प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जीवन में क्या ध्यान करना आवश्यक है?
आचार्य प्रशांत: अगर अभी ध्यान न हो तो सुनोगे कैसे कि मैं क्या कह रहा हूँ? और मैं ध्यान न दूँ, तो मैं उत्तर कैसे दूँगा? प्रश्न ही नहीं जान पाऊँगा।
देखिए, अभी आप कैसे स्थिर बैठे हैं, आँखें मेरे चेहरे पर गड़ा दी है, है न? इसी को ध्यान कहते हैं। उचित ध्येय को बना लेना ही ध्यान है। ध्येय उचित, तो आप ध्यानी। जिस किसी ने भी उचित ध्येय बना रखा है, उसे तुम ध्यानी कह सकते हो। तो देखिए, अभी आपने मुझे ध्येय बना रखा है, कुछ उत्तर, कुछ समाधान पा रहे हैं, तो आप क्या हैं अभी? ध्यानी हैं। और यही मैं आपको कुछ कह रहा हूँ और आप उधर देखें कि सीढ़ियाँ हैं, पेड़ है, कुछ आवाज़ आ रही है, तो फिर आप ध्यानी नहीं हुए। तो ध्यान इसलिए आवश्यक है।
जीव के पास सदा ध्येय होता है। या तो ये कह दो कि तुम्हारे पास कोई ध्येय नहीं। ध्येय है न? क्यों ध्येय है? क्योंकि जो घर से दूर हो, उसे घर लौटने का ध्येय बनाना पड़ता है। और जीव होने का अर्थ ही है घर से दूर होना, तो जीव के पास ध्येय हमेशा होगा। अनिवार्यता है कि जीव हमेशा अपने साथ एक लक्ष्य, एक ध्येय रखकर चलेगा। और अगर ध्येय के साथ न्याय करना है, ध्येय को पाना है, तो तुम्हें होना पड़ेगा ध्यानी।
तो अभी भीतर जो बेचैनी थी, उसको दूर करने के लिए मुझसे पूछा प्रश्न। बेचैनी के कारण ध्येय बनाया; ध्येय क्या था? प्रश्न का उत्तर। लेकिन वो उत्तर आप तक पहुँच सके, इसके लिए आपकी कौनसी अवस्था आवश्यक है? ध्यान की अवस्था। तो इसलिए ध्यान जीवन में आवश्यक है, क्योंकि हमारे पास ध्येय होने अनिवार्य हैं। ध्येय बस किसके पास नहीं होता? जो घर पहुँच गया, उसके पास कोई लक्ष्य नहीं होता, या होता है? पर यहाँ कोई ऐसा है जो कहे कि मैं तो घर ही पहुँचा हुआ हूँ?






