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जीवन की परीक्षा ही बताती है कि कितने पानी में हो
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आज एक, कुछ कथाएँ मिली थीं पढ़ने को। उनमें से सबसे पहली कथा जब पढ़ी थी तो उसका शायद संक्षेप ये था अंत में कि तुम्हें जो भी कर रहे हो उसके लिए तुम्हें किसी भी चीज़ का मोह या उसके प्रति आसक्ति या ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए कार्य कर रहे हो तो। सफ़लता और विफ़लता, आपको उससे ना दुखी ना सुखी, इस तरह का आपसे सम्बन्ध नहीं होना चाहिए उस चीज़ से। पर आजतक शायद, मुझे लगता नहीं है, या फ़िर मुझे, या फ़िर मैंने उसको इतने तमीज़ से देखा नहीं होगा कि मैंने कोई कार्य बिना किसी इच्छा के या फिर उसके प्रति कुछ भी भाव जो मेरे अंदर जागृत होता है उसके बिना किया हो।

चाहे वो किसी की मदद ही करना क्यों ना हो, वो भी शायद मैं इसीलिए कर रहा था कि उससे मुझे सुकून मिलेगा, मुझे शांति मिलेगी या अच्छा फील (महसूस( होगा उससे। तो कोई भी कार्य, वो कहना चाहते हैं कि, बिना... मतलब तुम उत्साह के साथ करो पर तुम उससे कुछ भी चाह या आसक्ति ना रक्खो। तो वो मैं समझ ही नहीं पा रहा हूँ। ऐसा लगा रहा है कि अंधकार जैसा हो गया है कि कैसे ऐसा होगा कि मैं जो भी कर रहा हूँ, आजतक शायद कुछ-न-कुछ तरह का आनंद मुझे उसमें मिला है, तो ही कर पाया हूँ। चाहे वो पढ़ रहा हूँ या खेल रहा हूँ, अच्छा था इसलिए कर पाया नहीं तो शायद ना कर पाता। तो बस, समझ ही नहीं आ रहा कि ऐसे उत्साह कैसे आएगा इस क्रिया में।

आचार्य प्रशांत: कहानी क्या है सर्वप्रथम, तो ब्रह्मसूत्र जिन्होंने रचा है उन व्यासदेव के पुत्र और शिष्य थे शुकदेव। तो व्यास-महाराज ने खुद ही उन्हें शिक्षा दी थी। फिर जब वो युवा हो गए तो उनकी शिक्षा की परख के लिए, उनके ज्ञान को सत्यापित करने के लिए उनको भेजा राजा जनक के महल। राजा जनक खुद बड़े प्रतिष्ठित ज्ञानी थे। तो वो राजा जनक के यहाँ गए। जनक को पूर्व सूचना थी इस बात की, उन्होंने तदनुसार तैयारी कर ली थी।

तो कहानी कहती है कि पहले कुछ दिन शुकदेव को बड़ी उपेक्षा से रखा गया। किसी ने कोई हाल–चाल नहीं लिया, कोई आदर सम्मान नहीं दिया। और जबकि शुकदेव अपने आप में भी बड़े ज्ञानी थे, उस ज्ञान के अनुरूप उनको कोई आसन वगैरह भी नहीं दिया गया। उसके बाद सहसा, कुछ दिन तक उनको बड़े आदर–सम्मान से रक्खा गया। लेकिन देखने में आया कि शुकदेव पर न तो उपेक्षा का और न ही आदर का कोई प्रभाव पड़ा, वो एक समभाव में स्थित रहे।

फिर उनको लाया गया राजा जनक के दरबार में, और वहाँ तरह-तरह के भोग-विलास, आकर्षण-प्रलोभन, सोने- चाँदी की प्रदर्शनी, सुंदर नारियों का नाच-गाना। देखा गया कि इन सब बातों का भी उन पर कुछ असर पड़ नहीं रहा है। तो फिर आखिरी परीक्षा के तौर पर जनक ने उनसे कहा कि, "ये लो भाई दूध से भरा कटोरा और ये जो भवन है इसका, या जो कक्ष है, कुछ है, उसका चक्कर लगालो। और दूध की एक भी बूँद गिरनी नहीं चाहिए। कटोरा लबालब भरा हुआ है।"

अब अगर शुकदेव का ध्यान ज़रा भी विचलित हुआ होता, आकर्षण-विकर्षण कुछ भी उठा होता, तो हाथ हिल जाता, कटोरा गिर जाता, पर उनपर कोई फर्क नहीं। वो बिलकुल हाथ को साधे-साधे कटोरा लेकर चक्कर पूरा कर आए। तो जनक बोले, "अब न मैं कोई सवाल पूछूँगा, न कोई परीक्षा लूँगा, आपका ज्ञान पूरा है।" और इतना कहकर के और नमस्कार करके शुकदेव को विदाई दे दी। तो ये कहानी है।

अब कह रहे हैं प्रश्नकर्ता कि ये कहानी तो बड़ी दूर की कौड़ी मालूम पड़ती है, अपनी ज़िन्दगी में तो कभी ऐसा होता ही नहीं कि समभाव रहे और घोर अनासक्ति रहे। हमेशा जो करते हैं इसलिए करते हैं कि उससे कुछ लाभ हो जाए या कुछ आनंददायक अनुभव हो जाए। किसी-न-किसी प्राप्ति की उम्मीद तो रहती ही है, और कह रहे हैं कि ये सोचना कि बिना किसी राग-द्वेष के ही कर्म करे जाएँगे, बड़ी असंभव बात मालूम होती है।

तो भाई यहाँ बात किसकी हो रही है? यहाँ बात शुकदेव की हो रही है। और कौन हैं शुकदेव? मान लो कहानी के समय वो पच्चीस वर्ष के हैं। कहा गया है जवान आदमी हैं, मानलो पच्चीस साल के हैं। तो कुछ नहीं तो बीस साल की उन्होंने बड़ी तन्मय शिक्षा पाई है। और वो भी एक पहुँचे हुए सिद्ध से, व्यासदेव से। ब्रह्मसूत्र अपनी ऊँचाई में उपनिषदों के समतुल्य हैं। सब उपनिषद जैसे ब्रह्मसूत्रों में निहित हों, ऐसे हैं ब्रह्मसूत्र और शुकदेव के पिताजी उन ब्रह्मसूत्रों के रचयिता।

तो ऐसा गुरु मिला हुआ है इन शुकदेव महाराज को, ठीक? और ऐसे गुरु ने तल्लीन होकर, वात्सल्य के साथ, और यहाँ तो वात्सल्य का जो शाब्दिक अर्थ है वही लागू हो जाता है। वत्स समझते हो न? वत्स माने बेटा। तो यहाँ तो सच में बेटे ही हैं, तो यहाँ तो पूरे वात्सल्य के साथ ही शिक्षा दी गई है। अपने ही बेटे को शिक्षा दे रहे हैं। अब बीस साल जिसने शिक्षा पाई हो उसकी बात हो रही है भाई कि उसके भीतर आसक्ति नहीं बची और वो बिलकुल अब समता में स्थापित है।

और आपने कितने साल की शिक्षा पा ली है? आप काहे अपनी तुलना शुकदेव से कर रहे हो? शुकदेव से तुलना कर रहे हैं फिर कह रहे हैं, “मुझसे तो लगता ही नहीं कि वो सब कुछ हो पाएगा जो ये कर गए, कि कोई आदर दे तो भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा, कोई अनादर दे, उपेक्षा दे तो भी अंतर नहीं पड़ रहा।" सामने रत्नजड़ित दीवारें हैं, सोने-चाँदी के आसन सिंहासन हैं, कोई फर्क नहीं पड़ रहा। जवान आदमी हैं और सामने सुंदर आकर्षक कामिनियाँ नाच रही हैं लुभा रही हैं, कोई फर्क नहीं पड़ रहा।

और जनक के सामने खड़े हैं। जनक ज्ञानी ही नहीं हैं, ताकतवर राजा भी हैं। क्या पता राजा के दिमाग का, कब सरक जाए? कहीं गर्दन ही उड़वा दे। उन्हें कोई अंतर ही नहीं पड़ रहा। ये सब होता है, लेकिन ये ब्रह्मस्थ व्यक्ति के साथ होता है। इतना सस्ता मत बनालो ब्रह्म को कि कोई दिखाई दे ब्रह्मलीन व्यक्ति तो उसकी स्थिति को देखकर के कहो, “अरे ऐसी स्थिति मेरी क्यों नहीं है?" उसने ज़िन्दगी के बीस साल दिए हैं, उसने कीमत अदा करी है भाई, मूल्य पूरा-पूरा चुकाया है। तुमने मूल्य कितना चुकाया है? तुम्हें अभी अधिकार क्या है उनसे अपनी तुलना करने का? या है अधिकार? है अधिकार?

और ये जो तुलना होती है न, पता भी नहीं चलेगा कब ईर्ष्या बन जाएगी। ईर्ष्या आवश्यक थोड़े ही है कि सक्रिय हो, चुपचाप मूक भी बैठी रहती है ईर्ष्या बड़े अक्रिय रूप में। और जब पाओगे कि कहानियों में ऐसे-ऐसे किरदार हैं और देखोगे कि उन किरदारों का मुकाबला तो तुम कर ही नहीं पा रहे तो जानते हो नतीजा क्या निकलेगा? अनुभव से बता रहा हूँ, नतीजा ये निकलेगा कि कुछ समय के बाद तुम कहना शुरु कर दोगे, “ये सब किरदार झूठे हैं, ये सब मनगढ़ंत कहानियाँ हैं, ऐसा कुछ होता नहीं है। किसने देखा? प्रमाण क्या है कि ऐसा कुछ हुआ भी था?” खूब तर्क दे लोगे।

और वो तर्क आ कहाँ से रहा है? वो तर्क आ इसी भावना से रहा है कि, "अगर उस व्यक्ति के लिए ऐसी स्थिति को पाना सम्भव हो पाया तो मेरे लिए क्यों नहीं संभव हो पा रहा?" और जितना ही पाओगे कि तूम्हारे लिए संभव नहीं हो रहा, उतना ही ज़्यादा तुम क्लेश से और द्वेष से भरते जाओगे। समझ में आ रही है बात?

इसीलिए तुलना बड़ी सुंदर चीज़ होती है पर देख समझ के करनी चाहिए। मैं तुलना का विरोधी नहीं हूँ, प्रगति में सहायक भी हो सकती है तुलना, पर अन्धी तुलना नहीं, सात्विक तुलना। थोड़ा होश तो रखो किसकी बात हो रही है। समझ रहे हो?

इसीलिए सत्य के साधक को दो बातों का ख्याल रखना पड़ता है। पहली बात तो, जो अध्यात्म के चमकते सितारे हैं, जो आत्मस्थ आदर्श पुरुष हैं उनकी निकटता भी बनानी है, दूसरी ओर ये बात कभी भूल नहीं जानी है कि तुममें और उनमें वास्तव में कितनी दूरी है। ये भूले नहीं कि खेल खराब सब। और बहुत लोग भूल जाते हैं। क्योंकि ये कहा जाता है न कि भई अगर कोई आध्यात्मिक प्रगति करनी है तो उसका सबसे सुंदर तरीका तो संगति ही है, संगति अच्छी रखो। अब संगति उसी की रक्खोगे जो तुमसे थोड़ा ऊपर का हो, तभी तो तुम्हारा उत्थान होगा। ऊपर वाले से संगति रखना भी ज़रूरी है लेकिन ये याद रखना भी बराबर का ज़रूरी है कि वो तुमसे ऊपर वाला है।

देखो भई, हम लोग तो सब देह–केंद्रित लोग होते हैं न, शरीर भाव में जीते हैं। अब शरीर के तल पर तो तुम हो कि शुकदेव हों, सब बराबर ही हैं न? तुम्हारे कितने हाथ हैं? और शुकदेव के कितने थे? तुम्हारा भी एक नाम है उनका भी एक नाम है। तुम्हारी भी दो आँख हैं उनकी भी दो आँख हैं। बल्कि पढ़े–लिखे सांसारिक अर्थ में तो तुम शुकदेव से थोड़े ज़्यादा ही होगे। तुम आईआईटी, आईआईएम हो, शुकदेव बेचारे तो जंगल में शिक्षा पा रहे थे, उनके पास तो कोई डिग्री भी नहीं। पिताजी ने जो पढ़ा दिया तो पढ़ा दिया उनके, उतना ही जानते थे।

शरीर के तल पर, संसार के तल पर तो तुम और वो बराबर ही हो, तो जितना तुम उनके निकट जाओगे, बहुत संभावना है कि तुममें ये भावना उठने लगे कि, "मैं और ये एक जैसे ही तो हैं!" ये अच्छी से अच्छी संगति का प्रतिफल हो जाता है, कुफल हो जाता है, ये समझना। सत्संगति में भी ये एक बड़ा खतरा रहता है। तुमने बहुत सुंदर संगति कर ली, वो चीज़ भी खतरनाक हो सकती है। कुसंगति तो खतरनाक होती ही है, सुसंगति या सत्संगति भी बहुत खतरनाक हो सकती है।

क्योंकि देखो, जब तक वो दूर था, तब तक तो वो एक दूर का तारा था, तुम उसके सामने झुक सकते थे, है न? तुम उसे आदर्श मान सकते थे, तुम उससे कुछ सीख सकते थे। ज्योंही तुम उसके करीब पहुँचे वैसे ही अब वो क्या हो गया? तुम्हें दिखाई देने लगा कि, "ये तो बिलकुल मेरे जैसा है!" क्यों दिखाई देने लग गया? क्योंकि तुम देख ही पा रहे हो बस उसकी देह को, कुछ हद तक उसके मन के सांसारिक ज्ञान को। और जिस सीमा तक तुम देख पा रहे हो उस सीमा तक तुममें और उसमें कोई विशेष भेद नहीं है, ठीक है न? जहाँ भेद है वो क्षेत्र, वो तल आँखों को दिखाई देता नहीं। तो फिर तुरंत मन इस भावना को पकड़ लेगा कि, "मैं और ये कैसे हैं? एक जैसे हैं। और जब मैं और ये एक जैसे हैं तो फिर जो स्थिति इनको उपलब्ध हो पाई वो मुझे भी होनी चाहिए न। अगर मैं और ये एक जैसे हैं तो फिर जिस ब्रह्मलीनता पर और जिस परम आनंद पर इनका अधिकार है वो सब मुझे भी तो मिलना चाहिए न?"

पर तुम पाओगे कि तुमको तो मिल नहीं रहा। जब तुम पाओगे तुमको मिल नहीं रहा तो जानते हो तुम तत्काल क्या तर्क दोगे? तुम कहोगे, “मुझे मिल नहीं रहा और मैं और ये एक जैसे हैं इसका मतलब क्या है? इन्हें भी मिला-विला नहीं था, इन्होंने झूठ ही अपने बारे में, अपना महिमामंडन करने के लिए अफ़वाह उड़ा दी है। सच ही है, सब पुरानी किताबें, ये वेद पुराण सब झूठ से भरे हुए हैं।"

बहुत बुद्धिजीवी यही तो प्रचारित करते हैं कि ये सब है क्या? मिथ है, किस्सागोई है, काल्पनिक किस्से हैं। यही तो कहा जाता है न, वो इसीलिए। क्योंकि इसमें जो बातें बताई गईं हैं वो उनके जीवन में है नहीं। वो ये मानेंगे नहीं कि उनके जीवन में इसलिए नहीं है क्योंकि उन्होंने आजतक कीमत ही नहीं चुकाई। ऊँचाई पाने की क्या करनी पड़ती है? कीमत चुकानी पड़ती है।

तो हमारे साहिबान ये बिलकुल नहीं मानेंगे कि उनके जीवन में अगर किसी अष्टावक्र जैसी या किसी शुकदेव जैसी ऊँचाई नहीं है तो इसकी वजह ये है कि उन्होंने कभी कोशिश ही नहीं करी, उनका कभी इरादा ही नहीं था। कभी साधना नहीं करी, कभी मूल्य नहीं अदा करा, ये वो मानेंगे नहीं। वो कह देंगे, “अगर हममें नहीं है तो इसका मतलब हो ही नहीं सकता।" जैसे कोई अँधा कहे कि अगर हमें दिखाई नहीं पड़ता है पीला रंग तो इसका अर्थ है कि पीला रंग है ही नहीं (हँसते हुए)।

ये बड़ा प्रचलित कुतर्क है, इससे सावधान रहना। और ये जो कुतर्क है ये बड़ा अनुकूल बहाना बनता है अहंकार के लिए, न बदलने का। अहंकार और चाहता क्या है? एक निष्क्रियता है अहंकार, जो बाहर–बाहर से खूब धूम मचाती है, चंचल रहती है, मचलती रहती है। लेकिन अपने केंद्र पर उसे बिलकुल अड़े रहना है, बदलना नहीं है, वहाँ उसको अलसियाए पड़े रहना है।

बाहर से देखो तो लगेगा, "अरे बड़ी सक्रिय है, देखो यहाँ भाग रहा है, वहाँ भाग रहा है, कितना महत्वाकांक्षी है, क्या– क्या नहीं कर रहा है।" भई आदमी बड़ा कर्मठ है, जब देखो तब कुछ-न-कुछ करता ही नज़र आता है। लेकिन अहंकार की हकीकत ये होती है कि उसे बाहर–बाहर तो गतिविधि दिखानी है और अपने केंद्र पर उसे बिलकुल अड़े रहना है, अंगद के पाँव की तरह जमे रहना है, "हम नहीं बदलेंगे!" बाहर से सब बदल लेंगे, भाषा बदल लेंगे, भेस बदल लेंगे, ज्ञान इकट्ठा कर लेंगे। जितनी चीज़ें बाहरी होती हैं सब बदल लेंगे, भीतर–भीतर जो अहम भाव है उसको ज़रा भी हिलने–डिगने नहीं देंगे।

तो सावधान रहो, इतनी कोशिश करलो फिर कुछ पूछना। और इसमें तुम्हारी भी विशेष गलती नहीं है। बात क्या है असल में, ये कहानी है पूरी। इस पूरी कहानी की शुरुआत ही वहाँ से होती है जहाँ शुकदेव सब शिक्षाओं में निष्णात हो गए, ठीक? समझ लो जैसे कि किसी की कहानी की शुरुआत ही हो रही है उसके विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह से, कन्वोकेशन से। भैया पढ़ लिख के निकला है, कन्वोकेशन हो गया उसके बाद उसका खेल पूरा बताया जा रहा है।

उस पूरी कहानी में कहीं भी ये बताया गया क्या कि पढ़ाई कैसे करी? बताया गया क्या? ये तो बताया ही नहीं गया कि पढ़ाई कैसे करी। वो कितना कठिन था और उस पढ़ाई की पात्रता दर्शाना और ज़्यादा कठिन था, प्रवेश परीक्षा कैसे उत्तीर्ण हुई वो तो बताया ही नहीं गया। कहानी शुरू ही वहाँ से हो रही है जहाँ वो अपनी शिक्षा पूरी कर चुका है।

जैसे तुम्हारी कहानी में बताया जाए कि फलाना व्यक्ति है वो महीने का इतना कमाता है और उसके नाम के साथ ये डिग्रीयाँ लगी हुईं हैं और उसको ये आदर–सम्मान प्राप्त है। उस कहानी में ये तो कहीं बताया ही नहीं जा रहा है कि लड़के ने दसवीं के बाद से ही मेहनत करनी शुरू कर दी थी। पहले आईआईटी-जेईई क्लियर किया, फिर लग कर के कैट की परीक्षा पास करी, वो सब नहीं बताया जा रहा है। देखने वाले को तो ये दिखाई दे रहा है कि कहानी शुरू ही हो रही है इसके भोग–विलास से।

जैसे कोई पिक्चर हो, मूवी , और उसका पहला ही शॉट क्या है कि एक व्यक्ति है और महीने की तीस तारीख़ को वो पाता है कि उसके बैंक अकाउंट में इतनी तनख्वाह आ गई। अब आदमी कहेगा, "मतलब अच्छा कहानी शुरू ही यहाँ से हो रही है!" और उसके पीछे का जो है वो सब छुपा हुआ है वो दिखाया नहीं जा रहा। भाई उस आदमी ने अपनी रातें जलाई हैं बड़ी मेहनत करी है। वो बात दिखाई नहीं जा रही। तो देखने वाले को भ्रम हो सकता है, देखने वाला कहता है, “हम भी उस आदमी जैसे हैं, जो कुछ उसको मिल रहा है हमें भी मिलना चाहिए और अगर हमें नहीं मिल रहा तो अन्याय है। ये ज़रूर किसी की साज़िश है। ये ज़रूर किसी की साज़िश है कि उसको इतना कुछ मिला और हमको नहीं मिला।" और साज़िश-वाद सदा अहंकार का प्रिय रहा है। इसीलिए देखते नहीं, हर दूसरा आदमी क्या है, एक ' कॉन्सपिरेसी थियोरिस्ट' , “कहीं कुछ-न-कुछ गड़बड़ ज़रूर है, दाल में काला है।” दाल में कुछ काला नहीं है, खेल बहुत सीधा है।

दाम चुकाओ माल पाओ, साधना का यही मतलब है। (हँसते हुए) है सौदा खरा-खरा।

प्र: इसी में एक दूसरा प्रश्न भी था, वो शायद इसी से ही शुरू भी हो सकता है कि अब ये जो इतनी लंबी उन्होंने साधना की होगी इस चीज़ को पाने के लिए, थोड़ा सा समझ नहीं आता है क्योंकि बहुत सारे अलग-अलग तरह की टेक्निक्स (तकनीक) भी हैं, और बहुत सारे तरीके की बातें भी हैं। टेक्निक्स हैं जैसे विपासना, चाहे बाबा स्वामी, आर्ट ऑफ लिविंग, सदगुरु, सब अपना अलग-अलग तरीके का है और ऐसे ही बातें भी अलग-अलग हैं, ओशो की हैं, आप की हैं, जिद्दू बाबा की हैं, ऐसे अलग-अलग बहुत सारी हैं।

तो ये तो समझ आता है कि हो सकता है तुम्हें कि, आपने अभी जैसे बताया, कि तुम्हें उनका मिश्रण करके देखना पड़ेगा। पर मेरे को ये नहीं समझ आ रहा है कि टेक्निक और बात दोनों ही चाहिए या एक चीज़ से हो रहा है? क्योंकि मैं टेक्नीक पर थोड़ा बहुत, मतलब बहुत तो बिलकुल नहीं, पर हाँ कभी-कभी एक–दो महीना, एक–दो महीना करता रहता हूँ पर मेरे को पता नहीं चलता है। अभी ऐसा लगा कि हो सकता है मतलब बात वाली चीज़ भी हो ज़्यादा जो कि करना चाहिए, तो ये दोनों का मिश्रण ही है जो आगे ले जाएगा या...

आचार्य: देखो तुमपर, तुम्हारी फितरत पर, तुम्हारी प्रकृति पर निर्भर करता है। मोटा–मोटा सिद्धांत ये होता है कि जो लोग समझ नहीं पाते, स्थूल विधियाँ सब उनके लिए होती हैं। तुम कह रहे हो कि बात सुनूँ, माने श्रवण या विधियाँ आज़माऊँ, माने उपाय। तो तुम ज्ञान और उपाय के मध्य मुझसे चुनाव करने को कह रहे हो, है न? तुम ये नहीं समझ रहे हो कि ज्ञान अपने आप में पहला उपाय है। तुम्हारी बात में ऐसा आशय है जैसे ज्ञान उपाय न होता हो। जैसे कि उपाय सब एक अलग कोटि के हैं और ज्ञान उपाय से कुछ अलग है। शिव सूत्र जानते हो क्या कहते हैं? वो कहते हैं, “गुरु ही उपाय है।”

तो उपाय का मतलब यही थोड़े ही होता है कि फलानी लकड़ी ले करके पाँच बार दाएँ हाथ पर घिसी या फलाने मंत्र का जाप किया या फलाने आसन में बैठ गए। या जो कुछ भी है, या श्वास को ले करके फलानी क्रिया की। ये जो तुम सुनते हो, तुमने नाम लिया मानलो जिद्दू कृष्णमूर्ति का। उनको जब तुम पढ़ रहे हो, तो क्या वो अपने आप में उपाय नहीं है? ये जो पाठ है उनकी किताब का, ये उपाय नहीं है क्या? या तुम कबीर साहब की साखी बाँच रहे हो, ये उपाय नहीं है क्या?

जिन उपायों को आजकल उपाय माना जा रहा है, वो स्थूल उपाय हैं। जैसे कि एक स्थूल उपाय ये भी है कि, बड़े स्थूल उपाय चल रहे हैं, अभी ऋषिकेश में हो यहाँ बाहर निकल जाओ यहाँ स्थूल-ही-स्थूल उपाय हैं। एक ये भी है कि खंबे के सामने खड़े हो जाओ, खंबे को गाली दो। ये अपने आप में कोई बुरा उपाय नहीं है, कई लोगों के लिए हो सकता है ये मददगार भी हो।

लेकिन ये उनके लिए मददगार है जिनपर और कोई तरीका चलता ही नहीं, जिनकी चेतना का स्तर किसी वजह से इतना निम्न हो गया है कि उनको अब इस कोटि के उपाय चाहिए। और इस तरह के उपाय तो मनोविज्ञान में बहुत पाए जाते हैं। एक तकिया लेलो और उसको पीटना शुरू कर दो और तब तक पीटते जाओ, तब तक पीटते जाओ जब तक उससे रूई ना उड़ने लगे, फट ही ना जाए एकदम, चीथड़े। ये भी उपाय है।

आँख बंद करके अपने ही घर में चलना शुरू करदो, ठीक है? और कहीं भी टकरा जाओ, ठोकर खा जाओ, आँखें खोलनी नहीं हैं या पट्टी खोलनी नहीं है, ये भी उपाय है। पर इन सब उपायों की ज़रूरत उनको पड़ती है जिनपर सीधे-सादे उपाय विफल हो जाते हैं। तुम पहले कोशिश यही करो कि जो उत्कृष्ट कोटि के उपाय हैं उनसे ही तुम्हारा काम चल जाए। फिर वो न चलें तो उपायों की कमी नहीं है, हर चीज़ उपाय है।

एक ज़ेन गुरु थे, तो उनका एक शिष्य था। प्रचलित कहानी है, मेरे ही मुँह से सुनी होगी कई बार। तो वो बड़ा उधमी, उपद्रवी, वो कुछ बोला करें, वो हरकतें किया करे, कभी ये करतूत कभी वो करतूत, शांत ही न बैठे। तो एक बार कुछ पूछ रहे हैं कुछ कर रहे हैं, वो बार-बार उनको उंगली दिखाए ऐसे-ऐसे करके,कुछ होगा। तो उन्होंने उसको बोला, “इधर आ, इधर आ।” वो आया पास, तो इनके पास चाकू पड़ा था उन्होंने लिया उसकी उंगली काट दी। और कहानी कहती है कि इधर उंगली काटी गई और उधर (हँसते हुए) उसपर रौशनी उतर आई, उसका दिया ही जल गया। एकदम जैसे बल्ब का स्विच ऑन हो गया हो। ये भी उपाय है कि तुम्हारी उंगली ही काट दी जाए। अब इस उपाय की नौबत न आए तो अच्छा है।

तो जो सात्विक उपाय हैं पहले उनको आज़मा लो। भूलना नहीं कि ये संसार कुछ और नहीं है, त्रिगुणात्मक प्रकृति ही है, ठीक? ये जो सब कुछ है ये क्या है? त्रिगुणात्मक प्रकृति का पसार है। उपाय भी सारे इसी संसार में घटित होते हैं न? तो उपाय भी फिर तीन तरह के होते हैं। प्रकृति अगर तीन गुण है तो उपाय भी फिर कितने तरह के होंगे? यही तीन तरह के होंगे, सात्विक उपाय होंगे, राजसिक उपाय होंगे और तामसिक उपाय होंगे।

भला हो कि तुमपर सात्विक उपाय ही काम कर जाएँ। सात्विक उपाय क्या है? वही जो सतोगुण में निहित है, 'ज्ञान'। ज्ञान से काम चल जाए, भली बात। सात्विक उपाय बिलकुल ही विफल हो जाए तुम पर तो फिर राजसिक उपाय। राजसिक उपाय क्या होता है? जहाँ मन के उद्वेलन का ही सहारा लिया जाता है मन को शांत करने के लिए, ठीक है?

ये उपाय तुमपर अगर काम करेगा तो तुमको बहुत ऊँचाई नहीं दे पाएगा। राजसिक उपाय का काम ये नहीं होता कि वो तुम्हें सीधे मुक्ति तक पहुँचा दे, समझना बात को। राजसिक उपाय का काम होता है कि वो तुमको तैयार करदे सात्विक उपाय में प्रवेश करने के लिए। समझ रहे हो? अब जैसे राजसिक उपाय है कि, 'अच्छा सोचो'। अच्छा सोचने से मुक्त तो नहीं हो जाओगे न सोच से? निर्विचार तो नहीं हो जाओगे न? कि हो जाओगे? ये राजसिक उपाय है, 'अच्छा सोचो'। आ रही है बात?

राजसिक उपाय की ज़रूरत न पड़े, भला।

फिर तामसिक कोटि के भी उपाय होते हैं। तामसिक कोटि के क्या उपाय होते हैं, वो बड़े ज़बरदस्त होते हैं। वो उनके लिए होते हैं जो बिलकुल ही कीचड़ में लथपथ लोग हैं। वही जिसकी अभी बात करी थी, खंबे को मारो, अँधेरे में किसी को गालियाँ दे लो, अपने भीतर का सब गुबार निकाल लो।

ये सब जो चलता है न, गाँजा डाल लो, अफ़ीम, साइकेडेलिक्स , ये भी सब तामसिक उपायों में ही आते हैं। इनसे बहुत दूर का फायदा नहीं होगा। तामसिक उपाय की पहुँच बस इतनी होगी कि वो आपको तैयार कर दे कि अब आप पर राजसिक उपाय लगाए जा सकें, ठीक है?

तो ये लोग जो गाँजा, भाँग, धतूरा पीते हैं ध्यान के नाम पर या अध्यात्म के नाम पर, ये भी वास्तव में लगा उपाय ही रहे हैं पर ये निकृष्टतम कोटि का उपाय है। इसी तरीके से ये जो सब चलता है कि मैथुन से हमें शांति मिल जाएगी। मदिरा, फिर मैथुन भी तो आता है न तंत्र में? ये भी उपाय है पर ये उनके लिए उपाय है जो सेक्स के बदहवास रोगी हैं, महा-हवसी हैं। जो इस लायक ही नहीं हैं कि वो थोड़ी भी अपने शरीर से दूरी बना पाएँ। उनको, जब उनकी दुर्दशा देखी जाती है तो उनसे कहा जाता है कि, "भाई तुझसे ये बीमारी छूटेगी तो है नहीं, तो तू ऐसा कर, तू इसी का उपाय बनाले।"

लेकिन वो उपाय, ध्यान रखना, उनको बहुत दूर तक नहीं ले जाएगा। बाज़ार में अधिकांश जो प्रचलित उपाय हैं, वो वैसे ही होंगे जैसे अधिकांश लोग हैं। भई बाज़ार में जो माल सबसे ज़्यादा चल रहा होगा वो किसके बारे में बताएगा? वो यही तो बताएगा न कि अधिकांश खरीददार कैसे हैं। अब तो अपने आस-पास की दुनिया को देखो, ज़्यादातर लोग तुमको कैसे दिखाई देते हैं? सात्विक, राजसिक, तामसिक? नब्बे-पिचानबे प्रतिशत तामसिक, दो-चार प्रतिशत राजसिक और आधा-एक प्रतिशत सात्विक।

तो ये जितनी भी संस्थाएँ हैं जो तमाम भाँति-भाँति की विधियाँ, मेथड्स , क्रियाएँ, ये सब लेकर के बाज़ार में उतारती हैं, ये उन्हीं लोगों के लिए तो होगा न जो बाज़ार में भरे हुए हैं खरीददार। पिचानबे प्रतिशत खरीददार ही तामसिक हैं, तो ये सब विधियाँ तामसिक लोगों के ही काम आएँगी। ये विधियाँ बनाई ही जा रही हैं सिर्फ तामसिक लोगों के लिए। सबसे घटिया तरीके के लोगों के लिए सबसे घटिया तरीके की विधियाँ हैं ये। इन विधियों की तुम्हें ज़रूरत न पड़े तो अच्छा। ठीक है?

प्र: जैसे-तैसे ध्यान की तरफ जब मूवमेंट (गति) भी हुई तो शायद ये प्रचलित चीज़ें ही थीं और वही करी और उनसे कुछ अंतर महसूस नहीं हुआ।

आचार्य: नहीं हुआ क्योंकि जो व्यक्ति कक्षा तीन में हो - मानलो तीन बच्चे हैं, एक कक्षा एक का, एक कक्षा दो में और एक कक्षा तीन में - जो व्यक्ति कक्षा तीन में हो, जो छात्र कक्षा तीन में हो, उसे तुम कक्षा एक का पाठ्यक्रम पढ़ाओगे तो उसे कितना अंतर महसूस होगा?

तो जो आदमी तीसरे तल पर हो उसे तुम पहले तल की विधि दोगे, उसके काम आएगी ही नहीं। उसे कुछ नुकसान भी नहीं करेगी लेकिन फायदा भी नहीं करेगी। तो ये शुभ सूचना है कि बाज़ार में प्रचलित ज़्यादातर विधियाँ तुमपर विफल हो रही हैं, ये शुभ ही सूचना है। इसका मतलब ये है कि तुम थोड़ा ऊपर की चीज़ों का प्रयोग करो, उनको आज़माकर देखो। जाओ न ब्रह्मसूत्रों के पास, उपनिषदों से क्यों बच रहे हो? सीधे-सीधे संतों के पास जाओ। कबीर साहब की उलटबासी से कुश्ती करो ज़रा।

कहते हैं साफ़ साफ़, “ये मेरी उलटबासी है, बिलकुल बात ही मैंने यहाँ पर पलट के बोली है उलझा कर बोली है।” बुद्धिग्राह्य है ही नहीं बात, खोपड़ी चकरा जाए। और कहते हैं साथ में, “लेकिन जो इस बात को समझ लेगा वो फिर यम के भय से मुक्त हो जाएगा।" तो तुम ये सब इस तरह की बचकानी चीज़ें करो कि ये मेथड , वो क्रिया, इससे अच्छा सीधे जाकर संतों के दरबार में बैठो। और जब मैं संत कह रहा हूँ तो मेरा आशय कबीर साहब की ऊँचाई के लोगों से है, उन लोगों की बात कर रहा हूँ, ठीक है?

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