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कौन है सबका ज़िम्मेदार? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी। तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि॥

पर्वत पर वास करने वाले सुखप्रदाता, हे रुद्रदेव! आपका कल्याणकारी, सौम्य, पुण्य से कांतिमान जो रूप है, आप हमें अपने उसी सुखदायी स्वरूप से देखें।

यामिषुं गिरिशन्त हस्ते विभर्ष्यस्तवे। शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिंसी: पुरुषं जगत्‌॥

हे हिमालयवासी सुखदाता! जिस बाण को आप प्राणियों की ओर फेंकने के लिए हाथ में धारण किए रहते हैं, हे हिमालय रक्षक देव! आप उसे कल्याणकारी बनाएँ, इस जगत को, जीवसमूह को हिंसित न करें।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद्(अध्याय ३, श्लोक ५-६)

आचार्य प्रशांत: बहुत ध्यान से समझना पड़ेगा, नहीं फिर चूक होगी।

क्या कहा? पहली बात, "पर्वत पर वास करने वाले रुद्रदेव!" कैसे सम्बोधित किया है? 'तुम, जो पर्वतारुढ़ हो, चोटी पर विराजे हो, आपके अनेक रूप हो सकते हैं।' जब कहा जा रहा है कि 'आप हमें अपना एक विशिष्ट रूप दिखाएँ', तो निश्चित रूप से इसमें ये बात निहित है कि आपके अनेक रूप हो सकते हैं। हम आपसे प्रार्थना कर रहे हैं कि आप हमें अपना सुखदायी रूप दिखाएँ।

"आपके अनेक रूप हो सकते हैं, उनमें से आपका जो कल्याणकारी, सौम्य, पुण्य से कांतिमान रूप है, आप हमें अपने उसी सुखदायी स्वरूप से देखें।" आपके कई स्वरूप हो सकते हैं, आप हमें अपने सुखदायी स्वरूप से देखें।

और वही भाव आगे बढ़ता है, "हे हिमालयवासी सुखदाता! जिस बाण को प्राणियों की ओर फेंकने के लिए आप हाथ में लिए रहते हैं, हे हिमालय रक्षक देव! आप उसे कल्याणकारी बनाएँ।" आपके हाथ में कुछ है जो आप प्राणियों की ओर फेंकते हैं, आप उस चीज़ को कल्याणकारी बनाएँ। "इस जगत को, जीवसमूह को हिंसित न करें।" आप हमारी ओर जो फेंकते हैं वो बाण ऐसा न हो कि उससे हममें हिंसा हो, माने उससे हमें कष्ट हो। अपितु उसकी जगह आप हमें सुख प्रदान करें। जो बात यहाँ लिखी है, "आपका कल्याणकारी, सौम्य, पुण्य से कांतिमान रूप है, आप हमें उस तरीके से देखें।"

बहुत आसान है ये सोच लेना कि यहाँ रुद्रदेव से प्रार्थना की जा रही है कि 'देखिए हमें मुसकुराकर', कि 'आप मालिक हैं हमारे, सर्वेसर्वा हैं, आप दाता हैं, आप नियंता हैं। आप हमें क्रुद्ध होकर न देखें, आप हमें हिंस्र होकर न देखें। आप हमें अपने शांतिपूर्ण, सौम्य और सुखदायी रूप से देखें।' और ये तो बड़ी साधारण प्रार्थना हो जाएगी न।

ये तो हर अधीनस्थ कर्मचारी अपने वरिष्ठ के बारे में चाहता है कि 'आज जब मैं दफ़्तर पहुँचूँ तो वो मुझे हिंसक तरीके से न देखे, बड़े सौम्य, शांत और सुखदायी तरीके से देखे।' ये तो घर का ग़लती किया हुआ हर लड़का, हर बच्चा अपने बाप के विषय में चाहता है कि दिनभर मटरगश्ती करी है, अब जब रात में घर पहुँचूँ तो बापराम मुझे क्रुद्ध और आग्नेय नेत्रों से न देखें बल्कि शांत, सौम्य और सुखदायी चेहरे के साथ देखें। तो ये कोई बहुत ऊँची बात तो नहीं हुई। ये उपनिषदों के तल की बात तो नहीं हुई अगर हमने ऐसा अर्थ किया। तो निश्चित ही इसका अर्थ कुछ और है।

इसका अर्थ क्या है?

अर्थ समझने से पहले हमें पहले सूत्र को पुनः याद करना पड़ेगा। पहला सूत्र क्या है? जो भी बात कही जा रही है उसका मंतव्य रुद्र भगवान नहीं हैं, उसका मंतव्य प्रार्थी जीव है।

अब उनसे कहा जा रहा है, 'आपके कई चेहरे हैं, आप हमें अपना शांत, सौम्य और सुखद चेहरा दिखाइए।' उनके कई चेहरे हो सकते हैं क्या? सत्य के कई चेहरे हो सकते हैं? सत्य तो है ही वो जो अब अपरिवर्तनीय हो गया, जो अब कई चेहरों की चमक से और कई चेहरों के दायित्व से सर्वथा मुक्त हो गया। जो नित्य नहीं वो सत्य नहीं, और नित्य माने वो जिसमें बदलाव की कोई संभावना नहीं।

तो फिर इस प्रार्थना का मतलब क्या हुआ?

जब रुद्र ही परमात्मा है और ऐसी बात स्वयं उपनिषद् ने ही कही है आरम्भ के श्लोकों में, और परमात्मा किसी भी प्रकार बदल नहीं सकता, सत्य में किसी भी तरह के आरोह-अवरोह की कोई गुंजाइश ही नहीं है, तो क्यों कहा जा रहा है जीव द्वारा सत्य को कि, "अपना सौम्य, शांत, शीतल, सुखद चेहरा दिखाओ और हम पर हिंसा मत करो"? वो हिंसा कर सकते हैं क्या? परमात्मा हिंसा कर सकते हैं?

तो उपनिषद् ने कैसे कह दिया कि, "आप कृपया जीवसमूह को हिंसित न करें"? इससे तो ऐसा लग रहा है कि जैसे अभियोग हो, जैसे कि उन्होंने हिंसा कर रखी हो और अब कहा जा रहा हो कि 'नहीं, हिंसा मत करिए', या कम-से-कम हिंसा करने का उनका उद्देश्य हो, तो उनसे प्रार्थना की जा रही है हिंसा न करिए।

उनका उद्देश्य है हिंसा करना? वो हिंसा कर भी सकते हैं? हिंसा करने के लिए भी दो चाहिए, उनके सामने कोई दो हैं क्या? और वो क्या कर सकते हैं, क्या नहीं कर सकते हैं, ये प्रार्थी को पता होगा क्या? तो फिर ये जो पूरा मन्त्र है, श्लोक है, इसका अभिप्राय क्या? इसका अभिप्राय ये है कि 'हम आपके प्रति हिंसा से न भरें, हम आपको अशान्तिपूर्वक न देखें।'

जब तुम परमात्मा से कह रहे हो 'अपना शांत चेहरा दिखाइए', तो परमात्मा की नहीं, अपने चेहरे की बात कर रहे हो। तुम कह रहे हो 'हम आपको अशांत होकर न देखें।' क्योंकि जगत क्या है? हमारा विस्तार है, हमारा प्रक्षेपण हैं। तुम अशांत हो तो जो कुछ भी तुम देख रहे हो, तुम्हें कैसा दिखाई देगा? अशांत। तो अगर तुमको रुद्र भी अशांत दिखाई दे रहे हैं, तो माने वास्तव में अशांत कौन है? तुम हो।

तो अगर रुद्र से प्रार्थना की जा रही है कि 'आप हमें अपना शांत चेहरा दिखाएँ', तो वास्तव में चाहा क्या जा रहा है? कामना क्या है? कामना ये है कि हम सत्य के प्रति सदा शांत रहें, हम सत्य के प्रति कभी विद्रोही न हो जाएँ, हम सत्य से कभी विमुख न हो जाएँ।

परमात्मा आप पर नहीं कृपा करेगा, न परमात्मा कभी आपके प्रति अपनी कृपा को रोक लेगा, न परमात्मा कभी आपके प्रति हिंसक हो जाएगा। वो कुछ करता ही नहीं है, कौन करता है? आप करते हैं। तो हिंसक भी होगा तो कौन होगा? आप होंगे। तो अगर प्रार्थना की जा रही है कि 'भगवान! तुम मेरे प्रति हिंसक मत हो जाना', तो वास्तव में प्रार्थना क्या है? कि 'मैं हिंसक न हो जाऊँ तुम्हारे प्रति।'

और ये प्रार्थना अकारण नहीं है। अहंकार सबसे ज़्यादा हिंसक किसके प्रति होता है? सत्य के प्रति, क्योंकि अहंकार को सबसे ज़्यादा खतरा किस्से है? सत्य से है। अंधेरे को सबसे ज़्यादा डर किससे लगता है?

शिष्य इसीलिए तो बँटा रहता है। एक तरफ़ तो उसमें गुरु के प्रति अनुराग होता है, दूसरी तरफ़ गुरु के प्रति उसमें गहरी घृणा होती है। क्योंकि शिष्य का एक हिस्सा है जो बचे रहना चाहता है, जो अतीत की तरह क़ायम रहना चाहता है, जो चाहता है और जो सोचता है कि 'मैं जैसा पहले था, उसमें भी क्या ख़ास बुराई थी।' तो वो जो हिस्सा है वो विरोध करता है, विद्रोह करता है। वो कहता है 'मुझे क्यों मिटाया जा रहा है? मुझे बार-बार क्यों कहा जा रहा है कि मैं ग़लत हूँ? अगर मैं इतना ही ग़लत होता तो मैं आज भी जो श्रेष्ठता हासिल किए हुए हूँ, वो कैसे करता?' ग़ुमान यही है न कि 'अभी भी हममें कुछ श्रेष्ठ है'?

तो ऊपर से नहीं हिंसा आती है नीचे, नीचे की ओर से हिंसा जाती है ऊपर। और नीचे की ओर से बड़ी तीव्र हिंसा जाती है ऊपर की ओर, आग की लपट जैसे ऊपर को उठे। याद है एक बार कहा था मैंने कि वो शिष्य ही नहीं जिसके मन में कभी-न-कभी गुरु की हत्या कर देने का विचार न आया हो? क्योंकि गुरु अगर गुरु है तो वो प्राणघातक है। और जो तुम्हारे लिए प्राणघातक है, तुम क्यों नहीं पलटकर उसके प्राण लेना चाहोगे?

हाँ, वो तुम्हारे लिए प्राणघातक इस अर्थ में है कि वो तुमको नया जीवन देना चाहता है। और तुम जब पलटकर के गुरु के प्रति हिंसक होते हो तो इसलिए नहीं कि तुम गुरु को नया जीवन दोगे, इसलिए कि तुम अपना पुराना, सड़ा हुआ जीवन बचाना चाहते हो। इसी भाव का इस मन्त्र में स्वीकार है कि हम ऐसे न हो जाएँ कि सत्य की ओर हिंसक भाव से या विलग होकर के, पराए होकर के, क्रोधित होकर के देखें। हम ऐसे हो जाएँ कि हमें वो सौम्य दिखाई दे। हम ऐसे हो जाएँ कि हमें वो सुखप्रदाता दिखाई दे।

देखो, अगर तुम ग़लत रास्ते पर चल रहे हो तो तुम्हें दुःख मिलेगा। जब तुम्हें दुःख मिलेगा तो तुम ये नहीं मानोगे कि वो दुःख तुम्हें तुम्हारी हरकतों की वजह से मिला है। तुम मानोगे कि वो दुःख तुम्हें किसने दिया? ऊपरवाले ने दिया। तो देखो तुम्हारी दृष्टि में क्या हुआ; वो जो परमात्मा है वो तुम्हारे लिए क्या हो गया? दुःखप्रदाता। दुःखप्रदाता हो गया न? इसी तरह से परमात्मा सुखप्रदाता कब हो जाता है? जब तुम सही राह चल रहे होते हो, सत्य की, विवेक की राह चल रहे होते हो। तो वो सुखप्रदाता हो जाता है।

तो वास्तव में जब तुम प्रार्थना करते हो कि 'तुम मेरे लिए सुखप्रदाता रहो', तो तुम्हारी प्रार्थना ये है कि 'मैं विवेक की राह चलूँ', क्योंकि तुम विवेक की राह चलोगे तभी तो तुम्हें सुख मिलेगा। वो सुख वास्तव में तुम्हें किसी उपरवाले ने, किसी बाहरवाले ने नहीं दिया है। वो सुख वास्तव में तुम्हें पर्वत पर आरूढ़ किसी भगवान ने नहीं दिया है। वो सुख वास्तव में तुम्हारे अपने कर्म का परिणाम है। लेकिन हम ये मानते नहीं हैं। हम किसी बाहरवाले की अभिकल्पना ज़रूर करते हैं कि वहाँ से आ रही है भलाई-बुराई सब कुछ।

तो जब उस बाहरवाले से कहा जाए कि 'मेरा भला करना', तो वास्तव में अपने-आपको याद दिलाया जा रहा है कि ऐसे काम करने हैं तुम्हें जिसमें तुमको भलाई मिले। वो नहीं भलाई दे देगा। तुमने काम ग़लत करे हैं तो क्या तुमको परमात्मा भलाई दे सकता है, सुख दे सकता है?

हालाँकि उम्मीद हमारी यही रहती है कि हम घटिया-से-घटिया ज़िंदगी जिएँ, बेकार-से-बेकार निर्णय करें लेकिन उसके बाद भी हमारा कल्याण हो जाए। लेकिन वो होगा नहीं। वहाँ जो गणित चलता है, जो नियम चलता है वो बिलकुल पक्का है। उसमें किसी के लिए कोई अपवाद नहीं बनाया जाता। जैसा आपने कर्म करा है, वैसा आपको परिणाम मिलेगा। श्रेष्ठ मार्ग पर चले हो, श्रेष्ठ परिणाम मिलेगा; और अगर निम्नस्तरीय काम कर रहे हो तो निम्नस्तरीय परिणाम मिलेगा।

"जिस बाण को प्राणियों की ओर फेंकने के लिए आप हाथ में धारण किए रहते हैं, आप उसे कल्याणकारी बनाएँ।"

नहीं, वहाँ से कोई बाण नहीं आ रहा है। सत्य तो दर्पण की तरह है। दर्पण में अगर तुमको दिखाई दे रहा है कि कोई तुम पर बाण फेंक रहा है, तो वास्तव में क्या हो रहा है? क्या हो रहा है? तुम बाण फेंक रहे हो न।

मेरे मन के बहुत निकट है गीता, चौथा अध्याय, चौदहवाँ श्लोक – "हे अर्जुन! जो मेरे प्रति जैसा है, उसके प्रति भी मैं वैसा ही हूँ।" तो उस पर हमने क्या बात कही थी? जो भरम (भ्रम), उसे भरम, और जो परम, उसे परम। दर्पण का कोई पूर्वाग्रह नहीं, उसके लिए कोई अच्छा-बुरा नहीं, उसे किसी को कुछ नहीं देना। तो यहाँ दर्पण से प्रार्थना है कि 'तुम जो मुझे बाण फेंक रहे हो, मेरे लिए कल्याणकारी रहे।'

वास्तव में ख़ुद को चेताया जा रहा है, ख़ुद को याद दिलाया जा रहा है कि दर्पण के प्रति रवैया शांति का और सम्मान का रखना। अन्यथा जब अपना चेहरा बहुत विकृत हो जाए तो बड़ा मन करता है दर्पण को ही तोड़ देने का। परमात्मा दर्पण जैसा है। दर्पण को तुम सम्मान दे सको, उसके लिए ज़रूरी है कि तुम्हारा चेहरा साफ़ और सुंदर रहे। फिर दर्पण बड़ा प्यारा लगेगा कि 'आहाहा! देखो, सामने से जो दिखा रहा है हमें दर्पण, वो कितनी बढ़िया चीज़ है।'

दर्पण क्या बढ़िया चीज़ दिखा रहा है? तुम बढ़िया हो इसलिए दर्पण ने बढ़िया चीज़ दिखा दी। तो दर्पण से तुम्हारा रिश्ता सुमधुर रह सके, उसके लिए आवश्यक है कि तुम्हारा जीवन पहले सुंदर रहे। जीवन सुंदर होगा, दर्पण पलटकर के तुमको सुंदरता दिखा देगा। दर्पण ने तुम्हें सुंदरता इसलिए नहीं दिखाई क्योंकि दर्पण को तुमसे कोई विशेष प्रेम है। दर्पण ने तुम्हें सुंदरता इसलिए दिखाई क्योंकि दर्पण सब तरह के पूर्वाग्रहों और पसंद-नापसंद से मुक्त है; उसका तो नाम ही है मुक्त, परममुक्त।

तो अध्यात्म परमदायित्व, सम्पूर्ण कर्तव्य का अनुसंधान है। यहाँ कोई बात किसी और पर नहीं छोड़ी जाती; भाग्य पर तो छोड़ी ही नहीं जाती, सत्य पर भी नहीं छोड़ी जाती; संसार पर तो छोड़ी ही नहीं जाती, परमात्मा पर भी नहीं छोड़ी जाती। यहाँ तो पूरी ज़िम्मेदारी ली जाती है सीधे अपने ऊपर। साफ़ पता है कि जो कुछ हो रहा है उसका दायित्व सिर्फ़-और-सिर्फ़ मेरे ऊपर है।

तो दूसरे से भी जब प्रार्थना हो रही है तो वास्तव में वो प्रार्थना लौटकर के स्वयं से है। ख़ुद को याद दिलाया जा रहा है। जैसे ख़ुद से ही प्रार्थना की जा रही हो, 'इस बार ग़लती मत कर बैठना। देखो, तुम बार-बार ग़लती करते हो मन, इस बार ग़लती मत करना मन।' या ऐसे कह लो कि तुम्हारे ही मन के कई तल हैं और जब तुम प्रार्थना करते हो तो अपने ही मन के उच्चतम तल का आह्वान करते हो। जब तुम प्रार्थना करते हो तो अपने ही मन के उच्चतम तल को बुलाते हो, याद करते हो। और मन के ही उच्चतम तल का दूसरा नाम परमात्मा है, सत्य है, रुद्र है।

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