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जब सत्य और माया दोनों आकर्षक लगें || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: सत्य और माया, दोनों अच्छे लगते हैं। बहुत चंचलता होती है। कोई उपाय बताएँ।

आचार्य प्रशांत: एक माया बुरी लगती है, एक माया अच्छी लगती है—ये मत कहो कि सत्य भी अच्छा लगता है और माया भी अच्छी लगती है। सत्य के सामने बुरा लगना ठहर सकता है, बंद हो सकता है, वो एक बात है, और सत्य अच्छा लगता है, ये बिल्कुल दूसरी बात है।

सत्य वो है जिसके सामने, जिसे अच्छा लगता है और जिसे बुरा लगता है, उसे कुछ भी 'लगना' इत्यादि बंद ही हो जाए। जब तक वो बैठा हुआ है निर्णेता बनकर जो अनुभव करता है, और किसी अनुभव को बोलता है, “ये अच्छा है,” किसी अनुभव को बोलता है, “ये बुरा है,” तब तक कौन-सा सत्य, और किसके लिए?

तो जब कोई कहे कि सत्य और माया के बीच में फँसा हुआ है, तो संभावना यही है कि वो सत्य और माया के बीच में नहीं, 'मीठी माया' और 'कड़वी माया' के बीच में फँसा हुआ है। माया इसी तरह तो फँसाए रह जाती है न—कड़वी वाली से भागते हो, तो मीठी वाली पर जाकर बैठ जाते हो। नहीं तो कब के मुक्त हो गए होते!

फल तो माया का बंधन ही होता है न? और बंधन स्वभाव नहीं है। बंधन अनुभव करके कब का छोड़ दिया होता बंधनों को, पर कड़वे बंधनों से जब अनासक्ति उठती है तो मीठे बंधनों की ओर बढ़ लेते हो। मीठे बंधनों का नाम सत्य नहीं होता।

सत्य अच्छा या बुरा लगने की चीज़ नहीं है। सत्य वो है जिसकी रोशनी में तुम देख पाते हो कि कौन है जो अच्छे-बुरे का निर्धारण करता फिरता है।

मैं ये भी नहीं कह रहा कि सच वो है जिसकी रोशनी में तुम अच्छे और बुरे को देख पाते हो; मैं कह रहा हूँ सत्य वो जिसकी रोशनी में तुम उसे देख पाते हो जो 'अ' को कहता है 'अच्छा' और 'ब' को कहता है 'बुरा'। सत्य को जब देखा ही नहीं जा सकता, तो वो अच्छा या बुरा कैसे अनुभव होने लग गया?

वो कौन बैठा है भीतर जो अपनी सुविधानुसार, अपनी सुरक्षा के लिए कभी दाएँ जाना चुनता है, कभी बाएँ जाना चुनता है। और जाता वो जिधर को भी है, उसके सामने भय और मृत्यु ही खड़े रहते हैं। वो कौन है जिसको जीने का आधार बनाया है? वो कौन है जो मूल क्राइटेरिया (मापदंड) बनकर बैठा हुआ है, जिसके आधार पर सब निर्णय होते हैं? उसको अगर जान पा रहे हो, तो ये सत्य का आशीर्वाद है।

हम हैं छोटे-से और विनम्रता में कई दफ़े कह भी देते हैं कि, "हम तो बड़े छोटे हैं," पर भीतर-ही-भीतर हमें गुमान बहुत रहता है। हम दुनिया में तो हर चीज़ के ऊपर न्यायाधीश बनकर बैठ ही जाते हैं। हम उसको भी जज (आँकना) करने से बाज़ नहीं आते जो दुनिया के पार का है। हम उसके ऊपर भी निर्णेता बन जाते हैं। और किसी के ऊपर निर्णेता बनने की बात तब ही नहीं उठती जब तुम उसे बुरा ठहराओ, जब तुम उसे भला ठहराओ तब भी तो तुम उसके ऊपर न्यायाधीश बनकर बैठ ही गए न। अगर आज कह रहे हो कि, "सत्य बड़ा अच्छा, बड़ा मीठा, बड़ा पावन है," तो तुमने अपने-आपको ये अधिकार तो दे ही दिया कि कल कह सकते हो कि, "मीठा नहीं है, अच्छा नहीं है, पावन नहीं है।" जिस हक़ से उसको अच्छा बोल रहे हो, उसी हक़ से कल उसे बुरा बोलोगे।

तो माया मुस्कुराती है जब तुम कहते हो सत्य बड़ा ऊँचा और बड़ा मीठा है। वो कहती है, "जिस मुँह से बोला है कि ऊँचा है और मीठा है, उसी मुँह से कल बोलेगा कि नीचा है और कड़वा है, क्योंकि तूने अपने मुँह को ये अधिकार तो दे ही दिया न कि वो सत्य के बारे में कोई फैसला करे, कोई निर्णय करे। अब फैसला अगर एक तरफ़ को जा रहा है तो वो दूसरी तरफ़ को भी जा ही सकता है।" इसीलिए जाओगे अगर तुम ऋभुगीता के पास, या अवधूत गीता के पास, या अष्टावक्र मुनि के पास, तो वो कहेंगे कि, "ईश-वंदना करना, परमात्मा की स्तुति गाना बड़ा अपराध है, क्योंकि जिस मुँह से आज तुम वंदना कर रहे हो, उसी मुँह से कल तुम निंदा भी कर डालोगे।" और वो कहते हैं कि तीर्थ-यात्रा पर जाना भगवत्ता का अपमान है, क्योंकि तुमने अपनी बुद्धि लगाकर के कह दिया न कि अमुक काम करके और अमुक जगह जाकर के देवत्व के दर्शन हो जाएँगे।

सत्य को अच्छा-बुरा कुछ नहीं बोला जाता, अपने-आपको देखा जाता है: “मेरी क्या हालत है? मैं कौन हूँ? मेरा क्या हिसाब-किताब है?” अध्यात्म सत्य की बातें नहीं है, अपनी बात है। ये नहीं कहा जाता कि, “मुझे ये अच्छा लगा या मुझे वो अच्छा लगा,” पूछा जाता है, “कौन है जिसे कुछ अच्छा लग रहा है?” और कैसे उसने सीख लिया कि क्या अच्छा और क्या बुरा?

अंतर समझ पा रहे हैं?

आप अगर बात कर रहे हैं कि क्या अच्छा और क्या बुरा, तो आप अभी भी किसकी बात कर रहे हैं? संसार की। संसार में कुछ अच्छा बनाया, कुछ बुरा बनाया, और संसार की इतनी बात कर रहे हो तो तुमने स्वयं को ही मान्यता दे दी न? क्योंकि संसार तो तुम्हारा ही प्रक्षेपण है। संसार के बारे में इतनी बातें, तो तुमने मान ही लिया कि - 'मैं जो प्रक्षेपित कर रहा हूँ वो तो असली ही है'।

प्रक्षेपित विषय को मान्यता देने से पूर्व ये जो प्रक्षेपक है, उसकी जाँच-पड़ताल तो कर लो।

सवाल भी हम पूछेंगे तो ऐसे कि, “जो मुझे अच्छा लग रहा है, क्या वो वास्तव में अच्छा है?” अब ये हमारी जिज्ञासा है। जिज्ञासा भी उठी है, संदेह भी कर रहे हैं तो अभी भी बाहरी विषय पर कर रहे हैं, अपने ऊपर नहीं कर रहे। बहुत पुराना उदाहरण है, सबने सुन ही रखा है: लाल चश्मा पहन रखा है और कोई वस्तु लाल दिखती है। आप जाँचना भी चाहते हो कि वो वस्तु लाल है या नहीं, तो उस वस्तु को जाँच-जाँच के क्या मिलेगा? कितना भी जाँचो उसको, कुछ पता नहीं लगने वाला। तो वस्तु को छोड़ना पड़ेगा, स्वयं को जाँचना पड़ेगा न?

लाल माने अच्छा, नीला माने बुरा। एक आँख पर लाल शीशा चढ़ा रखा है, दूसरे पर नीला, और जाँच किसको रहे हैं? वस्तु को। और वस्तु को जाँच भर नहीं रहे हैं, सत्य को भी वस्तु ही मान लिया है, तो वो भी जाँच का विषय बन गया।

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