प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आचार्य जी, मैं शुरू से ही शिक्षकों का बहुत आज्ञाकारी रहा हूँ। उन्हीं शिक्षकों ने हमें सत्यनिष्ठा या ईमानदारी की शिक्षा दी लेकिन मुझे सांसारिक जीवन में कभी उन बातों से लाभ नहीं हुआ।
मैं एक शिक्षक हूँ प्राइमरी (प्राथमिक) में। क्लास (कक्षा) में पीछे बैठने वाले, बैकबेंचर्स, आज मनी लेंडिंग (साहूकारी) या दूसरा छोटा-मोटा बिज़नेस (व्यापार) करके सब अमीर हो चुके हैं। और सांसारिक रूप से, सामाजिक रूप से मुझसे बहुत सफल कहलाते हैं। यहाँ तक कि मेरे माता-पिता भी मानते हैं कि वो सफल हैं और मैं असफल हूँ।
तो कैसे मान लिया जाए कि सत्यनिष्ठा या ईमानदारी या गुरु की शिक्षा मेरे जीवन में काम ही आ रही है? और कैसे उसका मोह छोड़ें? मैं जान रहा हूँ कि वो बहुत रिलेवेंट (प्रासंगिक) नहीं है, फिर भी मोह नहीं छूटता, साथ में ढल गया हूँ उसी में। लेकिन वो बहुत रिलेवेंट (प्रासंगिक) नहीं समझ में आती, सत्यनिष्ठा और ईमानदारी।
आचार्य प्रशांत: देखिए, जो सीख है गुरुओं की और ग्रंथों की, वो एक चीज़ तो यही बताती है मूल में कि तुलना किससे कर रहे हो अपनी। वो सीख अगर हम आत्मसात करें, अगर हमने उस सीख को गहा होता, तो सबसे पहले तो जो तुलना जनित कष्ट होता है कि दूसरा मुझसे आगे निकाल गया, बैकबेंचर्स थे या कम सीजीपीए वाले थे वो आगे निकल गये। फ़लाना काम कर रहे हैं वो, उनके पास ज़्यादा पैसा आ गया। अगर अभी मन में ये बातें चल ही रही हैं तो फिर हमने सत्यनिष्ठा अभी प्रदर्शित कहाँ करी है।
आप कह रहे हैं, सत्य पर चल कर आपको नुक़सान हुआ है। मैं मान रहा हूँ नुक़सान हुआ है पर नुक़सान इस कारण नहीं हुआ है कि आप सत्य पर चले हैं या आपमें सत्य के लिए प्रेम या निष्ठा रही है; वो नुक़सान इसलिए रहा है क्योंकि सत्य के लिए आपमें बहुत-बहुत कम निष्ठा रही है। जो आप नुक़सान बता रहे हैं, वो सत्यनिष्ठा के कारण नहीं, सत्यनिष्ठा की कमी के कारण हुआ है। सत्यनिष्ठा यदि होती है तो ये तुलना वगैरह करने की बात कहाँ से आ जाती है कि पीछे वाले आगे निकल गये! ये क्या है!




