आचार्य प्रशांत: श्रीमद्भगवद्गीता चौथा अध्याय, ज्ञानयोग, प्रथम श्लोक।
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत।।४.१।।
श्री कृष्ण कहते हैं कि मैंने इस योग को कभी विवस्वान (सूर्य) से कहा था, सूर्य ने फिर अपने पुत्र मनु से कहा था और मनु ने फिर इक्ष्वाकु को बताया था।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक १
कृष्ण कहते हैं, ‘मैंने इस अव्यय — अव्यय अर्थात् जो नष्ट नहीं होता — मैंने इस योग को कभी विवस्वान से, माने सूर्य से कहा था। सूर्य ने फिर अपने पुत्र मनु से कहा था और मनु ने फिर इक्ष्वाकु को बताया था।’
विचित्र बात है! ऐसा लग रहा है जैसे समय की धारा में कोई ऐतिहासिक सी बात बतायी जा रही हो। मैंने उसको बताया, उसने उसको बताया, उसने उसको बताया।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। स कालेनेह महता योगो नष्ट: परन्तप।।४.२।।
और इस तरह परम्परा से ये जो मेरी बात है, यह बात राजा, ऋषि और विद्वान जानते रहे, ज्ञान की एक परम्परा चलती रही लेकिन अभी इस लोक में मेरी वो बात, वो योग नष्ट हो गया है।










