्टली इकोनॉमिक्स।

कुत्ता होता है न? कल माता जी मुझसे कह रही थीं कि "कुत्ता अगर पालना तो रोटी उसे तुम ही देना। भले ही उसे बहुत लोग खिलाएँ या कुछ भी करें, पर रोटी अपने ही हाथ से देना। कुत्ता तुमसे भावनात्मक रूप से जुड़ जाएगा।" क्यों — इमोशन इज़ मोस्टली इकोनॉमिक्स।

तो भावनात्मक निर्भरता, 'आर्थिक निर्भरता' है। मत कहो कि ये भावनात्मक निर्भरता है। ये निर्भरता 'आर्थिक' है।

ऐसा तुम्हें लगता है कि 'आर्थिक' है — तथ्यों पर आओ। क्या वास्तव में तुम्हें 'आर्थिक' तौर पर निर्भर होने की आवश्यकता है?

कुछ लालच होगा। लालच के अलावा गुलामी की और कोई वजह नहीं होती। और लालच तो हमेशा आर्थिक ही होता है। तो मत कहो कि भावनाओं के कारण बँधी हुई हो। बात पैसे की है।

हो सकता है कि चैतन्य रूप से तुम ऐसे न सोचती हो। हो सकता है कि मैं जो बात कह रहा हूँ, वो सुनने में भद्दी भी लग रही हो। पर अपने मन की गहराई में उतरो। उसमें कहीं न कहीं तुमको आर्थिक आकर्षण दिखाई देगा।

क्यों है ऐसा कि इस प्रकार के बंधन स्त्रियों को ही ज़्यादा अनुभव होते हैं? कल विस्तार से बात करी थी हमने — ग्यारह बजे नहीं कि सभा से कुछ लोग उठ कर के चले गए। और जितने लोग उठ कर के चले गए उसमें शत-प्रतिशत स्त्रियाँ थीं। क्या कहोगे? वो भावनात्मक थीं इसलिए उठ कर चली गईं? न, और हर उम्र की थीं।

जैसे अभी तुम यहाँ कह रही हो कि ये बढ़ी उम्र की हैं, ये देख कर तुम्हें ताज्जुब हो रहा है। कल पंद्रह वर्ष से लेकर के पैंसठ वर्ष तक की स्त्रियाँ थीं, सब उठ कर चली गईं।

अब उस बात को ज़रा इस तथ्य के सामने रख कर देखो कि विवाह के बाद भारत में जैसी परिपाटी है उसमें स्त्री को अचानक आर्थिक लाभ बहुत हो जाता है। और वो आर्थिक लाभ हो उसके लिए आवश्यक है कि वो पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था के अनुशासन के दायरे में रहे।

अगर विद्रोह करती है कोई लड़की परिवार के विरुद्ध, समाज के विरुद्ध, बंधनों के विरुद्ध, तो सबसे पहले वो क्या खोती है? बहुत अच्छा सा घर होगा, उससे वंचित होना पड़ेगा। और घर से अभी मैं रिश्ते, सम्बन्ध इत्यादि की बात नहीं कर रहा। मैं सीधे-सीधे बिस्तर एयर-कंडीशनर, फ्रिज, हॉल, गाड़ी, ड्राइवर, लॉन इनकी बात कर रहा हूँ।

पहले वो मिल जाता है पिता के अनुशासन के अधीन रह कर। और अगर पिता के अनुशासन के अधीन हो तो पिता विवाह ही ऐसी जगह कर देंगे जहाँ वही सब मटीरियल सुख-सुविधाएँ मिलने लगेंगी पति के अनुशासन के अधीन रह कर।

एक चमकती हुई कोठी से विदाई होकर दूसरी चमकती हुई कोठी में प्रवेश हो जाता है। और अगर विद्रोह किया इस व्यवस्था के प्रति तो कोठियों से हाथ धोना पड़ता है। फिर जाकर रहो किसी पी.जी. में। और हैं लड़कियाँ जिन्होंने विद्रोह करा है। उनकी कोठियाँ छिन गईं। अब वो पी. जी. इत्यादि में रहती हैं। घर पर तो दो नौकर, चार नौकर, गाड़ी, सॉफर।

तो निर्भरता भावनात्मक है? डर क्या छिनने का है?

डर कोठी और पैसा छिनने का है। सुख-सुविधाएँ छिनने का है।

मुझे मालूम है। ये बोल रहा हूँ। ये सुनने में अच्छी नहीं लगेगी। मुझे कहने में अच्छी नहीं लग रही, तुम्हें सुनने में कैसे अच्छी लगेगी। पर बात जैसी है वैसी कहनी तो पड़ेगी न? न कहूँ तो मैं तुम्हारे साथ नाइंसाफी करूँगा।

एक कोठी से दूसरी कोठी की जो यात्रा होती है, और कल रात में आपने जो दृश्य देखा उसमें बड़ा गहरा अन्तर्सम्बन्ध है। समाज स्त्रियों का शोषण तो खूब करता है। लेकिन साथ ही साथ उन्हें सजा-धजा के भी रखता है और सुख-सुविधा संपन्न भी रखता है। स्त्री घर की लाज और इज़्ज़त होती है न? तो उसे सुख-सुविधा से लैश रखा जाता है।

कोठियों वाली स्त्रियों को तुमने धूप में सड़क पर कब घूमते देखा? हाँ घर के अंदर उनका कितना भी शोषण हो रहा हो। घरेलू हिंसा ही हो रही हो। ये संभव है। पर हिंसा भी एयर-कंडीशनर वाले कमरे में ही हो रही होगी। बलात्कार भी हो रहा होगा उनका घर के अंदर तो जिस गद्दे पर हो रहा होगा वो एक लाख रुपय का होगा। शायद मैंने सस्ती बात बोल दी — पांच लाख। तो सुविधा तो पूरी मिलेगी।

गोरे मुखड़े पर आंच नहीं आने वाली। हाँ, मन भले गन्दा कर दिया जाए।

ये बात थोड़ी सी अंतर विरोधी लगेगी पर इसको समझना।

एक तरफ तो पुरुष वर्ग स्त्रियों का गहराई से शोषण करता है। दूसरी ओर उनको गहनों से लाद कर भी तो रखता है न? ये आभूषणों की दुकाने, इनमें क्या पुरुषों के गहने बिक रहे हैं? बोलो?

चुनाव स्त्री को करना है। मिलेंगे तो दोनों एक साथ मिलेंगे — गहने और शोषण। और अगर शोषण नहीं चाहिए तो गहने और कोठियाँ भी छोड़नी पड़ेंगी।

जिन्हें कोठियों का लालच है वो शोषण करवाने के लिए भी तैयार रहें। जो अपनी पहचान ही यही बना चुकी हैं कि "मैं तो उच्च कुल की इज़्ज़तदार स्त्री हूँ", वो अब बिलकुल तैयार रहें कि उच्च कुलीन लोग ही उनका शोषण भी खूब करेंगे।

और खबरदार इस पूरे मुद्दे में भावुकता को मत लेकर आना। ये मत कह देना कि "मुझे तो इतना प्यार है नात-रिश्तेदारों से कि मैं प्यार के कारण बंधन में बंधी हुई हूँ।" ये बात प्यार इत्यादि की नहीं है। लम्बी गाड़ी और तीन टन के ए.सी. की है। यही वजह है कि निम्न वर्ग या निम्न-माध्यम वर्ग की लड़कियों के लिए उड़ान भरना अपेक्षतया आसान होता है। क्योंकि उनके बापों के पास ऐसा कुछ होता ही नहीं कि वो उनको रोक पाएँ या बाँध पाएँ। मैं निम्न आय वर्ग की बात कर रहा हूँ, और कुछ नहीं।

छोटे शहरों की निम्न-माध्यम वर्गीय लड़कियाँ कई बार अपेक्षतया ज्यादा आसानी से फुर्र उड़ जाती हैं। पर धनाढ्य परिवारों में बड़ा मुश्किल होता है लड़की के लिए। लालच बहुत बड़ा है कैसे उड़ जाएगी? पहले पिता के घर का लालच और फिर पिता ही तो रिश्ता तय करेंगे न, अपने ही जैसे किसी सेठ जी के यहाँ? तो ससुराल के पैसे का लालच।

और जो विरोध करेगा उसको बहुत चीजों से हाथ धोना पड़ता है। घर में रहते हो तो "मैम-मैम, बेबी-बेबी", बाहर निकलोगे, सड़क की धूल फाँकोगे। वहाँ कौन तुमको मैम-मैम करने वाला है? आजादी बड़ी कीमत माँगती है न? धूप में गोरा रंग भी काला पड़ जाएगा। टोयोटा से स्कूटी पर आ जाओगे। और स्कूटी भी किश्तों की।

अभी बढियाँ दो लाख रुपय के डाइनिंग टेबल पर स्प्रेड बिछता होगा। कुक आकर बिछा देता होगा। तीन-चार तरह की सब्जी, ये वो...। उसके बाद, बाहर निकल गए अगर तो राकेश के अमृतसरी छोले-कुलचे। पेट भी ख़राब होगा। क्योंकि पेट को तो उच्च वर्गीय माल की आदत पड़ी हुई है।

अभी तो ऐसा रहता है कि सर के लिए दो-तीन तरह के अलग-अलग शैम्पू , मुँह के लिए दो-तीन तरह के फेस वॉश, एक लेफ्ट हैंड वॉश, एक राइट हैंड वॉश, फिर एक बॉडी वॉश, और फिर इतना वॉश कर के जब सूख जाए बहुत मामला तो कंडीशनर, उसके ऊपर ऑलिव-आयल फिर एलोवेरा का पेस्ट।

बाहर निकल गईं, काम करने लग गईं, तो सर पर जल्दी से डालो रामदेव का तेल और बस पकड़ो या स्कूटी निकालो। फिर कहाँ तुम्हें इम्पोटेड ऑलिव-आयल और ये सब चीजें नसीब होने वाली हैं? मैं बहुत ज्यादा ज्ञान नहीं रखता हूँ इन विषयों में, तो कुछ गलत कह रहा तो... (हाथ जोड़ते हुए)

मैंने देखा है, पूरी-पूरी अलमारी टॉइलेट्रीज़ की होती है। वो जो टॉइलेट्रीज़ से भरी हुई अलमारी है न? वही बंधन है। पूरी-पूरी अलमारी जूतों की होती है। वो जो जूतों की पूरी अलमारी है न, वही बंधन है।

नारियल का तेल इस्तेमाल किया करो। सर पर भी चलता है, मुँह पर भी चलता है, शरीर पर भी चलता है और कढ़ाई में भी चलता है। इतना बड़ा खरीदो पैराशूट (नारियल का तेल) और उसके साथ बस एक चाहिए कंघा। कुछ और नहीं।

क्या आपको आचार्य प्रशांत की शिक्षाओं से लाभ हुआ है?
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