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हमारे जीवन के युद्ध और कृष्ण की समीपता || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: श्रीकृष्ण की निकटता सीखनी है अर्जुन से; अर्जुन के भीतर का कोहरा उधार नहीं ले लेना है। और हमारी हालत ज़बरदस्त है, हमारे पास वो सब कुछ है जो अर्जुन के पास है, बस एक चीज़ नहीं है। हम हर मायने में अर्जुन हैं, अर्जुन का पूरा नर्क हमारे पास है; बस अर्जुन की एक चीज़ नहीं है हमारे पास, क्या? कृष्ण। क्या खूब हैं हम! जो कुछ भी अर्जुन का ऐसा है कि त्याज्य है, भ्रमित है, वो हममें और अर्जुन में साझा है। बस एक चीज़ है जो अर्जुन को बचा लेती है, उसका कहीं अता-पता नहीं हमारे जीवन में — कृष्ण।

जो कुछ अर्जुन के अंतस में है, वो आपकी विवशता है; विवशता समझी जा सकती है क्योंकि उसको हम गर्भ से ले कर पैदा होते हैं। ये अर्जुन के मन में जो कोहरा छाया हुआ है, वो अर्जुन भर का नहीं है; वो मनुष्य मात्र का है, वो सबका है और वो सब हमलोग ले कर पैदा होते हैं। तो उसकी क्षमा है, हम विवश हैं, हम क्या करें। कृष्ण विवशता नहीं होते, कृष्ण चुनाव होते हैं। कृष्ण मजबूरी नहीं होते, कृष्ण आपकी स्वतंत्रता के प्रतीक हैं। आपके पास ये विकल्प था, स्वतंत्र निर्णय करने का अवसर था कि आप कृष्ण को अपना बना लें, कृष्ण की निकटता को चुन लें। आपने चुना या नहीं चुना ये आप जानिए।

अर्जुन जैसे आप हैं, ये बात तो स्पष्ट है, सर्वमान्य है, निर्विवाद है। एक तरह से आप निर्विकल्प हैं अर्जुन होने में। सब अर्जुन पैदा हुए हैं। हाँ, किसी अर्जुन का नाम अर्जुन है, किसी अर्जुन का कोई और नाम हो सकता है; सब अर्जुन हैं। अर्जुन पैदा होने के बाद आपको तय करना होता है कि कृष्ण का सामीप्य चाहिए या नहीं; वो आपको चुनना होता है। जिन्होंने चुन लिया उनके लिए पूरी गीता है, जिन्होंने नहीं चुना उनके लिए बस पहला अध्याय; उनकी गीता पहले अध्याय पर शुरू होकर ख़त्म हो जाती है। उनकी गीता एक बंद कमरा है जहाँ बस उनके अपने अश्रुरंजित प्रलाप की गूँज भर है, कोई उत्तर नहीं आता।

कृष्ण साथ हों तब तो आपकी दलीलों का, आपके वक्तव्यों का, कोई उत्तर आएगा न। जिनके पास कृष्ण नहीं हैं, उनके पास बस अपनी हस्ती है, और अपनी हस्ती एक बंद कमरे जैसी होती है। गूँजता हुआ बंद कमरा — जहाँ आप जैसे हैं, आपको चारों दिशाओं से उसी की अनुगूँज सुनाई देती है, बस! आप अपना सत्य स्वयं बन जाते हैं, क्योंकि आपसे जो अलग हैं वो आपके उस बंद कमरे में हैं ही नहीं न। तो आम-आदमी की गीता में कितने अध्याय? बस पहला। क्योंकि दूसरे से तो कृष्ण आ जाते हैं, कृष्ण तो हैं ही नहीं हमारे पास। हाँ, अर्जुन हम सब हैं। तो पहले अध्याय में जो कलपना, रोना-पीटना चल रहा है वो हम सब के पास है।

इस वीभत्स स्थिति का थोड़ा चिंतन करिए, ज़रा कल्पना, ज़रा संज्ञान लीजिए। हमारी व्यक्तिगत गीता शुरू होती है हमारे छाती पीटने से और समाप्त हो जाती है हमारे छाती पीटने पर। दुःख में आरंभ, दुःख में अंत; दुःख के बंद वर्तुल से बाहर कहीं कोई सत्य नहीं हमारे लिए। हमारे ही अस्तित्व की चार दीवारें, जैसे हमारा एक मात्र सत्य। हमारे ही व्यक्तिगत विचारों की अनुगूँज, जैसे हमारे सारे संवाद।

कैसी प्रगति, कैसा ज्ञान, और कैसी मुक्ति! ये है आम मनुष्य का जीवन, एक अध्यायी। कृष्ण निकट हों तो बाकि सत्रह खुलें। कैसे खुलेंगे बाकी सत्रह, बोलो तो? सबके जीवन में मचा हुआ है कोलाहल, जमा हुआ है कुरुक्षेत्र। ठीक? सबके पास अपने-अपने युद्ध हैं और अपने-अपने तर्क हैं। अपनी-अपनी जटिलताएँ, अपने-अपने बंधन हैं, और उन बंधनों में बने रहने को जायज़ ठहराते अपने-अपने तर्क। कौन आकर आपको बताए कि आपके सारे तर्क झूठे हैं? कौन आकर आपको बताए कि आपके सब कर्मों के आधार उथले हैं? कौन आकर आपको बताए कि जीवन की इमारत आपने जिस नींव पर खड़ी करी है, कोई गहराई नहीं उसमें?

बड़ी सांकेतिक है ये बात कि श्रीमद्भगवद्गीता में संजय बोल लेते हैं, धृतराष्ट्र बोल लेते हैं, दुर्योधन बोल लेते हैं, अर्जुन खूब बोल लेते हैं, तब श्री कृष्ण की बारी आती है। हमारे जीवन में भी ये सब मौजूद हैं और ये ही बोले जा रहे हैं, बोले जा रहे हैं और ये इतना बोले जा रहे हैं, इतना बोले जा रहे हैं कि बेचारे कृष्ण की बारी कभी आती ही नहीं। पूरा जीवन बीत जाता है इन्हीं की बोल-बातचीत में; बोले ही जा रहे हैं, बोले ही जा रहे हैं। कितने किरदार! दुर्योधन ने तो नाम गिना दिए, उधर इतने खड़े हैं, इधर इतने खड़े हैं; नाम गिना रहे हैं। और हर किरदार अपने-आपमें एक उपन्यास है, एक महाकाव्य है सबका जीवन।

मैं छोटा था, तो घर में महाभारत पर आधारित उपन्यासों की एक श्रृंखला होती थी, राम कुमार भ्रमर द्वारा रचित। अभी कुछ दिनों पहले मैंने देखा तो मेरे संग्रहालय में उसमें से एक मिल गया। उन सबकी विशेषता ये थी कि उन सबके नाम 'अ' से आरम्भ होते थे। तो कर्ण पर जो आधारित था उसका नाम था अधिकार, वो अभी भी मेरे पास मेरे कमरे में रखा है। एक-एक पात्र का जीवन अपने-आपमें एक महागाथा है। उससे पार कैसे पाओगे? तुम्हें कितने साल जीना है? इतने सारे नाम और सब नाम अपने पीछे एक पूरी महागाथा रखे हुए हैं। हर नाम अपने-आप में एक संसार है, तुम कैसे उसके पार निकल जाओगे? तुम्हारे पास साठ-अस्सी साल हैं कुल। साठ-अस्सी साल अपनी गाथा से पार पाने के लिए पूरे नहीं पड़ते, यहाँ तो इतनी सारी गाथाएँ हैं। कृष्ण प्रतीक्षा करते रह जाते हैं — ये गाथाएँ कब समाप्त होंगी? मेरा नंबर कब आएगा?

अर्जुन सौभाग्यशाली हैं कि कृष्ण से एक बड़ी भौतिक निकटता थी — सूक्ष्म नहीं, पारमार्थिक नहीं — भौतिक। सामने खड़े हैं कृष्ण, बस इसी बात ने बचा लिया कि सामने खड़े हैं। हमें गीता में ऐसा पढ़ने को नहीं मिलता पर अगर आपके पास ज़रा भी रसपूर्ण मन है, यदि थोड़े भी कवि-हृदय हैं आप, तो आप देख पा रहे होंगे कि कैसे कृष्ण की आँखें भी बात कर रही होंगी, और वो बातें श्लोकों में लिखित नहीं हैं। कुछ कह रहे हैं अर्जुन, और अर्जुन की बदमाशी को समझ कर के कृष्ण के होंठ ज़रा से कँपे और आँखें उनकी मुसकुरा दीं। ये बात किसी श्लोक में वर्णित नहीं है पर कृष्ण के अधर यदि काँपे ना होते, कृष्ण के नयन यदि मुस्कुराए नहीं होते, तो अर्जुन को वो बात समझ में भी नहीं आयी होती जो गीता में समझ में आ गयी है।

इसलिए मैं कह रहा हूँ कि भौतिक निकटता बहुत ज़रूरी है। अन्यथा श्लोक तो किसी पुस्तक में भी लिखे जा सकते थे। सही बात तो ये है कि गीता उपनिषदों का अमृत भर है, कोई नया सिद्धांत नहीं प्रतिपादित है गीता में। कृष्ण अर्जुन को ये भी कह सकते थे कि, ‘चलो, ऐसा करते हैं कि छान्दोग्य उपनिषद् का पाठ कर लेते हैं। और, कर लेते हैं माने क्या! दोनों को थोड़े ही करना है। मैं तो कृष्ण हूँ, मैं क्या करूँगा, तुम कर लो। मैं तुम्हें एक सूची दिए देता हूँ उपनिषदों की, शाम तक पढ़ कर आ जाना।‘ और प्रायः सभी उपनिषद् गीता पूर्व हैं। कुछ हैं उपनिषद् बाद के भी, जो ज़्यादा हालिया हैं, वरना तो प्रमुख उपनिषद् अधिकांशतः पहले के हैं। तो कह सकते हैं कि ‘कठ, केन, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, प्रश्नोपनिषद…जाओ अर्जुन, पढ़ कर के आ जाओ।‘ बात बनती ही नहीं।

सम्भावना तो ये है कि अर्जुन ने उन उपनिषदों का पठन पहले ही कर रखा है। राजपुत्र थे, उनकी शिक्षा-दीक्षा में तो कोई कमी रखी नहीं गयी थी। अर्जुन ने ही नहीं कर रखा, दुर्योधन ने भी कर रखा है। अब ऐसे में वो अर्जुन को बोलते कि ‘जाओ, पाठ कर के आओ’, क्या लाभ होता? कृष्ण को स्वयं एक उपनिषद् बनना पड़ा, यही बात बचा ले गई अर्जुन को। नहीं तो हमारे ही जीवन में जो 'हम' मौजूद हैं और जो 'हमारे' मौजूद हैं, उनकी महागाथाएँ हमको कभी मौका नहीं देने वालीं कि हम कृष्ण की बारी आने दें, कृष्ण की बारी कभी आएगी नहीं। अर्जुन के भी जीवन में किनकी बारी आयी हुई है? ‘अरे! वो भाई खड़ा है, वो गुरु खड़े हैं, वो मातुल खड़े हैं, जीजा भी हैं मेरे, जयद्रथ बहनोई लगता है।‘ इन सब के चक्करों के बाद कृष्ण की बारी आने की कोई सम्भावना? आपके जीवन में भी ये सब मौजूद हैं, ये कृष्ण की बारी कभी नहीं आने देंगे।

अर्जुन सौभाग्यशाली हैं कि कृष्ण सामने खड़े हैं, कृष्ण की बारी आयी नहीं, कृष्ण ने झपट ली अपनी बारी। नहीं तो अर्जुन ने तो निर्णय कर लिया था, धनुष नीचे रख दिया था, ‘मैं नहीं लड़ रहा’ और कृष्ण से अनुमति नहीं माँग रहे थे; कृष्ण को अपना ना लड़ने का निर्णय घोषित कर रहे थे, सुना रहे थे, ‘मैं नहीं लड़ रहा, मैंने रख दी अब’। कृष्ण ने तो एक प्रकार का विद्रोह करा है, कृष्ण ने तो हारी हुई बाज़ी पलट दी है, नहीं तो अर्जुन ने तो बाज़ी का निर्णय कर ही दिया था अपनी तरफ़ से।

हम सब अपनी बाज़ी का निर्णय कर चुके हैं अपनी तरफ़ से, और हम स्वयं अपनी बाज़ी नहीं पलट पाएँगे, समझिए इस बात को। हम सब को कृष्ण चाहिए जीवन में और ठीक अपने सामने चाहिए। ठीक उतने सामने चाहिए जितना सामने सारथी होता है रथी के। रथी और सारथी में कितनी दूरी होती है? बस उतनी ही दूरी पर कृष्ण आपको चाहिए, और नहीं हैं तो बाज़ी का फ़ैसला अग्रिम रूप से हो चुका है।

सिद्धांत की बात ये है कि मनुष्य मुक्ति के लिए पैदा होता है, व्यवहार की बात तो ये है कि मुक्ति पाते तो किसी को देखा गया नहीं। सिद्धांत आपको बोलता है कि मनुष्य योनि आपको मिली है ताकि आप मुक्ति प्राप्त कर सकें, व्यवहार की बात ये है कि लाखों-करोड़ों में कोई एक होता है जो मुक्ति पाता है। मनुष्य जन्म तो दासता के लिए, जीवन भर बंधन उठाने के लिए मिलता है। अर्जुन एक विरल उदाहरण हैं एक विशिष्ट अपवाद का और इसीलिए वो हमारे काम के हैं; क्योंकि हम सबको उसी अपवाद बनने की लालसा है, उसी अपवाद की तलाश है हम सब को।

पैदा तो हुए हैं बंधनग्रस्त रहने के लिए, क्या मुक्ति मिल सकती है? आरम्भ में अर्जुन बिलकुल हमारे जैसे हैं। फिर ऐसा क्या हो जाता है कि अर्जुन की भाग्यरेखा बिलकुल अलग दिशा में मुड़ जाती है, हमसे बिलकुल भिन्न किसी ओर निकल जाते हैं अर्जुन? ऐसा क्या होता है? ऐसा जो भी होता है अर्जुन के करे नहीं होता है, ऐसा जो भी होता है कृष्ण के करे होता है। अर्जुन ने बस एक काम करा है, जब कृष्ण बोल रहे थे तो रथ से कूद कर भाग नहीं गए। अर्जुन को कुल श्रेय बस इस बात का है।

नहीं तो कृष्ण जो बोल रहे हैं वो बात स्वीकार करने की नहीं; ग्रहण करने की नहीं, ग्रहण कर भी लो तो पचने की नहीं। कृष्ण ने जो बातें गीता में कही हैं वो आप एक आम-आदमी से जा कर बोलिए, बस ये मत बताइए कि कृष्ण की बात है, वो आपको पीट-पाट कर बराबर कर देगा। वो तो कृष्ण को परम्परागत रूप से हम पूजते हैं तो इसीलिए किसी प्रकार आम-आदमी गीता को बर्दाश्त कर लेता है। नहीं तो सच्चाई तो ये है कि हमारा आम जीवन गीता के ज्ञान के बिलकुल विपरीत चलता है।

ऐसे में यदि कोई आपको बताए कि ‘तुम ये-ये चीज़ें ग़लत कर रहे हो’, बस ये ना बताए कि ‘ये जो मैं तुम्हें बता रहा हूँ ये बात गीता से आ रही है’, तो आप उस व्यक्ति का पुरज़ोर विरोध करेंगे। हाँ, यही वो बोल दे कि ‘मैं गीता का ज्ञान दे रहा हूँ’, तो आप नैतिकता के मारे और धार्मिकता के मारे विरोध नहीं कर पाते। खुले तौर पर विरोध नहीं कर पाते, भीतर-ही-भीतर तो विरोध रहता ही है। विरोध ना रहता तो इतनी गीताएँ आईं और गईं, हमारा जीवन वैसे ही कैसे चल रहा होता जैसे चल रहा है? हमने खूब विरोध किया है गीताओं का। समझ में आ रही है बात कुछ?

उस क्षण को अनुभव करिए, उस क्षण में पहुँचिए, कृष्ण कुछ ऐसा कह रहे हैं जो बिलकुल अस्वीकार्य है, और यही वो क्षण है जिसने अर्जुन को अमर कर दिया। उस क्षण में अर्जुन कृष्ण से विमुख नहीं हुए। अर्जुन के भीतर से प्रबल आवेग उठ रहा है। ‘कृष्ण तुम मुझे पितृ द्रोही, भातृ द्रोही, कुल द्रोही बनाओगे? तुम मुझसे मेरे ही वंश का नाश कराओगे?’ ये ज्वालामुखी का लावा उठ रहा है भीतर से, आग लग गयी है अर्जुन की काया में, क्योंकि अर्जुन की काया है तो कुरुवंश की काया ही न।

वास्तव में जब काया की बात आती है तो अर्जुन की काया और दुर्योधन की काया में बहुत समानता है, कृष्ण की काया तो ज़रा दूर की है। और काया अपने-आपको बचाने के लिए बड़ी उद्यत रहती है। जानवरों में भी आप देखेंगे तो आमतौर पर कोई भी पशु अपनी ही प्रजाति का शिकार नहीं करता है। काया बड़ा ध्यान रखती है कि ‘जो मेरे जैसे हैं, उनको ना मारुँ’; और कृष्ण कह रहे हैं अर्जुन से कि तुम इन्हीं को मारो। अर्जुन के भीतर से विरोध का, आक्रोश का, ज्वालामुखी फूटा है। और मैं कह रहा हूँ कि अर्जुन ने उस क्षण में जो ना भागने का निर्णय किया है, उसी ने अर्जुन को अमर कर दिया।

धर्म के सकल क्षेत्र में अर्जुन का कुल योगदान यही है कि उस क्षण को झेल गए अर्जुन जिस क्षण रोआँ-रोआँ जल कर, चिल्ला कर, कह रहा था ‘चले जाओ यहाँ से, भाग जाओ यहाँ से, मत सुनो इस व्यक्ति की, ये व्यक्ति ठीक नहीं है। ये तुमसे कुछ ऐसा करा रहा है जो बहुत घातक होगा। इसका क्या जाता है, घर तो तुम्हारा है, वो भाई तुम्हारे हैं, वो गुरु तुम्हारे हैं, वो पितामह तुम्हारे हैं, इसका क्या जाता है!’ और चौंकिएगा नहीं, भीतर जो वृत्ति बैठी है वो पाशविक होती है, तर्क वो ऐसे ही देती है। ऐसे तर्क आपने पहले कभी सुने नहीं क्या? ऐसे तर्क आपने अपने जीवन में नहीं सुने क्या? अपने घर में नहीं सुने क्या?

आपमें और अर्जुन में अंतर बस ये है कि आप इन तर्कों के आगे घुटने टेक देते हैं, अर्जुन खड़े रहे, अर्जुन गिरे नहीं, बस इतना कर दिया। और अध्यात्म आपसे बस कुल इतनी ही माँग भी रखता है कि जब सामने आ जाए वो ख़ास, जब क्षण छा जाए वो ख़ास — बस भाग मत जाना, भाग मत जाना! हम कहते हैं कि हम उस क्षण को आने का मौका ही नहीं देंगे, भागने की नौबत ही नहीं आने देंगे। भागने की नौबत तो तब आए न जब पहले कृष्ण सामने खड़े होकर के हमें ज्ञान दे रहे हों। हम ऐसी स्थिति ही नहीं आने देंगे कि हमारे साथ ये भयंकर दुर्घटना घटे। हम कृष्ण को अपने सामने खड़े होने का मौका ही नहीं देंगे; ना रहेगा बाँस, ना बजेगी बाँसुरी। ना होंगे कृष्ण, ना आएगी गीता। जब गीता आएगी ही नहीं तो भगने-भागने की कोई बात ही नहीं।

पहली बात — अर्जुन हो ही। दूसरी बात — अपने जीवन का सर्वस्व भी आहुति दे कर, यदि कृष्ण के सामने खड़े हो सकते हो तो हो जाओ। तीसरी बात — सिर्फ़ खड़े होना पर्याप्त नहीं है; जब गीता बहनी शुरू होगी तो तुम्हारे भीतर से भी आवाज़ ये उठेगी कि ‘बेटा तुम भी बह लो’; बह मत जाना। जब गीता बरसे तो खड़े रहना, वृत्ति की सुरक्षा-छतरी मत खोल लेना, अपने-आपको भीगने देना। जितना भीगोगे, उतना गलोगे और जितना गलोगे, उतना तरोगे।

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