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एकै साधे सब सधै || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्राणान्प्रपीड्येह स युक्तचेष्टः श्रीणे प्राणे नासिकयोच्छवसीता। दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान्मनो धास्येताप्रमत्तः॥

विद्वान् पुरूष को चाहिए कि आहार-विहार की सभी क्रियाओं को विधिवत् सम्पन्न करते हुए प्राणायाम की क्रिया करके जब प्राण क्षीण हो तो उसे नासिका से बाहर निकाल दे। जिस प्रकार सारथी दुष्ट अश्वों से युक्त रथ को अत्यन्त सावधानी से लक्ष्य की ओर ले जाता है, उसी प्रकार विद्वान् पुरूष इस मन को अत्यन्त जागरूक होकर वश में किये रहें।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (आध्याय २, श्लोक ९)

आचार्य प्रशांत: योग की दृष्टि से प्राण-वायु पर अनुशासन मन का अनुशासन हो गया न? चित्तवृत्ति निरोध हो गया। चित्त की वृत्ति क्या है? चंचलता। और चित्त जब चंचल होगा तो प्राण भी—प्राण माने श्वास इस अर्थ में—तो प्राण भी चंचल हो जाएँगे। चित्त से श्वास चंचल हो जाती है। तो योग ने कहा कि क्यों न हम श्वास को ही शांत और लय युक्त कर दें। श्वास अगर लीन हो गई, साँस संगीतमय और नियमित हो गई तो मन भी नियमित हो जाएगा। यह योग की दृष्टि से बात हुई।

वेदांत इसको कैसे देखेगा?

वेदांत कहेगा - देखो, प्राणायाम में तुम तीन भाग रखते हो। एक यह कि साँस अंदर जा रही है, उस पर ध्यान देना होता है, उसका अनुशासन। दूसरा, जब तुम श्वास को भीतर रोकते हो उसका अनुशासन। और तीसरा होता है साँस को बाहर छोड़ने का अनुशासन। भीतर जब तुम साँस लेते हो तो उसको योग में कहते हैं 'पूरक'। जब तुम भीतर साँस रोक लेते हो तो उसको कहते हैं 'कुंभक'। और जब तुम साँस छोड़ते हो तो उसे कहते हैं 'रेचक'। तो हम हैं जो कुछ भीतर ले रहे हैं, कुछ अपने भीतर रोक ले रहे हैं, और कुछ है जिसको अपने भीतर से, जिसको मैं 'मैं' कहता हूँ न, अपने भीतर से हम निष्कासित कर रहे हैं, ठीक है?

तो वेदांत कहता है पूरक हुआ 'कोहम्', प्राणायाम में जो पूरक है वो हुआ 'कोहम्'। भीतर क्या लेना है? ये सवाल भीतर लेना है कि 'मैं हूँ कौन?' साँस तो प्रतीक है। मैं वेदांत की दृष्टि से कह रहा हूँ। योग में साँस माने साँस और वेदांत में साँस माने प्रतीक, क्योंकि वेदांत में, याद रखो, मन होता है। तो जो भीतर ले रहा है अपने वो भी कौन है? मन है। तो मन को अपने भीतर क्या लेना है? मन को अपने भीतर यह प्रश्न लेना है कि 'मैं कौन हूँ?' तो कोहम् है पूरक।

और फिर अपने भीतर कुछ रोक लेना है। योग की दृष्टि से जहाँ रोका जा रहा है वह जगह है फेफड़े तुम्हारे, वहाँ रोक रहे हैं। वेदांत की दृष्टि से मन ही है न जो अपने भीतर किसी चीज़ को स्थान दे रहा है। तो मन में क्या रोककर रखना है? मन में रोककर रखना है सोहम्। तो कुंभक हुआ, सोहम्। यह सवाल अपने भीतर लो 'मैं कौन हूँ?' यह बात अपने भीतर जमाकर रखो, स्थाई कर दो कि 'मैं वह हूँ'। और फिर आता है रेचक। बाहर क्या निकालना है, स्वयं से हटाना किस चीज़ को है, मुक्त किस चीज़ से होना है? तो रेचक हुआ नाहम्। 'मैं देह नहीं हूँ, नाहम् देहास्मि्।' कोहम्, सोहम्, नाहम्। यह प्राणायाम है, यह प्राणायाम का वेदांत में अर्थ हुआ।

तो योग में प्राणायाम का अर्थ हुआ साँस अंदर लेना, रोकना और फिर साँस को बाहर निकालना। वेदांत में प्राणायाम का क्या अर्थ हुआ? कि मन पूछ रहा है 'मैं कौन हूँ?', मन दृढ़ता पूर्वक स्थापित हो गया है सोहम् में, और मन ने संकल्प के साथ हटा दिया है इस भाव को कि 'मैं देह हूँ'। यह वेदांत की दृष्टि से प्राणायाम हुआ।

"विद्वान् पुरूष को चाहिए कि आहार-विहार की सभी क्रियाओं को विधिवत् सम्पन्न करते हुए प्राणायाम की क्रिया करके जब प्राण क्षीण हो, तो उसे नासिका से बाहर निकाल दे। जिस प्रकार सारथी दुष्ट अश्वों से युक्त रथ को अत्यन्त सावधानी से लक्ष्य की ओर ले जाता है, उसी प्रकार विद्वान् पुरूष इस मन को अत्यन्त जागरूक होकर वश में किए रहे।"

सारथी है और जो रथ है उसके अश्व, घोड़े दुष्ट हैं। भगवद्गीता का स्मरण हो रहा है। रथ की, सारथी और अश्वों की बात वहाँ भी विस्तार से आयी थी। तो तुम हो सारथी और जो यह तुम्हारा पूरा तंत्र है शरीर का, वो बड़ा दुष्ट है, मनचला है, अन-अनुशासित है। तुम्हारी नहीं सुनता, अपनी ही सुनता है। तुम चाहते हो कि कम खाओ, वो ज़्यादा खा लेता है। कौन ज़्यादा खाता है? जो ज़्यादा खा लेता है उसे तुम बोल देते हो 'मैंने ज़्यादा खा लिया।' तुमने नहीं ज़्यादा खा लिया, तुम्हारे तंत्र ने ज़्यादा खा लिया। तुम्हारे घोड़े बड़े दुष्ट हैं। तुम चाहते थे तुम्हारे घोड़े कम खाएँ, वो ज़्यादा खा गए। यह होता है कि नहीं?

तुम चाहते हो सुबह पाँच बजे उठ जाएँ, यह घोड़े उठे ही नहीं। लेकिन जब रथ होता है तो तुम्हें साफ़ दिख जाता है कि तुम अलग हो, सारथी और घोड़े अलग हैं। दिख जाता है न? जब रथ की बात होती है तो तुम्हें स्पष्ट हो जाता है कि तुम, जो कि सारथी हो, और घोड़े, यह अलग-अलग हैं। यह स्पष्ट हो जाता है और तुम्हें दिख जाता है कि घोड़े, आवश्यक नहीं है कि सारथी की इच्छा का पालन करें। सारथी हो सकता है आदेश दे, 'इधर चलो', घोड़े उधर भग रहे हैं। सारथी बोले 'धीरे चलो', घोड़े बहके जा रहे, उड़े जा रहे। रथ में स्पष्ट हो जाता है, जीवन में, शरीर में स्पष्ट नहीं होता कि तुम अलग हो, तुम्हारी देह और मन अलग हैं। देह, मन को ही घोड़ा मान लो। स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर इनको घोड़ा मान लो।

वहाँ स्पष्ट नहीं होता कि यह अलग हैं। मैं चाहता कुछ और हूँ और यह मेरा साथ नहीं देते। मैं सीधा बैठना चाहता हूँ, बैठ नहीं पाता। मैं संकल्प करता हूँ इतना पढ़ूँगा, हो नहीं पाता। मैं शब्द देता हूँ अपना, प्रण करके वचन देता हूँ कि मैं फ़लाना काम ज़रूर करूँगा। और जब मैं यह वचन दे रहा होता हूँ तो मुझे लगता है कि मैं ईमानदारी से कह रहा हूँ कि पालन करूँगा, और दो दिन बाद पाता हूँ कि वादा तोड़ दिया। तुमने नहीं तोड़ दिया, वादा करा था सारथी ने, तोड़ा है घोड़ों ने। यही बात यहाँ समझायी जा रही है। अरे, वो घोड़े हैं जो तुमने अपने नाम से जोड़े हैं।

सारथी को इतना तो पता है कि वो घोड़ा नहीं है, ठीक है। तुम्हें घोड़ों के साथ ही ज़िंदगी बितानी है क्योंकि तुम हो कौन? सारथी हो। अब सारथी और करेगा क्या? जीवन भर वो घोड़ों पर ही रहेगा, घोड़े ही उसका रथ आगे लेकर के चलेंगे। तो इतना तो पक्का है कि तुम ज़िन्दगी में घोड़ों से कभी पूरी तरह से अलग नहीं हो सकते। अलग होना है तो रथ से ही उतर जाओ। रथ से उतरने का मतलब क्या होगा? कि तुम्हारी गति ही बंद हो गई, माने तुम अब मर गए।

तो जब तक तुम्हारी शारीरिक मृत्यु नहीं हुई, तब तक तुम घोड़ों से अलग नहीं हो सकते। लेकिन भाई, इतना तो याद रहे कि तुम ख़ुद घोड़े नहीं हो। तुम अलग हो, घोड़े अलग हैं; तुम अलग हो, शरीर अलग है। और घोड़े बड़े बदमिज़ाज हैं, अभद्र घोड़े, एकदम शालीनता नहीं जानते। और घोड़ों की बड़ी-से-बड़ी चाल यह कि उन्होंने तुमको आश्वस्त कर दिया कि तुम भी घोड़े हो। तुम भूल ही गए हो कि तुममें यह ताक़त है कि तुम घोड़े पर अनुशासन लगा सकते हो।

श्लोक हमसे यह कह रहा है कि अत्यन्त सावधानी से लक्ष्य की ओर चलो। यही घोड़े, जो तुम्हारी ज़िंदगी का नर्क हैं, अगर तुमने सावधानी दिखा दी तो तुम्हें तुम्हारे लक्ष्य तक लेकर जाएँगे, ठीक वैसे जैसे वही नदी या वही सागर जो तुम्हें डुबो देने के लिए तैयार था, वही तुम्हें उस पार पहुँचाता है, पहुँचाता है कि नहीं?

समुद्र से पानी हटा दो, अब उसके बाद बता दो कि क्या यूरोप से अमेरिका पहुँचना संभव हो पाएगा? मान लो हवाई जहाज़ नहीं है। समुद्रों में पानी ना होता तो क्या कोलम्बस पहुँच पाता अमेरिका? कल्पना करो कि समुद्रों में ज़रा भी पानी नहीं। अब वहाँ पर क्या है? किलोमीटरों गहरी खाई है बस। और भयानक उबड़-खाबड़ खाई, वो खाई ऐसी है कि उसमें नीचे ऊँचे-ऊँचे पर्वत हैं।

तुम जानते हो समुद्र की तलहटी में जो पर्वत हैं उनमें से कई माउंट एवरेस्ट से भी ज़्यादा ऊँचे हैं? समुद्र का तल ऐसा है। तुम्हें क्या लग रहा है, समुद्र का तल ऐसा है जैसा किसी छोटी-मोटी नदी का होता है, सपाट? ना। समुद्र के नीचे बड़े ऊँचे-ऊँचे पहाड़ हैं, बल्कि ज्वालामुखी हैं। जब वो फटते हैं तो क्या आती है? सुनामी। वो समुद्र के नीचे का कोई बहुत ऊँचा पहाड़ फटा है। अब अगर समुद्र में पानी ना हो तो कभी पार कर पाते? तो बताओ कि पानी दुश्मन है या दोस्त?

ठीक उसी तरीके से यह जो घोड़े हैं तुम्हारे रथ में, अगर तुम मूर्ख हो तो ये घोड़े तुम्हारे बहुत बड़े दुश्मन हैं। और तुम होशियार हो तो इन्हीं घोड़ों का इस्तेमाल करके अपनी मंज़िल तक पहुँचोगे। यह तुम पर निर्भर करता है। घोड़ों की बार-बार दुहाई मत देते रहना कि 'हाय! घोड़े, हाय! घोड़े। क्या करें, इधर दौड़े, उधर दौड़े, बदत़मीज़ घोड़े।'

ज़्यादातर लोगों का यही है, नाच ना आवे, आँगन टेढ़ा। हाँकना आता नहीं तो लम्बी-लम्बी हाँक रहे हैं। सावधानी होनी चाहिए। सुंदर शब्द है न, 'सावधान'। सावधानी-पूर्वक बढ़ना है। सा-अवधान; अवधान माने ध्यान। जिधर को बढ़ना है वो ध्येय लगातार याद रहे। घोड़ों को बस में घोड़ों को बार-बार ध्यान देकर नहीं किया जाता, घोड़ों को बस में किया जाता है जब तुम्हारा ध्यान तुम्हारे लक्ष्य पर होता है। यह बात बड़ी मजे़दार है।

ज़िंदगी के यह जितने भी उपद्रवी घोड़े हैं, यह अपने-आप नियंत्रण में आ जाएँगे अगर तुम्हें लगातार तुम्हारी मंज़िल याद रहे। यह घोड़े हैं ही इतने उच्छृंखल क्योंकि तुम्हें तुम्हारे लक्ष्य से कोई प्रेम नहीं है। वो बड़ी चीज़ ठीक कर लो ज़िंदगी की, यह छोटी चीज़ें अपने-आप ठीक हो जाती हैं। और ज़िंदगी में यह छोटी-छोटी चीज़ें बहुत हाहाकर मचाए हुए हैं तो मतलब समझ लेना कि वह बड़ी चीज़ गड़बड़ है, इसलिए यह सब छोटी-छोटी चीज़ें इतना उपद्रव कर रही हैं। जिस सारथी को अपने लक्ष्य से प्यार हो, उसके घोड़ों की मजाल कहाँ कि बहक जाएँ।

बैडमिंटन खेलते हो। शॉट मारना है, शॉट मारते हो तो अपने कंधे, अपनी बाँह, फिर अपनी हथेली और फिर अपनी रैकेट का इस्तेमाल करके, पर देखते किसको हो? जहाँ मारना है। और अगर तुम्हारी नज़र चिपक गई है उससे जहाँ तुम्हें पहुँचना है, तो मजाल है फिर कंधे की और बाँह की और हाथ की और रैकेट की कि ये बहक जाएँ। फिर यह अपने-आप अनुशासन में रहते हैं।

और हो कोई ऐसा धुरंधर जिसे शॉट मारना हो और वह रैकेट को देखे। क्यों भई, उसका तर्क भी तो सही है न? वह कह रहा है ' शॉट मारना मुझे किससे है? रैकेट से है। तो करीब की चीज़ पर ध्यान दूँगा न पहले? पहली चीज़ तो रैकेट है, तो उसको देखूँगा कि बिलकुल आ रही है, आ रही है और रैकेट पर ठीक लग रही है। हाँ ठीक है, अब ठीक है।'

ज़िंदगी की बहुत सारी समस्याएँ अपने-आप हल हो जाती हैं अगर आपके पास एक समुचित लक्ष्य हो। काम किसके लिए कर रहे हो, अगर यह पता है तो काम कैसे करना है यह अपने-आप सीख जाओगे। और अगर बहुत समय हो गया और तब भी सीख नहीं पा रहे हो कि काम कैसे करना है, जीवन कैसे जीना है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि तुम्हारे अभ्यास में कोई कमी है या ज्ञान में कोई कमी है, इसका मतलब है कि तुम्हारे उद्देश्य में ही कमी है।

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