प्रश्नकर्ता: अपनों से जब झगड़ा हो जाता है, तो पीड़ा या दुख क्यों होता है?
आचार्य प्रशांत: पराया कौन है? और कैसे तुमने ये अपने-पराये का भेद किया?
प्र: जो पहले से, जन्म से पास में हैं।
आचार्य: ठीक है, तुम्हें अब इसी आधार पर अगर जीना है कि अधिकांश विश्व तुम्हारे लिए पराया ही है, और दो ही चार लोग तुम्हारे अपने हैं, तो तुम्हारा खेल तो वहीं ख़त्म हो गया। आज तुम्हारा चेहरा देखा है। मैं जन्म से तुम्हारे पास था? तो फिर अपने-पराये से सम्बन्धित प्रश्न मुझसे क्यों पूछ रहे हो? तुम तो अपना मानते ही सिर्फ़ उसे हो जिसका तुमसे जन्म का और देह का रिश्ता हो। मेरा न तुमसे जन्म का रिश्ता है, न देह का रिश्ता है। मैं तुम्हारा अपना कैसे हो गया?
प्र: आचार्य जी, वो अपना मानते हैं।
आचार्य: पर अभी प्रश्न तो तुमने करा न कि अपनों को पीड़ा होती है अगर मैं सच्चाई पर चलूँ? अभी उन्होंने आकर के अपने-पराये की बात करी या तुमने करी?
प्र: मेरी वजह से पीड़ा होती है उनको।




