प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा प्रश्न यह है कि क्रोध पर कैसे काबू पाया जाये?
आचार्य प्रशांत: अगर सिर्फ़ क्रोध पर काबू पाना हो तो उसके लिए तो बहुत विधियाँ हैं।
सबसे अच्छी विधि यह है कि किसी को नियुक्त कर दो कि जब तुम्हें क्रोध आ रहा हो तो एक डंडा मारे। और आदमी तगड़ा होना चाहिए। देखा है न कि तगड़े आदमी के सामने क्रोध आता नहीं?
तुम्हारे सामने कोई सबल राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री खड़ा हो, कभी आया है तुम्हें इतना क्रोध कि तुमने उछल कर उसका गला पकड़ लिया हो? और यही बेचारा कोई गरीब सब्ज़ीवाला हो, रिक्शावाला हो, वहाँ बात-बात में तुनक जाते हो।
बॉस के सामने कौन क्रोध प्रदर्शित करता है? हाँ, अधीनस्थ हो तो उसके सामने तो फिर कुछ भी कर सकते हो। अगर सिर्फ़ क्रोध की घटना पर काबू पाना हो तो व्यावहारिक तल पर बहुत उपाय हैं।
सिर पर पानी डाल लो या क्रोध आ रहा हो तो पूरा ही क्रोध कर डालो। अंजाम ऐसा होगा कि बहुत दिनों तक नहीं आएगा क्रोध। यह सारे उपाय क्रोध की घटना को, इवेंट आफ एंगर, उसको रोक सकते हैं। और खेद की बात है कि हमारा ज़्यादा आशय, ज़्यादा प्रयोजन ही क्रोध की घटना से होता है। समझना!
क्रोध एक चीज़ है और क्रोध की घटना दूसरी चीज़ है। क्रोध की घटना है वो अवसर, वो मौका जब तुम फट पड़े। और क्रोध है एक सुलगता हुआ जीवन। अभी कल या परसों ही मैं कह रहा था कि क्रोध की घटना है कुकर की सिटी का बज जाना। और क्रोध है नीचे जलती आग, भीतर बढ़ता हुआ तनाव और दबाव। सीटी तो तभी बजेगी जब दबाव एक सीमा को पार कर जाएगा। पर हमें इस बात से कोई आपत्ति ही नहीं होती कि आग लगी हुई है और दबाव बढ़ रहा है। हमें आपत्ति सिर्फ़ तब होती है जब सीटी बज जाती है। फिर हम कहते हैं सीटी कैसे न बजे। तो बैठ जाओ सिटी पर, नहीं बजेगी। या सीटी ही निकाल कर फेंक दो — न रहेगा बांस, न बजेगी सीटी।




