(गीता-11) कछुए का अमर सिद्धांत || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2022)

आचार्य प्रशांत: श्रीमद्भगवद्गीता, सांख्ययोग, दूसरा अध्याय, अट्ठावनवाँ श्लोक।
अर्जुन क्या पूछ रहे थे? अर्जुन पूछ रहे थे, स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताइए। और स्थितप्रज्ञ के लक्षण क्यों पूछ रहे थे? क्योंकि आत्मज्ञान की चर्चा करने के बाद और वो चर्चा अर्जुन पर लगभग विफल जाने के बाद श्रीकृष्ण ने बात शुरू करी निष्काम कर्मयोग की। जो पूरा प्रवाह है शुरू से अन्त तक वो याद रखना पड़ेगा, तभी समझ में आएगा कि कौनसा श्लोक किस सन्दर्भ में है।
तो सबसे पहले जो उपदेश दे रहे हैं श्रीकृष्ण अर्जुन को, वो है आत्मज्ञान का, संक्षिप्त तथा गूढ़। उससे लगता है कि कोई विशेष बात बनी नहीं क्योंकि अर्जुन के भ्रम और जिज्ञासा लगभग यथावत् रहते हैं। तो फिर बात करते हैं निष्काम कर्मयोग की। जब निष्काम कर्मयोग की बात करते हैं तो कहते हैं, 'निष्काम कर्मयोगी स्थितप्रज्ञ हो जाता है।' और फिर स्थितप्रज्ञ के बारे में कुछ बातें बताते हैं अर्जुन को। यहाँ से अर्जुन की उत्सुकता कुछ जगती हुई दिखती है तो पूछते हैं, स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताइए, कैसे चलता है, कैसा दिखता है, कैसा आचरण करता है। जैसा कि आम तौर पर शिष्यों के प्रश्न होते हैं, 'लक्षण बता दो, बाहरी बात बता दो, आचरण बता दो।'
तो कृष्ण इस प्रश्न का सदुपयोग करते हैं, अर्जुन ने तो पूछे हैं लक्षण, और कृष्ण बताते हैं अन्तस के बारे में। वो स्थितप्रज्ञ के मन के ही द्वार खोल देते हैं अर्जुन के लिए कि देखो अर्जुन, स्थितप्रज्ञ का मन ऐसा होता है। उसी श्रृंखला में यह अट्ठावनवाँ श्लोक भी है, अब हम इसकी विवेचना करेंगे।
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।









