प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक महिला ने आपसे कुछ दिनों पहले प्रश्न किया था कि – “मेरे घर के लोग मुझे परेशान करते हैं, क्या करूँ?” आपने उन महिला को जवाब दिया था कि – “और भी लोग हैं, आपको ही परेशान करने क्यों आते हैं?”
हमारे जीवन में भी कई बार ऐसे पल आते हैं जहाँ लोग परेशान करने आते हैं। क्या ये मौका हम ही उन्हें दे देते हैं, जिससे उनमें ये हिम्मत आ जाती है?
आचार्य प्रशांत: बात हिम्मत की भी नहीं है। बात मुनाफ़े की है।
सड़क पर एक हॉकर घूम रहा है, खुदरा, छोटी चीज़ों का विक्रेता। और सड़क पर बहुत लोग आ-जा रहे हैं। वो किसको पकड़ता है? वो किसके पीछे-पीछे दौड़ता है? मान लीजिए उसके पास जो माल है, वो सस्ता है, नकली है, घटिया है, पर फिर भी वो तो बेचने की ही कोशिश कर रहा है। उसे तो अपना सीमित, व्यक्तिगत स्वार्थ ही दिख रहा है। पर अपनी उस नकली चीज़ को बेचने के लिए, वो किसके पास जाकर के ललचाता है? वो किसको झाँसा देते हैं? क्या सबको? नहीं। वो भी परख रहा है कि यहाँ पर कौन है जो बुद्धू बन जाएगा।
तो अगर आप ये कहते हैं कि लोग आपको बार-बार आकर बुद्धू बना जाते हैं, तो आप साफ़-साफ़ समझ लीजिए कि आप कुछ ऐसा कर रहे हैं, आप कुछ ऐसा जी रहे हैं, जिससे पूरे ज़माने को खबर लग रही है कि आपको बुद्धू बनाया जा सकता है।
देखा है न, खिलौने बेचने वाला होगा, बिंदिया बेचने वाला होगा, चश्मे बेचने वाला होगा, ये सब अपना सामान बेचने के लिये सड़क पर घूमते रहते हैं, पर ये सबके पास नहीं जाते। ये भी ख़ूब जानते हैं कि किसको झाँसा दे सकते हैं, उसी के पास जाते हैं। तो ऐसा नहीं है कि बाकियों से ये डर गए।




