मन जो है न, अहम्, अपूर्ण होता है। वो माँगता है सहारा सचमुच, वो माँगता है जीवन के लिए एक लक्ष्य। शिक्षा की वजह से, विज्ञान की वजह से, ये सब आपको पता चल गया है कि वो जो सहारे थे वो नकली थे, तो उनको तो आपने अस्वीकार कर दिया। उन सहारों की जगह कुछ वास्तविक हम ला नहीं पाए, मन की अपूर्णता को भरने के लिए हमने क्या दे दिया उसको? हमने उसको दे दिया भोगवाद। हमने कह दिया, ‘भीतर से अगर तुम खाली अनुभव कर रहे हो, तो लो भोगो।’ तो पहले एक नकली सहारा था, वो हटा दिया, अब कह दिया कि उसकी जगह तुम भोग से भर लो।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, मेरी उम्र पच्चीस साल की है और आइ फॉल इन कैटेगरी ऑफ़ जेन-ज़ी(मैं जेन-ज़ी की श्रेणी में आती हूँ)। और ऐसा माना जाता है, ऐसा एनालिसिस(विश्लेषण) करके देखा गया है कि हमारी जेनरेशन(पीढ़ी) जेन-ज़ी, जो उन्नीस-सौ-छियानवे से अभी, मतलब ग्यारह साल से अभी छब्बीस साल की उम्र के हैं अभी जो लोग, उन लोगों में ऐसे एनालिसिस करके देखा गया है कि हमारी जेनरेशन हमारी ओल्डर जेनरेशन(पुरानी पीढ़ी) से काफ़ी मेंटली डिस्टर्ब जेनरेशन(मानसिक तौर से परेशान) है।
क्योंकि मैं रियल लाइफ़ में भी अपने दोस्तों को देखती हूँ, मैं खुद को भी देख रही हूँ, हर जगह मैं जिसको देखती हूँ मेरी उम्र की या मेरी आस-पास की उम्र की, सबमें कोई-न-कोई मेंटल डिसऑर्डर(मानसिक विकार) और बहुत सारा सफ़रिंग(कष्ट) है। और ये हमारे पेरेंट्स की जेनरेशन(माँ-बाप की पीढ़ी) में ये शब्द, डिप्रेशन, एंग्जायटी और स्ट्रेस (अवसाद, चिंता और तनाव) इन शब्दों से वो लोग इतना परिचित भी नहीं थे। सर, मेरा प्रश्न है कि व्हाय बिकॉज़ ऑफ़ दिस जेनरेशन गैप वी हैव सम वेरिएशन ऑफ़ मेंटल हेल्थ डिसऑर्डर्स




