खुद को जानने की कोशिश तुम्हें खुद से दूर ही ले जायेगी || आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र गीता पर (2014)

शुद्धम बुद्धम प्रियं निष्प्रपंचं निरामयां।
आत्मानं तं न जानंति तत्राभ्यासपरा जनाः।।
अष्टावक्र गीता, अध्याय १८, श्लोक ३५
(आत्मा के सम्बन्ध में जो लोग प्रयास में लग रहे हैं, वे अपने शुद्ध, बुद्ध, प्रिय, पूर्ण, निष्प्रपंच और निरामय
ब्रह्म स्वरुप को नहीं जानते)
आचार्य प्रशांत: तुम ये सब हो, पर तुम्हें नहीं पता लगेगा कि ये सब तुम हो, जब तक तुम दुनिया भर के दूसरे अभ्यासों में लगे रहोगे। तुमने अगर कोई भी पद्यति पकड़ ली, तुम अगर किसी भी पंथ के हो गए, तुम अगर कुछ भी होने की दावेदारी करने लगे, तो वो अभ्यास ही करते रह जाओगे। तुमको अपने शुद्ध, बुद्ध, प्रिय, पूर्ण, निष्प्रपंच रूप के बारे में कुछ पता नहीं चलेगा। फिर तुम रह जाओगे और तुम्हारी पद्यति रह जाएगी। तुम कोई भी अभ्यास करोगे तो तुम अपने को शुद्ध-चैतन्य के रूप में नहीं देख पाओगे। तुम्हारा अभ्यास तुम्हें दूर ही ले जाएगा, कभी पास नहीं ले जा सकता। हर विधि तुम्हें तुम्हारे अत्यांतिक रूप से दूर ही रखेगी। किसी भी विधि में मान्यता ही यही है कि, ‘मैं अपने शुद्ध रूप से दूर जा चुका हूँ’, और ये मान्यता ही झूठी है। क्योंकि दूर कोई जा ही नहीं सकता। तुम किसी विधि का पालन कर-कर के, इस मान्यता को मान्यता देते हो कि दूर जा चुके हो। एक आदमी जो पैसे और नौकरी के पीछे भाग रहा है, और एक जो आध्यात्मिक उपलब्धियों के पीछे भाग रहा है, दोनों का यही मानना है कि, “मेरे पास नहीं है”।
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