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कामवासना बार-बार क्यों सताती है?
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
24 min
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपको सुनने के बाद जीवन में काफ़ी सुधार महसूस किया है लेकिन कामवासना की स्थिति में अभी भी असहाय रहता हूँ, ऐसा क्यों?

आचार्य प्रशांत: असहाय स्थिति तो रहेगी। जीव हो, इंसान पैदा हुए हो, संरचना ही तुम्हारी ऐसी है कि जवान होवोगे तो वासना पकड़ेगी। वह तो होगा। पर वासना भी उसको पकड़ती है ज्यादा जो पकड़ने के लिए उपलब्ध होता है।

तुम उपलब्ध मत रहो न, तुम अपनी उपलब्धता कहीं और कर दो; तुम किसी और को उपलब्ध हो जाओ। इस समय यहाँ बैठे हो। कामवासना पकड़ ले तुम्हें इसकी संभावना शून्य सी ही है। होने को कुछ भी हो सकता है, पर बहुत कम है संभावना। क्यों? क्योंकि उपलब्ध नहीं हो। क्यों उपलब्ध नहीं हो काम को? क्योंकि अभी ध्यान को उपलब्ध हो। काम आता है, तुम्हें खोजता है, कहता है, “होता तो इसका शिकार कर लेता। ये यदि मौजूद होता, ये यदि उपलब्ध होता तो मैं इसका शिकार कर लेता।” और जब भी तुम उपलब्ध होवोगे तो शिकार तो तुम्हारा हो जाएगा।

बंदर जमीन पर ही सो गया तो शेर छोड़ दो, लोमड़ी भेड़िये भी उसका शिकार कर जाएंगे। क्यों? क्योंकि वह उपलब्ध हो गया न। चढ़ गया बंदर ऊपर, शिखर पर, तो क्या ज्यादा ताकतवर हो गया? क्या अब घुसा मार कर भेड़िये को भगा देगा? है तो वो बंदर ही। अभी भी अगर पकड़ में आ जाए भेड़िए की तो मारा ही जाएगा। लेकिन अब वह मारा नहीं जाएगा क्योंकि अब वह उपलब्ध नहीं है। तुम उपलब्ध होना छोड़ दो। तुम काहे जमीन पर पड़े हो? तुम चढ़ जाओ पेड़ पर। जितना ऊपर चढ़ जाओगे, उतना तुम्हारा शिकार होने की संभावना कम होती जाएगी। ऊपर चढ़ो, ऊर्ध्वगमन।

ऊपर चढ़ने का आशय समझते हो? ऊपर वाले को उपलब्ध हो जाओ, उसके काम में नत रहो और रत रहो, फिर कामवासना, और भी पचास चीज़ें हैं, वो आएँगी जरूर, वो क्यों आएँगी? क्योंकि जीव हो तुम, उनको लिए लिए घूम रहे हो। उनको आना थोड़ी ही पड़ता है, उनको तो अपनी तुम गठरी में, इसी गठरी(शरीर) में, घट में, पोटली में बांधे घूम रहे हो।

यह भी कोई आवश्यक थोड़ी है कि तुम्हें कोई विषय दिखे तो ही तुममें वासना उठेगी। ऐसा थोड़ी ही है कि तुम्हें कोई आकर्षक स्त्री-पुरुष कुछ दिख जाए तभी तुममें वासना उठती है, तुम यहाँ जाओ जंगलों में, घूमो, सिर्फ जंगल है, पेड़ हैं, पौधे हैं, पक्षी हैं, बीच-बीच में कोई जानवर है, दूर कहीं झरना है और यह संभव है कि तुम पर वासना का आक्रमण हो जाए। तुम कहोगे, अजीब बात है यहाँ कहाँ से आ गयी? कुछ देखा नहीं, कुछ सोचा नहीं, यहाँ बैठे-बिठाए आफत कहाँ से खड़ी हो गयी? वह कहीं से नहीं आ गयी, वह तुम्हारी गठरी में मौजूद थी।

प्र: उपलब्ध न होने का अभ्यास कैसे करें?

आचार्य: अभी यहाँ बैठे हो तो उपलब्ध नहीं हो वासना को, अभ्यास क्या करना है?

प्र: अभी तो माहौल ही ऐसा है।

आचार्य: तो यही माहौल रखो।

प्र: हमेशा यही माहौल?

आचार्य: हाँ, हमेशा यही माहौल रखो। और इस माहौल में भी तुम बच जाओगे वासना से इसकी कोई शत-प्रतिशत आश्वस्ति है नहीं। जो हर प्रकार की माया से बच जाते हैं कामवासना उन्हें भी पकड़ लेती है। तो हम ये जो आयोजन कर रहे हैं, ये कोई बहुत बड़ी चीज नहीं है। बिल्कुल हो सकता है कि यहाँ बैठे हो और सुनते-सुनते तुम पाओ कि मन में कामुकता तैरने लगी, बिल्कुल हो सकता है, लेकिन वही है कि संभावना जरा कम हो जाती है; ठीक है भाई! मर्ज लाइलाज ठहरा तो क्या इलाज न करें? लाइलाज है फिर भी इलाज करके उसकी तीव्रता को तो कम कर सकते हैं, उसके रोष को तो कम कर सकते हैं, उसके प्रकोप को तो कम कर सकते हैं, कि नहीं? भूख लाइलाज मर्ज है, है कि नहीं? है कोई भोजन ऐसा जो डाल दो पेट में तो फिर भूख लगे ही न, है कोई? बोलो। और भूख सताती है न? किसी बीमारी की तरह वो भी सताती है। दो दिन न खाओ फिर बाकी सारी बीमारियां भूल जाओगे, फिर एक ही बीमारी बचेगी, कौन सी? भूख, भूख। फिर कामवासना इत्यादि भी भूल जाओगे। चार दिन खाने को न मिले फिर देखें, कैसे तुममें सक्रिय रह जाती है वासना। तो ये थोड़ी कहते हो कि भूख तो रोज लगनी है तो अब क्या इसका इलाज करें। भूख लगती है तो उसको थोड़ी सी चिकित्सा देते हो न? भोजन और क्या है? भूख को जो तात्कालिक चिकित्सा दी जाती है, वो है?

प्र: भोजन।

आचार्य: और प्यास को जो तात्कालिक चिकित्सा दी जाती है वो है?

प्र: पानी।

आचार्य: तो ऐसा ही है। काम से पूर्ण मुक्ति तुम्हें कभी नहीं मिल जानी, न आज न कल न आखरी स्वास में, लेकिन जब वो उठे तब उसे सुसंगति के माध्यम से, ध्यान, योग, भक्ति, सत्कार्य⁠—इनके माध्यम से ज़रा झांसा दिया जा सकता है। ठीक है! क्या बुराई है?

“शठे शाठ्यं समाचरेत्”(दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार ही करना चाहिए)। वो तुम्हें झांसा देने ही तो आता है। काम कोई तुम्हें बताकर तुमपर आक्रमण करता है? कोई वो तुमको बड़ा मीठा फल देता है? फँसा लेता है और फिर भुगतते हो, रोते हो कि ये तो गड़बड़ हो गयी। तो जैसे वो तुम्हें झांसा देता है वैसे ही तुम उसे झांसा दे दो। वो जब आए, अपना फन उठाए तुम उससे कहो, “बस दस मिनट रुको, कुछ ज़रूरी काम है निपटाकर आते हैं, तुम्हारे ही है सनम! बस दस ही मिनट में आ जाएंगे।” और दस मिनट में ऐसी जगह पहुँच जाओ जहाँ से लौटना संभव ही न हो। वो दस मिनट का उपयोग कर लो फोन करने के लिए और फोन पर वादा कर दो कि आ रहे हैं। अब वादा कर दिया है तो जाना ही पड़ेगा, वासना पीछे बैठी चिल्ला रही है कि “झांसा दे गया बच्चू!” उसको बोलो, “गुड बाय!”

प्र: दूसरे किसी चीज में तो थोड़ी स्पष्टता मिल जाती है, जैसे किसी दूसरे का भला करने का सोचूँ तो पता चल जाता है कि शायद यह भी मेरा अहंकार ही है पर कामवासना के मामले में इतना भी नही दिखता। ऐसा क्यों?

आचार्य: तुम सोचोगे वगैरह तो एक सोच दूसरी सोच को काट दे ऐसा यदा-कदा होता है, फिर तो तुम्हें ब्रह्मवाक्य ही सोचना पड़ेगा जो बाकी सोचों को काट दे। तुम्हें तो अनुपलब्ध हो जाना पड़ेगा। तुम्हें तो दिनभर जीवन ऐसा बीताना पड़ेगा कि रात में जब सोयो तो थक के चूर हो जाओ, अब कहाँ से आएंगे तुमको काम इत्यादि के खयाल। तुम तो बिस्तर में पड़े नहीं उससे पहले ही सो गए, अब किसको मोहलत है कि बैठे-बैठे मधुर कल्पनाओं में लोट रहा है और विचार कर रहा कि “आ हा हा..सब अप्सराएं आ गयी हैं।” सही जीवन जिओ, अपने-आप ऐसी नींद आएगी कि—और जो सही जीवन जीतें है उन्हें नींद फिर गहरी आती है। गहरी नींद का मतलब समझते हो? उसमे सपने नहीं होतें। जिन्होंने दिनभर मक्कारी की होती है, अय्यासी की होती है, कामचोरी, उनकी नींद उथली होती है। उथली नींद में क्या आते हैं?

प्र: सपने।

आचार्य: अब सपने आएंगे। सपने वही आएंगे जो तुम्हारी चित्त की वृत्तियाँ हैं, फिर सपनों में अप्सराएं आएँगी, फिर तुम्हें बीमारियां लगेंगी। इससे अच्छा ये है कि एक महत प्रयोजन चुन लो, एक बड़ा उद्देश्य चुन लो और दिनभर उसमें टूटकर लगे रहो, अथक काम करो।

प्र२: अथक काम करेंगे फिर थक जाएँगे फिर बोरियत आ जायेगी और सो जाएँगे।

आचार्य: धर्म बोरियत से बड़ा होता है। बोरियत मनोरंजन के साथ आती है, धर्म मनोरंजन नहीं है। तुम पिक्चर देखने गए हो तो वहाँ बोलते हो “बोर हो गए।” जब तुम किसी धार्मिक अनुष्ठान में लगे हो, जब तुम वो कर रहे हो जो तुम्हें करना ही है तो तुम कैसे बोल सकते हो कि हम ऊब गए, बोर हो गए? पिक्चर बोर करती है। उबाऊ है या नहीं, उत्तेजक है या मनोरंजक है, ये सारे विशेषण किसके साथ लागू होते हैं? विषयों के साथ, लालसाओं के साथ, लिप्साओं के साथ। वहाँ पर तुम कह सकते हो, “उत्तेजना मिली या नहीं मिली? ऊब मिली या रंजन मिला?” वहाँ पर ये प्रश्न प्रासंगिक है, पर तुम उस काम में लगे हो जो काम कीमती से कीमती है। वहाँ पर इस सवाल की कोई कीमत ही नहीं कि ऊबे कि नहीं ऊबे? ये सवाल उठेगा ही कहाँ से? हाँ, अब तुमने काम ही कुछ ऐसा पकड़ा हो जो तुम्हें पूरी तरह से सोख न पाता हो तब ये प्रश्न उठेगा कि दिल नहीं लग रहा, ऊब लग रही है।

तुम्हारा कोई प्रियजन बहुत बीमार है और उसे तुमने गाड़ी में बैठा रखा है और तुम खुद चला रहे हो, दो घंटे दूर है अस्पताल और उसको लिए जा रहे हो, बीच में जम्हाई मारकर कहते हो क्या कि गाड़ी चलाते-चलाते ऊब गया? बोलो। ये सवाल ही बेतुका है क्योंकि इस वक्त ऊबना हो ही नहीं सकता। और मान लो तुम दो नहीं तीन लोग हो, तुम हो, तुम्हारा एक दोस्त है और पीछे एक मरीज है जिसकी जान बचाने के लिए अस्पताल को भाग रहे हो, और तुम्हारा दोस्त तुमसे पूछे “भाई तू ऊब तो नहीं रहा?” तो उसको थप्पड़ और मार दोगे। कहोगे, “तू ये क्या मूर्खतापूर्ण सवाल कर रहा है। मैं इसको क्या मनोरंजन के लिए, उत्तेजना के लिए, रास-विलास के लिए अस्पताल लेकर जा रहा हूँ? मैं क्या कर रहा हूँ? मैं धर्म का पालन कर रहा हूँ” और धर्म के पालन में ये थोड़े ही पूछा जाता है कि खुश हो या नहीं हो। खुश हो ठीक है, दुखी हो तो भी ठीक है, जो आवश्यक है वो करो, फर्क नही पड़ता कि वो तुम्हें रुच रहा है कि नहीं रुच रहा है। तुम्हारी रुचि एक तरफ़, तुम्हारी पसंद एक तरफ़, काम ज़रूरी है होना चाहिए; इसी को तो धर्म कहते हैं।

भाई धर्म में और विलास में क्या अंतर है? कर्म तो दोनों में ही है। धर्म भी कर्म माँगता है, और विलास भी कर्म माँगता है। पर धर्म में कर्म किया जाता है (ऊपर की ओर इशारा करते हुए) उसके लिए, और विलास में कर्म किया जाता है अपने लिए, इस व्यक्तित्व के लिए, इस शरीर के लिए, इस मन के लिए। चूँकि विलास में कर्म करा ही अपने लिए जाता है—अपने से मेरा तात्पर्य आत्मा नहीं है, अपने से मेरा तात्पर्य है: तन, मन, अहंकार—विलास में कर्म करा ही अपने लिए जाता है, तो जब तुम विलासिता में संलग्न हो तब ये सवाल ज़रूर पूछ लेना कि भाई रुच रहा है कि नहीं रुच रहा है? क्योंकि उस कर्म का उद्देश्य ही यही था कि मन को ज़रा मसाला मिले, मन को ज़रा कुछ रुचिकर लगे पर धर्म में जब तुम कर्म करते हो तब उस कर्म का ये उद्देश्य ही नहीं होता कि वो तुम्हें अच्छा लगे, मीठा लगे। जब कोई तुम्हें दावत देता है और तुम्हारे लिए व्यंजन बनाता है तो फिर वो तुमसे पूछता है, “खाना अच्छा बना है न?” क्यों? क्योंकि उस खाने का उद्देश्य ही था सुस्वादु होना। खाना बनाया ही इस लक्ष्य से गया कि तुम्हारी जीभ को पसंद आए। ठीक? अब तुम गए हो किसी चिकित्सक के पास और वो तुमको सिरप पिला रहा है तो क्या सिरप पिला के पूछता है, “ टेस्ट (स्वाद) अच्छा था?” पूछता है क्या? बोलो।

प्र: नहीं।

आचार्य: क्यों नहीं पूछता। दोनो ही जगह पर स्वाद तो कुछ-न-कुछ था, कुछ-न-कुछ तो जीभ पर गया, चाहे पकवान हो चाहे दवाई हो, जीभ से तो दोनों हो के गुजरे, सीरप भी तो जीभ पर पड़ा। और तुम अगर डॉक्टर से कहो कि, “डॉक्टर साहब, ज़रा जलजीरा डाल के सिरप देना।” तो क्या बोलेगा? बोलेगा, “तुम्हें डॉक्टर की तो बिल्कुल ज़रूरत है, पर उधर बगल में साइकाइअटि्र (मनोचिकित्सक) वार्ड है उधर जाओ, तुम्हें वो वाला डॉक्टर चाहिए पहले।”

तुम्हें अभी जो दवाई दी जा रही है वो तुम्हारी ज़बान को तृप्त करने के लिए नहीं दी जा रही है। वो किसलिए दी जा रही है? वो किसी और उद्देश्य से दी जा रही है। इसी तरीके से धर्म में जब कर्म किया जाता है तो तुम्हारी ज़बान को या तुम्हारे मन को, तुम्हारी इन्द्रियों को, तुम्हारी पसंद-नापसंद को तृप्त करने के लिए नहीं किया जाता, वो किसी और उद्देश्य से किया जाता है। उसमें ये पूछना ही बचकानी बात है कि तृप्ति मिली कि नहीं? अच्छा लगा कि नहीं? मैंने आजतक किसी सत्र के बाद लोगों से ये नहीं पूछा, “अच्छा तो लगा न? किसी को चोंट तो नहीं लग गयी? भाई सबको मीठा-मीठा प्रतीत हुआ?” क्यों नहीं पूछा? क्योंकि जो बोल रहा हूँ उसका उद्देश्य आपको मिठास देना नहीं हैं, उसका उद्देश्य आपको सहलाना नहीं है। उसका उद्देश्य है चिकित्सा। ये दवाई है और दवाई का स्वाद नहीं देखा जाता। इसी तरीके से धर्म में अपनी व्यक्तिगत रुचि-अरुचि को बीच में नहीं लाया जाता।

कुछ पकड़ लो ऐसा जो तुमको सीधे-सीधे शांत कर देता हो, जो तुमको पता ही हो कि ज़रूरी से ज्यादा ज़रूरी है, फिर वो तुम्हें इतना सोख लेगा कि तुम उपद्रव को उपलब्ध ही नहीं रहोगे और यही एकमात्र तरीका है उपद्रव से बचने का।

दिन में कामवासना उठे, उससे कहो रात में आना और रात में इतने थके रहो कि जब वो आए तो तुम्हें सोता पाए। बस खेल खत्म।

प्र: इसमें आचार्य जी, शारीरिक दृष्टि से देखें तो खानपान में परहेज करना होगा न?

आचार्य: खानपान में परहेज करोगे तो परहेज करते समय क्या याद रख रहे हो? कामवासना। अब तुम्हारे सामने कुछ भोजन रखा है और तुम कह रहे हो, “ये फलाना चीज़ खाने से वासना उठती है” तो तुमने किसको याद कर लिया है?

प्र: वासना को।

आचार्य: अब जब वासना को याद ही कर लिया है तो कौन रोक रहा है तुम्हें खाना छोड़कर उठ जाने से और ज़रा आधे घन्टे जाकर के वासना तृप्त कर आने से, क्योंकि वासना याद तो आ ही गयी, तुम उपलब्ध थे याद आने के लिए तो याद तो आ ही गयी। तुम कहोगे ज़रा एक फ़ोन अटेंड करके आता हूँ और उतनी देर में तो हो गया काम, फ़ोन अटेंड करने भर में।

खाना वो खाओ जो तुम्हें सेवा के लिए तैयार कर दे, जो तुम्हें सेवा के लिए मज़बूत कर दे। नौकर हो तुम और काम है तुम्हारा मालिक की ख़िदमत। वो भोजन मत करो जो तुम्हें काम से दूर ले जाता हो, वो भोजन करो जो तुम्हें मालिक के करीब ले जाता हो ताकि ख़िदमत कर पाओ। और मालिक की ख़िदमत अगर कर रहे हो तो खुद ही इतने व्यस्त रहोगे कि काम को अनुपलब्ध हो जाओगे।

ये दो अलग-अलग दृष्टियाँ हैं समझना, एक दृष्टि है जो कहती है राजसिक भोजन से बचो, राजसिक भोजन से वासना उठती है, सात्विक आहार करो। ठीक है, वो बात गलत नही कह रही है पर मैं उससे ज़रा आगे की बात कह रहा हूँ। मैं कह रहा हूँ तुम देखो कि धर्मोचित कार्य के लिए तुम्हें क्या भोजन चाहिए, वो खाना खाओ तुम। देखो कि तुम्हारे पास मिशन क्या है और उस मिशन की पूर्ति के लिए तुम्हें कैसा खाना चाहिए, वो खाना खाओ। वो खाना खाने से क्या होगा? तुम मिशन में और ज़्यादा डूब जाओगे। जब मिशन में और ज़्यादा डूब जाओगे तो वासना से खुद ही दूर हो जाओगे। और तुम कहो कि, “नहीं साहब, जीवन में मेरे कोई मिशन वगैरह तो नहीं है पर मैं प्याज और लहसुन नहीं खाऊंगा।” तो बेटा, बहुत घूम रहे हैं जिन्होंने प्याज-लहसुन नहीं खाया लेकिन दिन-रात मैथुन के दीवाने हैं। प्याज निश्चित रूप से वासना को उद्दीप्त करती है कोई शक नहीं लेकिन प्याज न खाने भर से अगर कोई वासना से बच सकता तो फिर तो बहुत आसान था। ये खेल प्याज जितना छोटा नहीं है, ये परमात्मा जितना बड़ा है। मैं हिमायती नहीं हूँ कि तुम प्याज खाओ और ये खाओ और वो खाओ, बस मैं तुम्हें बता रहा हूँ कि ये सब जो बातें हैं कि सात्विक खाना खाने से तुम बच जाओगे, ऐसा होने नहीं वाला। वासना से अगर तुम्हें वाकई बचना है तो ब्रह्म की ओर चले जाओ, यही तो ब्रह्मचर्य है। ब्रह्म में चर्या करने लगो वासना खुद ही नहीं सताएगी। ब्रह्म माने? सच्चाई। जीवन को कुछ ऐसा लक्ष्य दे दो जो जानते हो कि सच्चा है और डुबो दो उसमें अपने-आपको।

हवाओं का बहना और ये शोर कब ज़्यादा सुनाई दे रहा है अभी या तब जब मैं बोल रहा था?

प्र: अभी ज़्यादा सुनाई दे रहा है।

आचार्य: पर शोर तो पहले भी था न! बस तुम उस शोर को उपलब्ध नहीं थे।

प्र३: कामवासना तो नेचुरल (स्वाभाविक) ही है न? जैसे हिन्दू पौराणिक कथाओं में भी शिव-पार्वती की और कृष्ण की प्रेम कथाएँ हैं।

आचार्य: नेचर (स्वभाव) क्या होता है? स्वभाव है नेचर या शरीर है नेचर ?

प्र३: स्वभाव।

आचार्य: तो काम स्वभाव में है? ये किसने बता दिया? आप बातें तो कर रहे हो कृष्ण और राम और ये और वो और शिव! बस कहानियां ही सुनी है या पढ़ा भी है?

प्र३: नहीं, बस कहानियां सुनी है।

आचार्य: तो कहानियां जो सुनी है उसमें अपने ये भी फिर सुनना था कि शिव के पास जब गया था कामदेव तो उन्होंने उसका क्या किया था। ये कहानी नहीं सुनी?

प्र३: ये भी सुनी है मगर मैं जानना चाह रहा था कि यदि ये नैचुरल है तो क्या इसको नियंत्रित करना ज़रूरी है?

आचार्य: अरे तो नेचर क्या है पहले ये बताओ। नेचर क्या है?

प्र३: नहीं पता आचार्य जी।

आचार्य: तो ये पहला प्रश्न होना चाहिए था न! कि आचार्य जी मुझे बताइये नेचर क्या है मेरा? वही तो वो पूछ रहा है, “ हु एम आई * ”(मैं कौन हूँ)। * हु एम आई पूछने का अर्थ ही है: मेरा नेचर क्या है। और देखिए वो पूछ रहा था और आपने नेचर की व्याख्या दे डाली और वो भी गलत, कि ये तो नैचुरल ही है काम उठ रहा है। वो पूछ रहा है, “*हु एम आई?*” और आपने उसका उत्तर दिया है, “*आई एम ए सेक्सुअल बीइंग*”(मैं एक कामुक व्यक्ति हूँ)।

प्र३: नहीं, मैंने ऐसा नहीं कहा।

आचार्य: आपने कहा ये तो नैचुरल है, आपने तो नेचर की परिभाषा दे दी न।

प्र३: नहीं नहीं, ये बात तो मैंने पहले प्रश्न के प्रतिक्रिया के रूप में कही थी।

आचार्य: आप समझ रहे हैं मैं क्या बोल रहा हूँ? उसने पूछा हु एम आई? वो सवाल यही है कि मेरा नेचर क्या है? स्वभाव क्या है? और आपने बता दिया, इट इज़ नैचुरल टु हैव सेक्सुअल फीलिंग्स (यौन इच्छा स्वाभविक है।)

प्र३: मगर आचार्य जी ये तो नैचुरल (स्वाभाविक) ही है न! क्योंकि सेक्सुअल फीलिंग्स से हटकर भी बहुत सारी इच्छाएं हैं जो हमें प्रभावित करती हैं।

आचार्य: नेचर क्या है? तुम्हें हज़ार तरह की बीमारियां हो सकती हैं तो क्या वो तुम्हारी नेचर हैं? नेचर क्या है? तुम कौन हो?

प्र३: इसके बारे में तो कभी विचार किया ही नहीं।

आचार्य: तो वो ज़्यादा ज़रूरी है न। फिर समझ मे आएगा कि वो परेशान क्यों है। अगर वो यह कह रहा है कि, “मुझे बचाओ” तो उसको कुछ परेशानी है तभी तो कह रहा है। कामवासना बहती हवा की तरह होती कि वो बह रही है आप अपना कर रहे हो फिर तो कोई बात नहीं थी।

प्र३: क्या इनके सवाल का जवाब मनोविज्ञान या मनोचिकित्सा में नहीं है?

आचार्य: बिल्कुल हो सकता है, अगर उनको ये पता हो कि वो परेशान क्यों हैं।

मनोविज्ञान का क्या अर्थ होता है? मन को समझना। अब मन परेशान है, तो मन क्यों परेशान है?

प्र३: तो इसे दो तरीके से व्याख्या की जा सकती है। एक धार्मिक व्याख्या और एक...

आचार्य: व्याख्या हटाइए, हकीकत पर आइए। व्याख्या माने कहानी, *फ़िक्श्न्*।

प्र३: मैं कह रहा था मान लीजिए इनके पास चौबीस घन्टे हैं इस बारे में सोचने के लिए..

आचार्य: भाई दो तरह की संलिप्तता होती है, दो तरह से आदमी संलग्न होता है। एक ये कि खुले तौर पर सोच रहा है कि सेक्स मिल जाए, और दूसरा ये कि उसे पता भी नहीं है कि वो सेक्सयूअली ओरिएंटेड (कामोन्मुख) है और इस कारण उसकी ज़िंदगी तबाह हो रही है। आपको पता भी नहीं चल रहा कि आपको एक कार का मॉडल इसलिए पसंद आ रहा है क्योंकि वो कर्वेशियस (कमनीय) बना दिया गया है और वो औरत के जिस्म जैसा दिख रहा है। आपने वो कार ही खरीद ली और आपको पता भी नहीं चला लाखों डुबो आए, क्योंकि कामवासना ने छुपकर के आपसे एक फैसला करवा दिया। आप बोलोगे, “नहीं साहब, सेक्स का ख्याल तो मुझे दिन में आधे घंटे के लिए ही आता है बाकी टाइम तो मैं कार का ख्याल कर रहा था।” आपको पता ही नहीं है कि कार भी काम है। आपको पता ही नहीं है कि कार भी इसीलिए तब बिकती है जब उसके बगल में—कभी जाइएगा ऑटो एक्सपो में—कार भी इसीलिए तब बिकती है जब उसके बगल में कमनीय मॉडल्स खड़ी हों।

आप तो ये कहोगे, “नहीं, अभी मैं अपना काम कर रहा हूँ।” इसीलिए ये संयोग मात्र नहीं है कि हमारी भाषा में काम और ‘काम’(सम्भोग) के लिए एक ही शब्द है, वर्क और वासना के लिए एक ही शब्द है। क्योंकि ज़्यादातर हम जो काम करते हैं, हमें पता भी नहीं होता कि वो लिबिडो (कामेच्छा) द्वारा संचालित है। हम यही सोच रहे होते हैं कि, “मैं तो काम कर रहा हूँ, मैं दफ़्तर जा रहा हूँ काम करने।” हमें ये पता भी नहीं होता कि हम दफ़्तर में काम करने इसलिए जा रहे हैं क्योंकि अंततः उसका ताल्लुक़ सेक्स से है। सेक्स पूरी तरह से नचा रहा है, एक घन्टे नहीं चौबीसों घंटे नचा रहा है। हाँ, एक घन्टे वो खुलकर नचाता है और बाकी तेईस घंटे वो छुपकर नचाता है और चूँकि आपकी दृष्टि बहुत तेज नहीं है, बहुत शार्प नहीं है तो आपको पता भी नहीं चलता कि बाकी तेईस घंटे भी आपको नचा जो रहा है वो काम ही है, सेक्स ही है। आप मनोविज्ञान की बात कर रहे हैं, किसी मनोविज्ञानी से पूछिए वो आपको बताएगा कि और कुछ नहीं है आदमी का ईंधन—इस दुनिया का जो ईंधन है, जो प्राइम मोटिवेटर (मुख्य प्रेरक) है, वो लिबिडो (कामवासना) ही है। काम और जिजीविषा एक चीज़ हैं। सेक्स इतना थोड़ी ही है कि जाकर किसी से संभोग कर लिया, ये जो लगातार शरीर को बचाए रखने की इच्छा है, ये और क्या है? ये सेक्स का ही छद्म रूप है।

प्र३: बचाने की इच्छा हो तो भी?

आचार्य: धीरे-धीरे समझेंगे अभी बस इतना समझ लीजिए कि नेचर इसको नहीं कहते हैं कि मुझे किसी को मारने का मन करा, मैंने कहा देखो मेरा तो नेचर ही ऐसा है कि मैं दूसरों को मारता हूँ। नेचर शब्द का बड़ा दुरुपयोग होता है क्योंकि अंग्रेजी भाषा में, दुर्भाग्यवश, प्रकृति और स्वभाव के लिए दो अलग-अलग शब्द नहीं हैं। तो जो लोग अंग्रेजी को ज़्यादा पसन्द करते हैं वो सबसे ज़्यादा गच्चा खाते हैं। इसीलिए मैं चाहता हूँ कि बात ज़रा हिंदी में हों। आपने सवाल अगर हिंदी में करा होता तो आप सवाल कर ही नहीं पाते क्योंकि फिर आपको बताना पड़ता कि आप नेचर माने प्रकृति कह रहे हैं या नेचर माने स्वभाव कह रहे हैं। प्रकृति कह रहे हैं तो फिर नेचर का अर्थ हो गया शरीर, फिर तो आप ये कह रहे हैं, “ द पेनिश इज माई नेचर * ”(लिंग ही मेरा स्वभाव है)। * नेचर इज नॉट प्रोन टु इन्फ्लेशन एंड डिफ्लेशन (स्वभाव में उतार चढ़ाव नहीं होते)।

सारा अध्यात्म इसी भेद पर आधारित है कि नित्य और अनित्य का भेद करना सीखो। नित्य और अनित्य का भेद नहीं है अगर, प्रकृति और आत्मा का, प्रकृति और पुरुष का भेद नहीं है अगर तो फिर आगे की कोई बात करना व्यर्थ ही होगा। पहले वो भेद समझें।

(प्रश्नकर्ता की ओर देखते हुए) ठण्ड लग रही होगी आपको? जैसे आप बैठें है उससे पता चल रहा है। तो अगर आप शरीर हैं तो उठकर चले क्यों नहीं जाते? क्योंकि शरीर को तो कुछ नहीं मिल रहा है मुझसे; मैं शरीर को सहला नहीं रहा, मैं शरीर को भोजन नहीं दे रहा, मैं पानी नहीं दे रहा, मैं शरीर को आपके किसी तरह की तृप्ति नहीं दे रहा। अगर प्रकृति हैं आप तो उठकर यहाँ से चले क्यों नहीं जाते? आप नहीं जाएंगे क्योंकि आप प्रकृति मात्र नहीं हैं। आप कुछ और भी हैं इसलिए आप यहाँ बैठे हुए हैं। ये अंतर है प्रकृति और स्वभाव में। आप प्रकृति मात्र होते तो आप कबके उठकर चले गए होते, पर स्वभाव है आपका बोध इसीलिए बोध की खातिर यहाँ बैठे हैं।

प्र३: प्रकृति मात्र मतलब?

आचार्य: शरीर मात्र होते तो शरीर को तो कष्ट ही मिल रहा है न यहाँ पर?

प्र३: नहीं, कष्ट नहीं मिल रहा, अच्छा भी लग रहा है, हवा भी आ रही है।

आचार्य: अभी थोड़ी और ठण्डक हो जाए फिर क्या लगेगा?

प्र३: तब बैंड बज जाएगी।

आचार्य: बैंड बजेगी न, पर तब भी आप कोशिश करोगे बैठे रहने की, कुछ देर तक तो। अब क्यों कोशिश करोगे बैठे रहने की? क्योंकि शरीर मात्र नहीं हो आप।

(जोरो की हवा चलने लगती है)

ठंड लग रही है न?

प्र३: आचार्य जी, मैं इसलिए बैठा हूँ क्योंकि मैं और सुनना चाहता हूँ।

आचार्य: क्यों सुनना चाहते हो? शरीर सुनना नहीं चाहता। आप कह रहे हो, “मैं सुनना चाहता हूँ।” हाथ सुनना चाहता है? कान सुनना चाहता है? होंठ सुनना चाहते हैं? टांग सुनना चाहती है, कौन सुनना चाहता है?

प्र३: दिमाग सुनना चाहता है।

आचार्य: हाँ, ये जो दिमाग सुनना चाहता है ये क्या चीज़ है?

प्र३: शरीर।

आचार्य: दिमाग शरीर है वाकई? मस्तिष्क सुनना चाहता है? मस्तिष्क से सुनते हो आप?

प्र३: कान से सुनता हूँ और मस्तिष्क उसका अर्थ निकलता है।

आचार्य: मस्तिष्क में जो भी कुछ हो रहा है वो फिर मटेरियल (पदार्थ) होगा, केमिकल (रसायन) होगा? क्योंकि मटेरियल में और तो कुछ हो नहीं सकता, फिज़िकल-केमिकल एक्टिविटी (भौतिक-रासायनिक गतिविधि) ही होगी वहाँ पर? तो आप जो सुन रहे हो, समझ रहे हो, अगर वो मटेरियल, फिज़िकल, केमिकल ही है, तो वो काम तो कोई मशीन भी कर सकती है क्योंकि जो कुछ भी मटेरियल और केमिकल है उसको मशीन के द्वारा भी किया जा सकता है न? बोलिए

प्र३: किया जा सकता है।

आचार्य: मैं जो कुछ बोल रहा हूँ उसे कोई मशीन समझ सकती है?

प्र३: नहीं।

आचार्य: इसलिए आप यहाँ बैठे हो क्योंकि मैं जो बोल रहा हूँ वो बात आपकी देह की नहीं है, वो बात आपके मस्तिष्क की भी नहीं है, कुछ और हो आप। जो वो हो आप, वो है जो समझता है, वो समझने को बोध कहते हैं, इसलिए बैठे हो आप यहाँ पर ठण्ड के बावजूद।

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