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क्या बच्चे भगवान का रूप होते हैं? || पंचतंत्र पर (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
21 min
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अगर शांति के लिए कोई कर्तव्य या वादा तोड़ना पड़े, तो उससे क्या कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता?

आचार्य प्रशांत: शांति के लिए वादे रखने भी पड़ सकते हैं।

प्र: जैसे मैं भीष्म की बात कर रहा हूँ।

आचार्य: हाँ, ठीक है। शांति इतनी ऊँची चीज़ है कि उसके सामने कोई नियम नहीं बनाया जा सकता, ये नियम भी नहीं बनाया जा सकता कि नियम तोड़ने हैं। शांति के लिए अगर नियमों का पालन करना पड़े तो? पालन भी कर लेंगे। तोड़ना पड़े तो? तोड़ भी देंगे। आख़िरी बात सिर्फ़ एक है। क्या? शांत रहे या नहीं रहे।

तुमने बहुत कुछ अच्छा-अच्छा किया, ठीक-ठीक किया, पर जो कुछ भी कर रहे थे, वो करने के दौरान भी, वो करने से पहले भी, वो करने के बाद भी रह गए उछलते-कूदते, चंचल और विकल ही, तो जो कुछ भी किया…?

प्र: सब बेकार।

आचार्य: सब बेकार।

प्र: परिणाम के लिए नहीं कर रहा।

आचार्य: शांति परिणाम तो होती ही नहीं है। शांति परिणाम नहीं है कि ऐसा करेंगे तो शांत हो जाएँगे। आख़िरी परिणाम की कब तक प्रतीक्षा करोगे? पता चला कि तुम्हारी प्रक्रिया ही पचास साल लम्बी है। आख़िरी दिन शांत हो पाओगे तो क्या पाया?

शांति तो लगातार बनी रहनी चाहिए। ऊपर-ऊपर तुम चाहे जो उछल-कूद मचाना चाहो, मचा लो। ऊपर-ऊपर तुम अशांति भी दर्शा सकते हो। ये भी कर सकते हो, ठीक। अशांति के नीचे भी शांति बनी रहनी चाहिए।

प्र: तो, आचार्य जी, वैराग्य भी यही होता है?

आचार्य: अशांति से मोहित न रह जाना वैराग्य है। अहम् वृत्ति हो तुम, कहा न आज हमने, उसका अशांति के प्रति बड़ा आकर्षण होता है। अशांति से तुम्हारा आकर्षण मिट गया, राग अशांति के प्रति मिट गया, ये वैराग है।

प्र२: कामना से मोहित रहना, ये तो बहुत ही साधारण लगता है सुनना, लेकिन अशांति से मोहित रहना, ये तो लगता है पहली बार….।

आचार्य: अरे, अशांति का क्या मतलब है? अपूर्णता।

प्र२: ये बात पूरी सही है। पूरा मन इसके साथ सहमत है, पर उतना स्पष्ट नहीं दिखता। कामना से मोह है, ये तो स्पष्ट दिखता है।

आचार्य: वो इसलिए कि कामना से मोह है, कामना के विषय से, कामना के पदार्थ से मोह है, इस बात को देखते हो, ज़रा-सा नीचे जाकर और नहीं देखते कि कामुक कौन है।

तुम्हारा पहला मोह कामना के विषय से नहीं है, तुम्हारा पहला मोह स्वयं से है, और तुम कौन हो? जिसे कामना है। और कामना क्यों है? क्योंकि अशांति है। तुम्हारा अगर अपने-आपसे मोह है, तो किससे मोह हुआ?

श्रोतागण: अशांति से।

आचार्य: अब मान लो कि कोई चीज़ है, वो कलम है। ठीक है? वो कलम उठाओ। अब उस कलम से मान लो कि मोह है, तो हम क्या कहते हैं? कि मुझे, उस कलम से मोह है। वो कलम हुआ कामना का विषय। हम ये भूल जाते हैं कि कामुक कौन है। कामातुर कौन है? कामना किसको है? अब अगर वो काम का विषय है, तो मैं विषयी हुआ न।

जब तक मुझे उस कलम से मोह है, मैं कौन हुआ? जो मोहित है। तो जितनी बार मैं कहता हूँ कि वो मुझे चाहिए, उतनी बार मैं वास्तव में क्या कह रहा हूँ? मुझे मोहित रहना है। अगर कलम की ओर इशारा करके कहो, तो मैं कहूँगा, "मुझे कलम चाहिए, मुझे कलम चाहिए, मुझे कलम चाहिए।" और उसी उँगली का इशारा अपनी ओर कर लो, तो तुम वास्तव में क्या कह रहे हो? “मुझे उससे मोहित रहना है, मोहित रहना है, मोहित रहना है।"

जो मोहित है, वो क्या है? वो अशांत ही तो है। तुम कहते हो कि वो मिलेगी तो शांति मिलेगी। जब तक वो नहीं मिली है, तब तक मैं? अशांत हूँ। तो उसकी ओर तुम जितना बढ़ रहे हो, उतना तुम अपने-आपको क्या बना रहे हो? अशांत। तुम्हारी रुचि उसमें बाद में है, तुम्हारी प्रथम रुचि ये है कि तुम अशांत बने रहो।

अगर तुम अशांत हो ही नहीं, तो उसको ले करके तुममें क्या मोह बचा? कुछ नहीं न? तो हमारी घोर रुचि ये है कि हम अशांत बने रहें। अहंकार और कुछ नहीं है, अशांति है। अहंकार अपने-आपको बचाना चाहता है, मतलब किसको बचाना चाहता है?

श्रोता: अशांति को।

आचार्य: अशांति को बचाना चाहता है। तो अशांति में हमारी गहरी रुचि है। जिसकी अशांति में रुचि समाप्त हो गई, वो वैरागी कहलाया। हमारी अशांति में बहुत गहरी रुचि है।

आज से कई साल पहले मैंने कहा था किसी को, तुमको बहुत ज़्यादा रुचि है नहीं समझने में। फिर उसका बाद में लोगों ने पोस्टर भी बना दिया। हमारी गहरी रुचि है बोधहीनता में, नहीं समझने में, यानी अशांति में। अशांति में हमारी बहुत रुचि है। अभी यहाँ सब कुछ शांत हो, देखो तुम्हें नींद आ जाएगी; तुम जम्हाई मारोगे, तुम्हें नींद आ जाएगी।

अभी कुछ उपद्रव हो जाए, कोई किसी का गला काट दे, कोई किसी की चीज़ चुरा ले, कोई किसी का खाना लेकर भाग जाए, देखो कैसे उठते हो सकपकाकर, "अरे! क्या हुआ? बताओ, बताओ, बताओ।" रुचि किसमें आई?

श्रोता: अशांति में।

आचार्य: और शांति हो ज़्यादा तो कहते हैं, “अरे, कुछ हो ही नहीं रहा, कुछ मसाला ही नहीं है। सब शांत-शांत पड़ा हुआ है।” बहुत लोग तो हैं जिनको शांति मिल जाए तो वो परेशान हो जाते हैं, कहते हैं, “इतना सन्नाटा क्यों है, भाई?” कुछ होना चाहिए न। किसी का तो सिर फूटे। कुछ तो मज़ा आए।

प्र२: मतलब, आचार्य जी, जब भी हम किसी चीज़ की तरफ़ भागते हैं, तो यही साबित होता है कि हमें अशांति से प्यार है?

आचार्य: हाँ, हॉं। बाहर को देखो तो वो चाहिए और भीतर को देखो तो अशांत बने रहना है। वो दोनों काम एक साथ हो रहे हैं।

प्र: एक कहावत है न, ‘ग्रीवेंस इज़ लुकिंग फ़ॉर अ कॉज़’ (शिकायत एक कारण की तलाश में है)।

आचार्य: हाँ, बिलकुल। बहुत बढ़िया। वो बात तुम यही कह रहे हो कि भीतर की जो अशांति है, वो बाहर विषय ढूँढ़ रही है। हो तुम भीतर से ही अशांत, लेकिन ये कैसे कह दो कि हम अशांत हैं और हमें अशांत ही बने रहना है, तो तुम कहते हो, “हम अशांत नहीं हैं, उसने हमें अशांत कर दिया।”

प्र२: तभी, सर, ग़लती निकालने में और उलाहना करने में…

आचार्य: बढ़िया, बढ़िया, बिलकुल, बिलकुल। सही जगह पर उँगली रख रहे हो। बढ़िया।

कैसे मान लें कि परेशान होना हमारी फ़ितरत है। बात ज़रा अपमान की लगती है न। ऐसा लगता है किसी ने थप्पड़ मार दिया। हमसे कह रहा है कि तुम तो रहना ही चाहते हो परेशान। तुम ये नहीं जानते कि हम ही परेशान रहना चाहते हैं, फिर हम परेशानी के कारण ढूँढ़ते हैं, दूसरों पर इल्ज़ाम लगाते हैं।

“ये न बड़ी नालायक है। ये परेशान कर रही है। नीला पेन , नीला पेन , ये न मुझे परेशान करने के लिए नीला पेन लेकर आया है। ये देखो, इसका मुँह देखो। इसने छोटे बाल कटाए ही इसलिए हैं कि ये मुझे खिन्न कर सके। ये देखो, वहाँ पर एक तरफ़ को झुककर बैठी है।” जिसे परेशान होना है, वो बहाने ईजाद करेगा। ढूँढ़ेगा नहीं, ढूँढ़ना तो फिर ईमानदारी की बात है, डिस्कवरी हो गया, वो ईजाद करेगा, वो आविष्कार करेगा जहाँ कुछ है ही नहीं, वहाँ भी। और कुछ नहीं तो बादलों पर इल्ज़ाम लगा दो, “बादल बहुत हैं!”

प्र: ट्रैफ़िक (यातायात)।

आचार्य: ट्रैफ़िक , ट्रैफ़िक , *ट्रैफ़िक*।

प्र: ये वही बात हो गई कि भोगी नहीं भोग रहा है, भोग भोगी को भोग रहा है। भोग भोगी की तलाश में है।

आचार्य: हाँ, हाँ, हाँ।

प्र३: बचपन से जो कमी महसूस कराई जाती है।

आचार्य: बचपन से पहले से, गर्भ से। इसमें समाज का बीस प्रतिशत योगदान है और शरीर का अस्सी प्रतिशत। समाज तुमको ये न भी जताए कि तुम कम हो, कमज़ोर हो या अपूर्ण हो, तो भी ये (शरीर) काहे के लिए है? समाज तो पहले से ही बिगड़ी हुई हालत को और बिगाड़ देता है। पूरा दोष समाज पर मत डाला करो। समाज का काम तो यही है कि ‘एक तो करेला दूजा नीम चढ़ा’। पर करेला कड़वा तो पहले से ही है। नीम नहीं भी मिलता तो भी उसमें कड़वाहट तो है ही।

प्र: आचार्य जी, तो क्या जो हमारी मान्यताएँ हैं, वो हमें सुदृढ करती हैं चीज़ों में बल देने के लिए?

आचार्य: हाँ, इसको साधारण भाषा में कहते हैं, ‘कोढ़ में खाज’। पहले ही शरीर कोढ़ी था और उसमें खाज अलग आ गई।

प्र: अगर, आचार्य जी, समाज की तरफ़ से जो दिया जाता है, मिलता है, वो अगर हम लेना बंद कर दें, जैसा कि आप कह रहे हैं कि वो ग़लत है।

आचार्य: न, नहीं कर सकते। गड़बड़ है, क्योंकि समाजिक इनपुट को बंद करके भी हद-से-हद समस्या को बीस प्रतिशत ही कम कर पाओगे। तुम समझ ही नहीं रहे हो कि ये जो सामाजिक इनपुट है, ये तुमने लेना क्यों शुरू किया था। ये तुमने लेना इसलिए शुरू किया था सर्वप्रथम क्योंकि तुम अपने शरीर से परेशान हो।

चूँकि तुम इस समस्या से परेशान हो, इसीलिए पचास लोगों ने मिल-बैठ करके—यही तो समाजिक गतिविधि हुई न। बहुत लोग हुए तो वो सामाजिक गतिविधि हुई। एक शिक्षा का और संस्कारों का एक ढाँचा तैयार किया, एक विधि तैयार की, कि इस प्रकार अगर बच्चे को संस्कारित किया जाए, समाज को अगर इस प्रकार संचालित किया जाए, तो हम जो ये रोग लेकर ही पैदा होते हैं, इस रोग में ज़रा कमी आएगी, इसका प्रकोप थोड़ा शांत होगा।

तो समाज की नीयत तो ये थी कि तुम्हारे रोग को शीतल करे, कम करे, लेकिन अब समाज भी हमारे जैसे लोगों का ही है, और बुद्धिहीन लोग उसमें ज़्यादा आगे-आगे रहते हैं। तो उन्होंने जो एक व्यवस्था बना दी, उस व्यवस्था ने एक बिगड़ी हुई स्थिति को और ज़्यादा बिगाड़ दिया। लेकिन अगर तुम ये कहोगे कि बच्चे को समाज से हटा दिया जाए तो वो बिलकुल चैतन्य रहेगा, और बुद्धत्व रहेगा उसमें, और जागृत रहेगा, तो ये महा बेवक़ूफ़ी की बात है। और आजकल इस तरह की बातें भी बहुत प्रचलित हैं।

प्र: होम एडुकेशन (गृह शिक्षा) भी…

आचार्य: होम एडुकेशन नहीं, अभी बड़े-बड़े संतजन-गुरुजन हैं, वो कहते हैं कि अगर कोई बिलकुल साफ़, निष्पक्ष और निर्मल तरीके से दुनिया को देख पाता है, तो वो है छोटा बच्चा। आजकल छोटे बच्चों के बड़े गुण गाए जाते हैं, कि बड़े हो करके हमें दुनिया ख़राब कर देती है। ये जो छोटा बच्चा होता है, ये तो बड़ा निर्मल होता है। ये बात महा झूठी है। तुम बच्चे को मत दो शिक्षा और मत दो संस्कार, और तुम उसे छोड़ दो जंगल में, फिर तुम देखो कि वो क्या बनता है।

तुम्हें क्या लगता है, तुम छोटे बच्चे को अगर जन्म से ही जंगल में छोड़ दोगे, तो वहाँ से बुद्ध बनकर आएगा? वो वहाँ से और पशु बनकर, और जानवर बनकर आएगा। तो ये मत कहो कि आदमी के लिए ये जो सामाजिक इनपुट है, इसकी कोई आवश्यकता नहीं है।

आदमी को वो सामाजिक इनपुट निश्चित रूप से चाहिए, पर समाज के उन लोगों से चाहिए जो वास्तव में प्रबुद्ध हैं। अभी शिक्षा ग़लत लोगों के हाथ में है। सबसे बड़ी दिक़्क़त तो ये है कि शिक्षा का एक बड़ा हिस्सा माँ-बाप के हाथ में है। बच्चा पैदा होता है, सबसे ज़्यादा शिक्षा तो उसे माँ-बाप से ही मिल जाती है और घर वालों से मिल जाती है। और ये माँ-बाप कौन हैं? जो स्वयं अंधेरे में हैं।

शिक्षा आवश्यक है। ये मत कह देना कि शिक्षा ही अभिशाप है। शिक्षा अभिशाप नहीं, शिक्षा आवश्यक है, पर वो शिक्षा सही लोगों द्वारा दी जानी चाहिए।

प्र: आचार्य जी, वो कहते हैं न कि ढाई से तीन साल में बच्चे का अहंकार विकसित होना शुरू होता है।

आचार्य: कुछ नहीं, बेकार की बातें। बच्चा अभी गर्भ से बाहर भी नहीं आया, तब भी उसमें ‘मैं’ भावना विद्यमान है। ये मूर्खतापूर्ण बात है कि वो ढाई-तीन साल का होता है, तब उसमें अहम् वृत्ति आती है। बच्चा पैदा हुआ है अभी-अभी, तुम उसको उँगली चुभा दो, वो रोएगा कि नहीं रोएगा?

तो उसे ये कैसे पता कि जब उँगली पालने पर रखी जाए तो नहीं रोना और जब उँगली मुझे चुभाई जाए तब रोना है? 'मैं' की भावना तो आ ही गई न उसमें? अहम् वृत्ति तो आ ही गई न उसमें? जन्म के पहले ही क्षण से वो सारे वृत्तिगत प्रमाण प्रस्तुत करने लगता है।

भाई, तुम भूखे हो अगर, तो क्या बच्चा रोएगा? बच्चे का बाप भूखा है, तो क्या बच्चा रोना शुरू कर देता है? तो बच्चा कब रोता है?

श्रोता: जब बच्चा ख़ुद भूखा होता है।

आचार्य: तो पैदा होते ही उसे स्वार्थ पता है, कि नहीं पता है? तो ये कौन-सी बात है कि अहम् तो तीन की उम्र में आता है? अहम् तो पहले ही पल से है। वो सिर्फ़ तब रोता है जब उसका अपना पेट भूखा है। उसका बाप भूखा रहे, उसकी माँ भूखी रहे, वो रोता है क्या?

दूसरा प्रश्न— माँ बीमार है। माँ ने बच्चे को जन्म दिया, और अक्सर जन्म देने के बाद माँ अच्छी हालत में नहीं होती है। माँ बीमार है, माँ सोना चाहती है। बच्चा भूखा है, बच्चा माँ को सोने देगा? बच्चे के मन में करुणा है? बोलो। माँ तो सो रही होगी, वो रात में चिल्ला-चिल्लाकर उसको जगाएगा। उसको तो अपने स्वार्थ से मतलब है, “मुझे दूध दे।” और दूध नहीं उतरेगा तो वो काटेगा, परेशान करेगा, चिल्लाएगा, सब कुछ करेगा।

तो कौन कह रहा है कि अहम् तीन की उम्र में आता है? अहम् तो लगातार है। जहाँ देह है, वहाँ अहम् वृत्ति है। कोई ये न कहे कि अहम् वृत्ति तुम्हें समाज देता है। समाज, मैं कह रहा हूँ, सिर्फ़ एक बिगड़ी हुई चीज़ को और बिगाड़ता है, पर बिगड़े हुए तो हम पैदा ही होते हैं।

ये कहना बिलकुल छोड़ दो, बात को मन से निकाल दो कि बच्चा बड़ा निर्मल, शुद्ध और मासूम पैदा होता है। बच्चे में कोई मासूमियत नहीं होती, न कोई निर्मलता होती है। हाँ, ये है कि वो इतना छोटा, इतना दुर्बल और इतना अशक्त है कि उसके भीतर का विष आरम्भ में दिखाई नहीं देता। वही विष दिखाई देगा पाँच-दस-पंद्रह साल बाद। और वो सारा विष अपने भीतर लेकर ही पैदा हुआ है।

प्र२: “अगर बच्चे के गुरु बन सको तो सबसे श्रेष्ठ स्थिति, या फिर उसको अपने हाल पर छोड़ दो।” ये चीज़ें किसलिए?

आचार्य: माँ-बाप बन जाते हैं न गुरु, तब मैंने कहा था। मैंने कहा था कि माँ-बाप और बच्चे का सम्यक रिश्ता ये है कि माँ-बाप, माँ-बाप न रहें, माँ-बाप गुरुता के आसन पर बैठ जाएँ; फिर वो माँ बच्चे की माँ न रहे, माँ बच्चे की गुरु हो जाए, माँ इतनी ऊँची पहुँच जाए।

मैं समझ रहा हूँ, तुम्हें क्या लग रहा है। तुम कह रहे हो कि आपने ही तो कहा था कि माँ को गुरु होना चाहिए।

प्र२: नहीं, आचार्य जी। मैं ये पूछ रहा हूँ कि अगर दूसरी स्थिति है, तो बच्चे को उसके अपने हाल पर छोड़ दें?

आचार्य: हाँ, उसे अपने हाल पर छोड़ दो, उससे बेहतर है कि किसी ऐसे के सुपुर्द कर दो जो गुरु बनने लायक है। पर अगर नहीं मिल रहा है कोई ऐसा जिसके हाँथों सौंप सकते हो बच्चे को, तो कम-से-कम ख़ुद उसके गुरु मत बन जाना। कम-से-कम उस पर इतनी मेहरबानी करना कि ख़ुद मत गुरु बन जाना कि “हम जैसा बताएँगे, तू वैसा करेगा।” तब मैंने कहा कि यही कर दो फिर कि उसको उसके हाल पर छोड़ दो, धीरे-धीरे ख़ुद ही टटोल-टटोलकर कुछ सीखेगा।

प्र२: पर वो तो शुरू से ही कर देते हैं। उसको सूसू-पोटी सिखाना…

आचार्य: नहीं, सूसू-पोटी सिखा दो। मैं कुछ और, मैं दूसरे संस्कारों की बात कर रहा हूँ, जब तुम उसको सही-ग़लत सिखाने लगते हो, सच-झूठ सिखाने लगते हो। तुम अगर उसको यही सिखा रहे हो कि बिस्तर पर मत सूसू करो। यहाँ पर जाओ, यहाँ टॉयलेट ट्रेनिंग दे रहे हैं। मैं इसकी बात नहीं कह रहा हूँ, ये तो दूसरी बातें हैं। ये तो ठीक है।

अब तुम उसको ये बताओ, “देखो, वो वहाँ पर प्लग पॉइंट है, वहाँ पर उँगली नहीं डालना है।” तो ये तो बताना ही पड़ेगा तुमको।

प्र२: जैसा आपने अभी कहा कि बच्चे को अगर हम ऐसे चुभाएँगे तो वो रोएगा, लेकिन जैसे कोई बुद्ध पुरुष है, उसको कुछ काटता है, तो दर्द तो उसको भी होता है।

आचार्य: हाँ, होता है। ये थोड़े ही कह रहा हूँ कि जो बुद्ध पुरुष है, वो देह के पार निकल गया। मैं तुम्हें बता रहा था कि अहम् वृत्ति पहले ही दिन से मौजूद होती है, ये समझा रहा हूँ।

अरे भाई, अहम् माने क्या होता है? 'मैं'। और 'मैं' का मतलब होता है, “इतना (शरीर) मैं हूँ और इसके आगे मैं नहीं हूँ।” तो तुम यहाँ पर (शरीर से बाहर) मारोगे, मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, पर तुमने यहाँ (शरीर पर) मारा, तो मैं रो पड़ूँगा, इसका मतलब मैंने 'मैं' का दायरा तय कर लिया है। यही तो अहम् है। और ये अहम् किससे जुड़ा हुआ है? शरीर से। तो वो तो पैदा होता ही है अहम् को शरीर से जोड़कर।

प्र३: ये तो माँ-बाप के गुरु बनने पर था। जब बात पति की आती है तो पति गुरु नहीं बनाने देते, वे कहते हैं कि पति ही गुरु होता है।

आचार्य: पति गुरु होता है या नहीं होता, ये तो पता नहीं पर पत्नी शिष्य नहीं हो सकती। ये तो बात ही बहुत असंभव बोल दी जिन्होंने भी बोली, कि पतिदेव कह रहे हैं कि किसी गुरु के पास जाने की ज़रूरत नहीं है, मैं ही गुरु हूँ। पतिदेव आप गुरु हो भी गए, पत्नी शिष्या हो जाएगी?

प्र३: फिर गुरु घंटाल हो जाएँगे।

आचार्य: उनका इरादा ही यही होगा। दिखा दो कोई पत्नी जो शिष्या होने को तैयार हो। उल्टा भी बिलकुल सही है— पत्नी अगर गुरुता रखती है, तो दिखा दो कोई पति जो शिष्य होने को तैयार हो। ये रिश्ता देह से ही शुरू हुआ था। इसमें ये सम्भावना बहुत-बहुत कम है कि कोई पक्ष किसी दूसरे को गुरु मान ले।

प्र३: नहीं, सम्भावना तो बहुत कम है, पर अगर उनके कानों में गुरु वचन पड़ गए हैं, वो पूछ रहे हैं तो फिर उसमें कैसा आचार-विचार हो।

आचार्य: नहीं, फिर देख लें, फिर देख लें कि पतिदेव के सामने वो शिष्य भाव से बैठ पा रही हैं। अगर बैठ पा रही हैं तो बिलकुल ठीक है। लेकिन ये भी याद रखना कि गुरु घंटा भर ही गुरु नहीं हो सकता, कि अभी तो गुरु आवर चल रहा है, जैसे हैप्पी आवर चलते हैं, कि अभी गुरु आवर चल रहा है, इस समय तो तुम शिष्या हो मेरी और गुरु आवर जब बीत गया, तो फिर कह रहे हो, “चल पूड़ी बना, चल पाँव दबा, चल बिस्तर लगा।” फिर ऐसे नहीं।

गुरु की गुरुता लगातार होनी चाहिए न। गुरुता का मतलब होता है एक ऊँचाई। अगर पतिदेव अपने लिए वो ऊँचाई निर्धारित कर रहे हैं, तो फिर उस ऊँचाई पर लगातार रहें। ये नहीं कि गुरु आवर पूरा हुआ और फिर उस ऊँचाई को छोड़ करके वो नीचे गिर गए, टपक गए।

अगर पति वास्तव में गुरु हैं, तो उन्हें निरन्तर फिर गुरुता का प्रदर्शन भी करना होगा, उस गुरुता को लगातार अभिव्यक्ति भी देनी होगी। गुरुता कोई हक़ ज़माने की चीज़ थोड़े ही होती है या घंटे भर तक सीमित लिखाने-पढ़ाने की चीज़ थोड़े ही होती है कि अभी तुम सिर्फ़ हमारे सामने शिष्या की तरह बैठो और थोड़ी देर बाद तुम हमारे बच्चों की अम्मा बन जाना। ऐसे नहीं।

प्र३: सर, एक प्रसिद्ध उक्ति भी है न आध्यात्मिक गुरु रामदास का, “अगर आप बुद्धत्व को प्राप्त हो चुके हैं, तो जाइए अपने परिवार से मिलने किसी त्यौहार में।”

आचार्य: परिवार का अगर वास्तव में हित चाहते हो तो परिवार का गुरु बनने की कोशिश मत करो, बल्कि परिवार को किसी ऐसे ओर मोड़ दो जहाँ पर वो सुन पाएँ। तुम ऊँची-से-ऊँची बात भी कहोगे, लेकिन जिनसे तुम्हारा शरीर का रिश्ता रहा है अतीत में—माँ-बाप, भाई-बहन, पत्नी-पति—बड़ा मुश्किल है कि ये तुम्हें सुन पाएँगे।

इन्होंने तुम्हें देखा है, बहुत सालों से देखा है, हो सकता है कि बचपन से देखा हो। इनके मन पर स्मृतियाँ हावी हैं। इन्होंने तुम्हें नंगे घूमते हुए देखा है, इन्होंने तुम्हें ऊटपटाँग हरकतें करते हुए देखा है, इन्होंने तुम्हें झूठ बोलते देखा है। पत्नी है तुम्हारी, तो उसने तुमको कामातुर हुए देखा है। वो कैसे भूलेगी?

अभी तुम उसके सामने बैठकर बोल रहे हो कि "न मैं देह हूँ, न तुम देह हो।" और उसको अच्छे से याद है कि अभी दो साल पहले तुम देह पर ही टूटे पड़े रहते थे। तो वो कैसे भूल जाएगी इस बात को? अब वो तुम्हारे मुँह से सुनेगी कि देह तो कुछ होती ही नहीं, तो उसको हँसी और आएगी, कहेगी, “ये देखो, ये मुँह मसूर की दाल। ये बता रहे हैं कि कुछ नहीं होती।”

प्र३: कहेगी कि भांग, धतूरा खाकर आया है।

आचार्य: हाँ। तो बड़ा मुश्किल हो जाता है। उससे भला ये है कि उनको कोई और रास्ता दिखा दो, वहाँ पर वो सुन लेंगे, तुम्हारी नहीं सुन पाएँगे। और इसमें ग़लती तुम्हारी नहीं है, ये तो मन ही चीज़ ऐसी है।

जीज़स ने भी कहा था कि “ प्रोफ़ेट (पैग़म्बर) हर जगह पूजा जाएगा, अपने गाँव में नहीं पूजा जाएगा।” ऊपर वाले का जो पैग़म्बर भी आएगा, उसको भी भले ही पूरी दुनिया पूज ले, उसका अपना गाँव कभी उसे नहीं पूजेगा।

प्र३: उलटा सब उसको आँकेंगे कि देखो, इसको क्या हो गया है, किस तरफ़ जा रहा है। प्रश्न आपके ऊपर ही आ जाएँगे।

आचार्य: वो पैग़म्बर के किसी चेले को सुन लेंगे, जो किसी दूसरे गाँव का हो, पर पैग़म्बर को नहीं सुनेंगे क्योंकि वो अपने गाँव का है। तो अच्छा ये है कि उनके पास अपने चेले को भेज दो। वो ज़्यादा व्यावहारिक बात है।

हमारी तो इच्छा ही यही है न कि सबको अपने ही जैसा मानें ताकि ये सिद्ध हो सके कि हम जैसे हैं, वैसा ही होना आवश्यक है। और जैसे हम हैं, उसके अलावा कोई विकल्प ही नहीं है। हमारी तो गहरी इच्छा ही यही है, “हम देह हैं, सब देह हैं।”

जिसको तुमने सदा से देह ही देखा, जो तुम्हारी आँखों के सामने पैदा हुआ हो, वो अचानक से कुछ और हो जाए, तुम्हें न यक़ीन आएगा और न तुम चाहोगे कि यक़ीन आए। पहली बात तो यक़ीन आएगा ही नहीं, थोड़ा-बहुत यक़ीन आने भी लगेगा तो बात इतने अपमान की है कि तुम चाहोगे ही नहीं कि यक़ीन आए। तुम कहोगे, हमारा ही पप्पू…

प्र३: पास (सफल) हो गया।

आचार्य: हम फ़ेल (असफल) होते रहे, और ये पास हो गया? घोर अपमान है!

सबसे बड़ा इम्तिहान ज़िन्दगी है। तुम्हें कैसे ये अच्छा लग जाएगा कि तुम हर साल परीक्षा में बैठते थे और फ़ेल हुए और पप्पू बिना बताए पास हो गया, बिना तुम्हारी मदद के पास हो गया। और पास होने के बाद कह रहा है कि “मैं सीनियर (वरिष्ठ) हूँ, मेरी सुनो।”

तुम कहोगे, “बताता हूँ अभी।”

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