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हृदय से जीना
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: यदि प्राणी हृदय से संचालित है तो वो वास्तव में परम स्रोत से ही संचालित है; पर ये शर्त बड़ी है कि उसे हृदय से संचालित होना चाहिए। जब वह हृदय से संचालित होता है तो इन्द्रियाँ वैसी हो जाती हैं जैसी श्रीकृष्ण भगवद्गीता में कहते हैं, कि, ‘निर्मल इन्द्रिय'। फिर इन्द्रियाँ भी अपने उन विकारों को और सीमाओं को त्याग देती हैं जिनके कारण जीव भ्रम में पड़ा रहता है इंद्रियों पर चलकर के; फिर बाहर भी नाना प्रकार की वस्तुएँ, संसार, माया ये नहीं दिखाई देते, ठीक वही तत्व दिखाई देता है बाहर, जो भीतर बैठकर बाहर को देख रहा है। तो ये सत्य स्थिति है, ये आदर्श स्थिति है: जब द्रष्टा, दृश्य और जो देखने का करण या माध्यम है वो तीनों ही पूर्णतया शुद्ध हैं, और जब पूर्णतया शुद्ध हैं तो एक हैं।

इन बातों की शिष्य के लिए क्या उपयोगिता है? उपयोगिता ढूँढनी है तो पुराने सूत्र पर वापस आइए; यही मत देखिए कि क्या कहा गया है, ये देखिए कि किसको अनुपस्थित कर दिया गया है कहने से, किसकी बात बिलकुल नहीं कही गई है। देखने वाला भी वह, देखने का माध्यम भी वह, और देखा जा रहा दृश्य भी वह; करने वाला भी वह, करने का उपकरण भी वह, और कर्म भी वह- इन बातों में क्या है जो अनुपस्थित है? इनमें हम अनुपस्थित हैं; आप कहीं नहीं हैं।

आप अपने-आपको कर्ता समझते रहे ये आपकी भूल है; ऐसा आपका आभास है या मान्यता है, पर सत्य नहीं है। सत्य में यदि जिएँगे आप, तो आप नहीं जिएँगे, फिर सत्य जिएगा, आप नहीं होंगे; आपको अगर होना है तो आपको असत्य ही होना पड़ेगा। और जब तक आप हैं, अपनी निजी सत्ता लिए हुए और निजी व्यक्तित्व लिए हुए, तो आपके साथ वो सब सीमाएँ और बंधन चलते ही रहेंगे जो आपके दुःख के कारण हैं।

उस परम तत्व के विषय में तो कह दिया, “वह सब ओर मुख, सिर और ग्रीवा वाला है,” अर्थात् वो व्यक्तिगत सीमाओं से बँधा हुआ नहीं है। हमारी सीमाएँ देखिए, हमारी विवशताएँ देखिए; जितनी हमसे गलतियाँ होती हैं, जितने भ्रमों में हम पड़ जाते हैं, वो इसीलिए तो हैं न, कि न पूरा जानते हैं और न पूरा जान सकते हैं? पूर्ण को जानने की सामर्थ्य ही नहीं है मन में; सब कुछ याद नहीं रख सकते, सब कुछ सोच नहीं सकते, विचार का पात्र बहुत छोटा होता है। मजबूर रहते हैं कि आँखें जितना दिखाएँगी, कान जितना सुनेंगे और ज्ञान जितना होगा उसीके अनुसार जीवन चलाना होगा, और निर्णय लेना होगा।

वो है सब ओर सिर-मुख-ग्रीवा वाला; हम नहीं हैं। हम नहीं हैं तो हम एक ओर को मुख रखते हैं। एक ओर जब भी मुख रखेंगे तो अनेकों ओर से विमुख हो जाएँगे, और जिधर भी नहीं देख रहे उधर से तो चूक ही जाएँगे न? फिर ये निर्णय भी कि किधर को मुख रखना है ये आता है मन से; जिसकी बुद्धि भी चौतरफा प्रसार वाली नहीं है, उसकी बुद्धि भी सीमित है, उसी सीमित बुद्धि से वो ये निर्णय करता है कि किधर को देखना है, किसको सुनना है, किस दिशा आगे बढ़ना है। और इतनी फिर विवशताएँ होते हुए जीव तमाम तरह की गलतियाँ करे और दुःख में पड़े तो फिर आश्चर्य क्या? ये हुई माध्यम की बात।

देखने वाला भी हमारा वो नहीं जो हृदय की गुहा में वास करता हो; हम ह्रदय से नहीं देखते। हृदय से देखने का अर्थ जीव के लिए क्या होता है? ह्रदय से देखने का अर्थ होता है कि जीव हृदय को ही देखता रहे; और वहाँ उसे वो सब कुछ दिखाई दे जाएगा जो देखने योग्य है। हृदय कोई माध्यम नहीं है, हृदय ही एकमात्र सच्चा द्रष्टा है; मात्र वही देख सकता है, मन तो क्या ही देखेगा! मन जब अपनी निजी सत्ता को मानकर के स्वयं ही संसार की ओर देखता है तो उसको बाहर ठीक वैसे ही भ्रामक दृश्य दिखाई देते हैं जैसे वो स्वयं भ्रम से निर्मित है। तो सही देख पाने की क्षमता मात्र हृदय में है।

‘हृदय’ सत्य या आत्मा के लिए ही एक शब्द है। मन का काम है वो हृदय की ओर देखता रहे, देखता रहे निकट आता रहे, वो अपनी व्यक्तिगत क्षमता को एक बहुत बड़ी दूसरी क्षमता पर समर्पित कर दे; वो दूसरी क्षमता हृदय के पास है। आप जो अपने-आपको जीव या प्राणी या मनुष्य कहते हैं, आपके पास दो क्षमताएँ होती हैं। एक जो आपकी निजी है ऐसा आपको लगता है, और दूसरी जो आपकी हो जाती है जब आप अपनी निजी और व्यक्तिगत क्षमता को एक तरफ़ रख देते हैं। हम पैदा होते हैं पहली तरह की क्षमता लेकर के या पहले तरह की क्षमता के साथ सम्बंधित होकर के।

जैसे कि आप एक रेलवे प्लेटफार्म पर खड़े हैं और उसी प्लेटफार्म पर एक रेलगाड़ी खड़ी है। सौ मील दूर जाना है आपको; टाँगें हैं आपके पास, गाड़ी छूट रही है। अब दो विकल्प हैं आपके पास। एक तो ये कि टाँगें तो हैं ही, सौ मील दौड़ जाएँगे, यह टाँगों का एक तरह का इस्तेमाल हुआ। और दूसरा ये कि इन्हीं टाँगों से इस तरह दौड़ेंगे कि रेलगाड़ी पर बैठ जाएँगे, ये टाँगों का दूसरी तरह का इस्तेमाल हुआ; रेल पर भी बैठने के लिए टाँगों का इस्तेमाल तो करना ही पड़ेगा, नहीं तो छूट जाएगी।

तो सार्थक उपयोग क्या है उन सब क्षमताओं का, सीमित क्षमताओं का, जो जीव को उपलब्ध हैं उसके जीव होने के कारण ही? उनका सार्थक उपयोग यही है कि उनके द्वारा अपने-आपको किसी बड़ी सत्ता के सुपुर्द कर दिया जाए। ये बात बहुत सावधानी से समझनी होगी।

जो बात कही जा रही उसका अर्थ अकर्मण्यता नहीं है, बात बहुत व्यावहारिक है। सौ मील दूर जाना है आपको, हो सकता है हज़ार मील दूर भी जाना हो; सिर्फ़ उदहारण के लिए आँकड़ा लिया है। जितनी दूर आपको जाना है, जितनी दूर जाने की आपकी गहरी कामना है, उतनी दूर आपको आपकी निजी सामर्थ्य ले नहीं जा पाएगी और उतनी दूर जाए बिना आपका काम भी नहीं चलेगा, क्योंकि कामना तो कामना है; जहाँ चैन मिलना है वो जगह दूर है। तो अब व्यावहारिक बात, उपयोगी बात यही है कि सामर्थ्य का पूरा इस्तेमाल करो और उसको पा लो जिसको पाने से कामना पूरी हो जाएगी। या फिर इसी अकड़ में, दंभ में रहे आओ कि, “हमें किसी की ज़रूरत नहीं, देखो हम थोड़ी-थोड़ी प्रगति कर तो रहे हैं अपने पाँव पर चलते हुए।“

और आप अगर ऐसा कहेंगे तो भी बात गलत नहीं होगी, क्योंकि प्रगति तो हो ही रही है। हज़ार मील भी दूर जाना है यदि, और कोई कहता है कि मैं अपनी टाँगों पर जाऊँगा, तो रोज़-ब-रोज़ थोड़ा-थोड़ा तो वह आगे बढ़ेगा ही। लेकिन जो लोग उतनी लम्बी यात्रा अपने व्यक्तिगत सामर्थ्य से करना चाहते हैं उन्हें शीघ्र ही पता चलता है कि समय सीमित है।

कुछ गणित भी लगा लिया होता; दूरी हज़ार मील की है या सौ मील की है, पर जीने के लिए हज़ार साल तो क्या सौ साल भी उपलब्ध नहीं हैं, कैसे पहुँच जाओगे आप? और रेलगाड़ी से ऐसी क्या दुश्मनी है कि उसकी ओर देखना नही चाहते? ये सवाल बहुत प्रासंगिक हैं, जवाब हमें माँगना चाहिए।

जो लोग कहते हैं, “स्वयं कर लेंगे; हमारे पुरुषार्थ से, हमारे कर्तृत्व से, हमारी करनी से होगा।“ उनसे ये पूछना पड़ेगा कि, “ये तुम्हारे पुरुषार्थ का हिस्सा क्यों नहीं हो सकता कि तुमने टाँगों का उपयोग करके रेल पकड़ ली? तुम्हें ऐसी क्या समस्या है रेल से कि तुम उसकी ओर देखना भी नहीं चाहते?”

तुम कहोगे कि, “नहीं साहब, हम तो खुद चलकर पहुँचेंगे।“

“ठीक है, ये तो तुमने अपना निर्णय बताया कि तुम खुद चलकर पहुँचोगे। हम तुम्हारे निर्णय का आधार जानना चाहते हैं, रेल से समस्या क्या है? रेल ने तुमको मारा है, पीटा है; रेल तुम्हें लूट रही है; रेल में बैठने की कोई बहुत बड़ी कीमत अदा करनी पड़ती है; समस्या क्या है? सहारा क्यों नहीं लेना चाहते रेल का?”

जवाब नहीं आएगा, जवाब आएगा भी तो कुछ यूँ ही अनिश्चित-सा।

जवाब जानते हैं क्या है? जवाब है अहंकार: “मैं नहीं झुकूँगा।“ “मैं नही झुकूँगा, भले ही न झुकने के कारण मैं जीवन में वो पाने से वंचित रह जाऊँ जिसको पाने में ही जीवन का सार है। रेल ने मेरा कुछ बिगाड़ा नहीं है, पर रेल में बैठ गया तो फिर ये दावा कैसे कर पाऊँगा कि मैंने खुद किया? रेल का सहारा ले लिया तो फिर ये दंभ कहाँ बचेगा कि अपने पैरों चलकर पहुँचा?” बस यही दुश्मनी है रेल से।

“रेल में अगर बैठ गया तो फिर छाती बजा-बजाकर के अपने गौरव के गीत कैसे गाऊँगा? फिर कैसे सबको सुनाऊँगा कि देखो मैं कितना महान और कैसा पुरुषार्थी हूँ?” तो बस ये समस्या है जिसके कारण हम, जो जीवन में सहज रूप से उपलब्ध होता है, उससे भी किनारा कर लेते हैं, और जो बहुत मुश्किल रास्ता होता है—मुश्किल, अव्यावहारिक और मूर्खतापूर्ण, उस पर चलने लग जाते हैं।

मेरे कहने का आशय यह बिलकुल भी नहीं है कि रेल का रास्ता, सत्य का या ब्रह्म का रास्ता बहुत ही आसान है; नहीं, इतना आसान भी नहीं है। ये रेल भी आसानी से पकड़ में आती नहीं है। अपने पाँवों से चलकर तुम रेल ही पकड़ लो यही बहुत, बहुत बड़ी बात होती है, इसमें ही बहुत साधना लग जाती है।

तो दृश्य कुछ ऐसा मत कल्पित कर लीजिएगा भीतर, कि- दो तरह के लोग होते हैं, एक वो जो आलस्य भरा हुआ सरल और सस्ता रास्ता ले लेते हैं, कि चलो रेल में बैठ गए। और दूसरे वो जो मेहनती होते हैं, श्रमशील होते हैं, अपने पाँव से यात्रा करना चाहते हैं। और वक्ता कह रहे हैं कि, “नहीं, जो लोग मेहनती और श्रमशील होते हैं उनका तरीका कुछ ठीक नहीं है; ज़्यादा अच्छा तरीका आलसी लोगों का है, जो सरल, सस्ता रास्ता ले लेते हैं।“ - नहीं, ऐसी चीज़ मत कल्पित कर लीजिएगा।

रेल भी पकड़ने के लिए जी-तोड़ साधना करनी पड़ती है। रेल ही पकड़ पाना, समझ लो कि शिखर है आदमी की क्षमता का; जो आपकी क्षमता है उसको ही जब आप अधिकतम उपयोग में लाओगे तब ये होगा कि रेल पकड़ पाओगे। तो रेल में बैठ जाना प्रमादियों और काहिलों का काम नहीं है, कि मोटे हो गए थे, या आलसी बहुत थे तो कहा कि, “अपने पाँव कौन चले, चलो रेल पर बैठ जाते हैं;” ऐसा मत सोच लीजिएगा।

तो वास्तव में दो तरह के लोग हैं फिर: एक वो जो साधक हैं, मेहनती हैं, उनकी मेहनत जब रंग लाती है तो वो पाते हैं कि रेल पकड़ ली। और दूसरे वे जो विक्षिप्त हैं, जो कहते हैं कि, “हज़ार मील हम पैदल चलकर जाएँगे, भले ही रेल उपलब्ध हो।“ क्यों पैदल चल कर जाएँगे? “ताकि हम पूरी दुनिया में ढिंढोरा पीट सकें कि हम ही तो भगवान हैं; देखो हम किसी पर आश्रित नहीं हुए, हमने किसी का सहारा नहीं लिया, हमने तो खुद करके दिखाया है।“

जब तुम किसी का सहारा नहीं ले रहे हो तो फिर अपने पाँव का भी सहारा क्यों ले रहे हो? पाँव भी कहाँ तुम्हारे हैं, तुमने अर्जित किए हैं क्या? जब तुम किसी का सहारा नहीं ले रहे तो मंज़िल का सहारा भी क्यों माँग रहे हो? किसी मंज़िल तक पहुँचना भी किसी मंज़िल का सहारा माँगने जैसा ही तो है न? तुम कहते हो, “मंज़िल पर कुछ है, वहाँ पहुँचकर कुछ पा लूँ तो चैन मिले।“ मंज़िल पर जो चीज़ रखी हुई है, एक तरीके से उसका सहारा ही तो माँग रहे हो, कि पहुँच जाऊँगा तो पा लूँगा तो कुछ आराम मिलेगा।

तुम इतने ही भगवान हो कि जो ताकत तुम्हें मुफ़्त, निःशुल्क सहारा और समर्थन देने को तैयार है तुम उससे भी कन्नी काटते फिरते हो, मुँह चुराए फिरते हो, उसका हाथ थामने में अपमान का अनुभव करते हो, तो फिर तुम अपने पाँव भी मत चलो। क्योंकि अगर भगवान ही हो तुम, तो भगवान को कहीं पहुँचने की आवश्यकता होती नहीं न, वह तो अपने-आप में ही पूर्ण और संतुष्ट है; तुम कहीं को भी जा ही क्यों रहे हो? पर ये जो अंतर्विरोध है भीतर, ये जो परस्पर संघर्षरत मान्यताएँ खड़ी कर रखीं हैं भीतर, इनको हम ठहरकर के शांति से देखते समझते कहाँ हैं, दंभ ये सब करने नहीं देता।

तो जब ये चुनाव करना हो कि मन होना है या हृदय होना है, तो याद रखना कि मन होने में खूब अहंकार है, पर ह्रदय होने में ही जीवन का सार है; ये चुनाव सबको करना होता है, प्रतिदिन करना होता है।

दोनों ही पक्षों के समर्थन में आपको खूब तर्क मिल जाएँगे; कम-से-कम मन होने के पक्ष में तो तर्कों की कोई कमी नहीं। तर्कों पर मत चलिएगा, एक मूल सवाल पूछिएगा, “मैं ऐसा क्यों होना चाहता हूँ? मुझे ऐसा क्यों बने रहना है?” कुछ बने रहने की आपकी आदत है, आदत के कारण वैसा ही आगे भी बने रहने में सुविधा होने लग जाती है; लेकिन सुविधा छोटी चीज़ है, सफलता उससे कहीं ज़्यादा बड़ी चीज़ है। अपने-आपसे पूछना पड़ेगा, “एक असफल लेकिन सुविधापूर्ण जीवन चाहिए मुझे, या दुविधापूर्ण, द्वंदपूर्ण पर सफल जीवन चाहिए?”

आपको हैरत हो रही होगी कि मैंने दुविधा और द्वन्द को सफलता की तरफ़ क्यों रखा; क्योंकि जो लोग सुविधा और आदत के कायल हो गए होते हैं, आप अक्सर पाएँगे कि उनके भीतर दुविधा और द्वन्द भी उठने बंद हो जाते हैं, वे यंत्रवत हो जाते हैं। उन्हें कुछ ग़लत, कुछ बुरा, कुछ कष्टप्रद लगता ही नहीं है अपने गलत ढर्रों पर चलते हुए भी, बस सफलता नहीं मिलती; सुविधा खूब रहती है, कष्ट कुछ नहीं होता।

जैसे यहाँ कोर्ट (मैदान) में लोग बैडमिन्टन खेलते हैं। किसी के खेलने की तकनीक ही गलत हो गई हो; वो बचपन से ही रैकेट ही गलत तरीके से पकड़ता था, या बैकहैंड कैसे खेलना है ये खेलने की तकनीक ही बचपन से गलत सीख ली हो। तो अभी जब वो कोर्ट पर उतरेगा तो ऐसा थोड़े ही है कि उसको कोई दर्द हो जाएगा, कोई तकलीफ़ हो जाएगी; वो जैसे बचपन से खेलता आया है वो अभी भी खेलेगा। आप उसको बैकहैंड पर सटल देंगे, जैसे उसको मारने की आदत है वो वैसे ही मारेगा। खेल लेगा वो, खेलने में कोई तकलीफ़ नहीं है, बस सफलता नहीं मिलेगी। अंक दूसरे पाले के बनते रहेंगे, प्रतिद्वंद्वी आपका आपसे जीतता रहेगा; आप अपने हिसाब से खेलते रहेंगे और हारते रहेंगे, खेलते रहेंगे और हारते रहेंगे। हाँ, खेलने में आपको पूरी सुविधा है। जैसी आपकी आदत है, रैकेट पकड़ने की, चलाने की, कदम रखने की, आप उसी के अनुसार खेलते जाएँगे और हारते जाएँगे, खेलते जाएँगे और हारते जाएँगे।

अब यहाँ से दो रास्ते हैं: या तो ये जो निर्द्वंद सुविधा है इसी को पकड़े रहो, मूल बात पर ध्यान ही मत दो, अपने आप को समझा लो कि, “शायद अभ्यास की कमी है, मैं जैसा खेलता हूँ मैं ऐसा ही खेलने का और बेहतर अभ्यास करूँगा तो सफल होने लग जाऊँगा।" कुछ हद तक आपकी बात सही भी है। गलत खेल के साथ, गलत तकनीक के साथ भी अगर अभ्यास और कर लेंगे, तो खेल थोड़ा तो सुधर ही जाएगा; लेकिन बस थोड़ा ही सुधरेगा, ऊँचाईयाँ नहीं छू पाएगा।

और दूसरा रास्ता ये है कि आप कहें कि, “खेल ही गलत है; मैं जैसे झुकता हूँ, मेरा झुकना ही गलत है। मैं जहाँ खड़ा होता हूँ, मेरा खड़ा होना ही गलत है। जिस टाँग पर वज़न डालना चाहिए उस टाँग के बजाए मैं दूसरी टाँग पर वज़न डालता हूँ। मेरी तो रैकेट की ग्रिप की पकड़ ही गलत है। मैं कहाँ से सफल हो जाऊँगा!” जैसे ही आपने ये कह दिया, आपने अपने लिए बड़ी समस्या खड़ी कर ली; क्योंकि अब आपको ऐसे शुरुआत करनी पड़ेगी जैसे आप दो साल के बच्चे हों और पहली बार आपके पिता ने आपके हाथ में रैकेट थमा दिया हो।

दो-तीन साल के बच्चे के लिए तो फिर भी आसान होता है, कि पहली बार रैकेट मिला है, और उसके हाथ कोमल हैं, उसकी माँसपेशियाँ मुलायम हैं, उसकी आदत नहीं पड़ी है; वो नया-नया थाम रहा है, उसे जैसे सिखाओगे सीख सकता है। आप दो साल के नहीं हैं, आप बाईस के हैं, आप बत्तीस के हैं; आपके अस्तित्व में अब अकड़ आ चुकी है, आप स्टिफ़ (कठोर) हो चुके हैं। ये अकड़ जानते हो न क्या होता है? आदत को ही अकड़ बोलते हैं; आपके अस्तित्व ने एक तरह के ढर्रे पकड़ लिए हैं, उसी पकड़ को अकड़ कहते हैं।

तो आपका काम अब उस दो-तीन साल के बच्चे से कहीं ज़्यादा मुश्किल है। अब आपको जब कहा जाएगा, “सब कुछ बदलना है अपने खेल में,” आप परेशान हो जाएँगे, और आप खेलने उतरेंगे जब कोर्ट पर तो आप पाएँगे कि न इधर के रहे न उधर के रहे। पुरानी आदत आपसे कहेगी पुराने तरीकों से ही खेलो, और जो नई सीख मिली है वो आपको किसी और दिशा भेजेगी; आप इन दोनों के बीच फँस जाएँगे, बड़े परेशान हो जाएँगे, जितने पॉइंट (अंक) आप पहले बना लेते थे अब उतने भी नही बनेंगे।

आप कहेंगे, “अच्छा फँसे, हमसे कहा गया कि इस तरीके के बदलाव लाओगे, सुधार लाओगे तो सफलता मिलने लगेगी, सफलता कहाँ मिल रही है? पहले जो थोड़ी बहुत सफलता मिलती भी थी, अब वो भी नहीं है।“

तो जो इस पूरी यात्रा से, इस असफलता-पूर्ण अन्तराल से होकर गुज़रने को तैयार हों, सिर्फ़ उन्हीं को जीवन में किसी तरह की प्रगति उपलब्ध हो सकती है। बाकियों का तो यही है, कि उल्टा-पुल्टा जैसा भी जीवन का सूत्र पकड़ लिया, अब उसी पर चले जा रहे हैं, चले जा रहे हैं, और उसी को सही साबित करने की ऊटपटांग कोशिशें भी करते जा रहे हैं।

और बीच-बीच में थोड़ी बहुत सफलता भी मिल ही जाती है; कोई मिल गया अपने से भी ज़्यादा अनाड़ी खिलाड़ी, तो उसको बिलकुल ध्वस्त कर दिया, और अपने-आपको समझा लिया कि, “देखो हम इतने भी गए-बीते नहीं हैं, आज ये मिला था, एकदम हरा दिया उसको।“ जिसको हरा दिया कौन है वो, किस पर हावी होकर के इतने प्रसन्न हो रहे हो?

तो जब भी ये चुनाव करना हो कि मन या ह्रदय, तो ज़्यादा आकर्षक तो यही लगेगा कि, “जैसे चलते आ रहे थे वैसे ही चलते रहें। हाँ, थोड़े बहुत सुधार का कोई तरीका बता दें; थोड़े बहुत सुधार की कोई विधि बता दें।“ जो दूसरा विकल्प है वो मुश्किल पड़ेगा; आदत का खेल। पर जिसने वो दूसरा विकल्प चुन लिया, वो पाता है कि तुम जिसको नहीं चुन रहे, तुम जिसको अस्वीकार कर रहे हो, तुमने उसको न चुनकर के उसका सबसे बड़ा हित कर दिया है।

मन और हृदय का विकल्प जब सामने हो, और इस विकल्प में तुम हृदय को चुन लो, तो हृदय को चुनकर के तुमने हृदय पर तो कोई उपकार नहीं किया; हृदय किसी का उपकार माँग भी नहीं रहा, तुमने मन पर बड़ी कृपा ज़रूर करदी है। ये बात थोड़ी-सी जटिल लगेगी।

मन के साथ आप बड़ी-से-बड़ी हिंसा और अन्याय यही कर सकते हैं कि आप बार-बार उसका समर्थन करते चलें; और मन के साथ आप बड़े-से-बड़ा उपकार और करुणा का काम यही कर सकते हैं कि आप मन को हृदय के सामने बिलकुल कोई वरीयता न दें।

कुछ चीज़ों के, कुछ लोगों के, कुछ विकल्पों के हित में सबसे अच्छा यही होता है कि उन्हें ठुकरा दिया जाए।

परमात्मा अकेला है जिससे जब प्रेम करो तो उसे पाने की इच्छा करो। संसार में अगर किसी से प्रेम हो जाए तो उसके हित में यही है, तुम्हारे प्रेम का सबसे बड़ा प्रदर्शन यही है उस व्यक्ति के प्रति, कि तुम उसको ठुकरा दो।

परमात्मा से प्रेम करो तो कहो कि उसके साथ एक हो जाना है। और संसार में किसी से प्रेम हो जाए तो कहो कि, “चूँकि तुझसे प्रेम है इसीलिए तेरा हित चाहता हूँ। और तेरा हित इसमें है कि मैं तुझे कभी-भी अपनी पहली वरीयता न बना लूँ; परमात्मा के पक्ष में मैं तुम्हें ठुकरा दूँ। जब भी चुनाव करना पड़े, सच में और तुझमें, तो मेरा चुनाव कभी भी तेरे पक्ष में न हो।“ जिसको तुमने इस तरह से ठुकराया, उसी से तुमने प्रेम निभाया; उसी से तुमने फिर धर्म भी निभाया। और जिसको तुमने ये कहकर के अपनाया कि “तुझे प्रेम करता हूँ,” समझ लो तुमने उसका जीवन नर्क बनाया।

तो मन और ह्रदय की तुलना खड़ी है, मन से हमारा तादात्म्य रहता है; चुनाव भी किसको करना है? मन को ही करना है; मन को चुनाव करना है और मन को ही चुनना है कि मन को चुनुँ या हृदय को चुनुँ। मन के लिए बड़ा मुश्किल होगा स्वयं को ठुकराना, हृदय को चुनना। ऐसे में क्या याद रखना है? “मैं मन हूँ, मुझे अपनी भलाई चाहिए न; मेरी भलाई किसमें है? मेरी भलाई हमेशा अपने-आपको ठुकराने में है। मैं अपने-आपको इसलिए नहीं ठुकरा रहा कि कठोर हूँ, क्रूर हूँ, प्रेम नहीं है मुझमें या हिंसा कर रहा हूँ; मैं अपने-आपको इसलिए ठुकरा रहा हूँ क्योंकि प्रेम है खुद से, स्वयं से प्रेम कर रहा हूँ।“ ये वास्तविक प्रेम है, यही वास्तविक सेल्फ-लव (स्व-प्रेम) है।

सेल्फ-लव का अर्थ ये नहीं होता कि तुम अपने-आपको सर पर चढ़ालो बिलकुल। प्रेम का अर्थ ये होता है कि “अपने प्रति और अनुशासित हो जाएँगे; क्योंकि अपनी भलाई चाहते हैं इसीलिए अपने सब दोषों के प्रति सजग, सावधान रहेंगे। हो सकता है कोई बेगाना होता तो उसकी कुछ कमियाँ नज़र-अंदाज़ कर देते; पर अपने दोषों के तो रेशे-रेशे से परिचित रहेंगे, बाल की खाल निकाल लेंगे। ये हो सकता है कि जहाँ हमारा दोष न हो वहाँ भी अपना दोष ढूँढ निकालें, लेकिन ये तो बिलकुल ही होने नहीं देंगे कि जहाँ दोष था वहाँ दोष स्वीकार नहीं किया।“

ये दोनों ही गलतियाँ हैं; एक गलती ये है कि जहाँ दोष नहीं है वहाँ भी लगा कि हमारा ही दोष है, और दूसरी गलती कि जहाँ दोष था वहाँ माना नहीं। जो दूसरी गलती है वो पहली गलती से हज़ार गुना ज़्यादा बड़ी गलती है।

जहाँ ये पहला काम ठीक से हो गया, वहाँ दूसरा और तीसरा काम अपने-आप हो जाता हैं। पहला काम क्या था? हृदय होकर के जीना। दूसरा काम क्या था? चित्त को, मन को, इंद्रियों को निर्मल रखना। तीसरा काम क्या था? समस्त जगत में, सारे संसार में सिर्फ़ एक सत्ता का ही प्रसार देखना; विविधता के फेर में, माया में फँस नहीं जाना।

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