
अंकित त्यागी: नमस्कार, स्वागत है आपका NDTV पर इस विशेष पेशकश में। मेरे साथ दार्शनिक, बेस्ट सेलिंग राइटर और आईआईटी-आईआईएम के पढ़े हुए दार्शनिक कहूँ अगर मैं, आचार्य प्रशांत जी इस वक़्त हमारे साथ जुड़ रहे हैं। उनकी कुछ किताबों पर हम बात कर रहे थे एक उन्होंने ये किताब लिखी है, “जात अजात की क्या जात?” इंटरेस्टिंग किताब है सर ये, और उस समय भी हम इस किताब के बारे में बात कर रहे थे जब अभी-अभी देश में एक बड़ा फैसला सरकार ने लिया है, कि जातिगत जनगणना सरकार कराएगी जब सेंसेस होगा।
विपक्ष ने बड़े दिनों से इसके लिए माँग की थी, कुछ राज्यों में सर्वे भी हुए। मैं आपका इस पर थोड़ा समझना चाहता हूँ, आपका क्या विचार है? इससे, जो हम भारत में बात करते हैं कि बड़ी विकट समस्या है, जाति के आधार पर लोगों को बाँटने की, उसको और बढ़ावा मिलेगा या इससे निजात पाने का प्रयास होगा? जिसे बिल्कुल कहा जा रहा है कि कोशिश ये की जाएगी कि लोगों को समझने के बाद उनके लिए और बेहतर स्कीम्स बनाई जा सकें। तो क्या जाति को इससे और बढ़ावा मिलेगा? विभाजन और बढ़ेगा या इसे एक मेडिसिन के तौर पर आप देख रहे हैं?
आचार्य प्रशांत: किसी भी मुद्दे के प्रति रवैया समस्या हो सकता है, नियत समस्या हो सकती है। तथ्य तो कभी समस्या नहीं होते, आँकड़े तो कभी समस्या नहीं होते। उन आँकड़ों को आप किस नजर से देख रहे हैं, वो आपकी समस्या हो सकती है।
अब ये तो सीधे-साधे आँकड़े हैं कि जनसंख्या में, किसी क्षेत्र में, किसी राज्य में, किसी जिले में, किसी मोहल्ले में, कहीं भी किस जाति का कितना प्रतिनिधित्व है। कितने लोग कहाँ मौजूद हैं, ये जानना अपने आप में तो कोई समस्या नहीं हो सकती। लेकिन हाँ, आप उन आँकड़ों का, उन तथ्यों का दुरुपयोग कर लें राजनीतिक लाभ के लिए, तो वो समस्या बन जाएगी, लेकिन वो समस्या फिर आपकी नियत में है। हम अपनी नियत ठीक करने की जगह, हम आँकड़ों को ही छुपा दें, ये तो कोई बात नहीं।
देखिए, भारत एक वेलफेयर स्टेट है। ठीक है? हमारा संविधान कहता है, वी आर अ वेलफेयर स्टेट। वेलफेयर का मतलब है कि राज्य इसलिए है ताकि नागरिकों की बेहतरी हो सके, भलाई हो सके। और ये दुर्भाग्य की बात है कि भारत में जो नागरिकों का जीवन स्तर, जिसमें शिक्षा आती है, जिसमें उनकी आय और आयु भी आती है, बहुत कुछ आता है, उसका संबंध उनकी जाति से है। अब है तो है, ये एक तथ्य है और ये किसी का सपना नहीं, किसी का मत नहीं। आप सीधे-साधे आँकड़े रखेंगे और कोरिलेशन निकालेंगे तो कोरिलेशन आपको दिख जाएगा। कि एक जातिगत समूह को आप लेंगे और उसकी औसत आय या औसत शैक्षणिक स्तर लेंगे, तो पाएँगे वो ऊँचा है दूसरे जातिगत समूह की अपेक्षा। तो इसका मतलब, कास्ट कोई अप्रासंगिक बात नहीं है।
अगर भारत एक वेलफेयर स्टेट है और हम चाहते हैं कि हमारे सारे बच्चे पढ़ें, हम चाहते हैं कि कोई भूखे पेट न सोए। हम चाहते हैं कि सबको जीवन में आगे बढ़ने के समान अवसर उपलब्ध हों। और हम पाते हैं कि वो सारी चीज़ें जो हम लोगों तक पहुँचाना चाहते हैं, उनका ताल्लुक तो जात से है। तो फिर जातिगत गणना में अपने आप में कोई बुराई नहीं है।
लेकिन जैसा मैंने कहा, आपकी नियत ही ख़राब हो। आप वो सब आँकड़े पता करो और फिर कहो, “अच्छा, यहाँ पर इस तरह के लोग ज़्यादा रहते हैं, तो चुनाव में इनको लुभाने के लिए आप ऐसे वादे कर लेंगे।” या कि, “यहाँ ये लोग बहुत कम रहते हैं, तो अगर मैं ऐसी कोई नीति लगाता हूँ, जिसमें इनके हितों की उपेक्षा होती है या इनके साथ शोषण होता है, तो कोई बात नहीं, क्योंकि इनके पास वोट बहुत कम हैं। आप इस तरह की ख़ुराफ़ात करने लगेंगे तो ये गलत बात है। लेकिन उन आँकड़ों को सामने लाना अपने आप में एक अच्छा कदम है। अब आगे बस ये सतर्कता होनी चाहिए कि ये जो आपके सामने तथ्य आएँगे, उनका दुरुपयोग न हो।
अंकित त्यागी: मैं इस पर एक सवाल आपसे और पूछूँगा। 1931 में आख़िरी बार जाति जिस तरह की जनगणना की गई थी, अंग्रेज़ों का उस वक़्त समय था। 1941 में एक्सरसाइज़ हुई, लेकिन उसे पब्लिश नहीं किया गया। 1951 में हमने ये कहकर इस पर रोक लगाई कि उस समय जो हमारे राजनेता थे, उन्होंने माना कि अंग्रेज़ों ने इसका इस्तेमाल किया था विभाजन करने के लिए। और हम अगर इसी में रहेंगे, उस समय राष्ट्र का निर्माण बिल्कुल शुरुआत वाले स्टेज में था, तो शायद इससे नुकसान होता। अब क्या बदल गया है कि वो वाली जो परेशानियाँ या सोच या डर था वो अब नहीं होगा?
आचार्य प्रशांत: देखिए, कई बातें हैं। पहली बात तो ये कि आरक्षण की नीति को अब चलते हुए बहुत समय हो गया है। कैसे पता करें कि वो नीति कितनी सफल है?
आप एक बहुत बड़ी नीति चला रहे हैं, आरक्षण की। 50% तक आरक्षण दे रहे हैं, उससे ज़्यादा भी दे रहे हैं या देना चाह रहे हैं, कोशिश तो यही है, अभी उस पर सुप्रीम कोर्ट ने कर दिया, नहीं तो। तो क्या आप इतनी बड़ी नीति चला रहे हो कि आप जानना नहीं चाहते कि उस नीति का परिणाम क्या है? उसकी एफिकेसी क्या है? तो कैसे पता चलेगा अगर आप ये देखेंगे ही नहीं कि जिनको आपने आरक्षण दिया, उनके जीवन स्तर में क्या बदलाव आया? कैसे पता चलेगा? इतना ही नहीं। आप आरक्षण दे रहे हैं और जिनको आप आरक्षण दे रहे हैं, उनके भीतर भी कई उपवर्ग हैं, सब सेक्शंस हैं।
अंकित त्यागी: क्रीमी लेयर जिसको बोलना शुरू कर दिया गया है अब।
आचार्य प्रशांत: क्रीमी लेयर है। ऐसे लोग हैं, जहाँ एक ही परिवार के कई लोगों को आरक्षण का लाभ मिल चुका है। अगर आप जाति के आधार पर सूचकांकों को गिनोगे ही नहीं, तो आपको कैसे पता चलेगा कि आपकी जो पॉलिसी है, वो सफल हो भी पा रही है या नहीं हो पा रही है। या उस पॉलिसी का वही लोग दुरुपयोग कर ले रहे हैं, उनका ही एक छोटा वर्ग दुरुपयोग कर रहा है, जिनके लिए जिनकी बेहतरी के लिए वो पॉलिसी बनी थी।
ये भी तो पता तभी चलेगा न, जब आप पहले ये सारी गणनाएँ करो। भाई, आप स्कूल में गिनते हो कितने बच्चे हैं, आप ये भी गिनते हो कि किसके अंक कितने आ रहे हैं। ये सब डाटा है, डाटा अपने आप में बुराई या पाप कैसे हो सकता है कि हमें उससे इतना बचना है। लेकिन उस डाटा को लेकर भेदभाव अगर करते हो, तो आप करते हो। डाटा अपने आप में नहीं करता। तो एक डाटा कलेक्शन एक्सरसाइज़ बुरी नहीं हो सकती। और फैक्ट्स के बिना, तथ्यों के बिना, डाटा के बिना अगर आप नेशनल पॉलिसीज़ चला रहे हो, तो ये तो अंधेरे में तीर मारने वाली बात है न।
अंकित त्यागी: बिल्कुल, लेकिन जैसे हम अभी आरक्षण की बात कर रहे थे, इस बात को कभी कहा जा रहा है कि देखिए, आजकल एक नारा चल रहा है, “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।” आपको नहीं लगता ये विभाजन कारक होगा?
आचार्य प्रशांत: ये तो विभाजन कारक है ही। अब हिस्सेदारी किस चीज़ में? हिस्सेदारी तो आउटपुट में होती है, प्रोडक्शन में होती है। तो हिस्सेदारी से आपका आशय क्या है कि जो कुछ तैयार हो रहा है, उसका बंटवारा हो जाएगा। लेकिन उसे तैयार करेगा कौन अगर उसमें कोई हिस्सेदारी नहीं है तो?
आप ये कह रहे हो, “दिस इज द साइज ऑफ़ द पाई, एंड इट विल बी डिस्ट्रीब्यूटेड इन प्रोपोर्शन टू द साइज ऑफ़ द क्लास। द न्यूमेरिकल साइज ऑफ़ द पपुलेशन ऑफ़ दैट क्लास। ये करोगे, पर वो पाई आएगी कहाँ से? अगर सब वर्ग सिर्फ़ जो बनी-बनाई चीज़ रखी है, उसमें अपना हिस्सा लेने को आतुर हैं, तो उस चीज़ को बनाने वाला कौन है फिर? तो मैं हिस्सेदारी की बात करूँगा, लेकिन उत्पादन में, प्रोडक्शन में, विकास में, देने में, मैं पहले कुछ तैयार करूँगा तब वो बटेगा न।
भाई रसोई में कोई माल तैयार हो गया है, सब लोग कहें कि “जिसका जितना बड़ा पेट, उसकी उतनी बड़ी हिस्सेदारी।” या “जितनी संख्या, उनको उसके अनुपात में हिस्से में बाँट दो।” लेकिन रसोई में कुछ तैयार होगा कैसे? सबसे पहले उसके लिए संसाधन कहाँ से आएँगे? मेहनत कौन करने वाला है? काबिलियत कौन विकसित कर रहा है अपनी? समर्पण किस में ज़्यादा है कि मैं और काबिलियत करके सबसे पहले उत्पादन करूँगा, देश के लिए कुछ तैयार करूँगा — वो ज़्यादा ज़रूरी बात है।
एक बार कुछ तैयार होता है, फिर उसमें बंटवारा होता है, हिस्सेदारी होती है। वो बाद की बात होती है, पहले कुछ तैयार तो करो। और तैयार वो लोग नहीं कर पाते, जो सिर्फ़ हिस्सेदारी लेने को आग्रही होते हैं, कि “साहब, जो बना बनाया है, उसमें मुझे मेरा हिस्सा दे दो।” अगर ऐसे ही बस हिस्सा माँगते रहोगे तो बनाने वाला कोई नहीं बचेगा। तो
हमें हिस्सेदारी रखनी चाहिए, पर सर्वप्रथम हमारी ज़िम्मेदारी ये है कि हम कहें, कि हमारा दायित्व है, हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम उत्पादन में, रचना में, निर्माण में हिस्सेदारी करेंगे।
अंकित त्यागी: मैं आपकी किताब से कुछ कोट करता हूँ और उसके कॉन्टेक्स्ट में एक सवाल आपसे पूछना चाहूँगा। आपने इसमें लिखा है, कि “जो समय भारत में बहुत गहरे जातिवाद का था, वही समय भारत में आर्थिक ह्रास का भी था। इकोनॉमिक डिक्लाइन का भी था। वही समय भारत में सामरिक ह्रास का भी था, मिलिट्री डिक्लाइन का था। और वही समय भारत में तमाम तरह की गुलामियों का भी था, वही समय था जब भारत में कई सौ सालों तक कोई वैज्ञानिक प्रगति भी नहीं हुई। ये सारी बातें मिलाकर, किधर इशारा कर रही हैं?”
तो मैं आपसे पूछूँ, तो आपके हिसाब से किधर इशारा कर रही हैं?
आचार्य प्रशांत: ये सारी बातें इशारा कर रही हैं कि इन सब गड़बड़ियों की, जितने दुर्भाग्य भारत पर पड़े, इनकी जड़ एक ही है। माने जहाँ पर जाति के आधार पर भेदभाव होगा, शोषण होगा, हिंसा होगी, जाति के आधार पर, लिंग के आधार पर, वर्ण के आधार पर। वर्ण माने रंग होता है। संस्कृत में वर्ण का अर्थ रंग है। इसके आधार पर, किसी भी आधार पर, जहाँ पर इंसान ऐसा हो जाएगा कि उसको ये बातें बहुत बड़ी लगने लगेंगी, वहाँ वो ज़िंदगी में कोई भी बड़ा काम करने से चूक जाएगा। कोई वैज्ञानिक प्रगति नहीं होने वाली, कोई कलाओं में प्रगति नहीं होने वाली, कोई ऊँचा साहित्य नहीं लिखा जाएगा। बड़े काम नहीं हो पाएँगे, क्योंकि आपके लिए छोटी-छोटी बातें बहुत बड़ी हो गई हैं।
क्या छोटी बात बड़ी हो गई है — वो किस घर में पैदा हुआ? उसके नाम के साथ क्या उपनाम जुड़ा हुआ है? जाति कौन है? जाति भी नहीं, गोत्र वग़ैरह भी बताओ। सब बताओ और पूरा घुस जाओ, उसकी कुंडली में घुस जाओ। एकदम जाकर के। ये छोटी-छोटी पेटी बातों को जब आप बड़ा बना लेते हो, तो ज़िंदगी में जो असली बड़ी बातें होती हैं, उनसे आप चूक जाते हो। आप युद्ध के मैदान पर भी मार खाते हो, आप सृजनात्मकता के मैदान पर भी मार खाते हो, आप विज्ञान में भी मात खाते हो। आप वैश्विक जीवन में बाक़ी सब देशों से एकदम पिछड़ जाते हो।
तो बहुत ज़रूरी है कि ये जो पेटी डिस्क्रिमिनेशंस हैं, इनसे इंसान अपने आप को दूर रखे, कि “वो मुझे पसंद नहीं है।” ये सब हम अपनी ज़िंदगी में करते हैं। वो पसंद क्यों नहीं है? साहब, वो अच्छा दिखता नहीं है। वो पसंद नहीं है। क्यों? उसकी खाल का रंग अलग है। इसी तरीक़े से वो पसंद है। क्यों पसंद है? क्योंकि उसका शरीर आकर्षक है। शादी-ब्याह इसी आधार पर तो होते हैं। ये पेटी, क्षुद्र आधार हैं — चुनने या न चुनने के। और जब ये क्षुद्रताएँ, ये पेटीनेस हमारे ऊपर हावी हो जाती हैं, तो हमारे जीवन के हर क्षेत्र में पतन होता है। डिक्लाइन होता है। मैं इसमें ये कहना चाहता हूँ।
अंकित त्यागी: लेकिन फिर एक ये भी सच्चाई है कि ये ऐसा नहीं है कि इस सच्चाई से नकारा जा सकता है कि देश जाति के तौर पर विभाजित रहा है। बहुत समय से रहा है। जाति में पैदा होने का कुछ लोगों को बहुत सालों, दशकों, सदियों तक नुकसान झेलना पड़ा है।
तो अगर उनको कुछ समानता देने के लिए करेक्टिव एक्शन की बात की जाती है, और उसमें, उस कॉन्टेक्स्ट में, अगर मैं जाति जनगणना को देखूँ और फिर ये कहूँ कि “भाई, अगर एक तबके को सदियों तक नीचे दबाया गया, तो उसके लिए अगर मुझे 50% रिज़र्वेशन की लिमिट को लाँघना भी पड़ेगा तो मैं उसके लिए तैयार हूँ” तो उसमें गलत क्या है?
आचार्य प्रशांत: गलत की तो कोई बात ही नहीं है। लिमिट की भी कोई बात नहीं है। इसमें आँकड़े की तो बात ही नहीं है, इसमें तो दिल की बात है। अगर मुझे पता चले कि आज मैं जिस हालत में हूँ, मुझे ज़िंदगी में जो सहूलियतें मिलीं, सुविधाएँ मिलीं, नियामतें मिलीं, प्रिविलेजेस मिलीं, वो इसलिए मिलीं क्योंकि कोई और था, जिसके घर में बिजली नहीं थी। जिसके घर में पीढ़ियों से किसी ने पढ़ाई नहीं की थी। जिसके पास इतना पैसा भी नहीं था कि वो अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी कर सके।
तो इंसान होने के नाते, एक खुददार इंसान होने के नाते, अपनी गरिमा, अपनी डिग्निटी के नाते मैं कहूँगा कि, “मेरे पास ज़्यादा से ज़्यादा है, मैं तुझे देना चाहता हूँ।” इसमें कोई ऊपरी सीमा ही नहीं, क्योंकि मुझसे बर्दाश्त नहीं होगा कि मैं किसी का हक़ खा के बैठा हुआ हूँ। बात इसकी भी नहीं, किसी ने नियम बना दिया। बात इसकी भी नहीं है, किसी ने आरक्षण का कोई कोटा निर्धारित कर दिया। बात मेरी अपनी व्यक्तिगत गरिमा की है। मैं कैसे अपने आप को खुशहाल मान लूँ और खुशी मना लूँ, नाच लूँ, गा लूँ, उत्सव कर लूँ, जब मुझे ये पता चल चुका है कि मुझे आज जो स्थिति उपलब्ध हुई है, वो किसी दूसरे के अधिकारों की कीमत पर हुई है।
ये तो मेरा आत्मसम्मान होगा, जो मुझे मजबूर करेगा कि मैं जाऊँ और कहूँ, “जो कुछ है, ले लो भाई, ले लो, अधिक से अधिक ले लो। क्योंकि तुम्हारी हालत अगर ख़राब है, तो ये मेरे मुँह पर तमाचे की तरह है।” मैं जितनी बार तुमको देखता हूँ, उतनी बार मुझे ये दर्द होता है। मुझे अपमान महसूस होता है कि तुम्हारी उस ख़राब हालत में थोड़ी बहुत, या बहुत ज़्यादा शायद मेरी ज़िम्मेदारी है। मेरी प्रतिभागिता है।
मैं आईआईटी गया था, नया-नया। सन 95 की बात है। तो सब बैठे हुए आपस में बात कर रहे थे, कि तुम्हारी कौन सी खूबी थी कि तुम जेई क्लियर कर पाए, जो टॉप वन परसेंटाइल होता है, वो क्लियर करता है। उस साल भी यही हुआ था। तो कोई अपनी कोई खूबी बता रहा है, कोई अपनी कोई बात बता रहा है, कोई अपना टैलेंट बोल रहा है। कोई बोल रहा है, टैलेंट वैलेंट कुछ नहीं था, मैं तो स्लॉगिंग करता था, दिन में 14 घंटे पढ़ता था। कोई कुछ बोल रहा है, कोई कुछ बोल रहा है।
तो मैंने भी कुछ बातें बोलीं। फिर मुझे एक और ख़्याल आया, तो सबके सामने मैंने रखा। मैंने कहा, “देखो, मुश्किल से डेढ़-दो लाख लोगों ने इस साल आईआईटी एंट्रेंस, जेई जो होता है, वो लिखा होगा।” जबकि अगर तुम देखो कि भारत में कितने किशोर हैं, टीनएजर्स हैं, जिन्हें इस साल 12वीं पास करनी चाहिए थी, और मैं अस्यूम कर रहा हूँ कि वे साइंस स्ट्रीम से होते, तो एलिजिबल होते जेई लिखने के लिए, तुम देखो वो कितने हैं। तो वो जो संख्या है, वो 2 लाख की अपेक्षा कई-कई-कई गुना निकल कर आई। साहब, ये तो इतने होने चाहिए थे।
मैंने कहा, इतने होने चाहिए थे, लेकिन उतनों ने तो 12वीं का एग्ज़ाम भी नहीं लिखा। और फिर जिन्होंने 12वीं का एग्ज़ाम लिखा, साइंस स्ट्रीम से उनमें से कितने लोग थे जिन्होंने जेई लिखा? तो वहाँ भी आपने पाया कि कई गुने का अंतर है।
तो हमने कहा, “यानी कि हम यहाँ पर हैं।” इसमें ये बात तो ठीक है कि हम अनुशासित थे, हमने मेहनत करी और बहुत जोर लगाया, तो हम सफल होकर यहाँ पहुँचे हैं। पर बहुत बड़ा योगदान इस बात का भी है कि भारत की एक बहुत बड़ी आबादी है, जिसके पास वो रिसोर्सेज़, वो संसाधन, वो क्षमता, वो एक्सपोज़र ही नहीं है।
अंकित त्यागी: वो अवसर ही नहीं है।
आचार्य प्रशांत: वो अवसर ही नहीं है कि वो जेई जैसा एग्ज़ाम लिख भी सके। तो हमारा, तुम्हारा इस वक़्त पर आईआईटी के कैंपस में होना—वी ओ इट इन सम मेजर टू दोज़ पीपल हू कुड नॉट इवन राइट द जेई, लेट अलोन क्लियर इट।
तो वहाँ पर सब ने माना कि हाँ, ये बात तो बिल्कुल सही है। तो देखिए, ज़रूरत नहीं पड़नी चाहिए कि कोई लेजिस्लेशन मुझे मजबूर करे कि मैं कुछ सीटें किसी को दे दूँ। मेरी बात बहुत लोगों को अखर रही होगी और और अखरेगी भी, क्योंकि गवर्नमेंट जॉब्स के लिए बहुत मारामारी है। और बड़ा बुरा लगता है जब आप पाते हो कि जनरल कैटेगरी के नंबर ज़्यादा थे, पर वहाँ कट ऑफ़ ज़्यादा था, तो आपका सिलेक्शन नहीं हुआ। पर रिज़र्व कैटेगरी में लोअर कट ऑफ़ पर किसी का सिलेक्शन हो रहा है। उससे हार्ट बर्न होता है, दिल जलता है। मैं समझ सकता हूँ। और इसलिए मैं भी समझ रहा हूँ कि जिनके साथ ऐसा हुआ होगा, उनको मेरी बात बुरी लग रही होगी।
लेकिन फिर भी अपना स्वार्थ या अपना हित, अनहित थोड़ा परे करके, जब हम एक व्यापक दृष्टिकोण से, बिगर पिक्चर देखते हैं, तो देखिए—ईमानदारी की बात तो ये है कि हमें मानना पड़ेगा कि अन्याय तो हुआ है। और अन्याय मात्र नहीं हुआ है। उस अन्याय से जो ऊँचे वर्ण रहे हैं, उन्हें फायदा भी हुआ है। और जब उन्हें फायदा हुआ है, तो ये बात हमारी सेल्फ रिस्पेक्ट की है कि अगर हमारा फायदा हुआ है, तो अब हम स्वेच्छा से तुम्हारा हाथ थाम कर तुम्हें ऊपर उठाना चाहते हैं। क्योंकि हम ऊपर उठे थे, उसमें एक अंश, एक हिस्सा इस बात का भी था कि तुम नीचे रह गए। तुम इतना नीचे न रहते, तो हम इतना ऊपर नहीं आए होते। अब हम ऊपर आए हैं तो तुम भाई हो हमारे, हम हाथ देंगे, तुम भी ऊपर आ जाओ।
अंकित त्यागी: जैसे आपने कहा कि कुछ लोगों को ये बात बुरी लगेगी।
आचार्य प्रशांत: लगेगी।
अंकित त्यागी: मैं उसी पर मेरा एक जुड़ा हुआ एक सवाल है। लोग कहेंगे, “आचार्य जी व्यवहारिक बात नहीं कर रहे हैं आप।” देखिए, मेहनत मैंने करी। इसी में फिर वो कहेंगे, आर्गुमेंट, फिर मेरिट का क्या होगा? अगर मैंने मेहनत करी और मैं आ गया और किसी और को, जैसे आपने बताया, उसके नंबर कम थे फिर भी उसको वही ऑप्शन।
आचार्य प्रशांत: मैं मेरिट पर एक बात पूछता हूँ। ये भी फिर वही अपने कैंपस में वापस जाता हूँ। तो दिल्ली का लड़का है, दिल्ली का और लड़का।
अंकित त्यागी: यही प्रिविलेज़ है।
आचार्य प्रशांत: यही प्रिविलेज़ है। अब यहाँ पर 100 तरह की कोचिंग, उन दिनों में भी मौजूद थी। एक “विद्या मंदिर कोचिंग” होती थी। एक “फिट जी” होती थी और भी दो-चार होती थी। एक उड़ीसा का लड़का है या बिहार का लड़का है, उसके पास न तो घर में पैसा है, न कुछ है, न कोचिंग जैसी कोई चीज़ है। स्कूल के जो टीचर्स हैं, वो भी बहुत औसत किस्म के हैं।
ये जो दिल्ली वाला लड़का है, ये जेई रैंक 10 निकालता है। और वो जो वहाँ पर, वो उड़ीसा या बिहार के किसी पिछड़े गाँव का लड़का है, वो अपने तीसरे अटेम्प्ट में जेई रैंक 2000 निकाल लेता है। अब बताइए, ज़्यादा बड़ा श्रेय आप किसको देंगे?
अंकीत त्यागी: मैं तो मेरा अलग है। लेकिन मैं समझता हूँ, मैं तो उसको दूँगा जिसने सबसे मुश्किल कंडीशंस में हासिल किया है।
आचार्य प्रशांत: “योर मेरिट हैज़ टू बी मेजर्ड इन रिलेशन टू द ऑड्स यू फेस।” मेरिट कोई एब्सोल्यूट नहीं होती। मेरिट इज़ अ सब्जेक्टिव थिंग। तो हम क्या मेरिट की बात करते हैं। जिसको सुविधाएँ ही नहीं मिली हैं, आप उसकी मेरिट क्या नाप रहे हो, वो तो ही इज़ स्विमिंग अपस्ट्रीम। वो बेचारा तो बहुत प्रतिकूल परिस्थितियों में संघर्ष कर रहा है।
अब यहाँ जो दिल्ली वाला है, उसको गाड़ी छोड़ने जा रही है कोचिंग तक। और पिताजी की गाड़ी, पिताजी की ही गाड़ी, कई बार वो सरकारी गाड़ी भी हो सकती है। और पिताजी की ही गाड़ी उसको वापस ला रही है। घर आ रहा है, तो माँ उसको घोट करके दूध में बादाम और अखरोट और काजू और ये सब पिला रही है। उसका छोटा से छोटा काम करने के लिए नौकर मौजूद हैं। अब उसकी जेई रैंक 10 आ गई, ऑल इंडिया। आप कहोगे, “ये तो मेरिटोरियस है।” इज दिस मेरिट? मेरिट क्या चीज़ है? समझना पड़ेगा न। और वहाँ पर वो बिहार का लड़का है। आप कहोगे उसके पास तो मेरिट ही नहीं है। तीसरे अटेम्प्ट में उसकी 2000 रैंक आई है, उसकी तो मेरिट ही नहीं है।
उसने जिन हालातों में संघर्ष करा है और 2000 रैंक निकाली है। ये जो दिल्ली वाले भाई साहब हैं, जो रुई के फाहे में पले-बड़े हैं, इनको आपने वहाँ डाल दिया होता तो इनकी सारी मेरिट निचोड़ जाती। तो मेरिट कोई एब्सोल्यूट चीज़ नहीं होती है, ये समझो कि किसके जीवन में क्या रहा है। उसके हिसाब से उसकी मेरिट देखी जाएगी।
अब मुझे मालूम है, ये मैं बोल के बहुत गालियाँ आमंत्रित कर रहा हूँ। पर कोई बात नहीं, सच्चाई बोली जानी ज़रूरी है।
अंकित त्यागी: और ज़रूरी नहीं है कि सच्चाई हमेशा आपको पसंद ही आए। सच्चाई सच्चाई होती है। ज़रूरी नहीं है कि वो आपको हमेशा पसंद ही आए।
लेकिन इसको मैं थोड़ा सा एक और इसमें सवाल जोड़ देता हूँ। फिर बहुत लोग ये भी कहेंगे, देखिए, जब आप ये संख्या की बात करते हैं, और आप ये बात करते हैं कि रिज़र्वेशन की बात भी उसके साथ जोड़ देते हैं, और फिर मेरिट की भी आपने जो व्याख्या इसमें की है, कि भाई अब तो डिसएडवांटेज हमको है, क्योंकि हमारी संख्या भी कम है। तो जिन्हें उधर रिज़र्वेशन मिल रहा है, उनकी संख्या वैसे भी बढ़ती जा रही है। तो हम सिर्फ़ इस नोशन से कि—हम इस अपर जात में पैदा हुए या ऊँची जात में पैदा हुए, अब हम डिसएडवांटेज में हैं। ऐसा कहने वाले बहुत लोग मिलते हैं। इसीलिए मैं आपसे सवाल पूछ रहा हूँ।
आचार्य प्रशांत: हाँ, बढ़िया सवाल है। बढ़िया, बहुत अच्छा सवाल है। जो कहते हैं कि उनकी संख्या कम है और फिर अब कोटा भी कम है। मैं उनके लिए खुशखबरी लाया हूँ, गवर्नमेंट जॉब्स भी कम हैं। गवर्नमेंट जॉब्स इतने कम हो गए हैं, इतने कम होते जा रहे हैं — पॉपुलेशन भाई, कुछ सौ नौकरियों के लिए कई करोड़ आवेदन आते हैं। तो हैं कितने गवर्नमेंट जॉब्स?
वो उतनी छोटी सी पाई के लिए, उतने छोटे से चीज़ के लिए आप क्यों जान लगा रहे हो? आप अगर सचमुच मेरिटोरियस हो तो आप जाओ न, आप जॉब क्रिएटर बनो।
भाई, सारा जो आरक्षण का मामला है, वो गवर्नमेंट जॉब्स के लिए ही तो है, मारामारी। गवर्नमेंट जॉब्स बचे ही कितने हैं? तो मारामारी करके मिल भी क्या जाएगा? 10 नौकरियाँ हैं और 10 लाख लोगों ने आवेदन दिया है। उसमें 50% अगर रिज़र्व सीट्स हैं, तो जनरल क्लास को पाँच मिल जाएँगी। वो कोटा बढ़ गया, 60% रिज़र्व सीट्स हो गई, तो जनरल क्लास को चार मिल जाएँगी।
अरे, 10 लाख अप्लिकेंट्स हैं। सीटें अब पाँच हो कि चार हो, क्या फ़र्क़ पड़ता है? इससे अच्छा ये है कि ये चक्कर ही छोड़ो न। बाहर निकलो, जॉब क्रिएटर बनो, और बोलो, “मैं हर कैटेगरी को नौकरी दूँगा।” बोलो ख़ुद को गाली देने वालों से कि “तुम लोग यही बोलते थे ना कि मैं प्रिविलेज्ड हूँ, तो देखो मैंने अपनी प्रिविलेज़ का कर्ज उतार दिया।”
अगर मैं प्रिविलेज्ड था, तो अब मैं नेशन के लिए जॉब क्रिएटर बन रहा हूँ और अब मैं सबको दे रहा हूँ। मेरे ऊपर यही इल्ज़ाम था न कि शताब्दियों से मेरे पुरखों ने जाति के नाम पर लिया है। यही तोहमत लगाई जाती है कि “साहब, आप सवर्ण हो। आपने लिया है, लिया है, लिया है।” तो लिया है तो लो, अब मैं दे रहा हूँ। अब मैं जॉब्स दे रहा हूँ। मैं क्यों गवर्नमेंट जॉब का अभ्यार्थी बनूँ? मैं क्यों कहूँ कि मैं भी कतार में लगा हूँ, मुझे भी सरकारी नौकरी मिल जाए, और फिर मैं उसमें शोर मचाऊँ कि रिज़र्वेशन हो गया मुझे नहीं मिल रही। मैं दूँगा न।
मैं सचमुच मेरिटोरियस हूँ। मैं यही तो कह रहा हू, मैं मेरिटोरियस हूँ। तो अब मैं अपनी मेरिट डिस्प्ले करूँगा, मेरिट करेंगे डिस्प्ले। दिखाओ अपनी मेरिट। दिखानी चाहिए। ये कोई कोरी चुनौती नहीं दे रहा, ना मैं व्यंग कर रहा हूँ। मैं चाहता हूँ ऐसा हो।
अंकित त्यागी: एक चैलेंज के तौर पर लोग लें इसे।
आचार्य प्रशांत: एक चैलेंज, एक दायित्व, ज़िम्मेदारी, बल्कि प्रेम के तौर पर लें। क्योंकि,
भारत राष्ट्र को आज ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो बस नौकरी माँग न रहे हों, वो नौकरियाँ दे रहे हों।
सरकार इतनी नौकरियाँ नहीं दे सकती। सरकार बहुत कम नौकरियाँ देती है और सारी मारामारी चल रही है कि इन नौकरियों के भीतर हमें रिज़र्वेशन मिल जाए। वो नौकरियाँ हैं ही बहुत कम। उसमें रिज़र्वेशन मिले कि न मिले, बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ता।
अंकित त्यागी: आपकी किताब से मैं एक कोट करना चाहता हूँ। “ऐसे विचित्र ये लोग कि सबसे पहले तो तुमने सदियों तक किया है गलत आचरण, किया है दुर्व्यवहार, किया है शोषण, मानो न इस बात को पहले तो मानने को तैयार नहीं है। और दूसरी बात, जो अतीत में करते आए हो, इच्छा तुम्हारी यही है कि तुम आज भी वही काम करो। ये कैसे लोग हैं, और आत्मविश्वास कूट-कूट कर भरा हुआ है कि जो हम कर रहे हैं, वो बिल्कुल ठीक कर रहे हैं। समझाने जाओ, सुधारने जाओ, तो सुनते नहीं हैं। सुनते हैं, पर बड़ा विरोध करते हैं। सिर मार-मार कर दीवारों को तोड़ना है। इतना विरोध करते हैं। अब दीवारें तो टूटती हैं, फिर लेकिन उसमें धार दिखाई देती है, लहू की।”
आचार्य प्रशांत: ये मेरी आपबीती है।
अंकित त्यागी: तो मैं इसको थोड़ा सा समझना चाहता हूँ कि अब ये किस पर कटाक्ष है और क्या कह रहे हैं?
आचार्य प्रशांत: अरे, उन्हीं से, जिनसे वो सब बातें करता हूँ जो अभी कर रहा हूँ। वही दीवार बन के खड़े हो जाते हैं। तो दीवारें तो मैं तोड़ रहा हूँ, लेकिन अपना सर मार-मार के तोड़ रहा हूँ, तो टूटती दीवारों पर लहू की धार दिखाई देती है।
नहीं मानना चाहते लोग कि अन्याय, अत्याचार हुआ है। लोग कहते हैं, “ऐसा कुछ हुआ नहीं था कभी।” न तो इतिहास पढ़ रहे हैं, न आँकड़ों पर जा रहे, न तथ्यों पर जा रहे। अरे, इतिहास की नहीं सुननी तो आज अलग-अलग जातिगत वर्गों का जो स्टैंडर्ड ऑफ़ लिविंग है, वही देख लो। उनका एजुकेशनल स्टैंडर्ड देख लो। सब कुछ, जो उनको सोशल अमेंटीज़ मिल सकती हैं, वो देख लो।
कुछ नहीं सुनना चाहते। और, मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि किसी से कुछ वसूलना है। मैं ये कह रहा हूँ, मैं ये बात अपनी डिग्निटी, अपनी गरिमा के नाते कह रहा हूँ कि अगर मुझे मिला है अतीत से, तो आज मैं बाँटूँगा। वरना, पाँच लोगों की रोटी छीन करके अगर मैं खा रहा हूँ, तो मुझे पचेगी कैसे? ये बात मेरी अपनी ज़िंदगी की है। बात ये भी नहीं है कि मुझे सोशल जस्टिस करना है, सोशल जस्टिस भी नंबर दो पर आता है।
नंबर एक पर जो चीज़ आती है, वो बहुत इंटिमेट है, निजी है, मेरी अपनी है। वो ये है कि मैं किसी का हक़ मारकर नहीं खा सकता, भले ही दूसरों को बाँटने में मुझे ही भूखा रहना पड़े। बिल्कुल हो सकता है, मैं भूखा चला जाऊँ। पर मेरी अपनी डिग्निटी मुझे अनुमति नहीं देती कि पाँच लोग भूखे हैं और शायद मेरी वजह से भूखे हैं, और मैं पेट भर के खा लूँ। नहीं कर सकता।
और ये बात सिर्फ़ इंसानों में नहीं, ये बात जानवरों पर भी लागू होती है। मैं किसी जानवर को भी नहीं मार के खा सकता, भले ही मुझे भूखा सोना पड़े, भले भूख से मर जाना पड़े। ये बात मेरी अपनी है। बात ये नहीं है कि मुझे उन पर करुणा दिखानी है। उन पर करुणा नंबर दो की बात है। ये बात नहीं समझ रहे, लोग समझने को तैयार नहीं हैं क्योंकि सबको सस्ती सुविधाओं का लालच है।
अंकित त्यागी: पर इसके लिए क्या अपने आप को आध्यात्मिक तौर पर मजबूत नहीं करना पड़ेगा?
आचार्य प्रशांत: बस वही, वो समाधान है। वही समाधान है और उसी के लिए तो ये है भगवद्गीता।
अंकित त्यागी: मैं एक और चीज़ सोच रहा था, क्योंकि बार-बार लोग बात करते हैं, हम जिस तरह के दौर में अभी हैं, 2025-26 के भारत में, क्या धर्म, जाति, लिंग से ऊपर उठ के भारत को आगे बढ़ाने की कोशिश करनी होगी, या हम फिर घूम-फिर के कौन जात में फँस जाएँगे?
आचार्य प्रशांत: देखिए, 2025 की बात नहीं है। 2025, 26, 2085, 3085, कुछ बातें समय के आगे बढ़ने से बदल नहीं जाती हैं। समय आगे बढ़ता है, इंसान आवश्यक नहीं है कि समय के साथ आगे बढ़ जाए। समय बढ़ा आगे, इंसान आगे बढ़ा ज़रूरी नहीं है। बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है। हर बच्चा जो पैदा होता है न आज की शताब्दी में, आज से 5000 साल पहले, आज से 500 साल बाद, हर बच्चा समझ लीजिए कि एक प्राकृतिक पशु पैदा हुआ है, और उसके भीतर वो सब वृत्तियाँ होती हैं कि “दूसरों का नोच-खसोट के खा लूँ, ये कर लूँ।” आपने देखा,
इंसान के बच्चे और जानवर के बच्चे में कोई बहुत अंतर होता नहीं है, इसीलिए इंसान के बच्चे को 25 साल तक शिक्षा देते हैं। कुछ तो बात होगी न कि उसे इतना एजुकेट करना पड़ता है।
किसी को 25 साल तक अगर दवाई देनी पड़े, तो माने बड़ी गहरी बीमारी रही होगी। इंसान के बच्चे को 25 साल तक शिक्षा माने दवाई देनी पड़ती है। हम इतनी गहरी बीमारी लेकर पैदा होते हैं। तो वो चीज़ हमें हमेशा चाहिए होगी कि ये जो टेंडेंसीज़ हैं — भेदभाव की, शोषण की, किसी को दबा लेने की, किसी से झूठ बोल देने की, किसी का हक़ मार लेने की इन सबके साथ हमेशा संघर्ष करना पड़ेगा। बात आज की नहीं है। और वो जो संघर्ष है, सिर्फ़ आध्यात्मिक तल पर हो सकता है।
नीतियाँ बनाना एक तरह का समाधान है, पर वो गहरा समाधान नहीं है। वरना आप क्या करोगे कि जो नीति निर्धारक हैं, आप उनको ही सरकार से हटा दोगे। लोकतंत्र है, तो वोट से हटा दोगे। लोकतंत्र नहीं है, तो बंदूक से हटा दोगे। कोई बहुत अच्छा संविधान है, तो आप बोल दोगे “नहीं, हमें संविधान ही नहीं चाहिए। कॉन्स्टिट्यूशन अमेंडमेंट कर दो। ये कर दो, वो कर दो। नया संविधान ले आ दो।” आप ये सब करना शुरू कर दोगे।
आख़िरी बात तो यही है कि आपके भीतर जो शोषण और भेदभाव का जन्मगत बीज होता है, उसको ही निकाल फेंका जाए। और उसके लिए होता है अध्यात्म, उसके लिए दर्शन होता है, उसके लिए वेदांत है, उसके लिए बौद्ध धर्म है, उसके लिए भगवद्गीता है।
अंकित त्यागी: मेरा अंतिम सवाल इस पर आपसे है, कुछ पंक्तियों में आप जाति को सामाजिक, रचनात्मक प्रेम और प्रतिभा का सबसे बड़ा दुश्मन भी बता रहे हैं। तो क्या, जाति को मजबूत करना भारत को या किसी भी देश को रचनात्मक, वैज्ञानिक और प्रेममय समाज बनने से रोकता है? और अगर ऐसा करता है, तो उसका समाधान क्या है?
आचार्य प्रशांत: प्रेममय समाज बनने से क्या रोकता है? ये आज के भी जो यंग कपल्स हैं, ये रोमांस शुरू करने से पहले जाति फिक्स कर लेते हैं। ये तो प्रेम विवाह करने जा रहे हैं, पर प्रेम भी इनको अपनी जाति और गोत्र, ये सब देख के होता है। कहाँ से प्रेम आ जाएगा? आप एक बहुत फिक्टिशस चीज़ को ज़िंदगी के सेंटर पर रख रहे हो। ऐसी फॉल्सनेस, ऐसे फिक्शन के साथ प्रेम जैसी असली चीज़ कहाँ से आ जाएगी?
वेदांत की अभी मैंने बात की। हमारे उपनिषद् हैं। मालूम है, वो क्या बोलते हैं? तो वहाँ पर शिष्य गुरु से प्रश्न कर रहा है: “बताओ, जाति क्या है?” तो गुरु कहते हैं तीन बातें होती हैं भाई — शरीर होता है, मन होता है और सत्य होता है, जिसको आत्म बोलते हैं, आत्मा। बोले, आत्म तो अजात है, तो उसकी तो कोई जाति होगी ही नहीं। वही जो किताब के शीर्षक में “अजात की क्या जात।” जो अजात है, वो आत्मा है, उसका कभी जन्म ही नहीं होता, न मृत्यु होती है। वो अजात है। जब वो अजात है, तो उसकी तो कोई जाति ही नहीं है। ये गुरु का उत्तर है।
बोले, इसी तरह शरीर है। शरीर सबका एक जैसा है। एक आदमी का खून दूसरे को चढ़ा देते हो, एक मर जाता है, उसकी आँख निकाल के दूसरे को लगा देते हो। एक का लीवर, एक की किडनी दूसरे में लगा देते हो। तो शरीर की भी कोई जाति नहीं है, नहीं तो ब्लड ट्रांसप्लांट ही नहीं हो पाता।
आत्मा का जन्म ही नहीं है, तो जात कैसी? और शरीर की कोई जात होती नहीं। तो यानी जाति फिर चीज़ क्या है? बोले, जाति ही मन की चीज़ है, और मन माने मानसिक कल्पना। जाति काल्पनिक है। हमारा धर्म स्वयं बोलता है कि जाति एक काल्पनिक बात है।
अब जो इस कल्पना में जिएगा, वो असली जीवन कैसे जिएगा? इमेजिनेशन और रियलिटी साथ-साथ तो चल नहीं सकते। अब मैं आपको, आप सामने बैठे हो, आप इंसान कैसे हो मुझे वो दिखाई न दे। मैंने पहली चीज़ यही पता कर ली कि आपकी जाति क्या है। मुझे कुछ नहीं दिखाई देगा, कुछ भी दिखाई नहीं देगा। जिसकी आँख में इन सब पूर्वाग्रहों का पर्दा आ गया, उसे सच्चाई कभी दिखाई नहीं देगी। वो बड़ा, आधा-अधूरा, धुंधलके में जीवन जिएगा और दूसरों को भी बहुत कष्ट देगा।
अंकित त्यागी: तो ये जो डिस्कशन हमारा रहा, इसमें दो चीज़ें कम से कम मुझे समझ में आई। एक, जो अफ़र्मेटिव एक्शन या जिसको सुधार की हम बात करते हैं। क्योंकि कुछ जातियों के आधार पर लोगों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है, वो अपनी जगह चलेगा।
दूसरा, आपको अध्यात्म के अंदर जाकर अपने अंदर सोचने के कम से कम जातियों के बंधन से मुक्त होना पड़ेगा। शायद तभी जाकर पूरी तरीक़े से हम किसी भी जाति के लोगों को, इकट्ठा एक जगह ला पाएँगे।
आचार्य प्रशांत: और इसमें एक बात मैं और जोड़ना चाहूँगा। अध्यात्म की ज़रूरत सिर्फ़ उनको नहीं है जिनको हम कह रहे हैं कि इनको जातिगत भेद से लाभ हुआ है। अध्यात्म की ज़रूरत उनको भी है, बराबरी की और ज़्यादा है, जो कहते हैं या जिनके साथ सचमुच दुर्व्यवहार हुआ है और जिनका नुकसान हुआ है। क्यों? दो वजहों से, एक तो उनके मन में कई बार हीन भावना आ जाती है। तो तुम हीन नहीं हो, ये बात तुमको वेदांत बताएगा और गीता बताएगी। किसी हालत में तुम हीन नहीं हो। तुम्हारे वर्ण से, रंग से, जन्म से, जाति से तुम हीन नहीं हो गए। लिंग से तुम हीन नहीं हो गए। ये पहली बात।
और एक नई चीज़ आई है, विक्टिमहुड, मैं विक्टिम रहा हूँ। अब मैं विक्टिम रहा हूँ, तो मुझे कंपन्सेशन चाहिए। जो वंचित वर्ग रहा है, जो दलित वर्ग रहा है, उसमें भी अब एक हिस्सा ऐसा उभर के आ रहा है, जो एग्रेसिव हो रहा है, ये बोल के कि “मैं विक्टिम हूँ तो अब मुझे अग्रेशन का हक़ है।”
तो अध्यात्म वहाँ भी बहुत ज़रूरी है, ताकि तुम्हें पता चले कि अगर तुमने विक्टिम होने को अपनी पहचान बना लिया, तो तुम अपनी ज़िंदगी ख़राब कर रहे हो। तो इसलिए अध्यात्म सबके लिए ज़रूरी है। उनके लिए भी, जिनको हम प्रिविलेज्ड क्लास कहते हैं। उनके लिए भी, जो ऑप्रेस्ड रहे हैं और जिनमें अब हीन भावना, इन्फ़िरिऑरिटी आ गई है। और उनके लिए भी, जो अब रेडिकलाइज़ हो रहे हैं, अपने आप को विक्टिम बोलते हैं और अब अग्रेसिव होना चाहते हैं। अध्यात्म उनके लिए भी बहुत ज़रूरी है। अध्यात्म सबके लिए बहुत ज़रूरी है।
अंकित त्यागी: यही मार्ग है। और हर तरह की जाति की बेड़ियाँ, चाहे आपने उन्हें पहनाया हो, चाहे आप उन्हें तोड़ना चाहते हो, दोनों के लिए यही आवश्यक होगा। बहुत-बहुत शुक्रिया हमसे बात करने के लिए। धन्यवाद।