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क्या सिखाना चाहती है कोरोना महामारी? || आचार्य प्रशांत, कोरोनावायरस पर (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आम जन मानस में ये धारणा घर करती जा रही है कि कोरोनावायरस ईश्वरीय प्रकोप है। कृपया कुछ कहें।

आचार्य प्रशांत: नहीं, ईश्वरीय प्रकोप वगैरह तो नहीं है। कोई ईश्वर नहीं बैठा है ऊपर आसमानों में जो वहाँ से वायरस बरसा रहा हो। लेकिन ये जो बात लोगों को प्रतीत हो रही है, उसमें थोड़ा यथार्थ तो है। समझना पड़ेगा बात क्या है।

देखिए, कहाँ से आया वायरस और उसके आने के फलस्वरूप क्या हुआ है? पहले भी कहा था, मैं फिर दोहरा रहा हूँ, वायरस अपनी इच्छा से या कोई साज़िश, षड्यंत्र करके तो नहीं आया है न? नहीं। बहुत बीमारियाँ होती हैं जो हमें यूँ ही लग जाती हैं। ये जो महामारी फैली है, वो हमें ‘यूँ ही’ नहीं लग गई। मानव जाति पूरी तरह से उत्तरदाई है इस बीमारी को आमंत्रित करने के लिए, बल्कि आविष्कृत करने के लिए।

एक बात तो ये है कि हम गए हैं और इस बीमारी को जंगल से खींचकर लाए हैं, और अभी जैसे-जैसे तथ्यों पर से पर्दा हटेगा, ये भी पता चल सकता है कि हम इसको जंगल ही भर से खींचकर नहीं लाए हैं, हमने इस बीमारी का शायद आविष्कार ही किया है। अभी कुछ पक्का पता नहीं। पर चाहे आमंत्रित किया हो, चाहे आविष्कृत किया हो, किया तो काम हमने ‘आ बैल, मुझे मार’ का ही है। तो मुश्किल है ये न देख पाना कि यहाँ कर्मफल का सिद्धांत काम कर ही रहा है।

हम जिन तरीक़ों से जी रहे थे, मैं पूरी मानवता की बात कर रहा हूँ, हम जिन आधारों पर, जिन सिद्धांतों पर अपनी सभ्यता, संस्कृति आधारित कर रहे थे, जीवन को आगे बढ़ा रहे थे, वो ग़लत तो हैं ही, झूठे तो हैं ही न? प्रकृति का क्रूर दोहन, विकास की झूठी और खोखली परिभाषा, उपभोग की अंतहीन कामना, ये आम आदमी का जीवन है। मैं दुनिया भर के लोगों की बात कर रहा हूँ, मैं सब आठ-सौ करोड़ लोगों की बात कर रहा हूँ। मैं सब देशों की बात कर रहा हूँ।

सब देशों का लक्ष्य है ‘विकास’। और विकास की क्या परिभाषा है? तुम्हारे पास उपभोग के लिए ज़्यादा माल होना चाहिए। जिस देश के पास भोगने के लिए जितना माल है, उतना वो 'विकसित' कहलाता है। ऐसे आदमी चल रहा है, और आपको भोगने के लिए माल चाहिए, तो अब अपने जंगलों का संरक्षण क्यों करोगे? आपको भोगने के लिए माल चाहिए, तो जो ही जीव-जंतु-जानवर आपको मिलेगा, आप उसे मारकर क्यों नहीं खाओगे? पर ऐसा ही चारों तरफ़ माहौल है। ये जो माहौल है, ऐसा नहीं कि ये ‘कुछ’ लोगों के मन में है—ये ‘सब’ वैश्विक संस्थाओं का आधार है, ये सरकारों का आधार है। बल्कि हमारी पूरी जो जनतांत्रिक अर्थव्यवस्था है, ये उसका आधार है।

तो ये सब चल रहा था, इसी के परिणाम स्वरूप ऐसा हुआ कि एक देश में लोग घुसे हैं जंगल में और ऐसे-ऐसे जानवर खा रहे हैं जो कि पहले बिल्कुल अभक्ष समझे जाते थे।

हर जानवर अभक्ष होता है, नहीं खाया जाना चाहिए। लेकिन जब आदमी बिल्कुल ही विवेकहीन हो जाए, तो फिर तो उसको जो कुछ भी चलता-फिरता दिखाई देगा, उसकी इच्छा-लालसा उठेगी कि इसी को मारके, काटते, उबालके, तलके खा लो। ऐसे समझ लो जैसे कि तुम बिल्कुल विवेकहीन हो जाओ तो तुम्हें ये इच्छा उठे कि कोई भी स्त्री-पुरुष जा रहा है, उसी को पकड़कर के उसी का उपभोग कर डालो। कोई भी स्त्री जा रही है, कोई उम्र हो, कोई उसकी अवस्था हो, कर डालो उसका उपभोग, कर लो व्यभिचार। उठ सकती है न ऐसी इच्छा? तो ठीक उसी तरीक़े से ये बात कि सब मार के, काट के, तल के, उबाल के खा जाना है।

ये बात सिर्फ़ आपके ‘खाने की आदतों’ की नहीं है, आप इस बात को समझिए पहले। आप ये नहीं कह सकते कि “एक देश के कुछ लोगों की जो खान-पान की व्यवस्था और आदते हैं, वो इस तरह की थीं,” ये पूरी दुनिया में मानसिकता ऐसी है। ये खान-पान की व्यवस्था की बात नहीं है; पूरी दुनिया की ‘मानसिकता’ की बात है।

हम उपभोगवादी युग में जी रहे हैं। जो कुछ भी दिख रहा है, वो हमारे लिए बस कंज़म्पशन की, भोग की एक वस्तु है। वो इसलिए, क्योंकि ‘अध्यात्म’ को तो हमने कूड़ा-करकट समझकर के बिल्कुल फेंक दिया है। जब आप अध्यात्म को फेंक देते हो ‘कूड़ा’ जानकर, तो जीवन में ज़बरदस्त ‘अपूर्णता’ आ जाती है। और फिर आप उस अपूर्णता को दुनिया-भर की चीज़ों के उपभोग से भरना चाहते हो। हम वही कर रहे हैं।

अब देखिए ये जो पूरा कार्यक्रम चल रहा है दुनिया में, ऐसा तो नहीं होने वाला है न कि आसमानों से घोषणा होगी, आकाशवाणी होगी कि - "देखो तुम लोग बहुत ग़लत ज़िंदगी जी रहे थे, इसलिए तुमको सज़ा के तौर पर ये बीमारी दी जा रही है।" वो तो कहीं कोई घटना होगी और आप फिर सज़ा भुगतोगे।

ऐसा समझ लो कि एक जवान आदमी है जो हर तरीक़े से ग़लत ज़िंदगी जी रहा है—वो एक ग़लत नौकरी करता है जिसमें दिन में वो अंधाधुंध काली-कमाई करता है, उसके बाद वो शाम को अपना समय अपनी रंगीनियों में गुज़ारता है। उसके बाद वो रात को जमकर के शराब पीता है। ऐसा उस व्यक्ति का पूरा जीवन है, चौबीस घंटे है। अब ऐसा उसका जीवन चल रहा है, कई सालों से चल रहा है। एक दिन ऐसा होता है कि वो रात में शराब-वराब पीकर के निकलता है, और दुर्घटना हो जाती है। तो अब क्या बोलोगे, वो जो दुर्घटना हुई है वो उस दिन की किसी हरकत के फलस्वरूप हुई है? बोलिए। वो जो घटना हुई है, वो लगेगी तो यही कि ‘आज’ हुई, पर वास्तव में वो जो घटना है, वो जो दुर्घटना घटी है, वो उस युवक की पूरी ज़िंदगी का अंजाम है न? "तू सालों से ग़लत ज़िंदगी जी रहा था, कभी-न-कभी तो तेरा घड़ा भरना ही था न—वो आज भर गया।"

और कर्मफल का सिद्धांत व्यक्ति-रूप में तो सामने आएगा नहीं, ये तो कहेगा नहीं कि, “देखिए जी, आपके घड़े की कुल क्षमता नौ-सौ-अस्सी लीटर की थी। बहुत बड़ा घड़ा था आपके पाप का—नौ-सौ-अस्सी लीटर की क्षमता थी। और आज वो भर गया, तो अब आपकी दुर्घटना होगी और उस दुर्घटना में आपकी एक टाँग कट जाएगी। टाँग कट जाएगी, और खोपड़ा हिल जाएगा।” कोई ऐसे तो कहने आएगा नहीं, वो तो अनायास बस दुर्घटना हो जाएगी। हाँ, आपमें ज़रा समझ है तो फिर आप समझ जाएँगे कि ये जो दुर्घटना हुई है वो आपको आपके सब संचित कर्मों का फल मिला है। ये जो हरकतें आप पिछले पाँच साल, दस साल, न जाने कितने दशकों से करते आ रहे थे, उसका कुल जमा फल आपको अचानक एक घड़ी में मिल गया। आप रात में शराब पीकर के निकले, आपने गाड़ी भिड़ा दी, दुर्घटना हो गई।

लेकिन अगर आपकी बुद्धि खुली नहीं है अभी, तो आप कह देंगे, “नहीं, नहीं, नहीं, ज़िंदगी तो मैं ठीक ही जी रहा था, वो तो बस आज की रात थोड़ा-सा स्टीयरिंग नियंत्रण से बाहर चला गया। दिक़्क़त मेरी ज़िंदगी में नहीं है, दिक़्क़त बस ये है कि ये जो आज गाड़ी है न गाड़ी, ये गाड़ी एकदम नई थी। मैं हर छह महीने में नई गाड़ी लेता हूँ। ये गाड़ी बिल्कुल नई थी, इसके स्टीयरिंग पर हाथ जमा नहीं था। तो आज ये स्टीयरिंग ज़रा नियंत्रण से बाहर चला गया, इसलिए हमारी दुर्घटना हो गई, वरना तो ज़िंदगी हम जैसी जी रहे हैं, वो बिल्कुल ठीक है, वैसी ही जीएँगे।” आप ऐसा दावा भी कर सकते हैं।

आज भी ज़्यादातर लोग यही सोच रहे हैं कि ये जो महामारी है, ये बस एक दुर्घटना है, संयोगवश हो गई, एक ऐक्सिडेंट भर है। नहीं। देखिए, दुर्घटना नहीं है, ये कर्मफल है। इस बात को समझिए। छोटी दुर्घटना है, तब ही चेत जाइए, नहीं तो और बड़े-बड़े आघात लगेंगे।

और देखिए हुआ क्या है। निश्चित रूप से बहुत लोगों की मौतें हो रही हैं, बड़ी दुखद बात है ये! लेकिन ज़रा बड़ी तस्वीर पर गौर करिए। अगर आप भारत को लें, तो आज की तारीख़ तक कुछ सौ मौतें हुई हैं, कुछ पच्चीस हज़ार लोग होंगे जो संक्रमित हुए हैं। भविष्य में दुर्भाग्यवश ये आंकड़ा ज़बरदस्त रूप से बढ़ने वाला है। मई के महीने में आशंका व्यक्त की जा रही है कि पंद्रह-बीस मई के आसपास इन संख्याओं में ज़बरदस्त विस्फोट भी हो जाएगा। लेकिन थोड़ा समझिएगा। कितनी ही मौतें हैं जो रुक गई हैं। भई, आदमी की जान किसी भी वजह से जाए, जान तो गई न? तो जब हम ये देखते हैं कि देश की स्थिति क्या है, या कि किसी घटना का देश पर कुल प्रभाव क्या पड़ा है, तुम्हें सब कुछ देखना पड़ेगा न? हाँ, सैकड़ों हज़ारों लोग हैं जिनकी जानें जा रही हैं, पर न जाने कितनी बीमारियाँ हैं जो कम होती जा रही हैं।

ठीक है, ये लॉकडाउन एक तात्कालिक उपाय ही है, लेकिन हमने कभी गौर नहीं किया कि सड़क दुर्घटना में कितने लोग मारे जाते हैं। सड़क दुर्घटनाओं में पिछले दो महीनों में अपूर्व कमी आई है। सीधी-सी बात है, लोग हैं ही नहीं सड़कों पर। ये बात हमेशा नहीं चलेगी कि लोग सड़कों पर नहीं होंगे, पर समझिए बात को। इसी तरीक़े से अगर अस्पतालों के आंकड़ों पर विश्वास किया जाए तो हृदय रोगों के मरीज़ों में और अन्य कई रोगों के मरीज़ों में कमी ही आई है। कोरोना-वायरस फेफड़ों पर असर करता है, और अक्सर फेफड़ों पर उसका जो असर होता है, उसी के कारण मृत्यु भी होती है। लेकिन हवा बहुत साफ़ हो गई है, दशकों में इतनी साफ़ नहीं थी हवा जितनी अब हो गई है, जिसके कारण साँस की बीमारी के, फेफड़ों की बीमारी के न जाने कितने मरीज़ों को राहत भी मिल रही है। वही कोरोनावायरस जो फेफड़ों की दुर्गति कर देता है, उसी के प्रभाव के चलते करोड़ों लोगों के फेफड़ों को राहत भी मिल रही है, क्योंकि प्रदूषण बहुत-बहुत कम हो गया है।

मैं यहाँ पर ये कहने के लिए नहीं बैठा हूँ कि बहुत अच्छा हुआ कि कोरोना-वायरस जैसी महामारी पृथ्वी पर फैल गई। मैं बस ये देखना चाहता हूँ, समझना चाहता हूँ, कि कौन-सी चीज़ें हैं जो इस बीमारी की ठोकर के कारण रुक गईं। अगर ये बीमारी वास्तव में हमारे कर्मों का कर्मफल है, तो कौन-से हमारे कर्म थे जो इस बीमारी के कारण होने बंद हो गए? कौन-सी चीज़ें हैं जो बिल्कुल ठहर गई हैं? माँस के उपभोग में, मेरे पास आंकड़े नहीं हैं, पर मैं समझता हूँ कि दो-तिहाई से तीन-चौथाई की कमी आई होगी; भारत में भी, पूरी दुनिया में भी। आप समझ रहे हैं, कितने अरब जानवरों की जान बच चुकी है?

माँस के भक्षण में कम-से-कम पचास प्रतिशत की कमी आई होगी, हो सकता है अस्सी-नब्बे प्रतिशत की कमी आ गई होगी। देश-देश पर निर्भर करता है। कितने अरब जानवरों की जान बची है, सोचिएगा। इसी तरीक़े से जो मानवता के सामने बड़े-से-बड़ा ख़तरा है वैश्विक तापन का, अंथरोपोजेनिक ग्लोबल वार्मिंग (मानवजनित वैश्विक तापमान) का, उसको रोकने के लिए हमारी संस्थाएँ, हमारी सरकारें, हमारे जन-आंदोलन, ज़्यादा कुछ नहीं कर पाए, पर ये वायरस बहुत कुछ कर गया। उदाहरण के लिए दुनिया भर में जितने कार्बन एमिशन (कार्बन उत्सर्जन) होते हैं, उसका बहुत बड़ा हिस्सा बीस-से-तीस प्रतिशत आता है माँस के उपभोग से। वो माँस का उपभोग कम हो गया, कार्बन एमिशन अपनेआप कम होके रहेंगे।

इसी तरीक़े से जो हवाई यात्रा होती है, उससे फ़िलहाल दो-से-चार प्रतिशत कुल कार्बन का उत्सर्जन होता है। माने अगर सौ-यूनिट कार्बन हवा में घोला जाता है, तो उसमें से दो-से-चार प्रतिशत हवाई यात्राओं के कारण आता है। ये दो-से-चार प्रतिशत बहुत ज़्यादा नहीं है, पर अनुमान ये था कि अगले दस साल में ये दो-से-चार प्रतिशत का आंकड़ा बढ़कर के बीस प्रतिशत होने वाला था। अब ये नहीं होगा, बिल्कुल नहीं होगा। ये जो पूरा एविएशन सेक्टर (विमानन क्षेत्र) है, ये अब कभी इतना बलवान नहीं हो पाएगा। कम-से-कम अगले तीन-चार सालों में, पाँच सालों में तो नहीं हो पाएगा कि ये जिस गति से बढ़ रहा था, उस गति को दोबारा पा ले। और मैं उन लोगों को बिल्कुल समझता हूँ जिनकी हवाई यात्रा बिल्कुल अनिवार्य होती है। पर देखिए, आप भी जानते हैं और मैं भी जनता हूँ कि बहुत सारी हवाई यात्रा एकदम अनिवार्य नहीं होती।

आप जानते हैं कि एक किलोमीटर अगर आप फ़्लाइट से चल रहे हैं, और एक किलोमीटर वही आप अगर ट्रेन से चल रहे हैं, तो फ़्लाइट से चलने पर आप ट्रेन से चलने की अपेक्षा सौ गुने से भी ज़्यादा कार्बन का उत्सर्जन, एमिशन करते हैं? लोग कहते हैं, “लेकिन, समय तो बचता है।” अच्छा, मैं समझना चाहता हूँ, तुम्हारे समय की इतनी क़ीमत है क्या? या तुम फ़्लाइट पर बस इसलिए चलते थे क्योंकि तुम्हारे पास किसी तरीक़े से पैसा आ गया है? भई, तुमको दिल्ली से जाना है लखनऊ, अगर तुम ट्रेन से जाओगे तो कुल मिलाकर के तुमको हो सकता है आठ-नौ घंटे लग जाएँ। बल्कि ऐसी ट्रेनें भी हैं जो रात में चलती हैं क़रीब-क़रीब बारह बजे और सुबह छह-सात बजे लखनऊ उतार देती हैं, सात घंटे में पहुँच जाओगे। फ़्लाइट से जाते हो तो चेक-इन, चेक-आउट, सब कुछ मिला-जुला कर के तुम को तीन-चार घंटे लग जाते हैं। तुमने कुल मिलाकर के तीन या चार घंटे की बचत करी, और तुम कहते हो कि तुम्हारे समय की इतनी क़ीमत है! उन तीन-चार घंटों की इतनी क़ीमत है कि तुमने ट्रेन की अपेक्षा फ़्लाइट चुनी? जबकि ट्रेन में भी वो जो तुम्हारे तीन-चार घंटे अतिरिक्त लग रहे थे, उसमें तुम सो ही रहे होते हो। तो वास्तव में तुम्हारा एक मिनट भी फ़ालतू लगा नहीं है ट्रेन में। वहाँ भी यही होता कि तुम सोते-सोते पहुँच जाते। लेकिन चलो, लोगों का दावा होता है कि—समय बचता है।

तुम वही हो न, जो रात में टिक-टॉक पर बैठते हो, और दो घंटे लगा देते हो सोने से पहले? ये तुम्हारे समय की क़ीमत है। तुम्हारे समय की क़ीमत होती तो तुम सोशल-मीडिया पर इतना समय कैसे लगा रहे होते? तुम्हारे समय की क़ीमत होती, तो तुम 'बाबू-शोना' से ‘थाना-थाना’ कैसे कर रहे होते चार-चार घंटे तक? ये तुम्हारे समय की क़ीमत है? बोलो?

तुम टी. वी. चैनल लगाकर के व्यर्थ चीज़ें देखते रहते हो, कभी कुछ न्यूज़ चैनल लगाया, कभी नेटफ्लिक्स लगी है, और उसपर एक-से-एक बेहूदगी तुम देखे जा रहे हो, और ये घंटों-घंटों, दिनों-दिनों, हफ़्तों-हफ़्तों चल रहा है। ये तुम्हारे समय की क़ीमत है? लेकिन जब ट्रेन में और फ़्लाइट में चुनना होता है, तुम कहते हो, “हम तो इतने बड़े आदमी हैं कि हमारे एक घंटे की बहुत क़ीमत है, हमें तो फ़्लाइट से जाना है।” तुम्हारे घंटे की अगर क़ीमत है, तुम्हारे समय की क़ीमत है, तो वो बात तुम्हारी ज़िंदगी के अन्य पक्षों में क्यों नहीं दिखाई दे रही? तुम जगह-जगह पर मिनट-मिनट समय बर्बाद करते हो, तब तो तुम्हारे समय की क़ीमत नहीं होती। फ़्लाइट का टिकट तुम सिर्फ़़ इसलिए अफोर्ड (प्रदान) कर रहे हो बेटा क्योंकि सस्ता है, और सस्ता इसलिए है क्योंकि अभी उसमें इस बात को फैक्टर-इन ही नहीं किया गया है, शामिल ही नहीं किया गया है, कि जब तुम फ़्लाइट पर चलते हो, तो तुम पूरी मानवता के ख़िलाफ़ अपराध कर रहे हो। उसपर एक ज़बरदस्त ग्रीन टैक्स लगना चाहिए। वो ग्रीन टैक्स लग गया होता, तुम फ़्लाइट पर बिल्कुल नहीं चलते। तब तुम्हारे समय की कोई क़ीमत नहीं बचती। तब तुम बिल्कुल हँसते-हँसते, राज़ी-खुशी जाकर ट्रेन में या बस में बैठ जाते।

तो ये हम ज़बरदस्त ग़लतियाँ तो कर ही रहे थे। हिन्दुस्तान जैसे देश में अन्तर्देशीय यात्रा के लिए विमान की कितनी ज़रूरत है, ये बड़ी बहस का मुद्दा होना चाहिए। मैं अंतर्राष्ट्रीय यात्राओं की बात नहीं कर रहा हूँ। निश्चित रूप से आपको अगर भारत से अमेरिका जाना ही है तो आपको फ़्लाइट लेनी पड़ेगी, मैं उसकी बात नहीं कर रहा हूँ। पर दिल्ली से भोपाल जाने के लिए फ़्लाइट ली जा रही है, भोपाल से पुणे जाने के लिए फ़्लाइट ली जा रही है। चलो ये भी मैं समझ सकता हूँ कि आपको अगर चंडीगढ़ से चेन्नई जाना है, तो आपने फ़्लाइट ले ली। ठीक है, वो भी ठीक है। दिल्ली-बैंगलोर भी समझ में आता है, पर पांच-सौ या आठ-सौ किलोमीटर के लिए अगर आप फ़्लाइट का इस्तेमाल करते थे, वो समझ में नहीं आता। खैर अब ये जान लीजिए कि अब नहीं कर पाएँगे, वो हो गया। सुख भरे दिन बीते रे भैया!

आम आदमी की पहुँच से अब हवाई यात्रा दूर हो जाएगी। अब नहीं हो पाने वाला, क्योंकि वो जो बिल्कुल ठुसा हुआ केबिन होता है हवाई जहाज़ का, उसमें बैठना बहुत लोगों को डराएगा। अगर आप ट्रेन में भी यात्रा कर रहे हैं, तो आपके पास थोड़ी सहूलियत होती है कि आप बगल वाले से तीन-चार फिट की दूरी बना लें। हवाई जहाज़ में तो एकदम नहीं होती। तो हवाई जहाज़ों को अपनी आधी-अधूरी क्षमता पर, कैपेसिटी पर चलना पड़ेगा। अगर दो-सौ लोग जा सकते थे हवाई जहाज़ में, तो हवाई जहाज़ों को झक्क मारके अधिक-से-अधिक अस्सी लोग भरने की अनुमति मिलेगी। अनुमति भी मिलेगी और लोग भी नहीं आएँगे, तो जो किराया है, जो टिकट का दाम है, वो दो-गुना, तीन-गुना हो जाना है। ये दो-गुना, तीन-गुना दाम होगा, इससे आप ये मत समझिएगा कि जो बेचारे ज़रूरतमंद लोग हैं उनकी जेब कटेगी, न। ज़्यादातर लोग व्यर्थ ही हवाई-जहाज़ पर बैठने पहुँच जाते थे, वो नहीं जाएँगे; अच्छा होगा। वो ही रुकेंगे। जो ज़रूरतमंद लोग हैं, वो कर लेंगे यात्रा। और अगर आप पाँच बार हवाई यात्रा करते थे तो वास्तव में आपको ज़रूरत एक ही बार होती थी। तो वो एक बार आप कर लेंगे। कैसे कर लेंगे? क्योंकि चार बार नहीं करी। पैसे बचे न? चार बार नहीं करी पैसे बचे, एक बार आप कर लेंगे। पर चार नहीं करी आपने, तो चार बार अब हवाई जहाज़ थोड़ा कम उड़ेगा। जब यात्री ही नहीं रहेंगे तो हवाई उड़ानों में भी तो कमी आएगी न? जब हवाई जहाज़ कम उड़ेगा तो कार्बन का उत्सर्जन कम होगा—कार्बन का उत्सर्जन कम होगा।

देखिए प्रकृति कर क्या रही है। मैं नहीं कह रहा कि किसी भगवान ने वायरस भेजा है, पर आप ज़रा कुल तस्वीर को समझिए प्रकृति क्या कर रही है। वो सारे काम जो इंसान के विवेक के द्वारा हो जाने चाहिए थे, इंसान के विवेक के द्वारा नहीं हुए, तो वो काम प्रकृति स्वयं कर रही है। तुम रोज़ अरबों जानवर काट रहे थे, प्रकृति ने कहा, "मैं कुछ ऐसा कर दूँगी कि तुम उन्हें काट ही नहीं पाओगे।" तुम ज़बरदस्ती हवा में कार्बन घोले जा रहे थे, घोले जा रहे थे, पृथ्वी को तबाह करे जा रहे थे। मानव जाति के लिए तो ठीक है, सब प्रजातियों के लिए बिल्कुल ज़बरदस्त ख़तरा पैदा कर रहे थे। प्रकृति ने कहा—"मैं ऐसे हालात पैदा कर दूँगी कि तुम हवाई यात्रा कर ही नहीं पाओगे।"

लोग कहते हैं, "अर्थव्यवस्था को झटका लगेगा," आप गौर करिएगा कि अर्थव्यवस्था में भी किन सेक्टर्स को सबसे ज़्यादा झटका लगने वाला है। अधिकांशतः उन्हीं सेक्टर्स को जो लगभग गैर-ज़रूरी हैं, क्योंकि जो भी चीज़ ज़रूरी होगी, उसे झटका लग नहीं सकता। मानव जीवन के लिए जो भी चीज़ आवश्यक है, अपरिहार्य है, वो कैसे रुक जाएगी?

अब आदमी को जीने के लिए खाना चाहिए तो आप ये नहीं कह सकते कि खेती को झटका लग जाएगा, किसान को झटका लग जाएगा। फसल तो उगेगी, और वायरस फ़सलों पर तो आक्रमण नहीं करने वाला। फसल तो उगेगी, और आदमी उतना ही खाएगा जितना हमेशा खाता था। जो भी क्षेत्र हैं अर्थव्यवस्था के, जो वास्तव में आवश्यक हैं, वो तो पहले की तरह ही चलते रहेंगे। शिक्षा के क्षेत्र को भी कोई झटका नहीं लग जाने वाला, स्वास्थ्य सेवाओं को भी कोई झटका नहीं लग जाने वाला। जो-जो चीज़ें आदमी के लिए आवश्यक हैं, वो बिल्कुल वैसी चलेंगी जैसी चल रही थीं। कपड़ा आदमी की ज़रूरत है, तो वो फ़ैक्टरीज़ या वो कंपनियाँ जो कपड़ों का उत्पादन करती थीं, आवश्यक कपड़ों का—मैं लग्ज़री ब्रांड्स की बात नहीं कर रहा—वो पहले की तरह चलेंगी, पूर्ववत। उन्हें कोई दिक़्क़त नहीं आने वाली।

किन चीज़ों पर गाज गिरने वाली है? उन चीज़ों पर जो निहायती गैर-ज़रूरी थीं, जिनका उपभोग सिर्फ़ अय्याशी के लिए होता था, वो सब चीजें बहुत ज़बरदस्त तरीक़े से ठोकर खाएँगी—जैसे टूरिज़्म (पर्यटन)। और हवाई यात्रा और टूरिज़्म में आपस में गहरा संबंध है, ये तो जानते ही हो। जैसे ज़बरदस्त सात-सितारा होटल। लोग होते हैं जिन्होंने अपना शहर नहीं देखा होता, अपना गाँव नहीं देखा होता, और वो कहते हैं कि—" हम जा रहे हैं पेरिस घूमने और सेशल्स घूमेंगे।"

“कहाँ से आ रहे हो?”

“स्विट्ज़रलैंड, ज़ुरिच।”

"भई, तुमने अपना पुश्तैनी घर देखा है? तुम्हारे गाँव के पास एक नदी बहती है, तुमने वो भी देखी है?"

“नहीं, वो नहीं देखी।”

“तो कहाँ गया था?”

“वो आल्पस की चोटी पर चढ़ा हुआ था।”

“क्या कर रहा था वहाँ चढ़कर?”

वही कर रहा होगा जो जीवन भर तुमने करा है—गंदगी।

तुम्हारा जी भर गया अपने आसपास के सब छोटे-मोटे पहाड़ों को गंदा करने से तो तुम जाकर के आल्पस पर भी अपनी छाप छोड़ आए! "हम जहाँ रहेंगे, अपने निशान कायम करेंगे।" अब ये नहीं कर पाओगे, अच्छी बात है कि नहीं कर पाओगे। वो सब चीजें जिनको तुम बोलते थे ‘लाइफ़-स्टाइल’, वो चपेट में आएँगी क्योंकि ‘लाइफ़-स्टाइल’ का मामला ही तब शुरू होता है जब तुम्हारे पास ज़रूरत से थोड़ा ज़्यादा पैसा आ जाता है। कहते हैं, क्या कर रहे हो? “इटिंग आउट!” अब वो ‘इटिंग आउट’ गया। कैसे बैठोगे जाकर रेस्तराँ में? तुम्हें कैसे पता कि तुम्हारे सामने जो टंगड़ी-कबाब लाया गया है उसमें किसी वेटर ने छींक नहीं दिया है?

गया! बैठो बेटा, घर में भी चूल्हा है, घर में भी चीज़ें हैं। दाल-चावल खाओ, स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। हाँ, ये पक्का है कि बीमारियों में कमी आनी है। बीमारियों में कमी आनी है, आदमी को वायरस लगा है बाकी सब प्रजातियाँ हर्ष मना रही हैं। जानवरों का कटना कम हो गया है, जंगलों का कटना कम हो गया है, हवा में प्रदूषण कम हो गया है, हवा में कार्बन कम हो गया है। अर्थव्यवस्था-अर्थव्यवस्था करके हम रोएँ, उससे पहले हमें ये सवाल पूछना होगा, “आदमी की ज़िंदगी में अर्थव्यवस्था का कितना महत्व है?” तुम्हारा जीवन बस आर्थिक केंद्र से चलता है क्या भाई, कि बस 'अर्थव्यवस्था-अर्थव्यवस्था' करे जा रहे हो?

मैं बिल्कुल समझता हूँ उन ग़रीबों का दर्द जिनकी रोज़ी-रोटी छिन रही है। और मुझे बहुत अफ़सोस है कि मानवता के कुकर्मों की चोट, कुल, समूची मानवता के कुकर्मों की चोट मानवता के उस हिस्से पर पड़ रही है जो बेचारा सबसे ज़्यादा दुर्बल है। गेहूँ के साथ घुन पिस रहा है, बल्कि गेहूँ कम पिस रहा है, घुन ज़्यादा पिस रहा है। अभद्रताएँ, अश्लीलताएँ, तमाम तरह के दुष्कर्म किए अभिजात्य वर्ग ने, अमीरों ने, ताक़तवर लोगों ने, और उसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव पड़ने जा रहा है ग़रीबों पर— ये बहुत अफ़सोस की बात है।

लेकिन अमीरों की भी ठसक पर चोट तो पड़ेगी, ये अच्छी बात है। कोई ची़ज ऐसी होती जिसको तुम पैसा देकर ख़रीद लेते तो तुमने ख़रीद ही लिया होता। तुम प्रकृति को कैसे ख़रीद लोगे पैसा देकर? ले जाओ अपने अरबों डॉलर और जाकर के जहाँ कहीं प्रकृति देवी हों, उनको घूस दे आओ, कि आप कोरोनावायरस को वापस बुला लीजिए। ये लीजिए हम आपको पचास ट्रिलियन डॉलर दिए देते हैं!

एक चीज़ और हो रही है। बहुत लोगों की ठसक पर बहुत चोट पड़ रही है। ये ट्रिलियन डॉलर्स से याद आया। बहुत लोग थे जिनको लगता था हमारी ही मुट्ठी में आकाश सारा, हम तो कर के दिखा देंगे। उनको लगता था कि हमारा पुरुषार्थ ही सर्वोपरि है, हम तो जो चाहें कर सकते हैं। उनको समझ में ही नहीं आ रहा होगा कि ये हो क्या गया उनके साथ, वो घर में घुसे बैठे हैं। दरवाज़ा खोलकर बाहर नहीं निकल सकते। और ये वो लोग हैं जो कह रहे थे कि “मैं तो जाकर चाँद पर बसूँगा। मैं तो जाकर मार्स को कॉलोनाइस करूँगा।” तुम अपने घर से बाहर निकलकर दिखा दो पहले।

तो आदमी को अध्यात्म की तरफ़ मुड़ने के लिए मजबूर करेंगी ये परिस्थितियाँ। वो लोग जो अपनी ताक़त के अभिमान में जीते थे, जिनको लगता था कि उनके पैसे से और उनके ज्ञान से तो न जाने क्या-क्या हो जाएगा, उनमें अगर ज़रा-सी भी विनम्रता होगी, तो उन्हें विवश होकर के अपनेआप से पूछना पड़ेगा, “आदमी की हस्ती ही क्या है? मैने जो कुछ अर्जित किया है, उसकी औक़ात ही क्या है? एक ज़रा सा जीवाणु बिल्कुल नतमस्तक कर गया मुझे। ज़रा-सा एक विषाणु है! और मेरी सारी दौलत उसके सामने किसी काम की नहीं है।”

कुछ पता नहीं। ये अभी देखिए छोटी आपदा है, ये जो वायरस है, ये ज़बरदस्त रूप से संक्रामक है, इसका संक्रमण फैलता बहुत है। पर ये जिसको लग जाए उसके लिए बहुत गंभीर बीमारी नहीं है। इतनी गनीमत है अभी। प्रकृति ने अभी हमें इतनी गुंजाइश कर दी है। ये जो कोविड -19 बीमारी है, ये अपनेआप में बहुत गंभीर बीमारी नहीं है। हाँ, ये संक्रमण फैलता बहुत ज़्यादा है। दिक़्क़त ये नहीं है कि ये बीमारी गंभीर है, दिक़्क़त ये है कि सबको जब लगेगी तो जिनको लग रही है, उनमें से अगर एक प्रतिशत लोग भी मेरे, तो मरनेवालों की तादाद बहुत ज़्यादा हो जाएगी।

गंभीर नहीं है, इसका प्रमाण ये है कि जिन लोगों को ये बीमारी लगेगी, उनमें अधिक-से-अधिक दो या तीन प्रतिशत, और शायद एक प्रतिशत से भी कम की मृत्यु होगी। हो रही है, आंकड़े सामने हैं। तो बहुत गंभीर बीमारी नहीं है। सौ लोगों को अगर वायरस लगेगा तो उसमें से किसी एक की मौत होती है, दो की होती है। लेकिन सौ को लगेगा तो एक की मौत होगी, और अगर चार अरब लोगों को लग गया तो? तो गड़बड़ हो गई न?

सौ को लगेगा तो एक की मौत होगी, चार अरब को लग गया तो फिर तो मरने वालों की तादाद करोड़ों में पहुँच गई, ये दिक़्क़त है। अब ज़रा ये कल्पना कर लीजिए कि जो अगला वायरस आ रहा है, जो अगला कोरोना-वायरस आ रहा है, वो इतना ही संक्रामक, इंफेकशियस होने के साथ-साथ ज़बरदस्त रूप से घातक भी हो, तब क्या होगा? ये जो अभी नॉवेल कोरोना-वायरस है, इसमें जो मृत्यु दर है, मोर्टेलिटी रेट, वो मान लीजिए दशमलव पाँच प्रतिशत का या दो प्रतिशत का है। ये हमको इतनी गनीमत मिली है। मान लीजिए, जो अगला आता है वायरस, हमारे कुकर्मों के चलते जो अगला हमपर वायरस का आक्रमण होता है, उसमें अगर मोर्टालिटी रेट पचास प्रतिशत का हो तो?

और ये जो अभी वायरस आया है, इसी के परिवार के अन्य वायरस आ चुके हैं, जिनसे संबंधित मृत्यु दर कहीं ज़्यादा थी—सार्स, ईबोला, ये सब। आ गया अगर कोई वायरस जिससे संबंधित मृत्यु दर, मोर्टालिटी रेट पचास प्रतिशत का है, और वो उतना ही संक्रामक है, इंफेकशियस है जितना कि ये वर्तमान वायरस, तब क्या करोगे?

तब चार अरब लोगों को लगेगा, तो दो अरब लोग मरेंगे। दो अरब जानते हो कितना होता है? दो-सौ करोड़ लोग! और तुम्हारे पास कोई तरीक़ा नहीं है उस स्थिति को रोक पाने का, कोई तरीक़ा नहीं है। तुम्हारे पास इतना भी समय नहीं मिलेगा कि तुम कहो कि “मैं तो वेक्सीन तैयार कर रहा हूँ, मैं तो वेक्सीन तैयार कर रहा हूँ।”

जीवन की नश्वरता को समझो। प्रकृति के साथ बदसुलूकी करना बंद करो। इतने बड़े नहीं हो तुम ‘इंसान’ कि तुम पूरे विश्व के शहंशाह हो जाओगे। अपनी हदों में रहो। ये बहुत दुःखदाई है, पूरा प्रसंग जो अभी चल रहा है, लेकिन फिर भी इससे सीख ली जानी ज़रूरी है।

और दुःख का एहसास तो होना शुरू हो ही गया है न?

मैं देख रहा था कि जब वायरस ने भारत में नया-नया प्रवेश लिया, तो बात मज़ाक की थी। लोग वीडियो-क्लिप्स बनाकर के भेज रहे थे, अपलोड कर रहे थे—'गो कोरोना गो' हो रहा है, औरतें गाना गा रही हैं—“कोरोना मेरे अंगने में थारो क्या काम है?” ये सब चल रहा था। वो बहुत जल्दी विलुप्त हो गया। उसके बाद वो सब शुरू हुआ कि थाली बजाओ, लोटा बजाओ, जैसे कि उत्सव हो रहा हो। वो सब भी गायब हो गया। फिर एक एनिमेशन कार्टून बनाया गया जिसमें एक चरित्र है एक लड़के जैसा, वो कोरोना-वायरस है, और वो धमधामाधम-धमधमाधम नाचता घूम रहा है, अब वो भी बंद हो चुका है। बात अब मज़ाक की हद से आगे जा चुकी है, लोगों को अब पीड़ा होने लगी है। कोरोना से संबंधित मज़ाक होने कम हो गए हैं, नहीं तो जब शुरू में आया था, तब तो हमें लग रहा था कि वाह-वाह-वाह कुछ भी नहीं है, ऐसा ही है— एक सामाजिक उत्सव है।

मई का महीना बड़ा दुःखदाई होने जा रहा है। मैं नहीं जानता कि हम कितना ज़्यादा रोक सकते हैं उस शारीरिक दुःख को जो हमारे ऊपर आने वाला है। किसी के ऊपर भी आ सकता है, आपके ऊपर, मेरे ऊपर। लेकिन हम इतना तो कर ही सकते हैं कि सबक लें, सीख लें, ताकि अगर किसी तरह इस आपदा से पीछा छूटे, तो हम कम-से-कम भविष्य में इसी तरह की या इससे भी ज़्यादा ख़तरनाक किसी दूसरी आपदा को आमंत्रित न करें।

देखिए, अध्यात्म के मूल सिद्धांतों के ख़िलाफ़ आप जब भी चलेंगे, उसका नतीजा आपको भुगतना पड़ेगा। सूक्ष्म रूप से वो नतीजा आपको तभी मिल जाता है जब आप अध्यात्म के ख़िलाफ़ जाते हैं, ठीक उसी क्षण में मिल जाता है। जब आप कोई घटिया काम करते हैं तो आपको सज़ा उसी पल में मिल जाती है। कैसे? आपका मन ऐसा हो गया न कि उसने घटिया काम करा। जो मन घटिया काम करे, वो मन अपनी सज़ा आप है न?

तो सूक्ष्म रूप से तो तब ही सज़ा मिल जाती है। स्थूल रूप से, माने प्रकट रूप से, सज़ा मिलने में वक़्त लगता है। चूँकि प्रकट रूप से सज़ा मिलने में वक़्त लगता है, तो हमको ऐसी ग़लतफहमी हो जाती है कि सज़ा हमें मिल ही नहीं रही।

लेकिन आप अध्यात्म के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ जा रहे हो तो सज़ा तो आपको मिलेगी— सूक्ष्म रूप से भी और स्थूल रूप से भी; प्रकट रूप से भी; आंतरिक रूप से भी और बाहरी रूप से भी। अभी जो ये महामारी आई है, ये बाहरी रूप से हमको सज़ा मिल रही है। बाहरी रूप से हमारे ही कुकर्मों की हमें सज़ा मिल रही है। हम सीख नहीं रहे लेकिन।

मुझे बड़ा अफ़सोस हुआ अभी मैंने अख़बार में आज ही या कल देखा कि एक राज्य सरकार विज्ञापन चला रही है कि —‘डरिए मत, चिकन खाने से कुछ नहीं होगा, आप चिकन खाइए’। साफ़-साफ़ इन्हीं शब्दों में लिखा हुआ है—‘डरिए मत, चिकन खाइए, चिकन खाइए, चिकन खाइए’। ये क्या कर रहे हो? तुम समझ भी नहीं रहे कि ये आपदा तुम्हें क्या संदेश देना चाहती है? तुम करदाताओं के पैसे से, तुम टैक्सपेयर्स मनी से, जानवरों को मारने का अभियान चला रहे हो। ये तुम क्या कर रहे हो? लेकिन हमें लग नहीं रहा कि बात समझ में बात आ रही है। हम अपनी बेवकूफियों पर अटल हैं।

ये आपदा यूँ ही नहीं आई है, ये आपको कुछ संदेश देने आई है। जो पैग़ाम है उसको पढ़िए, संदेश को समझिए। अभी छोटी चोट पड़ रही है, बहुत बड़ी चोट आगे पड़ सकती है।

जो कुकर्मी हैं, उनको चोट पड़े तो बात इंसाफ़ की भी है, दुःख इस बात का है कि कुकर्म करेंगे ताक़तवर, पैसेवाले लोग, और सबसे ज़्यादा चोट पड़ेगी उनपर जो ग़रीब हैं, फटेहाल हैं। लेकिन बचेंगे तो कोई दोषी नहीं। ठीक है, बेचारे ग़रीब पहले मारे जाएँगे, लेकिन ये जितने कुकर्मी घूम रहे हैं अंततः बचेंगे तो ये भी नहीं। क्यों ये नौबत आने देते हो? सुधर क्यों नहीं जाते?

संतों ने कहा था—“*जाका गला तुम काटि हो, सो फिर काटै तुम्हार*”।

माँसाहार के विरुद्ध कहा था कि — जिसका गला तुम आज काट रहे हो, वो कल तुम्हारा काटेगा। हमने बात का मर्म नहीं समझा, हमने बात को खिल्ली में उड़ा दिया। हमने कहा, "ऐसे थोड़ी हो सकता है, जिसका गला हमने काट दिया वो तो मर गया, वो हमारा गला काटने कैसे आएगा?"

ऐसे आएगा। अब आई बात समझ में?

कबीर साहब बोल गए हैं—“*जाका गला तुम काटि हो, सो फिर काटै तुम्हार*”।

और हमने कहा, “हे, हे, ये तो यूँ ही है, पुराने ज़माने के बैलगाड़ी के युग के लोग हैं, निरक्षर हैं। ये पुराने संतों, फ़क़ीरों की बात की आज क्या अहमियत? ये सब बातें पुरानी हो गईं, आज का नया युग है, आधुनिक मॉडर्न लोग हैं भई हम। कहाँ है के.एफ.सी. का फ्रायड चिकन?” तुम्हें नहीं समझ में आ रही बात।

जाका गला तुम काटि हो, सो फिर काटै तुम्हार

निश्चित रूप से अब वो मरा हुआ मुर्गा नहीं आएगा उठकर के तुम्हारा गला काटने, पर और ताक़तें आएँगी जो तुम्हें दुःख दे जाएँगी; वही हो रहा है।

मैं फिर आपसे निवेदन करता हूँ, ये आपदा संयोगवश नहीं आ गई, इस आपदा को कर्मफल मानिए; इस आपदा को हमारे कर्मों ने निर्मित करा है, इस आपदा को हमारे कर्मों ने आविष्कृत करा है। अपनी ज़िम्मेदारी समझिए, हम इस महामारी के निर्माता हैं, और बेहोश निर्माता हैं।

अगर होश में नहीं आएँगे, तो इससे भी ज़्यादा घातक महामारियों का निर्माण करे आएँगे। मत करिए, निवेदन है आप से!

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