पर एक साधारण सी बात है कि दूसरों की गंदगी बताने से पहले अपनी गंदगी तो साफ करूँ और मेरी गंदगी साफ होगी। उसके बाद कोई आकर के मुझसे बात करना चाहेगा उसके घर की गंदगी के बारे में। तो मैं प्रस्तुत हूँ। भई आखिरकार तो आप इंसान हो और हर इंसान से आपका सरोकार है। बात पंथ, मज़हब, संप्रदाय की तो नहीं होती है। कोई भी आकर आपसे बात करेगा और वो साफ होना चाहता है। बेहतर होना चाहता है तो आप बिल्कुल खुलकर बात करोगे। उसमें कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन सबसे पहले तो आप अपनी बात करोगे ना। अपना भीतर झाँक कर देखोगे।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मैं ताहिर और मेरा भी यही एक प्रश्न था आपसे कि हर रिलीजन में शुद्धिकरण हुआ है। जैसे हिंदूइज़्म में हुआ है। बुद्ध के टाइम पर फिर महावीर लॉर्ड महावीर उसके बाद गुरु नानक फिर राजा राममोहन रॉय, गांधी जी ऐसे क्रिश्चियनिटी में मार्टिन लूथर किंग जर्मनी में और इस्लाम में ऐसा कुछ हुआ नहीं है। तो मैंने उसके ऊपर थोड़ा रिसर्च किया और पढ़ना स्टार्ट किया तो उसमें पता चला कि ये इसलिए हुआ क्योंकि क्रिश्चियनिटी मोस्टली क्योंकि सेंट्रलाइज्ड रिलजन थी। उधर चर्च था तो उसको रिवॉल्व करना इजी था।
इस्लाम सब जगह फैला हुआ है और दूसरे हर धर्म शिया में सेक्ट्स है, सुन्नी में सेक्ट्स है, काफी है। उसमें बदलाव लाना बहुत डिफिकल्ट है। सोफिज्म ने ट्राई किया वो मगर उतना बदलाव लाया नहीं। और आज के जब आपने बात की कि वो दुख का साइकिल चलता रहता है। लिबरलिज्म फिर बाद में लोक धर्म। तो मेरा प्रश्न है कि फिर उससे बाहर निकलने के लिए खुद अपना ही




