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जिन्हें डर बहुत लगता हो
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरे जीवन की जो समस्या मुझे समझ आती है, वो ये है कि मेरे अंदर संसार को लेकर भय है। भय जैसे मेरे अंदर जड़ बनाकर बैठ ही गया है। मुझे अजनबी लोगों और परिस्थितियों पर बिना किसी कारण ही संदेह उठता है और डर तो लगातार दिन से रात तक बना ही रहता है। यहाँ शिविर में आने के दौरान, रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया के दौरान और शिविर में आने का जब ख्याल उठा था तब से लेकर अभी आने तक भी लगातार डर ही बना हुआ है। इस भय के साथ जीना मेरे लिए अत्यंत कष्टकारी होता जा रहा है। यह डर शारीरिक और मानसिक दोनों हानि को लेकर उत्पन्न होता है। कृपया मार्गदर्शन करें।

आचार्य प्रशांत: दो-तीन दिशाओं से समझना पड़ेगा बात को पूरी। पहली बात है संदेह की। संदेह में अपने-आपमें कोई बुराई नहीं होती। संदेह से तो कहीं ज़्यादा घातक होता है विश्वास। हममें से अधिकांश लोग संदेह के मारे हुए नहीं हैं। हमारे दुःख, समस्याओं और बंधनों का कारण हमारा झूठा, अंधा विश्वास है। संदेह तो हम वास्तव में कर ही नहीं पाते, करते भी हैं तो बहुत कम। संदेह होना चाहिए।

एक कोण से कहूँ तो धार्मिकता संदेह करने की कला है। किस पर संदेह? उस पर संदेह जो दिख रहा है क्योंकि और उपलब्ध ही क्या है संदेह करने के लिए। जो दिख रहा है, प्रतीत हो रहा है, जान पड़ता है उसके अलावा उपलब्ध कौन है संदेह करने के लिए। तो उसी पर तो संदेश करोगे न? और उस पर संदेह क्यों करना है? क्योंकि जो कुछ भी दिख रहा है, प्रतीत हो रहा है, अनुभव में आ रहा है, जान पड़ता है उसको देखने वाले तो हम ही हैं न।

तो दुनिया में जो कुछ भी बहुत विश्वसनीय, या बड़ा सच्चा लगता है; उस पर संदेह करो जिसने उसे विश्वसनीय और सच्चा मान लिया। और कहाँ छुपती है माया? हमारे विश्वास और आत्मविश्वास में ही तो। किसी दूसरे पर यकीन कर लेते हो तो कह देते हो विश्वास और दूसरा जैसा प्रतीत हो रहा है और जिसको प्रतीत हो रहा है उस पर हमारे भरोसे का नाम है आत्मविश्वास। यही माया है: बड़ा भरोसा कर लेना अपने पर और अपने देखे हुए पर।

लेकिन जो कोई संदेह करे, जो कोई प्रतीत होते हुए सच को झूठ जाने, जो भी कोई देखे कि अंदर-बाहर चारों तरफ फँसाने का सामान और सामग्री तैयार है उसे डर से मुक्त रहना होगा क्योंकि डर की प्रतीति भी तो, डर का अनुभव भी तो हमारे ही द्वारा किया जा रहा है न। कोई बात डरावनी है इसकी पुष्टि कौन कर रहा है? हम खुद ही तो। तो अगर आप देखी हुई चीज़ से डर जाते हो, तो भी ये आपका आत्मविश्वास ही तो है न?

“हमें भरोसा है कि उस तरफ जो सफेद-सफेद दिखाई दे रहा है वो चीज़ हमारे लिए बड़ी हितकर है, बड़ी सच्ची है।" किसको है भरोसा? हमको। और हम ही हैं जिसको भरोसा है कि उधर वो चीज़ जो काली-काली दिखाई दे रही है वो हमारे लिए बहुत हानिप्रद है, बड़ी खतरनाक है। ये भरोसा भी किसको है? हमको ही तो।

तो जो संदेह करेगा वो डर कैसे सकता है भाई? जब तक अपने ऊपर, अपने झूठे अहंकार के ऊपर भरोसा नहीं, तब तक अपने ही डर पर भरोसा कैसे कर लिया?

वास्तव में बहुत डरने वाला मन भी बड़ा अहंकारी है। उसका वक्तव्य है कि मुझे साफ पता है फ़लानी चीज़ मेरे लिए खतरनाक है। तुम्हें कैसे पता? कैसे पता? आज तक जिन चीज़ों पर बड़ा भरोसा था उनमें से क्या देखा नहीं है कि कितनी चीज़ें उल्टी पड़ी हैं? कहो, बोलो। आज जिन सब चीज़ों को लेकर सर धुन रहे हो, वो सब वही चीज़ें हैं न जिनको लेकर के कभी बहुत हर्षाते थे। कहते थे कि जीवन में उमंग आ गई, अमृत बरस रहा है। आज उन्हीं चीज़ों को लेकर के बाल नोच लेते हो, सर पटक लेते हो।

जीवन में हर्ष आ गया है, ये मानने वाला, इस धारणा को सत्यापित करने वाला कौन था? भीतर जो ‘मैं' बैठा है और जीवन में ख़तरा आ गया है, हानि की आशंका है इस बात को भी मानने वाला कौन है? ‘मैं'।

डर कैसे लेते हो बताओ तो? डरने के लिए तो बड़ा भरोसा चाहिए अपने ऊपर। जो भरोसा राम पर करना था वो भरोसा अपने ऊपर कर लिया। अब भीतर से एक बेईमान-सी आवाज है जो कभी कह देती है खुश हो जाओ तो खुश हो लेते हो। कभी कहती है डर जाओ, दुखी हो लो तो डर के दुखी हो लेते हो। लेकिन चाहे खुश हो रहे हो, चाहे उदास हो रहे हो, उल्लासित हो रहे हो चाहे आशंकित हो रहे हो एक बात पर तो हम अडिग हैं। किस बात पर? “हम भरोसे के काबिल हैं। हमारा अनुभव, हमारी धारणाएँ, हमारी प्रतीतियाँ, हमारे एहसास इन्हें गंभीरता से लिया जा सकता है। मुझे जैसा लग रहा है उस बात में सच्चाई है।" हम ये न बोले तो खाना नहीं हजम होता।

कौन-सा अध्यात्म, काहे का सत्य? कौन-सा राम? हम तो सबसे ज्यादा गंभीरता से लेते हैं स्वयं को। होगा कोई सत्य, होगा कोई ब्रह्म, हमने तो सबसे ऊँची जगह पर बैठा रखा है स्वयं को। तो फिर हमें डर भी राम से नहीं लगता, हमें डर भी उन बातों से लगता है जिनकी पुष्टि हम करते हैं कि डरावनी हैं। “मुझे ऐसा लग रहा है उस पर्दे के पीछे कोई है; मार न दे मुझे कहीं।" और मैं डर से बिलकुल काँपा जा रहा हूँ।

मैं फिर पूछ रहा हूँ, गौर करिए, कौन है जिसको ये सब फितूर पता चल रहा है? कौन है जिसे इस धारणा, इस विचार, इस भावना का अनुभव हो रहा है कि उस पर्दे के पीछे कोई छुपा बैठा है, किसको हो रहा है? आपको हो रहा है। आप अपने-आपको इतना भरोसे के काबिल मानते हो! आप अपने आपको इतनी खुल्ली छूट दे देते हो! कि मुझे अगर लग रहा है कि पर्दे के पीछे कोई है तो ज़रूर होगा।

साहब! ये तो छोड़ दीजिए कि पर्दे के पीछे कोई है, ये हो सकता है कि पर्दा ही न हो। ज्यादा संभावना ये है कि पर्दा भी नहीं है और हम काँपे जा रहे हैं कि पर्दे के पीछे वाला कहीं घात न कर दे। इतनी तो हमारी होशियारी है। कैसे कर लेते हो बताओ तो?

डरा हुआ आदमी सहानुभूति का पात्र बाद में है, दया या करुणा का पात्र बाद में है, सबसे पहले तो ये देखना ज़रूरी है कि उसमें अपने-आपको लेकर के कितनी घोर ठसक है।

"डरो!" क्यों डरो? "क्योंकि मुझे ऐसा लगा कि डरना चाहिए। अब मुझे लगा है तो डरना होगा।" क्यों? "क्योंकि मैं बादशाह हूँ। भई! मुझे लगा है तो सच ही लगा होगा न। सच की भी कसौटी क्या है? जो मुझे लगे सो सच। तो सच से भी बड़ा कौन हुआ? मैं। क्योंकि सच को भी प्रमाणित करने वाला कौन? मैं।"

मुझे अगर लगा पर्दे के पीछे कोई है तो उसे होना पड़ेगा क्योंकि किसको लगा? मुझे। मैं कौन हूँ? मैं बादशाह हूँ भई! मुझे अगर लगा है कि पर्दे के पीछे कोई है तो उसे होना पड़ेगा और अगर कोई पर्दे के पीछे है तो अब मुझे अधिकार मिल गया डरने का, तो अब मैं डरूँगा और काँपूँगा और मैं अपनी ही नज़रों में क्या बन जाऊँगा? सहानुभूति का पात्र।

अपनी नजरों में मैं एक तरफ यूँ हो जाऊँगा जैसे कि मैं बड़ा आतंकित हूँ, मेरे साथ बहुत चीज़ें गलत हो रही हैं, जबरन हो रही हैं, अन्याय पूर्वक हो रही हैं। और दूसरी ओर मैं जितना ज़्यादा अपने विषय में ये सब मानता रहूँगा मैं उतना ही भीतर-ही-भीतर अपने ही प्रति विश्वास से और भरता जाऊँगा। क्योंकि भाई ये जो कुछ भी हो रहा है किसके साथ हो रहा है? मेरे साथ।

तो ये एक चीज़ है, एक सवाल है, जो अपने-आपसे पूछना न भूला करें: ये जो कुछ हो रहा है ये किसके साथ हो रहा है? ये जो कुछ भी लग रहा है किसको लग रहा है? मुझे ही तो लग रहा है। कुछ बहुत बुरा हो गया, ऐसा किसको लग रहा है? कुछ बहुत अच्छा हो गया है, ऐसा किसको लग रहा है? कोई घोर विपदा आने वाली है, किसको लग रहा है? आ हा हा हा हा! आशा के कमल खिले हैं; कौन हर्षा रहा है? ‘मैं'। और मैं कौन हूँ? बोला करिए, ‘भग्ग चोट्टा!' फिर सुख दुःख दोनों बिलकुल झड़ जाएँगे।

सुख भी आप पर अवलंबित है और दुःख भी आप पर अवलंबित है और अपने-आपको बोलते रहेंगे कि मैं तो बादशाह हूँ, तो सुख भी बड़ा सच्चा प्रतीत होगा और दुःख भी।

जब डरोगे तो आचार्य जी से पूछने लगोगे, “आचार्य जी, डर बहुत लगता है।" जब मज़े आते हैं, मौज छाती है तब थोड़े-ही कहने आते हो कि बड़ी समस्या है। लेकिन बात ये है कि जितनी झूठी वो मौज है, डर उससे ज्यादा झूठा थोड़े ही है। डर भी अधिक-से-अधिक बराबर का झूठा है। लेकिन शिकायत किसकी होती है बस? डर की होती है। सुख की शिकायत कोई करने ही नहीं आता।

सुख और दुःख जब जीवन में बड़े मुद्दे बने तो पूछना मत भूलिएगा, सुखी कौन है भाई? यह सुखी कौन है? सुख तो ठीक है, यह सुखी कौन हो रहा है? दुःख तो ठीक है, यह दुखी कौन हो रहा है? सुखी राजा भी हम हैं, दुखी राजा भी हम हैं। और दोनों के लिए एक संयुक्त नाम है: ‘भग्ग चोट्टा!’

जो कुछ भी उसको (अहम् को) प्रतीत हो रहा है वह झूठा ही होगा। इसीको उपेक्षा भी कहते हैं, इसी को वैराग्य भी कहते हैं। इसी को साक्षित्व भी कहते हैं। “मैं अपने आप को गंभीरता से नहीं ले सकता भाई। दर्द हो रहा है, मुझे ही तो हो रहा है। मैं कहाँ का बड़ा हरिश्चंद्र हो गया, मुझे ही तो दर्द हो रहा है। ऐसे ही कोई होगी आती-जाती घटना, छोटी-मोटी बात। खुद को कौन गंभीरता से ले?"

जो स्वयं को ही गंभीरता से ले रहा है उसके जीवन में सत्य का स्थान बहुत नहीं हो सकता। खुद को गंभीरता से ले रहे हो तो किसका स्थान है फिर तुम्हारे जीवन में? तुम्हारा अपना। तो अपने को ही जगह दिए बैठे रहो फिर। बड़ी उदास उदासी छाई है, जबरदस्त उदासी छाई है, वह वाली वो जो शाम ढलने के बाद छाती हैं और गमगीन गाने चलाए जाते हैं और बोतल खुलती है और फोन किया जाता है और कोई मिल जाए। ठीक उस वक्त अगर याद आ जाए कि उदासी तो ठीक है पर यह उदास होने वाला कौन है। कौन है?

प्र: अहंकार।

आचार्य: और उसको जो उसके लिए बिलकुल जायज़ संबोधन है उससे अलंकृत कर दिया जाए ‘भग्ग चोट्टा!' तो अब उदासी कहीं बचेगी नहीं। लेकिन अगर आप यह साधना करना चाहते हैं तो अपने-आपको अविश्वसनीय सिर्फ दुःख के क्षणों में नहीं बोलना होगा, अपने-आपको अविश्वसनीय आपको सुख के क्षणों में भी बोलना होगा। वहाँ दिक्कत आएगी क्योंकि लालच रहता है सुख भोगने का।

सुख को हम तत्काल सत्य की मोहर लगा देते हैं। सुख है तो सच्चा होगा। नतीजा निकलता है कि फिर दुःख को भी झेलना पड़ता है, दुःख को भी सच्चा मानना पड़ता है। नहीं तो ये सब फिर पर्दे पर चल रही फिल्म जैसे हो जाएँगे। हम इतने पागल थोड़े ही हैं कि जो चल रहा है उससे प्रभावित ही हो जाएँ। देख लिया, थोड़े मनोरंजन की चीज़ है। प्रभावित हुए भी तो उतने जितनी अपने-आपको छूट दी प्रभावित होने की।

आप सिनेमा हॉल में फिल्म देखने जाते हैं तो ऐसा तो नहीं होता है कि फिल्म से बिलकुल अस्पर्शित रह जाते हैं। कुछ तो उसका आप पर असर होता ही है न। लेकिन इतना बावला तो कोई नहीं होता कि पिक्चर देख कर के सुध-बुध खो दे, आपा खो दे। कूद-फांद मचा दे, तोड़-फोड़ कर दे, गोली चला दे, ऐसा तो कोई नहीं करता। कोई सूरमा होता होगा लाखों में एकाध जो यह कर भी जाता होगा, लेकिन मैं हम लोगों की बात कर रहा हूँ। हम तो ऐसा नहीं करते आमतौर पर।

तो अपने साथ भी जो कुछ भी हो रहा है, सुख है, दुःख है, उस सबको वैसे ही देखिए कि पर्दे पर चल रहा है। और इस नाते मैंने कहा कि संदेश बड़ी मूल्यवान कला है। क्योंकि हमारी प्राकृतिक वृत्ति है विश्वास की। हमारे साथ जो कुछ भी हो रहा होता है हम उस पर तत्काल विश्वास करते हैं, कि जो हो रहा है, वह हो ही रहा है। जो प्रतीत हो रहा है उसको हम अस्तित्वमान मान लेते हैं जबकि इन दोनों में बहुत अंतर है। किसी चीज़ का प्रतीत होना एक बात होती है और किसी चीज़ का अस्तित्वमान होना बिलकुल दूसरी बात होती है। प्रतीत तो हमें कुछ भी हो सकता है। जो कुछ प्रतीत हो क्या आवश्यक है कि उसका अस्तित्व भी हो?

प्र: नहीं।

आचार्य: जानने वालों ने बार-बार यही समझाया है कि बेटा यह है नहीं, बस भास रहा है। भासता है, है नहीं। अहंकार क्या कहता है, कि आभास किसको हुआ? मुझे हुआ। (व्यंग करते हुए) जब मुझे आभास हुआ, तो जरूर होगा क्योंकि आभास अरे जब हमें हुआ है तो झूठ कैसे हो सकता है! हम कौन हैं? बादशाह। भाई हमें कोई चीज़ अगर प्रतीत हो रही है, अनुभव हो रही है तो ऐसा कैसे हो सकता है कि वह चीज़ बिलकुल नकली हो।

चूँकि हमारी प्राकृतिक वृत्ति विश्वास की है इसीलिए संदेह करना सीखिए। और जब संदेह कर रहे हैं तो भूलिएगा नहीं, कि दिखने वाली चीज़ पर ही नहीं, सबसे ज़्यादा संदेह करना है देखने वाले पर। अब बताइए डर कैसे लगेगा? डर पर भी तो फिर संदेह होगा न? समझ रहे हैं?

धर्म वास्तव में ईश्वर का, सत्य का, ब्रह्म इत्यादि का अनुसंधान नहीं होता। धर्म जमीनी तौर पर, व्यवहारिक तौर पर झूठ भर का अनुसंधान है। आप झूठ पकड़ लें यही धार्मिकता है। शर्त है कि झूठ पकड़ने में झूठ से लिप्त न हो जाएँ। झूठ को पकड़ भी लें और झूठ से अस्पर्शित भी रहें। यह नहीं करना है कि जिसको पकड़ने गए उसको पकड़ते-पकड़ते उससे ऐसे लिपटे कि उसी के रंग में रंग गए। जैसे कोई चोर कीचड़ मले भाग रहा हो, गिर गया होगा कहीं भागते-भागते, और उसको पकड़ा और ऐसा पकड़ा कि खुद भी बराबर के कीचड़-धारी हो गए। वो पीछे से भीड़ आ रही थी उसने कहा, "एक नहीं, दो हैं चोर, देखो भाई-भाई हैं कीचड़ के तौर पर।" मारे गए।

दुनिया का झूठ पकड़ना भी है—दुनिया में हम भी शामिल हैं। दुनिया माने यह नहीं कि बाकी सब झूठे हैं, हम सच्चे हैं—दुनिया का झूठ पकड़ना भी है और कितना भी खतरनाक दिखाई दे रहा हो वह झूठ, अपने-आपको याद दिलाते रहना है कि अरे है तो झूठ। जब झूठ है तो उससे जो खतरा है वह भी झूठा है। क्या झूठी चीज़ सच्चा खतरा पैदा कर सकती है?

प्र: नहीं।

आचार्य: तो जो दिखाई दे रहा है जब वह झूठ है, तो उससे जो खतरा लग रहा है मुझको, वह भी तो झूठ ही है न। काहे की परेशानी, क्या डरना!

अपनी सब मान्यताओं पर संदेह करें। वो सब बातें जो सहज ही, प्रकट ही, प्रत्यक्ष ही सच लगती हैं, जिन पर कोई शक-शुबहा उठता ही नहीं, उन पर भी संदेह करें। हमारी समस्या, खौफ़, परेशानियाँ, सब वहीं छुपे बैठे हैं। अंत में अगर आपकी हार होगी तो इसलिए नहीं कि आप संदेह में फँस गए, आपकी खोट ये होगी कि आपने संदेह बहुत-बहुत कम किया और ज़्यादा करना चाहिए था।

आप मेरे पास समस्या लेकर आते हैं, कहते हैं कि मैं बड़ा संदेहग्रस्त रहता हूँ। कहाँ संदेहग्रस्त रहते हैं? संदेह तो हममें से अधिकांश लोग जानते ही नहीं। सौ में से पाँच चीज़ों पर संदेह करते हैं, पंचानबे पर तो भरोसा रखते हैं। आपकी समस्या वो पाँच चीज़ें नहीं हैं जिनपर आपको संदेह है। आपकी समस्या वो पंचानबे चीज़ें हैं जिन पर आपको बड़ा अटल भरोसा है।

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