प्रश्नकर्ता: अभी कुछ दिनों पहले की बात है, संस्था के पास बहुत सारे ई-मेल आते रहते हैं कि हमें आचार्य जी का साक्षात्कार करना है या उनसे बात करनी है, तो कुछ समय से ऐसे ई-मेल्स आने लगे हैं जहाँ पर परिचय ही यही होता है कि 'जी मैं पढ़ाई छोड़ा हुआ हूँ।' मतलब, वो इस बात को भी इस तरीक़े से बताते हैं जैसे कोई बताता है कि 'मैं यहाँ का पूर्व-छात्र हूँ, मैं ये हूँ, वो हूँ;' वो बताते हैं, 'हम ड्रॉप-आउट हैं।' और इसी को अपना सम्मान का प्रतीक समझते हैं। तो ये दिखाने में कि मैंने पढ़ाई को लात मार दी, इसमें ये कहाँ का स्वैग (ग़ुरूर) आ गया है आजकल?
आचार्य प्रशांत: ये गँवार स्वैग है। और इसने भारत को पूरी तरह से अपने गिरफ़्त में ले लिया है, 'मुझे इसी बात का स्वैग है कि मैं गँवार हूँ।' जिस बात पर पहले लाज आती थी कि अनपढ़ हैं, अशिक्षित हैं, गँवार हैं; वो अब स्वैग की बात हो गयी है। 'देखो, मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूँ पर आज मेरे पास कितनी ताक़त है। मेरा यू.एस.पी. (ख़ासियत) ही यही है कि मैं बिलकुल पढ़ा-लिखा नहीं हूँ, लेकिन फिर भी देखो मैं कहाँ पहुँच गया।' तो ज्ञान का अपमान!
और वहाँ तक आप पहुँच कैसे गए? क्योंकि जिन्होंने आपको वहाँ तक पहुँचाया वो भी सब अज्ञानी ही हैं। ख़ासतौर पर सत्ता में तो ये होता है न कि जो आपको अपने जैसा लगता है, आप उसी को वोट दे देते हो। यही काम अध्यात्म में, ‘आय हैव नेवर रेड ऐनी बुक, आय हैव नेवर रेड ऐनी स्क्रिप्चर’ (मैंने कभी कोई पुस्तक नहीं पढ़ी हैं, मैंने कभी कोई ग्रंथ नहीं पढ़ा है)। ये बात गौरव की हो गयी? ये बात शर्म की होनी चाहिए न? अगर कुछ पढ़ा नहीं है तो जाओ, पढ़ो। जाओ, दो-तीन साल की छुट्टी लो, मुँह छुपा करके कहीं पढ़ाई करो।
लेकिन ये बात बड़ी—वही, जो बोला, बैज ऑफ ऑनर है ये, कि मैंने तो कुछ पढ़ा नहीं है। बात यहाँ तक पहुँच गयी, जो थोड़े-बहुत पढे-लिखे भी हैं वो अपनी शिक्षा को छुपाते हैं। मान लीजिए वो आठवीं-दसवीं पास होगा तो कहेगा 'नहीं, मैं बिलकुल निरक्षर हूँ,' क्योंकि निरक्षर होने में जो जलवा है, जो




