श्रुति ने कहा है — आप जन्म से ब्राह्मण नहीं हो जाते। श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में ब्राह्मण की तो बड़ी ऊँची परिभाषा बताई है — कहते हैं कि जो असली ज्ञानी होता है, वो तो ब्राह्मण, चांडाल, कुत्ते, गाय — सबको एक दृष्टि से देखता है। जाति का रिश्ता देह से ही बताया जाता है, और अध्यात्म इसलिए ज़रूरी है क्योंकि वो सीधे-सीधे देह-भाव पर ही सवाल उठाता है। जब तुम देह नहीं, तो तुम्हारी जात कैसे हो सकती है?
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, आचार्य जी मैं गीता सत्रों से लगभग एक साल से जुड़ा हुआ हूँ और मेरा नाम यादव है। मेरा सवाल हाल ही में हुई इटावा में एक घटना को लेकर है, जिसमें दो कथावाचक यादव परिवार से गाँव में गए थे कथा के लिए, और उनके साथ वहाँ पर दुर्व्यवहार किया जाता है और कुछ मूत्र की छींटे भी उन पर फेंकी जाती हैं, उनकी शुद्धता के लिए।
हालाँकि मैं भी आचार्य जी, यादव ही हूँ यादव परिवार से। तो आचार्य जी, मेरा सवाल ये है कि आपसे जुड़ने के बाद ख़ैर मेरे लिए ये सब मायने नहीं रखता, यादव वग़ैरह। लेकिन आचार्य जी, भविष्य में जो पीढ़ी आ रही है और हम भी जो हैं, आचार्य जी, हमारे दोस्तों में ये सब इतना ज़्यादा जाति वग़ैरह देखा नहीं जाता, मस्त रहते हैं लेकिन ये सब इंसिडेंट जब होते हैं सर, तो हमारे दिमाग़ में ये सब फिर से दोबारा भर जाता है। और जो भविष्य में पीढ़ी आ रही है, वो भी सब जात या आइडेंटिटी को पीछे छोड़ना चाह रही है सर। लेकिन ये सब इंसिडेंट जब हो जाते हैं तो फिर से वो सब दिमाग़ में कचरा भर जाता है। तो आचार्य जी, मैं इस पर आपसे समझना चाहता हूँ कि इतना ज़्यादा क्यों चीज़ें हो रही हैं?
और जब आने वाली पीढ़ी ये सब जाति, आइडेंटिटी को छोड़ना चाह रही है, दोस्तों में भी कुछ नहीं देखा होता है ये सब, लेकिन ये सब इंसिडेंट होने के बाद ये सब बढ़ने लग जाता है, आचार्य जी। इससे बड़ी दिक्कत होती है। इससे फिर दोस्तों में भी दरार आ जाती है और…।




