आप उपनिषदों को खोलेंगे, आप शास्त्रों को खोलेंगे, उनमें 'बीइंग इन द मूमेंट' जैसी कोई बात नहीं है। ये 'बीइंग इन द मूमेंट' कंज़म्प्शन (उपभोग) को बढ़ावा देता है। इसीलिए एक इंडस्ट्रियल एज (औद्योगिक युग) में ये बहुत प्रचलित मुहावरा है— ‘खा रहे हो तो खाओ न, क्यों विचार करते हो कि क्या आगे होगा, क्या पीछे होगा?’ भले ही उधार लेकर खाना पड़े।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: सर जैसे मैं और मेरी वाइफ (पत्नी) हैं, अगर मैं मेडिटेेशन (ध्यान) की भाषा में उन्हें डिस्क्राइब (वर्णन) करूँ तो शी इज़ अ काइंड ऑफ पर्सन हू लिव्स इन द मूमेंट (वह एक ऐसी इंसान हैं जो वर्तमान में जीती हैं)। मतलब वो हर एक पल से पूरी तरह जुड़ी होती हैं। शी इन्जॉय एव्रीथिंग, द वैदर, फूड, सन, प्लान्ट्स, एव्रीथिंग, विदआउट नोइंग एनीथिंग अबाउट स्पिरिचुएलिटी (वह आध्यात्मिकता के बारे में कुछ भी जाने बिना, हर चीज़ का आनंद लेती है, मौसम, भोजन, सूरज, पौधे, सबकुछ।)
लेकिन फिर उनमें इमोशन्स (भावनाओं) के वेरीएशन्स (विविधता) भी बहुत हैं। बहुत ज़्यादा खुश हो जाती हैं, कभी बहुत ज़्यादा दुखी भी हो जाती हैं। मुझमें उतने वैरीएशन्स नहीं हैं। आइ एम ट्राइंग टू अंडर्स्टेंड स्पिरिचुएलिटी (मैं अध्यात्म समझने की कोशिश कर रहा हूँ)। बहुत खुशी के पल में भी आइ डोंट फील वेरी हैप्पी (बहुत ज़्यादा खुश नहीं होता), बहुत दुख के मूमेंट में आइ डोंट फील वेरी सैड (बहुत ज़्यादा दुखी नहीं होता)। तो मुझे समझ नहीं आता कि ऐसा क्यों है?
आचार्य प्रशांत: इसका क्या अर्थ है लिविंग इन द प्रेज़ेंट मूमेंट




